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वो इकलौता मौका, जब पूरा मुल्क एक कातिल को बचाना चाहता था

नानावटी सिल्विया से प्यार करता था. प्रेम ने सिल्विया से प्रेम किया. नहीं नहीं. नाटक किया. ताकि उसकी देह से प्रेम कर सके. नानावटी सिल्विया की अब भी केयर करता था. इसलिए उसने प्रेम को किल कर दिया.

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prem ahuja murdered in Mumbai in 1959 by Naval Commander Kawas Manekshaw Nanavati over his affair with his wife Sylvia covered by Blitz
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विकास टिनटिन
30 मार्च 2016 (अपडेटेड: 10 अप्रैल 2017, 07:48 AM IST)
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मुलाकात का मिजाज इश्क से कुछ महरूम रहता है. नानावटी को अखरता है. सेल्विया को प्यार हो गया था, मगर किसी और से. बॉम्बे के अय्याश बिजनेसमैन प्रेम आहूजा से. खामोश आंखों से नानावटी अपने घर से निकल जाता है. साथ में सेल्विया और बच्चों को ले जाकर सिनेमा हॉल छोड़ देता है. कहता- तुम लोग फिल्म देखो. मैं आता हूं. नानावटी हॉल से सीधा जाता है नेवल हेडक्वार्टर. सर्विस रिवॉल्वर इश्यू करवाकर सीधा पहुंचता है बॉम्बे की मालाबार हिल्स के पास जीवन ज्योति बिल्डिंग. प्रेम आहूजा के अपार्टमेंट. नानावटी प्रेम आहूजा के बैडरूम में जाता है. कुछ देर बाद बाहर काम कर रहे नौकर कांच टूटने की आवाज के साथ तीन गोलियों की गूंज सुनकर अंदर दौड़ पड़ते हैं. टॉवल और खून से सना प्रेम आहूजा फर्श पर पड़ा हुआ था. प्रेम आहूजा की बहन मैमी नानावटी को चौंकी सवालिया आंखों से देखती है. नानावटी बिना जवाब दिए घर के सिक्योरिटी गार्ड से निकलते वक्त कहता, 'मैं सरेंडर करने पुलिस के पास जा रहा हूं.'
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किस्सा यहां से खत्म नहीं, शुरू होता है. इंडियन हिस्ट्री का सबसे यादगार दिलचस्प केस. कमांडर नानावटी केस, जिस में उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी दिलचस्पी रही. ये केस ज्यूरी ट्रायल, बॉम्बे सेशन कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा गया. कोर्ट समेत सब ने माना कि नानावटी ने आहूजा को मारा. खुद नानावटी ने भी. लेकिन उतने ही लोगों ने कहा- वो दोषी नहीं है. लेकिन सबने चाहा कि उसे रिहा किया जाए. नेहरू की बहन और तत्कालीन बॉम्बे गर्वनर विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर बाद में खुद प्रेम आहूजा की बहन तक. कोर्ट के बाहर खड़ी सैकड़ों की भीड़ मर्डर के दोषी नानावटी की रिहाई की दुआ करते. नानावटी उस वक्त का हीरो बन चुका था.
films on nanavati
नानावटी केस इतना दिलचस्प रहा कि कई फिल्में बनीं. किताबें लिखी गईं. 1963 में आई 'ये रास्ते हैं प्यार के' और 'अचानक'. सलमान रूश्दी जैसे बड़े राइटर्स ने 'मिडनाइट्स चिल्ड्रन'  में इस इंसीडेंट पर अपनी किताब में एक चैप्टर लिखा. अक्षय कुमार की फिल्म 'रुस्तम' भी पूरी तरह से नानावटी केस पर बेस्ड है. पर ये तो बात हुई नानावटी केस और उसके पब्लिक सपोर्ट की. हम आपको बताते हैं उस केस की पूरी डिटेल्स. क्यों और कैसे एक गुनहगार कमांडर के किए मर्डर को देशभक्ति से जोड़ा गया. और उसे बचाने के लिए ज्यादातर सब एक ही हमाम में नजर आए.
तारीख: 27 अप्रैल 1959, पुलिस स्टेशन, बॉम्बे कमांडर नानावटी: मैंने एक आदमी को गोली मारी. इंस्पेक्टर लोबो: वो मर चुका है. मुझे अभी गामदेवी पुलिस स्टेशन से ये मैसेज मिला. कमांडर नानावटी, क्या आप चाय पिएंगे? कमांडर नानावटी: बस एक ग्लास पानी.
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कब शुरू हुआ ट्रायल? 23 सितंबर 1959. खचाखच भरे डिस्ट्रिक और सेशन कोर्ट में केस की सुनवाई शुरू हुई. जज थे आरबी मेहता. ये केस सबसे पहले ज्यूरी में चला. ज्यूरी में कुल 9 मेंबर थे. दो पारसी, एक एंग्लो इंडियन, एक क्रिश्चियन और पांच हिंदू. सरकार की तरफ से चीफ पब्लिक प्रोसिक्यूटर सी. एम त्रिवेदी ने नानावटी पर प्रेम आहूजा की इरादतन हत्या का चार्ज लगाया. डिफेंस की तरफ से फेमस क्रिमिनल लॉयर कार्ल जे खंडालावाला केस लड़ रहे थे. ये पूरा ट्रायल एक महीने चला. ज्यूरी मेंबर्स क्राइम सीन वाली जगह तक गए.
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आहूजा के वकीलों ने कहा, नानावटी ने प्लान कर मर्डर किया था. सबूत पेश किए गए. 24 गवाहों की गवाही हुई. जिन इंस्पेक्टर लोबो के सामने नानावटी ने सरेंडर किया था, उनकी गवाही भी हुई. लेकिन लोबो के सामने नानावटी के कबूलनामे को ज्यूरी के सामने इसलिए भी नहीं माना गया, क्योंकि गवाही मैजेस्ट्रियल सुपरविजन में नहीं हुई थी. लोबो ने कोर्ट में लिखकर कहा:
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लोबो के इस बयान के बारे में आहूजा का केस लड़ रहे वकीलों ने कहा, 'ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नानावटी ने आहूजा को जानबूझकर दूर से मारा, ताकि कोई सबूत न रह जाए.' डिफेंस के वकीलों ने कोर्ट में तमाम सबूत पेश किए, कि प्रेम आहूजा की मौत महज एक हादसा थी. नानावटी की तरफ से सेल्विया ने भी कोर्ट में गवाही दी. मंजर कोर्ट का कुछ यूं था कि दो दिन नानावटी विटनेस बॉक्स में खड़ा रहा.
  सेल्विया और नानावटी ने कोर्ट में कहा:

मर्डर का लव ट्रॉयंगल

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ज्यूरी और बाद में कोर्ट में सेल्विया और नानावटी ने बारी बारी से ये बयान दिया. नानावटी से पब्लिक प्रोसिक्यूटर ने पूछा, अगर आप प्रेम आहूजा को इरादतन नहीं मारना चाहते थे, तो क्यों आपने अपनी सर्विस रिवॉल्वर इश्यू करवाई. नानावटी ने इसके जवाब में कहा,

'मैं खुद की जान लेना चाहता था, इसलिए मैंने सर्विस रिवॉल्वर इश्यू करवाई.'


नानावटी का जलवा केस की सुनवाई के दौरान नानावटी की दीवानगी हर तरफ थी. कोर्ट की गैलरी में लड़कियां सज धज कर आती थीं. द न्यू यॉर्कर की जर्नलिस्ट एमिली हाहन के मुताबिक, लड़कियां केस की सुनवाई के लिए ऐसे सजकर आतीं, जैसे ओपेरा जा रही हों. मैडल और सफेद नेवी ड्रेस में कमांडर नानावटी कमाल लगता था. लोग नानावटी से मुहब्बत करने लगे थे. सनकी, जिद्दी, धाकड़ Blitz एडिटर: करंजिया रूसी के करंजिया. अमीर पारसी परिवार में पैदा हुए. टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए 'लेटर्स टू द एडिटर' लिखते. पेपर के एडिटर को लेखनी बढ़िया लगी तो नौकरी के लिए बुला लिया. ट्रेनिंग के लिए लंदन भेजा. इंडिया लौटे तो पेपर छोड़ दिया. साल 1941 में एक टैबलॉयड शुरू किया. नाम रखा Blitz. नानावटी केस में खुल्लम खुल्ला स्टैंड लेने वाला इकलौता अखबार.
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Blitz शुरू होने के कुछ वक्त बाद ही काफी फेमस हो गया था. Blitz वीकली पेपर था, इसके बावजूद नानावटी केस की जैसी कवरेज Blitz ने की, कोई दूजा अखबार नहीं कर पाया. करंजिया ने अखबार में चार-चार पन्ने नानावटी केस की कवरेज पर छापे. नानावटी के लिए करंजिया ने खुलकर स्टैंड लिया. बिना किसी परवाह के.
nanawati case for defence
फोटो फीचर लगाने के साथ सेल्विया के प्रेम आहूजा और कमांडर नानावटी के लिए लोगों की दीवानगी को Blitz ने खूब परोसा. बताते हैं कि Blitz ने नानावटी केस की ऐसी कवरेज करी कि शनिवार को आने वाले इस अखबार को खरीदने के लिए लोग शुक्रवार को ही न्यूजपेपर स्टैंड पर जुट जाते थे. 25 पैसे का ये अखबार उस दौर में 2 रुपये तक बिका है.
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डिफेंस बनाम प्रोसिक्यूशन

नानावटी के वकील कार्ल खंडालावाला ने ज्यूरी के सामने कहा, 'प्रेम आहूजा की मौत बस एक हादसा है. नानावटी के खिलाफ एक भी पुख्ता सबूत नहीं है. कमांडर नानावटी ने इस देश के कानून, भगवान की नजर में कोई अपराध नहीं किया है. मैं किसी दया या सिम्पेथी की उम्मीद नहीं करता हूं. मैं बस चाहता हूं कि फैक्टस के आधार पर फैसला हो.' प्रेम आहूजा और सरकार की तरफ से केस लड़ रहे वकील त्रिवेदी ने कहा, सबूत ये साफ कह रहे हैं कि नानावटी ने जानबूझकर प्रेम आहूजा का मर्डर किया. सारे सबूत नानावटी के खिलाफ हैं. लेकिन इस केस की एक्सपशनल सर्कमस्टेंशस को देखते हुए ज्यूरी नानावटी को गिल्टी करार देने का फैसला वापस ले सकती है.'
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तारीख 21 अक्टूबर 1959. जज ने ज्यूरी से फैसला सुनाने के लिए कहा. शाम के साढ़े चार बज रहे थे. ज्यूरी ने कुछ वक्त मांगा. घंटे बीते. लोगों की भीड़ बढ़ी. ज्यूरी शाम को साढ़े सात बजे लौटी और फैसला सुनाया: 'कमांडर नानावटी मर्डर के दोषी नहीं हैं, नॉट गिल्टी.' ज्यूरी ने प्रेम आहूजा की इरादतन हत्या करने के आरोप को भी खारिज किया. इस फैसले के पक्ष में ज्यूरी के 9 में से 8 मेंबर रहे. कोर्टरूम में तालियां बजने लगी. सब चहकने लगे. लेकिन कुछ देर बाद ही सेशन कोर्ट जज मेहता ने एक बात कही, जिससे मंजर में खामोशी छा गई. जज मेहता ने ज्यूरी के फैसले के बावजूद केस को बॉम्बे हाईकोर्ट में रेफर कर दिया. कहा- इंसाफ के लिए ये जरूरी है.
हाईकोर्ट में नानावटी केस हाईकोर्ट में नानावटी केस में डिफेंस की सारी दलीलें काम नहीं आईं. हाईकोर्ट में कमांडर नानावटी घिरते नजर आए. हाईकोर्ट में नानावटी को दोषी माना गया. आगे केस सुप्रीम कोर्ट गया, वहां भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया. नानावटी को जेल भेज दिया गया. मुंबई के गवर्नर ने इंडिया के संविधान का हवाला देते हुए कहा कि नानावटी केस की नेवल कस्टडी पेंडिंग है, सुप्रीम कोर्ट में इसको लेकर याचिका भी दायर की हुई. तब के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने नेवी चीफ की अपील और लॉ मिनिस्ट्री की क्लीयरेंस मिलने पर गर्वनर को नानावटी की सजा सस्पेंड करने और रिमांड नेवी को सौंपने की सलाह दी. Blitz ने नानावटी को माफी देने को लेकर फ्रंट पेज पर लगभग कैंपेन सा चला दिया. लोग नानावटी को माफ करने की अपील करने लगे.
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उधर, प्रेम आहूजा की बहन मैमी ने लिखित में नानावटी को माफ करने के लिए अपील की. मैमी ने कहा कि उसे नानावटी के रिहा होने से कोई दिक्कत नहीं है. दोनों पार्टियों के बीच समझौते की बात की जाने लगी. तब काम आए वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी. जेठमलानी ने दोनों ग्रुप्स के बीच समझौता कराया. तब मुंबई की गवर्नर थीं नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित. गवर्नर विजयलक्ष्मी पंडित ने एक ही दिन नानावटी और भाईप्रताप को जेल से रिहा कर दिया. तारीख थी 17 मार्च 1964. तीन साल से कम वक्त जेल में रहने के बाद नानावटी जेल से रिहा हो चुका था. कुछ वक्त मुंबई में रहने के बाद नानावटी फैमिली के साथ कनाडा शिफ्ट हो गए. और फिर कभी नहीं लौटे. साल 2003 में कमांडर नानावटी की मौत हो गई.

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