रानी दुर्गावती का कौन सा प्लान अकबर से जीत दिला सकता था?
घायल दुर्गावती ने मुग़लों के हाथों में पड़ने से पहले खुद अपने सीने में खंजर उतार लिया.
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रानी दुर्गावती , चौरागढ़ किला (इमेज सोर्स ट्विटर)
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आज 5 अक्टूबर है और आज की तारीख़ का संबंध है एक महारानी से.

सुभद्रा कुमारी चौहान (फ़ाइल फोटो)
'गढ़ मंडल’ यानी गोंडवाना के उत्तर का इलाक़ा. 16वीं शताब्दी में यहां रानी दुर्गावती ने मुग़लों की विशाल सेना से लोहा लिया था और वीरगति को प्राप्त हुई थीं. 1820 में अंग्रेज प्रशासक सर विलियम हेनरी स्लीमैन ने भारत में प्रवास के दौरान बनाए अपने नोट्स में लिखा है,
यहां पढ़िए: रोज 3 दफा अफीम लेते हुमायूं ने दिल्ली दोबारा कैसे जीत ली?
लेकिन हुमायूं का राज केवल 10 साल रहा. 1540 में शेर-शाह-सूरी, जिसे हुमायूं ‘उस्ताद-ए-बादशाहन' यानी ‘बादशाहों का गुरु’ बुलाया करता था, ने हुमायूं को हराकर ‘सूरी सल्तनत’ खड़ी की. इसी दौरान मध्य भारत में अलग-अलग वंशों और राजे-रजवाड़ों का शासन हुआ करता था. इनमें सबसे मज़बूत था, गोंडवाना राज्य. जिस पर गोंड वंश का शासन था. आज के हिसाब से विदर्भ का पूर्वी इलाक़ा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ का कुछ हिस्सा मिलकर गोंडवाना बनाते हैं. गोंडवाना में भी चार रियासतें थीं, जिनमें से सबसे मज़बूत थी, गढ़ मंडल. आज के हिसाब से जबलपुर का इलाक़ा.

कलिंजर का किला जहां रानी दुर्गावती ने अपना बचपन गुजारा (फ़ाइल फोटो)
16वीं सदी की शुरुआत में उत्तर भारत में लोधी और बाबर की लड़ाई चल रही थी. तब गढ़ मंडल एक छोटा सा राज्य हुआ करता था. 48वें गोंड राजा संग्राम शाह के कमान सम्भालने के बाद उन्होंने अपने राज्य को विस्तार दिया और आसपास के 52 दुर्गों पर अधिकार कर लिया. गढ़ मंडल गोंड राजाओं की सबसे ताकतवर रियासतों में से एक था. उनके पास 1 हज़ार हाथी, 20 हज़ार घुड़सवार सैनिक और एक बड़ी सेना थी. राजकुमारी दुर्गावती का ब्याह गोंडवाना के पड़ोस में चंदेल राजपूतों का राज्य ‘महोबा’ था. इस पर राजा कीरत राय का शासन था. चंदेलों ने कभी महमूद गजनी का सामना किया था. खुजराहो के मंदिर का निर्माण कराया था. लेकिन 1530 तक आते-आते चंदेल एक छोटे से हिस्से में सिमट कर रह गए थे. 1526 में जब बाबर ने लोधी को हराया, उसी साल चंदेल वंश में आज ही के दिन यानी 5 अक्टूबर को एक राजकुमारी का जन्म हुआ. दुर्गाष्टमी के दिन पैदा होने के कारण उसका नाम रखा गया, दुर्गावती.
दुर्गावती ने अपना बचपन कलिंजर के किले में गुज़ारा. बचपन से ही घुड़सवारी और तीरंदाज़ी का शौक़ था. अकबरनामा में अबुल फ़ज़ल ने दुर्गावती के लिए लिख़ा है,

अबुल फ़ज़ल की किताब अकबरनामा का एक अंश और मुग़ल बादशाह अकबर ( सोर्स - इंडिया टुडे )
राजकुमारी ने दलपत शाह की वीरता के किस्से सुने थे. लिहाज़ा उसे इस शादी से कोई ऐतराज ना था. चंदेलों की तब पड़ोस के कालाचूरी राजाओं के साथ दुश्मनी थी. दुर्गावती को अहसास था कि अगर गोंड वंश से रिश्ता जुड़ जाए तो चंदेलों की शक्ति बढ़ जाएगी. लेकिन राजा कीरत राय शादी को तैयार नहीं थे. क्योंकि क्षत्रिय वंश के चंदेल गोंड वंश में शादी नहीं किया करते थे. वही जात-पात, ऊंच-नीच. अंत में जब संग्राम शाह अपनी फ़ौज लेकर कलिंजर के द्वार पर जा पहुंचे तो कीरत राय को हार माननी पड़ी. 1542 में दुर्गावती और दलपत शाह की शादी हो गई. दुर्गावती तब 18 वर्ष की थीं. रानी दुर्गावती 1545 में जब शेर शाह सूरी ने कलिंजर के किले पर आक्रमण किया तो गढ़ मंडल ने चंदेलों की मदद की. इस युद्ध में शेर शाह सूरी की मौत हो गई. और उसी साल रानी दुर्गावती ने भी एक बेटे को जन्म दिया. नाम था, वीर नारायण. वीर नारायण 5 साल का हुआ तो दलपत शाह चल बसे. 5 वर्ष के वीर नारायण को गद्दी पर बिठाकर रानी दुर्गावती राज-काज का काम देखने लगी.
उधर शेरशाह सूरी के बाद मालवा पर सुजात ख़ां ने क़ब्ज़ा कर लिया. 1555 में मालवा की बागडोर उसके बेटे बाज बहादुर खान के हाथ में आई. बाज बहादुर ने 1556 में गढ़ मंडल पर हमला कर दिया. इस लड़ाई में उसे रानी दुर्गावती के हाथों मुंह की खानी पड़ी. उसने दुबारा कभी गोंडवाना की तरफ़ नज़र नहीं डाली. इसी साल यानी 1556 में हुमायूं का इंतक़ाल हो गया और अकबर ने गद्दी सम्भाल ली. गद्दी सम्भालते हुई उसकी नज़र मालवा पर पड़ी. जो गढ़मंडल के बिल्कुल बग़ल में था. 1561 में अकबर ने अपने जनरल अधम ख़ां को मालवा पर हमला करने भेजा. कौन अधम ख़ां? ये जानने के लिए थोड़ा बैकग्राउंड में चलते हैं. अकबर जब पैदा हुआ तब हुमायूं दर-दर भटक रहा था. उसका लाल-पालन ज़िस दाई ने किया था उनका नाम था 'महाम अंगा’. अकबर जब राजगद्दी पर बैठा तो ‘महाम अंगा’ का ओहदा बहुत बड़ा हो गया. अकबर अपनी मां से भी ज़्यादा 'महाम अंगा’ की सुनता था. महाम अंगा का अपना भी एक बेटा था, नाम अधम ख़ां. जिसे अकबर अपने भाई की तरह मानता था.
उन दिनों मालवा के सम्राट बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्रेम प्रसंग का चर्चा चारों तरफ़ थी. रानी रूपमती निहायत ही खूबसूरत थी. अधम ख़ां को जब मालवा पर कूच का पता चला, तो उसने सबसे पहले अपना नाम आगे किया. इसकी एक वजह ये भी थी कि उसकी नीयत ख़राब थी और वो धन दौलत के साथ साथ रानी रूपमती को भी हड़पना चाहता था.
हुआ ये कि साल 1562 में अधम ख़ां ने अकबर के ‘वकील ए मुतलक़’ अतगा खान की हत्या कर दी. ‘वकील ए मुतलक़’ तब मंत्रिपद में सबसे वरिष्ठ पद होता था. जैसे आज प्रधानमंत्री का होता है.
2008 में आई फिल्म ‘जोधा अकबर’ अगर आपने देखी है तो आपको वो सीन याद होगा.
अधम ख़ां ने पीछे से हमला करते हुए अतगा खान की पीठ में खंजर भोंक दिया था. उसके बाद अधम ख़ां अकबर के कक्ष की ओर बढ़ा. अकबर के साथ हाथापाई के बाद सेवकों ने उसे पकड़ लिया. अपने प्रिय वकील की मौत की बात जानकर अकबर का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था, उसने सैनिकों से कहा कि अधम ख़ां को छत से नीचे गिरा दे.

अधम ख़ां को छत से गिराते हुए और मालवा में अकबर से मुलाक़ात (पेंटिंग: शंकर)
इमारत सिर्फ़ 10 फ़ीट ऊंची थी. इस कारण अधम ख़ां को चोट तो लगी लेकिन उसकी सांस चलती रही. अकबर उस दिन रियायत देने के मूड में नहीं था. उसने सैनिकों को आदेश दिया कि अधम ख़ां को पकड़कर ऊपर लाया जाए. अधम ख़ां को एक और बार छत से नीचे फेंका गया. जिसके बाद उसकी मौत हो गई. आसफ़ ख़ां का हमला मालवा हारने के बाद बाज बहादुर ने एक बार फिर मालवा क़ब्ज़ाने में सफलता पाई. तब अकबर ने अपने सबसे जांबाज जनरल आसफ़ ख़ां को सेना सहित मालवा की ओर रवाना किया. मालवा पे क़ब्ज़ा करने के बाद आसफ़ ख़ां ने रीवा पे चढ़ाई की और उसे भी मुग़ल रियासत में शामिल कर लिया. रीवा और मालवा मुग़लों के कब्जे में थे. यानी गढ़ मंडल दोनों तरफ़ से घिर चुका था. रानी दुर्गावती को पता था कि आज या कल मुग़ल उन पर भी हमला करेंगे.
इसके ठीक दो साल बाद यानी 1564 में आसफ़ ख़ां ने गढ़ मंडल पर हमला कर दिया. गढ़ मंडल के मुक़ाबले मुग़लों की सेना कहीं बड़ी थी. रानी दुर्गावती के वजीर आधारसिंह ने उन्हें संधि करने की सलाह दी. तब रानी ने जवाब दिया,

अकबर और नर्राई की लड़ाई के दौरान रानी दुर्गावती (फ़ाइल फोटो)
यहीं पर उनसे एक बड़ी गलती हो गई. अगले दिन आसफ़ ख़ां ने दोगुनी फ़ौज लेकर हमला कर दिया. रानी दुर्गावती अपने हाथी सरमन पर बैठी और रणक्षेत्र में कूद पड़ी. उनके बेटे वीर नारायण ने भी युद्ध में हिस्सा लिया. उसने तीन बार मुग़ल सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. लेकिन अंत में जब वो ज़ख़्मी हो गया तो रानी ने उसे किले की सुरक्षा में भेज दिया. रानी दुर्गावती को भी युद्ध के दौरान दो तीर लगे और वो बेहोश हो गई. जब उन्हें होश आया, मुग़ल जीत चुके थे. उनके महावत ने उनसे भाग जाने को कहा. तब रानी दुर्गावती ने एक ख़ंजर निकाला और अपने सीने में उतार दिया. इसी के साथ वो वीरगति को प्राप्त हो गई.
रानी दुर्गावती की मृत्यु के बाद वीर नारायण मुग़ल सेना से संघर्ष करते रहे. लेकिन जल्द ही वो भी वीरगति को प्राप्त हो गए. जिसके बाद गढ़ मंडल को मुग़ल रियासत में आत्मसात् कर लिया गया.
अकबरनामा में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है,
‘बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी’सुभद्रा कुमारी चौहान की इस कविता ने भारत के बच्चे-बच्चे को रानी लक्ष्मीबाई की कहानी से रूबरू करवाया. कविताओं में प्रेरणाओं का दौर है. सो हम भी सुभद्रा जी की कविता से क्वोट एंड क्वोट प्रेरणा लेकर एक और कविता आपको सुनाते हैं.
‘चंदेलों रजवाड़ों के मुंह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वो तो गढ़ मंडल की रानी थी’

सुभद्रा कुमारी चौहान (फ़ाइल फोटो)
'गढ़ मंडल’ यानी गोंडवाना के उत्तर का इलाक़ा. 16वीं शताब्दी में यहां रानी दुर्गावती ने मुग़लों की विशाल सेना से लोहा लिया था और वीरगति को प्राप्त हुई थीं. 1820 में अंग्रेज प्रशासक सर विलियम हेनरी स्लीमैन ने भारत में प्रवास के दौरान बनाए अपने नोट्स में लिखा है,
“आज भी उसकी समाधि दो पहाड़ियों के बीच एक संकरे रास्ते पर पर देखी जा सकती है. ये वही जगह है जहां वो जंग के मैदान में आख़िरी बार गिरी थी. समाधि के बग़ल में बड़े-बड़े दो गोल पत्थर हैं. मान्यता है कि ये रानी के शाही ढोल थे जिन्हें पत्थर में तब्दील कर दिया गया. रात के सन्नाटे में आज भी उनकी आवाज़ जंगल के उस पार तक गूंजती है. वो अपने योद्धाओं की आत्माओं को बुलाती है जिनकी हज़ारों समाधियां आस-पास ही हैं.”शुरू से शुरुआत 1526 में बाबर ने इब्राहिम लोदी को पानीपत की पहली लड़ाई में हराया और मुग़ल सल्तनत की नींव रखी. उसकी मौत के बाद 1530 में हुमायूं को मुग़ल सल्तनत की कमान मिल गई. जिसके बारे में हमने आपको 23 जुलाई के तारीख़ के एपिसोड में बताया था.
यहां पढ़िए: रोज 3 दफा अफीम लेते हुमायूं ने दिल्ली दोबारा कैसे जीत ली?
लेकिन हुमायूं का राज केवल 10 साल रहा. 1540 में शेर-शाह-सूरी, जिसे हुमायूं ‘उस्ताद-ए-बादशाहन' यानी ‘बादशाहों का गुरु’ बुलाया करता था, ने हुमायूं को हराकर ‘सूरी सल्तनत’ खड़ी की. इसी दौरान मध्य भारत में अलग-अलग वंशों और राजे-रजवाड़ों का शासन हुआ करता था. इनमें सबसे मज़बूत था, गोंडवाना राज्य. जिस पर गोंड वंश का शासन था. आज के हिसाब से विदर्भ का पूर्वी इलाक़ा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ का कुछ हिस्सा मिलकर गोंडवाना बनाते हैं. गोंडवाना में भी चार रियासतें थीं, जिनमें से सबसे मज़बूत थी, गढ़ मंडल. आज के हिसाब से जबलपुर का इलाक़ा.

कलिंजर का किला जहां रानी दुर्गावती ने अपना बचपन गुजारा (फ़ाइल फोटो)
16वीं सदी की शुरुआत में उत्तर भारत में लोधी और बाबर की लड़ाई चल रही थी. तब गढ़ मंडल एक छोटा सा राज्य हुआ करता था. 48वें गोंड राजा संग्राम शाह के कमान सम्भालने के बाद उन्होंने अपने राज्य को विस्तार दिया और आसपास के 52 दुर्गों पर अधिकार कर लिया. गढ़ मंडल गोंड राजाओं की सबसे ताकतवर रियासतों में से एक था. उनके पास 1 हज़ार हाथी, 20 हज़ार घुड़सवार सैनिक और एक बड़ी सेना थी. राजकुमारी दुर्गावती का ब्याह गोंडवाना के पड़ोस में चंदेल राजपूतों का राज्य ‘महोबा’ था. इस पर राजा कीरत राय का शासन था. चंदेलों ने कभी महमूद गजनी का सामना किया था. खुजराहो के मंदिर का निर्माण कराया था. लेकिन 1530 तक आते-आते चंदेल एक छोटे से हिस्से में सिमट कर रह गए थे. 1526 में जब बाबर ने लोधी को हराया, उसी साल चंदेल वंश में आज ही के दिन यानी 5 अक्टूबर को एक राजकुमारी का जन्म हुआ. दुर्गाष्टमी के दिन पैदा होने के कारण उसका नाम रखा गया, दुर्गावती.
दुर्गावती ने अपना बचपन कलिंजर के किले में गुज़ारा. बचपन से ही घुड़सवारी और तीरंदाज़ी का शौक़ था. अकबरनामा में अबुल फ़ज़ल ने दुर्गावती के लिए लिख़ा है,
“वो बंदूक़ चलाने और निशानेबाज़ी में माहिर थी. और लगातार शिकार पर जाया करती थी.”उनके बारे में एक और किस्सा मशहूर है कि शिकार के दौरान उन्हें कोई बाघ दिख जाता, तो वो जब तक उसे निशाना नहीं बना लेती, पानी नहीं पीती थीं. राजकुमारी दुर्गावती बड़ी हुई तो आसपास के राज्यों में उसकी ख़ूबसूरती और युद्ध कौशल के चर्चे फैल गए. ये खबर गढ़ मंडल तक भी पहुंची. संग्राम शाह के बड़े बेटे का नाम था, दलपत शाह. जिसकी शादी वो किसी कुलीन राजकुमारी से करना चाहते थे.

अबुल फ़ज़ल की किताब अकबरनामा का एक अंश और मुग़ल बादशाह अकबर ( सोर्स - इंडिया टुडे )
राजकुमारी ने दलपत शाह की वीरता के किस्से सुने थे. लिहाज़ा उसे इस शादी से कोई ऐतराज ना था. चंदेलों की तब पड़ोस के कालाचूरी राजाओं के साथ दुश्मनी थी. दुर्गावती को अहसास था कि अगर गोंड वंश से रिश्ता जुड़ जाए तो चंदेलों की शक्ति बढ़ जाएगी. लेकिन राजा कीरत राय शादी को तैयार नहीं थे. क्योंकि क्षत्रिय वंश के चंदेल गोंड वंश में शादी नहीं किया करते थे. वही जात-पात, ऊंच-नीच. अंत में जब संग्राम शाह अपनी फ़ौज लेकर कलिंजर के द्वार पर जा पहुंचे तो कीरत राय को हार माननी पड़ी. 1542 में दुर्गावती और दलपत शाह की शादी हो गई. दुर्गावती तब 18 वर्ष की थीं. रानी दुर्गावती 1545 में जब शेर शाह सूरी ने कलिंजर के किले पर आक्रमण किया तो गढ़ मंडल ने चंदेलों की मदद की. इस युद्ध में शेर शाह सूरी की मौत हो गई. और उसी साल रानी दुर्गावती ने भी एक बेटे को जन्म दिया. नाम था, वीर नारायण. वीर नारायण 5 साल का हुआ तो दलपत शाह चल बसे. 5 वर्ष के वीर नारायण को गद्दी पर बिठाकर रानी दुर्गावती राज-काज का काम देखने लगी.
उधर शेरशाह सूरी के बाद मालवा पर सुजात ख़ां ने क़ब्ज़ा कर लिया. 1555 में मालवा की बागडोर उसके बेटे बाज बहादुर खान के हाथ में आई. बाज बहादुर ने 1556 में गढ़ मंडल पर हमला कर दिया. इस लड़ाई में उसे रानी दुर्गावती के हाथों मुंह की खानी पड़ी. उसने दुबारा कभी गोंडवाना की तरफ़ नज़र नहीं डाली. इसी साल यानी 1556 में हुमायूं का इंतक़ाल हो गया और अकबर ने गद्दी सम्भाल ली. गद्दी सम्भालते हुई उसकी नज़र मालवा पर पड़ी. जो गढ़मंडल के बिल्कुल बग़ल में था. 1561 में अकबर ने अपने जनरल अधम ख़ां को मालवा पर हमला करने भेजा. कौन अधम ख़ां? ये जानने के लिए थोड़ा बैकग्राउंड में चलते हैं. अकबर जब पैदा हुआ तब हुमायूं दर-दर भटक रहा था. उसका लाल-पालन ज़िस दाई ने किया था उनका नाम था 'महाम अंगा’. अकबर जब राजगद्दी पर बैठा तो ‘महाम अंगा’ का ओहदा बहुत बड़ा हो गया. अकबर अपनी मां से भी ज़्यादा 'महाम अंगा’ की सुनता था. महाम अंगा का अपना भी एक बेटा था, नाम अधम ख़ां. जिसे अकबर अपने भाई की तरह मानता था.
उन दिनों मालवा के सम्राट बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्रेम प्रसंग का चर्चा चारों तरफ़ थी. रानी रूपमती निहायत ही खूबसूरत थी. अधम ख़ां को जब मालवा पर कूच का पता चला, तो उसने सबसे पहले अपना नाम आगे किया. इसकी एक वजह ये भी थी कि उसकी नीयत ख़राब थी और वो धन दौलत के साथ साथ रानी रूपमती को भी हड़पना चाहता था.
मालवा पर कब्जे के बाद वो रानी रूपमती को अगवा करने पहुंचा. लेकिन उसका ये मंसूबा कामयाब नहीं हो पाया. लोक कथाओं के अनुसार, जब अधम ख़ां ने मालवा के महत्वपूर्ण किले ‘मांडू’ पर क़ब्ज़ा कर लिया तो रानी रूपमती ने ज़हर खाकर अपनी जान दे दी. मालवा जीतकर अधम ख़ां ने अकबर के पास चंद हाथी घोड़े भिजवाए, लेकिन अधिकतर धन-सम्पदा अपने पास ही रख ली. अकबर को जब ये खबर लगी तो वो खुद सेना लेकर मालवा पहुंचा. अधम ख़ां को जीती हुई धन सम्पदा अकबर को लौटानी पड़ी. दस फ़ीट नीचे दो बार महाम अंगा के कारण अकबर अधम ख़ां की हरकतों को नज़र अन्दाज़ कर देता था. लेकिन 1562 में उसकी एक हरकत ने अकबर के सब्र का बांध तोड़ दिया.
बाज बहादुर और रानी रूपमती (फ़ाइल फोटो)
हुआ ये कि साल 1562 में अधम ख़ां ने अकबर के ‘वकील ए मुतलक़’ अतगा खान की हत्या कर दी. ‘वकील ए मुतलक़’ तब मंत्रिपद में सबसे वरिष्ठ पद होता था. जैसे आज प्रधानमंत्री का होता है.
2008 में आई फिल्म ‘जोधा अकबर’ अगर आपने देखी है तो आपको वो सीन याद होगा.
अधम ख़ां ने पीछे से हमला करते हुए अतगा खान की पीठ में खंजर भोंक दिया था. उसके बाद अधम ख़ां अकबर के कक्ष की ओर बढ़ा. अकबर के साथ हाथापाई के बाद सेवकों ने उसे पकड़ लिया. अपने प्रिय वकील की मौत की बात जानकर अकबर का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था, उसने सैनिकों से कहा कि अधम ख़ां को छत से नीचे गिरा दे.

अधम ख़ां को छत से गिराते हुए और मालवा में अकबर से मुलाक़ात (पेंटिंग: शंकर)
इमारत सिर्फ़ 10 फ़ीट ऊंची थी. इस कारण अधम ख़ां को चोट तो लगी लेकिन उसकी सांस चलती रही. अकबर उस दिन रियायत देने के मूड में नहीं था. उसने सैनिकों को आदेश दिया कि अधम ख़ां को पकड़कर ऊपर लाया जाए. अधम ख़ां को एक और बार छत से नीचे फेंका गया. जिसके बाद उसकी मौत हो गई. आसफ़ ख़ां का हमला मालवा हारने के बाद बाज बहादुर ने एक बार फिर मालवा क़ब्ज़ाने में सफलता पाई. तब अकबर ने अपने सबसे जांबाज जनरल आसफ़ ख़ां को सेना सहित मालवा की ओर रवाना किया. मालवा पे क़ब्ज़ा करने के बाद आसफ़ ख़ां ने रीवा पे चढ़ाई की और उसे भी मुग़ल रियासत में शामिल कर लिया. रीवा और मालवा मुग़लों के कब्जे में थे. यानी गढ़ मंडल दोनों तरफ़ से घिर चुका था. रानी दुर्गावती को पता था कि आज या कल मुग़ल उन पर भी हमला करेंगे.
इसके ठीक दो साल बाद यानी 1564 में आसफ़ ख़ां ने गढ़ मंडल पर हमला कर दिया. गढ़ मंडल के मुक़ाबले मुग़लों की सेना कहीं बड़ी थी. रानी दुर्गावती के वजीर आधारसिंह ने उन्हें संधि करने की सलाह दी. तब रानी ने जवाब दिया,
“बिना स्वाभिमान के जीने से इज्जत की मौत पाना कहीं बेहतर है”लड़ाई की तैयारी के लिए रानी अपनी सेना लेकर ‘नर्राई नाला' पहुंची. ये एक पहाड़ी इलाक़ा था. इसके दोनों तरफ़ गौड़ और नर्मदा नदियां बहती थीं. पहले हमले में रानी के फ़ौजदार अर्जुन दास की मौत हो गई. तब रानी ने खुद फ़ौज की कमान सम्भाली. मुग़ल सैनिक तराई के इलाक़े में पहुंचे तो रानी ने खुद लीड करते हुए मुग़लों पर हमला बोल दिया. इस लड़ाई में मुग़लों को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा, लेकिन रानी दुर्गावती की सेना को बहुत नुक़सान हुआ. रानी दुर्गावती का प्लान मुग़ल रिट्रीट कर रहे थे. ऐसे में रानी दुर्गावती ने अपने सिपह सलाहकारों को बुलाया और उनसे नई युद्ध नीति को लेकर सलाह मशवरा किया. रानी का प्लान था कि अगर वो रात में मुग़लों पर हमला कर दें तो सेना चौंक जाएगी. इस प्लान में उनके जीतने के चांसेज सबसे ज़्यादा थे. लेकिन मंत्रीगणों ने पहाड़ी इलाक़े का हवाला देते हुए रात की लड़ाई का विरोध किया. और रानी ने इस प्लान को टाल दिया.

अकबर और नर्राई की लड़ाई के दौरान रानी दुर्गावती (फ़ाइल फोटो)
यहीं पर उनसे एक बड़ी गलती हो गई. अगले दिन आसफ़ ख़ां ने दोगुनी फ़ौज लेकर हमला कर दिया. रानी दुर्गावती अपने हाथी सरमन पर बैठी और रणक्षेत्र में कूद पड़ी. उनके बेटे वीर नारायण ने भी युद्ध में हिस्सा लिया. उसने तीन बार मुग़ल सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. लेकिन अंत में जब वो ज़ख़्मी हो गया तो रानी ने उसे किले की सुरक्षा में भेज दिया. रानी दुर्गावती को भी युद्ध के दौरान दो तीर लगे और वो बेहोश हो गई. जब उन्हें होश आया, मुग़ल जीत चुके थे. उनके महावत ने उनसे भाग जाने को कहा. तब रानी दुर्गावती ने एक ख़ंजर निकाला और अपने सीने में उतार दिया. इसी के साथ वो वीरगति को प्राप्त हो गई.
रानी दुर्गावती की मृत्यु के बाद वीर नारायण मुग़ल सेना से संघर्ष करते रहे. लेकिन जल्द ही वो भी वीरगति को प्राप्त हो गए. जिसके बाद गढ़ मंडल को मुग़ल रियासत में आत्मसात् कर लिया गया.
अकबरनामा में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है,
“गढ़ मंडल से इतना सोना-चांदी, ज़ेवरात और धन सम्पदा मिली कि उसके एक हिस्से की गिनती कर पाना भी नामुमकिन था”आसफ़ ख़ां ने भी सिर्फ़ 200 हाथी अकबर के दरबार में भेजकर बाकी सारी दौलत हड़प ली. जिसे हासिल करने अकबर को खुद जाना पड़ा. इसके 25 साल बाद मुग़लों ने सिर्फ़ 10 किले अपने पास रखकर गढ़ मंडल की बागडोर संग्राम शाह के छोटे बेटे चंद्र शाह के हाथ में दे दी. आगे चलकर ये इलाक़ा मराठाओं के कब्जे में रहा और दूसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद इस पर अंग्रेजों का क़ब्ज़ा हो गया. जिसकी कहानी कभी और.

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