जिस पर दाऊद से मिले होने का आरोप लगा, उसी पुलिसवाले ने दाऊद के भाई को दबोच लिया है
1989 से 2006 के बीच 17 साल में इस एक पुलिस अधिकारी ने 113 एनकाउंटर किए.
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फोटो - thelallantop
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ये 1978 का साल था. दिल्ली में 16 साल की गीता चोपड़ा और उसके 14 साल के भाई संजय का अपहरण हो गया. इस अपहरण को अंजाम देने वाले थे कुलजीत सिंह उर्फ़ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ़ बिल्ला. इन लोगों ने अपहरण के बाद फिरौती न मिलने के चलते गीता और संजय का कत्ल कर दिया था. उस समय यह केस नेशनल मीडिया में छाया रहा था और 'रंगा-बिल्ला' केस के नाम से लोगों की जबान पर चढ़ गया था.
इस समय बॉम्बे में भी अपराधियों का एक जोड़ा तेजी से उभर रहा था. रंगा-बिल्ला केस की तर्ज पर उन्हें भी यही नाम दे दिया गया. इस अपराधी जोड़े का नाम था, जावेद खान और अब्दुल रहीम. जावेद-रहीम की यह जोड़ी अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात थी.

प्रदीप शर्मा
रिवॉल्वर की नाल से निकली पहली मौत
अगस्त 1989. बॉम्बे पुलिस के पास खबरी नेटवर्क से एक खबर आई कि रंगा-बिल्ला की यह जोड़ी घाटकोपर वेस्ट के माणकलाल इस्टेट की किसी चाल में छुपी हुई है. इस सूचना के मिलने के बाद घाटकोपर पुलिस स्टेशन से तीन कांस्टेबल और एक सब इंस्पेक्टर की टीम इन अपराधियों को दबोचने के लिए भेजी गई.
माणक लाल इस्टेट की इस चाल की बसावट बहुत संकरी थी. यहां पुलिस की टीम दो हिस्सों में बंट गई और हर घर का दरवाजा खटखटा कर देखने लगी. यह वो दौर था जब बॉम्बे में बड़े से बड़ा अपराधी खाकी वर्दी के सामने मूत दिया करता था. बुरी तरह से घिर जाने के बावजूद भी अपराधी पुलिस पर हमला करने से बचते थे. इस गश्त पर भी सिवाय एसआई के चारों कॉन्स्टेबल लाठी के दम पर दोनों अपराधियों को पकड़ने पहुंच गए.

प्रदीप शर्मा
दो कॉन्स्टेबल की एक टुकड़ी ने उस घर का दरवाजा खटखटाया जहां रंगा-बिल्ला छुपे हुए थे. उम्मीद से उलट जावेद उर्फ़ रंगा नंगी तलवार लिए कमरे से बाहर आया. उसने एक भरपूर वार सामने खड़े कॉन्स्टेबल की बांह पर किया और दूसरे कॉन्स्टेबल की तरफ लपका. घायल कॉन्स्टेबल दर्द के मारे चिल्ला रहा था. यह चीख टीम को लीड कर रहे सब-इंस्पेक्टर के कानों में पड़ी. वो अपने एक और साथी की तरफ वारदात की जगह की तरफ लपके.

प्रदीप शर्मा के पहले एनकाउंटर का किस्सा एस हुसैन जैदी की इस किताब में दर्ज है
वहां जाकर उन्होंने देखा कि जावेद हाथ में पिस्तौल लिए उनका इंतजार कर रहा है. उसके साथी रहीम के हाथ में वो तलवार थी जिससे अभी-अभी पुलिस के दो जवानों को घायल किया गया था. जावेद पुलिस की दूसरी टुकड़ी पर हमला कर पाता इससे पहले वहां खड़े सब-इंस्पेक्टर ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकली और सभी एक के बाद एक छह गोलियां दोनों की तरफ दाग दीं. दोनों अपराधी मौके पर ही खत्म हो गए. इस सब-इंस्पेक्ट का नाम था, प्रदीप शर्मा. यह उनका पहला एनकाउंटर था. 1989 से 2006 के बीच 17 साल में इस एक पुलिस अधिकारी ने 113 एनकाउंटर किए.
1983 का किलर बैच
1961 के साल में प्रदीप शर्मा का जन्म आगरा में हुआ. इसके एक साल बाद ही उनके पिता को धुले (महाराष्ट्र) के डिग्री कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी मिल गई. वो परिवार के साथ धुले में जाकर बस गए. M.Sc. तक की पढ़ाई करने के बाद वो पुलिस में बतौर सब-इंस्पेक्टर चुन लिए गए. साल था 1983. महाराष्ट्र पुलिस एकेडमी से निकला 1983 का सब-इंस्पेक्टर बैच बाद में खूब मशहूर हुआ. इस बैच को 'किलर बैच' के नाम से जाना जाता है. विजय सालसकर, प्रदीप शर्मा, राजू पिल्लई, प्रफुल भोसले, रविन्द्र अंगरे और असलम मोमिन जैसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इसी बैच की देन हैं.
एक फ़िल्मी मुठभेड़
1989 में जावेद-रहीम के एनकाउंटर ने प्रदीप शर्मा का खाता खोला था लेकिन उनके काम को पहचान मिली 1993 में. जावेद-रहीम के एनकाउंटर के बाद उन्हें स्पेशल ब्रांच भेज दिया गया. 6 मई 1993 का दिन था. क्राइम ब्रांच के पास सूचना आई कि सुभाष माकड़वाला अपनी कुख्यात AK 56 के साथ घाटकोपर के अमृत नगर के एक फ्लैट ने निकलने वाला है. उस दौर में मुंबई के किसी भी माफिया के पास ऑटोमेटिक असलहा नहीं हुआ करता था. पुलिस भी सेल्फ लोडिंग रायफल और 9 एमएम रिवॉल्वर से काम चला रही थी.

विजय सालसकर: मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट जिन्होंने 26/11 के हमले में शहादत दी
घाटकोपर पुलिस स्टेशन में इंस्पेक्टर शंकर कांबले ने स्पेशल ब्रांच से मदद की गुहार की. रात का वक़्त था स्पेशल ब्रांच के दो सब-इंस्पेक्टर विजय सालसकर और प्रदीप शर्मा घाटकोपर में शंकर काम्बले की मदद के लिए पहुंचे. वो लोग अमृत नगर की उस बिल्डिंग पर पहुंचे जहां माकड़वाला के होने की सूचना थी.
विजय सलासकर गाड़ी चला रहे थे और प्रदीप शर्मा .9 एमएम कार्बाइन के साथ उनके बगल में बैठे हुए थे. सालसकर ने देखा कि एक नीले रंग की मारुती 800 बिल्डिंग के बाहर निकल रही है. सालसकर ने अपनी गाड़ी ठीक उसके सामने लगा दी. मारुती के ड्राइवर ने जगह देने लिए डीपर दिया. सालसकर पहचान गए कि गाड़ी में माकड़वाला ही बैठा हुआ है. इतने में नीले रंग की मारुती तेजी से पीछे की तरफ घूमी और उल्टी दिशा में भागने लगी. सालसकर ने भी गाड़ी पीछे लगा दी.

शंकर काम्बले
एकदम फ़िल्मी अंदाज में सालसकर मारुती के बराबर में पहुंचे. उन्होंने प्रदीप शर्मा से खिड़की से गोली चलाने के लिए कहा. प्रदीप शर्मा ने ऐसा किया भी. गोली चलने के कारण मारुती का ड्राइवर हक्का-बक्का रह गया. उसने गाड़ी पेड़ में दे मारी. मौक़ा पाते ही माकड़वाला गाड़ी से उतरा. उसने पुलिस की गाड़ी पर गोलियां दागनी शुरू कर दीं. प्रदीप शर्मा अपनी कार्बाइन से उसका जवाब दे रहे थे. शंकर काम्बले और विजय सालसकर भी .38 बंदूक के साथ माकड़वाला से मुकाबला कर रहे थे. करीब 15 मिनट की गोलीबारी के बाद सब शांत हो गया.
सुबह अखबार में खबर छपी कि मुंबई का सबसे कुख्यात गैंगस्टर सुभाष माकड़वाला मारा गया. उसके पास दो AK 56, हैंडग्रेनेड एक पिस्तौल और खूब सारे कारतूस बरामद हुए. इसके साथ ही छपी प्रदीप शर्मा और विजय सालसकर की फोटो. यह सबसे कम से तैयारी के साथ किया गया अब तक का सबसे सफल ऑपरेशन था.
खाकी में दाऊद का गुर्गा
अगस्त 2008 , अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन ने एक मराठी चैनल को जेल से इंटरव्यू दिया. इस इंटरव्यू में उसने प्रदीप शर्मा पर आरोप लगाए कि वो दाऊद की गैंग से मिला हुए हैं. उसने शर्मा को दाऊद के नार्कोटिक्स बिजनेस का साझीदार भी बताया. छोटा राजन का दावा था कि दाऊद की मदद से शर्मा ने कई सौ करोड़ की बेनामी संपत्ति बना ली है. राजन ने कहा, "पुलिस विभाग में भी सबको पता है कि प्रदीप शर्मा दाऊद के लिए काम करता है."

छोटा राजन
31 अगस्त 2008 के दिन प्रदीप शर्मा को 25 साल की सर्विस के बाद उनके पद से हटा दिया गया. उन पर छोटा राजन के एक सहयोगी लखन भैया के फर्जी एनकाउंटर का मुकदमा चला. उन्हें इस केस के चलते जनवरी 2010 में गिरफ्तार किया गया. दरअसल मुंबई पुलिस की एक टीम ने 11 नवंबर 2006 को राम नारायण गुप्ता उर्फ़ लखन भैया को मुंबई के वासी से गिरफ्तार किया था. उसके साथ उसका साथी अनिल भेड़ा भी था. उसी दिन मुंबई के वर्सोवा के नाना-नानी पार्क के पास गुप्ता का तथाकथित एनकाउंटर हो गया.
2013 मुंबई की एक अदालत ने प्रदीप शर्मा और 13 अन्य पुलिस वालों को इस मामले में बरी कर दिया था. हालांकि इस टीम को लीड कर रहे प्रदीप सूर्यवंशी को कत्ल के केस में दोषी पाया गया.

छोटा राजन
हालांकि प्रदीप शर्मा बाइज्जत बरी हुए थे लेकिन 2011 में हुई एक हत्या ने इस केस की सुनवाई को संदेह के दायरे में खड़ा कर दिया था. यह क़त्ल था अनिल भेड़ा का. अनिल इस केस का एकमात्र चश्मदीद गवाह था. 13 मार्च 2011 को अनिल अपने नवी मुंबई के घर से अचानक गायब हो गया था. करीब दो महीने बाद जून 2011 में नवी मुंबई पुलिस को एक क्षत-विक्षत लाश मिली. डीएनए टेस्ट के बाद यह पता चला कि यह लाश अनिल की थी.

प्रदीप शर्मा
2013 में जेल से छूटने के बाद प्रदीप शर्मा ने कहा,
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इस समय बॉम्बे में भी अपराधियों का एक जोड़ा तेजी से उभर रहा था. रंगा-बिल्ला केस की तर्ज पर उन्हें भी यही नाम दे दिया गया. इस अपराधी जोड़े का नाम था, जावेद खान और अब्दुल रहीम. जावेद-रहीम की यह जोड़ी अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात थी.

प्रदीप शर्मा
रिवॉल्वर की नाल से निकली पहली मौत
अगस्त 1989. बॉम्बे पुलिस के पास खबरी नेटवर्क से एक खबर आई कि रंगा-बिल्ला की यह जोड़ी घाटकोपर वेस्ट के माणकलाल इस्टेट की किसी चाल में छुपी हुई है. इस सूचना के मिलने के बाद घाटकोपर पुलिस स्टेशन से तीन कांस्टेबल और एक सब इंस्पेक्टर की टीम इन अपराधियों को दबोचने के लिए भेजी गई.
माणक लाल इस्टेट की इस चाल की बसावट बहुत संकरी थी. यहां पुलिस की टीम दो हिस्सों में बंट गई और हर घर का दरवाजा खटखटा कर देखने लगी. यह वो दौर था जब बॉम्बे में बड़े से बड़ा अपराधी खाकी वर्दी के सामने मूत दिया करता था. बुरी तरह से घिर जाने के बावजूद भी अपराधी पुलिस पर हमला करने से बचते थे. इस गश्त पर भी सिवाय एसआई के चारों कॉन्स्टेबल लाठी के दम पर दोनों अपराधियों को पकड़ने पहुंच गए.

प्रदीप शर्मा
दो कॉन्स्टेबल की एक टुकड़ी ने उस घर का दरवाजा खटखटाया जहां रंगा-बिल्ला छुपे हुए थे. उम्मीद से उलट जावेद उर्फ़ रंगा नंगी तलवार लिए कमरे से बाहर आया. उसने एक भरपूर वार सामने खड़े कॉन्स्टेबल की बांह पर किया और दूसरे कॉन्स्टेबल की तरफ लपका. घायल कॉन्स्टेबल दर्द के मारे चिल्ला रहा था. यह चीख टीम को लीड कर रहे सब-इंस्पेक्टर के कानों में पड़ी. वो अपने एक और साथी की तरफ वारदात की जगह की तरफ लपके.

प्रदीप शर्मा के पहले एनकाउंटर का किस्सा एस हुसैन जैदी की इस किताब में दर्ज है
वहां जाकर उन्होंने देखा कि जावेद हाथ में पिस्तौल लिए उनका इंतजार कर रहा है. उसके साथी रहीम के हाथ में वो तलवार थी जिससे अभी-अभी पुलिस के दो जवानों को घायल किया गया था. जावेद पुलिस की दूसरी टुकड़ी पर हमला कर पाता इससे पहले वहां खड़े सब-इंस्पेक्टर ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकली और सभी एक के बाद एक छह गोलियां दोनों की तरफ दाग दीं. दोनों अपराधी मौके पर ही खत्म हो गए. इस सब-इंस्पेक्ट का नाम था, प्रदीप शर्मा. यह उनका पहला एनकाउंटर था. 1989 से 2006 के बीच 17 साल में इस एक पुलिस अधिकारी ने 113 एनकाउंटर किए.
1983 का किलर बैच
1961 के साल में प्रदीप शर्मा का जन्म आगरा में हुआ. इसके एक साल बाद ही उनके पिता को धुले (महाराष्ट्र) के डिग्री कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी मिल गई. वो परिवार के साथ धुले में जाकर बस गए. M.Sc. तक की पढ़ाई करने के बाद वो पुलिस में बतौर सब-इंस्पेक्टर चुन लिए गए. साल था 1983. महाराष्ट्र पुलिस एकेडमी से निकला 1983 का सब-इंस्पेक्टर बैच बाद में खूब मशहूर हुआ. इस बैच को 'किलर बैच' के नाम से जाना जाता है. विजय सालसकर, प्रदीप शर्मा, राजू पिल्लई, प्रफुल भोसले, रविन्द्र अंगरे और असलम मोमिन जैसे एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इसी बैच की देन हैं.
एक फ़िल्मी मुठभेड़
1989 में जावेद-रहीम के एनकाउंटर ने प्रदीप शर्मा का खाता खोला था लेकिन उनके काम को पहचान मिली 1993 में. जावेद-रहीम के एनकाउंटर के बाद उन्हें स्पेशल ब्रांच भेज दिया गया. 6 मई 1993 का दिन था. क्राइम ब्रांच के पास सूचना आई कि सुभाष माकड़वाला अपनी कुख्यात AK 56 के साथ घाटकोपर के अमृत नगर के एक फ्लैट ने निकलने वाला है. उस दौर में मुंबई के किसी भी माफिया के पास ऑटोमेटिक असलहा नहीं हुआ करता था. पुलिस भी सेल्फ लोडिंग रायफल और 9 एमएम रिवॉल्वर से काम चला रही थी.

विजय सालसकर: मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट जिन्होंने 26/11 के हमले में शहादत दी
घाटकोपर पुलिस स्टेशन में इंस्पेक्टर शंकर कांबले ने स्पेशल ब्रांच से मदद की गुहार की. रात का वक़्त था स्पेशल ब्रांच के दो सब-इंस्पेक्टर विजय सालसकर और प्रदीप शर्मा घाटकोपर में शंकर काम्बले की मदद के लिए पहुंचे. वो लोग अमृत नगर की उस बिल्डिंग पर पहुंचे जहां माकड़वाला के होने की सूचना थी.
विजय सलासकर गाड़ी चला रहे थे और प्रदीप शर्मा .9 एमएम कार्बाइन के साथ उनके बगल में बैठे हुए थे. सालसकर ने देखा कि एक नीले रंग की मारुती 800 बिल्डिंग के बाहर निकल रही है. सालसकर ने अपनी गाड़ी ठीक उसके सामने लगा दी. मारुती के ड्राइवर ने जगह देने लिए डीपर दिया. सालसकर पहचान गए कि गाड़ी में माकड़वाला ही बैठा हुआ है. इतने में नीले रंग की मारुती तेजी से पीछे की तरफ घूमी और उल्टी दिशा में भागने लगी. सालसकर ने भी गाड़ी पीछे लगा दी.

शंकर काम्बले
एकदम फ़िल्मी अंदाज में सालसकर मारुती के बराबर में पहुंचे. उन्होंने प्रदीप शर्मा से खिड़की से गोली चलाने के लिए कहा. प्रदीप शर्मा ने ऐसा किया भी. गोली चलने के कारण मारुती का ड्राइवर हक्का-बक्का रह गया. उसने गाड़ी पेड़ में दे मारी. मौक़ा पाते ही माकड़वाला गाड़ी से उतरा. उसने पुलिस की गाड़ी पर गोलियां दागनी शुरू कर दीं. प्रदीप शर्मा अपनी कार्बाइन से उसका जवाब दे रहे थे. शंकर काम्बले और विजय सालसकर भी .38 बंदूक के साथ माकड़वाला से मुकाबला कर रहे थे. करीब 15 मिनट की गोलीबारी के बाद सब शांत हो गया.
सुबह अखबार में खबर छपी कि मुंबई का सबसे कुख्यात गैंगस्टर सुभाष माकड़वाला मारा गया. उसके पास दो AK 56, हैंडग्रेनेड एक पिस्तौल और खूब सारे कारतूस बरामद हुए. इसके साथ ही छपी प्रदीप शर्मा और विजय सालसकर की फोटो. यह सबसे कम से तैयारी के साथ किया गया अब तक का सबसे सफल ऑपरेशन था.
खाकी में दाऊद का गुर्गा
अगस्त 2008 , अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन ने एक मराठी चैनल को जेल से इंटरव्यू दिया. इस इंटरव्यू में उसने प्रदीप शर्मा पर आरोप लगाए कि वो दाऊद की गैंग से मिला हुए हैं. उसने शर्मा को दाऊद के नार्कोटिक्स बिजनेस का साझीदार भी बताया. छोटा राजन का दावा था कि दाऊद की मदद से शर्मा ने कई सौ करोड़ की बेनामी संपत्ति बना ली है. राजन ने कहा, "पुलिस विभाग में भी सबको पता है कि प्रदीप शर्मा दाऊद के लिए काम करता है."

छोटा राजन
31 अगस्त 2008 के दिन प्रदीप शर्मा को 25 साल की सर्विस के बाद उनके पद से हटा दिया गया. उन पर छोटा राजन के एक सहयोगी लखन भैया के फर्जी एनकाउंटर का मुकदमा चला. उन्हें इस केस के चलते जनवरी 2010 में गिरफ्तार किया गया. दरअसल मुंबई पुलिस की एक टीम ने 11 नवंबर 2006 को राम नारायण गुप्ता उर्फ़ लखन भैया को मुंबई के वासी से गिरफ्तार किया था. उसके साथ उसका साथी अनिल भेड़ा भी था. उसी दिन मुंबई के वर्सोवा के नाना-नानी पार्क के पास गुप्ता का तथाकथित एनकाउंटर हो गया.
2013 मुंबई की एक अदालत ने प्रदीप शर्मा और 13 अन्य पुलिस वालों को इस मामले में बरी कर दिया था. हालांकि इस टीम को लीड कर रहे प्रदीप सूर्यवंशी को कत्ल के केस में दोषी पाया गया.

छोटा राजन
हालांकि प्रदीप शर्मा बाइज्जत बरी हुए थे लेकिन 2011 में हुई एक हत्या ने इस केस की सुनवाई को संदेह के दायरे में खड़ा कर दिया था. यह क़त्ल था अनिल भेड़ा का. अनिल इस केस का एकमात्र चश्मदीद गवाह था. 13 मार्च 2011 को अनिल अपने नवी मुंबई के घर से अचानक गायब हो गया था. करीब दो महीने बाद जून 2011 में नवी मुंबई पुलिस को एक क्षत-विक्षत लाश मिली. डीएनए टेस्ट के बाद यह पता चला कि यह लाश अनिल की थी.

प्रदीप शर्मा
2013 में जेल से छूटने के बाद प्रदीप शर्मा ने कहा,
"मैं जेल में हर दिन कई मौत मरता था. मैंने तय किया कि मैं इन आरोपों की वजह से अपना मनोबल कम नहीं करूंगा. मैं उठूंगा और अपनी बेगुनाही साबित करूंगा."अदालत प्रदीप शर्मा को कब का बरी कर चुकी है. लेकिन दाऊद के भाई को गिरफ्तार करके शर्मा शायद जनता के सामने अपनी तरह से अपनी बेगुनाही साबित कर रहे हैं.
लल्लनटॉप वीडियो देखें: यह भी पढ़ें:
अमरा राम : राजस्थान का वो विधायक जो पुलिस की गोली से बचने ऊंट पर चढ़कर भागा था
जो पार्टियां पावर में रहीं, वही चीरहरण करती रही हैं दल-बदल विरोधी कानून का

