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रेडियो के लिए गुल्लक तोड़ने वाला बच्चा बना रेडियो स्टेशन का मुखिया

रेडियो जुबानी-1: महेंद्र मोदी की जुबानी जानिए, रेडियो से एक छोटे से बच्चे के रिश्ते की शुरुआत.

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फोटो - thelallantop
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विकास टिनटिन
8 मार्च 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 10:42 AM IST)
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तब जब हम और हमारे पापा भी लिटिल थे. रेडियो तब भी था. रेडियो अब भी है. कुछ लोग आज भी रेडियो का नाम सुनते ही 'फीलिंग नॉस्टेलजिया' हो जाते हैं. रेडियो के ऐसे ही दीवानों के लिए 'दी लल्लनटॉप' लाया है एक नई सीरीज 'रेडियो जुबानी'.
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इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ाएंगे. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे. इसी सीरीज की पहली किस्त में जानिए रेडियो के लिए गुल्लक तोड़ने वाले एक प्यारे बच्चे का किस्सा, ये बच्चा आगे जाकर रेडियो स्टेशन का मुखिया बना.
  स्कूल से घर लौटकर बस्ता रखा. मुंह हाथ धोकर खाना खाने बैठा ही था कि दरवाज़े की सांकल बजी. सोचा, लाय (आग) बरसती ऐसी दुपहरी में कौन होगा भला? घर में और कोई था नहीं उस वक्त. भाई साहब अपने किसी क्लासमेट के यहां गए हुए थे. पिताजी अपने दफ्तर और मां मौसी के घर. उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा पसीने में तर मेरा दोस्त हरि अपनी साइकिल को सामने के पेड़ की हल्की सी छाया में खड़ी कर दरवाज़ा खुलने की राह देख रहा है. दरवाज़ा खुलते ही वो चिलचिलाती धूप से भागते हुए घर के अंदर घुस गया. बीकानेर की गर्मी के तेवर उन दिनों कुछ ज्यादा ही तेज हुआ करते थे. एसी जैसे चीज दूर की बात थीं. कूलर भी नहीं होते थे. पचास में से किसी एक घर में पंखा होता था और बाकी लोग खस की टट्टियां खिड़कियों पर लगाकर उस से छनकर कभी-कभार आती हवा से ही गुज़ारा किया करते थे. नींद की मीठी मीठी झपकियों के बीच बार बार हाथ के पंखे को झलना बहुत अखरता था और भगवान पर बड़ा गुस्सा आता था. कि वो गर्मी के मौसम में खूब तेज हवा क्यों नहीं चलाए रखता? मगर हवा जो बंद होती थी तो कुछ इस तरह बंद होती थी कि पेड़ का पत्ता तक नहीं हिलता था. मुझे याद है कि घर में बिजली लगने से पहले कई बार मेरी मांरात रात भर बैठ कर हम लोगों को पंखा झलती रहती थीं. जब कई कई दिन इसी तरह गुजर जाते तो सब लोग भगवान से अरदास करते, 'हे भगवान और कुछ नहीं तो आंधी ही भेज दे.'
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क्षितिज पर उभरता एक छोटा सा काला पीला धब्बा थोड़ी ही देर में रेत का समंदर बनकर पूरे आकाश को ढंक लेता था. हर ओर बस रेत ही रेत. सड़क की बत्तियां जला दी जाती थीं, क्योंकि इस काली पीली आंधी की परत इतनी मोटी होती थी कि सूरज की तेज किरणें भी उस परत को भेद नहीं पाती थीं. हर तरफ मिचमिचाती आंखें और सर पर रुमाल या गमछा लपेटे लोग. और हां हर आंख रेत से कड़कड़ाती हुई और हर मुंह रेत से भरा हुआ. ये आंधी लगातार कई कई दिनों तक चलती रहती थी. इसी रेत की आंधी के बीच सोना. इसी रेत के बीच उठना. इसी के बीच नहाना धोना और इसी के बीच खाना पीना. सुबह सोकर उठते तो देखते कि जिस करवट सोए थे उस करवट पर शरीर के साथ साथ रेत का एक छोटा सा टीला बन गया है और पूरा मुंह रेत से भरा हुआ है. आंखों को बहुत देर तक खोल नहीं पाते थे क्योंकि आंख की पलकें रेत से भरी हुई होती थीं. मगर ये रेत की काली पीली आंधी अपने साथ एक ऐसी सौगात लेकर आती थी जिसकी वजह से इतनी तकलीफों के बावजूद ये आंधी हमें बुरी नहीं लगती थी. ये सौगात थी- गर्मी से राहत.
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बीकानेर में रेडियो स्टेशन साल 1962 में खुल गया था. घर में रेडियो तभी आ गया था मगर रेडियो उन दिनों ड्राइंग रूम की शोभा हुआ करता था. सब लोग उसके चारों तरफ बैठकर ज़ाहिर है, घर के बड़ों की पसंद के प्रोग्राम सुना करते थे. रेडियो पर प्रोग्राम भी चलते रहते थे और गपशप भी. कभी ताऊजी या मामा जी आ जाते थी या पिताजी के मित्रों की मंडली जम जाती थी तो हम बच्चों को वहां से हटना पड़ता था. शायद बड़ों को लगता था कि चाहे हम बच्चे पास न बैठे हों गाने तो दूर तक भी सुनाई देते ही थे. इसलिए उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं लगता था कि रेडियो सुनने के हमारे अधिकार को वो हमसे छीन रहे हैं क्योंकि बाकी लोगों के लिए रेडियो फ़िल्मी गाने सुनने का साधन मात्र था. दो बातें थीं जो मुझे बहुत परेशान करती थीं. दरअसल मेरे पास एक बैंजो था, जो भाई साहब के छठी कक्षा में अव्वल आने पर पिताजी ने उन्हें बतौर ईनाम दिलवाया था. उन्होंने तो दो चार दिन उसे बजाने की कोशिश कर के रख दिया था मगर मुझे वो बहुत आकर्षित करता था. एक दिन भाई साहब से डरते डरते पूछा 'आप तो इसे बजाते नहीं हैं, क्या मैं इसे बजाने की कोशिश करुं?' वो बोले, 'हां मुझसे तो नहीं बज रहा है ये, तुम कोशिश करके देख लो.' मैं रेडियो के पास बैठकर गानों के साथ साथ बैंजो पर सुर मिलाने की कोशिश करता था. जब लोग आस पास बैठे होते तो मेरी ये साधना नहीं हो सकती थी क्योंकि इस काम में एकाग्रता की ज़रूरत होती थी और भीड़ में मैं फोकस नहीं कर पाता था. मेरी दूसरी परेशानी ये थी कि मुझे फ़िल्मी गाने सुनने में जितना आनंद आता था. उस से कहीं ज्यादा मजा रेडियो नाटक सुनने में आता था. जब भी रेडियो पर नाटक सुनने का मौक़ा मिलता था. मेरी इमेजिनेशन के सारे दरवाज़े खुल जाते थे और मैं दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाता था. मगर दुर्भाग्य से घर में न जाने क्यों और किसी को भी रेडियो नाटक सुनने में कोई रुचि नहीं थी. इसलिए अगर कभी मैं रेडियो पर कोई नाटक लगा कर सुनने की कोशिश करता तो कोई न कोई स्टेशन बदल देता और मुझे नाटक की उस खूबसूरत दुनिया से बाहर आना पड़ता. ये दोनों ही समस्याएं ऐसी थीं, जिसका एक ही हल था कि मेरे पास अपना एक अलग रेडियो हो जिसपर मैं जब चाहूं अकेला बैठकर नाटक सुन सकूं और जब चाहूं. उस पर संगीत चलाकर उसके साथ बैंजो बजा सकूं. लेकिन जब बीस-तीस घरों में से किसी एक घर में रेडियो हो तो मुझ जैसे सातवीं आठवी कक्षा के छात्र के पास एक अलग रेडियो हो, ये शायद सपने में ही संभव था.
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अब मुझे लगा कि शायद बात वो नहीं है जो मैं समझ रहा था. मैं उठा और दो तार के टुकड़े लेकर आ गया. अब हरि ने अपनी जेब से काले रंग का एक हैडफोन निकाला जो किसी फोन का एक हिस्सा लग रहा था. उसके पीछे की तरफ दो स्क्रू से निकले हुए थे. तार के दोनों टुकड़े उन स्क्रूज पर लपेटे गए. एक तार को एरियल के तौर पर ऊंचा टांग दिया गया और दूसरे तार के टुकड़े का एक सिरा हरि ने मेरे मुंह में डाल दिया. उस हैडफोन में कुछ कम्पन्न सी होने लगी तो हरि ने उसे मेरे कान से लगा दिया. उसमें बहुत ही साफ़ साफ़ आवाज़ में गाने आ रहे थे. हरि बोला- घर में बिजली न हो. तब भी आकाशवाणी, बीकानेर इसमें जब तक स्टेशन चालू रहे सुना जा सकता है. प्रभु रेडियो पर पांच रुपये में हैडफोन मिलता है और उसमें दो रुपये का एक क्रिस्टल लगवाना पड़ता है. उसी शाम अपनी गुल्लक को तोड़ा तो देखा उसमें आठ रुपये चार आने जमा थे. अपने उस बैंक को खाली करते हुए मुझे ज़रा भी अफ़सोस नहीं हुआ क्योंकि मुझे लगा. इसके बाद मेरी दुनिया बदल जाने वाली थी. मैंने प्रभु रेडियो से हैडफोन खरीद कर उसमें क्रिस्टल लगवाया और घर आकर अपने कमरे में उसे अच्छी तरह फिक्स कर दिया. मेरा कमरा ऊपर की मंजिल पर था.
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