The Lallantop
Advertisement

बजट इक आग है जिसमें धुआं नहीं होता

बजट आने के बाद सेंटियाए लोग इधर आएं. देखो, कोई तुम्हारे गम में शरीक है.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
आशुतोष चचा
1 मार्च 2016 (अपडेटेड: 1 मार्च 2016, 11:17 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
नजर पड़ी बजट के प्लान्स पर. बजट में महंगा जो करना है वो तो हो जाएगा एक अप्रैल से. बाकी सब प्लान का हिस्सा है. 'प्लान्स पर जोर नहीं, है ये वो ख्वाहिश गालिब.' कि एक बार ये बन तो जाते हैं लेकिन उन पर काम भी हो ये जरूरी नहीं. वित्तमंत्री ने गांव देहात के लिए मार्के का बजट बताया. बत्ती, सड़क पानी वानी सब रहेगा. मनरेगा को भी हज्जारों करोड़ दिए. मेडिकल स्टोर खुलेंगे. उन पर महंगी सिरदर्द की दवाएं मिलेंगी. डॉक्टर ने पर्चा ज्यादा बड़ा बनाया तो हार्ट अटैक की दवा अपनी तरफ से ऐड कल्लेना. फिलहाल, हमें पॉजिटिव रहना है. किसी हाल में उम्मीद का दामन छोड़ना नहीं है. लड़ना नहीं किसी से. ऑर्ग्यू भी नहीं करना है. बस ये प्लान देखते देखते एक बार फिर भावनाओं में बह गया है लल्लन. एक गज़ल लिखी है. खूबसूरत नहीं है ये पता है. लेकिन महंगाई से मार खाए आदमी की दिल की जुबान है. उसकी बात सुन ली जाए. पेश है पहला शेर. बजट जब आने वाला होता है तो देश का हर शख्स इम्तेहान के दौर से गुजर रहा होता है. सेंसेक्स निफ्टी से मिडिल क्लास को क्या मतलब. लेकिन साब पान पुड़िया पर चोट पड़ेगी तो बर्दाश्त नहीं होता साहब.
Image embed
आगे बढ़ते हैं. सर्विस टैक्स 14.5 से बढ़ाकर 15 फीसदी हो गया. जिससे ये सब होगा महंगा. अच्छा महंगा होगा तो ठेंगे से. खाना तो खैर घर पर भी मिलता है यार. लेकिन मोबाइल पर बतियाना. तौबा तौबा. अगर इस पर कोई आंच आई तो इन्कलाब आएगा.
Image embed
लल्लन खामोशी अख्तियार कर ले ऐसे हालात में. अगर सिर्फ अपनी बात करनी हो. लेकिन फर्ज भी तो बनता है कि दोस्तों-मितरों के गम में शरीक हो. डीजल महंगा, डाजल कार महंगी. बंदा साइकिल से दफ्तर आए जाए. लेकिन अगला निशाना जो है. वो नाकाबिले बर्दाश्त है.
Image embed
पहली जीन्स पापा दिलाए थे. बहुब्बढ़िया कपड़े पहने. ठेले वाले भी खरीदे. लेकिन इस मामले में हम बजट के साथ खड़े हैं. बनाने वाले ने क्या खूब बनाया है. अगर डेढ़ सौ की जीन्स 6 सौ में मिल रही है तो बुरा क्या है. कंधे उचका कर कह सकते हैं. 'सस्ते कपड़े अपने से पहने नहीं जाते. सो ऑड यू नो.'
Image embed
उप्परवाला न जाने कौन से जन्मों का बदला ले रहा है. जिससे उम्मीद करो कि गरीबी में हमारा हाथ थामेगा वो आटे में पानी घोल के पनारे पर उलट आता है. गरीब की हाय से दुनिया डरती है. मिडिल क्लास की हाय जैसे फोकट में आती है. कोई पूछता नहीं. लेकिन फिकर नॉट. कभी न कभी ये भी लगेगी. बस इसमें मिलावट करने का थर्ड क्लास बंद करें मिडिल क्लासिए.
Image embed

  लल्लन बजट से पहले क्या सोच रहा था

Advertisement

Advertisement

()