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हिमालय के 11 गांवों में सब इस 'लेडी डाकिया' के फैन हैं

इन खूबसूरत पहाड़ियों पर बसे लोगों को नहीं पता कि इंटरनेट किस चिड़िया का नाम है. वे बस ख़त लिखना जानते हैं.

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30 मई 2016 (अपडेटेड: 30 मई 2016, 01:33 PM IST)
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याद कीजिए, आपने पिछली बार चिट्ठी कब लिखी थी? 21st सेंचुरी बेबी हैं तो शायद कभी नहीं. कीबोर्ड तोड़ने वालों को तो शायद याद भी न हो कि आखिरी बार कलम कब उठाई थी. हर बरस लगता है कि कुछ बरसों में लोग चिठ्ठियां लिखना बिल्कुल छोड़ देंगे. लेकिन फिर कोई कहानी सामने आती है, जो 'बिलाती पाती' में जान फूंक देती हैं. सृजना थापा की कहानियों जैसी कहानियां. पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में एक खूबसूरत जिला है, अलीपुरद्वार. उसके कालचीनी ब्लॉक में रहती है 27 साल की सृजना. सृजना पोस्टमास्टर है. अपने नाम को सार्थक साबित करती एक औरत है. घूम-घूम कर चिठ्ठियां बांटती है. एक या दो नहीं, 11 गांवों में. आप सोच रहे होंगे कि ये पोस्टमास्टर डाकिये का काम क्यों करती है. जवाब आगे मिलेगा. सृजना ने कलिम्पोंग कॉलेज से ग्रेजुएशन किया. पिता पोस्टमास्टर थे. जब तक सृजना बड़ी हुई, पिता गुज़र गए. सृजना ने तय किया कि वो भी पोस्टमास्टर बनेगी, पिता की तरह. और पूर्वी हिमालय पर, समुद्र से 900 मीटर ऊंचाई पर बसे बक्सादौर के एक पोस्ट ऑफिस में वो पोस्टमास्टर हो गई. post office अलीपुरद्वार में लगभग 3 हजार लोग रहते हैं. जो 13 गांवों में बिखरे हुए हैं. और इनके बीच की दूरियां पिघलाती है एक लड़की, भागती, चिठ्ठियां बांटती. इस बात का ध्यान रखते हुए कि किसी चिट्ठी को पहुंचने में देर न हो जाए. पोस्ट ऑफिस में पहले एक डाकिया हुआ करता था. जो 2009 में रिटायर हो गया. रिटायरमेंट के 3 साल तक उसकी पोस्ट खाली रही. कोई पैदल चिठ्ठियां बांटने को तैयार न था. 2012 में सृजना की पोस्टिंग हुई. तब से हर सुबह सृजना 9 बजे दफ़्तर पहुंचती है. और घर वापस आती है सूरज ढलने के बाद. दिन भर में लगभग 15 किलोमीटर घूमती है चिठ्ठियां बांटने के लिए.
"हमारे पास कुल 11 गांव हैं. पैदल चलकर चिठ्ठियां बांटने जाना पड़ता है. सभी गांव दूर-दूर हैं, इसलिए काफी वक़्त लग जाता है."
दफ़्तर पहुंचने में सृजना को एक घंटा लगता है. पिछले 4 सालों से सृजना ये काम अकेले कर रही है.
एक स्थानीय निवासी बताते हैं: "औरत होने के बावजूद घर-घर चिट्ठियां बांटती है. यहां एक ही पोस्ट ऑफिस है. उसे एक से दूसरे गांव जाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. लेकिन वो अपना काम में बहुत अच्छा कर रही है."
पहाड़ों पर बसे इन गांवों के लिए बिजली आना तो मानो एक सपना है. यहां कोई 3जी-4जी नेटवर्क नहीं आता. यहां के लोग स्मार्टफ़ोन चलाना नहीं जानते. बक्साद्वार के लोग बस ख़त लिखना जानते हैं. और उन्हें एक-दूसरे से जोड़ती है पतली सड़कों पर भागती एक लड़की. srijana 2 यहां कोई बैंक नहीं है. ये पोस्ट ऑफिस केवल ख़त भेजने के काम नहीं आता. हजारों जिंदगियों को पैसे जमा करने-बचाने की सुविधा देता है. ये वो समय है जब सृजना के गांव के युवा गांव छोड़ शहर की तरफ भाग रहे हैं, बेहतर जीवन की तलाश में. लेकिन सृजना को कहीं नहीं जाना. बस पूरी जान लगा कर जर्जर हो रहे इस पोस्ट ऑफिस को जिंदा रखना है.

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