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एबॉर्शन कराने वाली औरतों को माफ़ी मांगने की जरूरत क्यों है?

पोप फ्रांसिस ने बीते दिनों की एक अहम घोषणा. लेकिन इसके मायने क्या हैं?

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प्रतीक्षा पीपी
23 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 23 नवंबर 2016, 11:34 AM IST)
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पोप फ्रांसिस ने ईसाई समुदाय के लिए एक फैसला दिया है. ये फैसला औरतों के हक़ में है. और इसके मुताबिक़ पादरियों को अब एबॉर्शन करवाने वाली औरतों को 'पार्डन' यानी माफ़ी देने का अधिकार होगा. पहले ये अधिकार केवल बिशप्स के पास होता था. ऐसा माना जाता है कि जीसस क्राइस्ट के 12 मुख्य-शिष्यों के वंशज बिशप होते हैं. माफी देने का अधिकार पोप ने एक ऑफिशियल ख़त लिख कर आगे बढ़ाया है. ऐसा ख़त, जिसे लिखने का अधिकार देवदूतों को होता है. लोगों ने पोप की काफी तारीफ की है इसके लिए.
ये फैसला आया है इयर ऑफ़ मर्सी के बाद. ईसाई धर्म में हर 25 साल पर इयर ऑफ़ जुबिली मनाते हैं. इस बार ये 27वें साल मनाया गया. दिसंबर 2015 से लेकर नवंबर 2016 तक. इयर ऑफ़ मर्सी मनाने का मतलब ये था कि हर गुनहगार को माफ़ किया जाए. क्योंकि जीसस भी यही कहते थे. कि माफ़ कर देने में ही आपका बड़प्पन है. वरना लड़ाई-मार तो कोई भी कर सकता है. और इसी तर्ज पर उन औरतों को भी आसानी से माफ़ी मिलने की सुविधा दे दी गई, जो एबॉर्शन करवाती हैं.

पहले जानिए, ईसाई धर्म में एबॉर्शन पाप क्यों है?

कैथोलिक चर्च कहता है: 'इंसानों के जीवन का सम्मान करना चाहिए. और जीवन की शुरुआत से ही उसकी रक्षा करनी चाहिए.' और इसीलिए एबॉर्शन, यानी फीटस को नष्ट कर देना ईसाई धर्म में पाप होता है. लेकिन अगर प्रेगनेंट को सर्वाइकल कैंसर है, तो कीमोथेरेपी (जिससे फीटस की मौत हो जाती है) गुनाह नहीं है. क्योंकि इससे औरत मर सकती है. चर्च के मुताबिक़ इंसान का पहला अधिकार जीने का है. और जब कोई औरत एबॉर्शन करती है, वो ऑटोमैटिकली चर्च से संबंध खो देती है. और चर्च उसको दोबारा अपनी शरण में तभी लेगा, जब उसने अपने पाप का प्रायश्चित कर लिया होगा. चर्च की शुरुआत से यानी पहली शताब्दी से ही एबॉर्शन को पाप माना गया है. और आज से तकरीबन 150 साल पहले पोप पायस ix ने कह दिया था कि एबॉर्शन ऐसा गुनाह है, जो तभी माफ़ हो सकता है जब कोई बिशप खुद माफ़ी दे. इस बात से मतलब नहीं था कि प्रेगनेंसी किस स्टेज पर है. कुछ लोगों ने इसका अर्थ ये भी लगाया है कि पायस ix ने एबॉर्शन को मर्डर का दर्जा दिया है.
कुल मिलाकर ईसाई धर्म के मुताबिक एबॉर्शन इसीलिए पाप है क्योंकि इसमें किसी को मारा जाता है. इस बात से मतलब नहीं है कि वो बच्चा अब तक फीटस है, वो पैदा तक नहीं हुआ है.

तो क्या अब एबॉर्शन पाप नहीं?

नहीं. एबॉर्शन अब भी ईसाई धार्मिक नियमों के मुताबिक पाप है. अब बस फर्क ये पड़ा है कि एबॉर्शन करवा कर औरतों को 'पापी' के लेबल से मुक्ति पाना ज्यादा आसान हो गया है. क्योंकि अब उसे बिशप के पास नहीं जाना होगा. बल्कि पादरी ही उन्हें धार्मिक माफ़ी दे सकते हैं. आपको बता दें कि पादरी का धार्मिक कद बिशप से नीचे होता है. और संख्या में पादरी ज्यादा होते हैं. ठीक उसी तरह जिस तरह हिन्दुओं में पुजारी और मुसलमानों में मौलवी होते हैं.
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मर्डर का बोझ

जब हम औरतों को बच्चा अबॉर्ट करने पर कातिल कहते हैं, हम एक बहुत जरूरी बात भूल जाते हैं. वो ये कि औरत खुद बच्चे को दुनिया में लाना चाहती है या नहीं. हम ये बात भूल जाते हैं कि हर बार प्रेगनेंसी चुनी हुई नहीं होती. और वो औरत ही होती है जिसे प्रेगनेंसी के दौरान की सिकनेस से लेकर बच्चा पैदा करने के दर्द तक, सब कुछ सहना पड़ता है. और बच्चा पैदा होने के बाद शुरू होता है मातृत्व. बच्चे को पालने की आधी, और इंडिया जैसे देशों में तो पूरी ही जिम्मेदारी औरत की होती है. ऐसे में लोग ये बातें भूल जाते हैं:
1. आने वाले बच्चे को समाज अपनाएगा भी, या औरत कुल्टा कहलाएगी? 2. प्रेगनेंट होने वाली औरत की उम्र एक स्वस्थ बच्चा डिलीवर करने की है भी या नहीं? 3. औरत आने वाले बच्चे का खर्च उठा सकती है या नहीं? 4. औरत अपने करियर या जिंदगी के साथ बच्चा पालने में सहज है या नहीं?
क्या कोई भी धर्म का ठेकेदार इस बारे में बात करता है? आसान होता है पेट में पल रहे फीटस को इंसान मानकर औरत पर मर्डर का आरोप लगाना. लेकिन क्या मां को इतना भी अधिकार नहीं कि वो तय कर सके कि नौ महीने अपने खून से वो किसी बच्चे को पालना चाहती भी है या नहीं?

क्योंकि मां बनना औरत की जिम्मेदारी है

ऐसी ही सोच है समाज की. चूंकि बच्चा पैदा करना औरत का फर्ज मान लिया गया है, फीटस को मार देना, या बच्चा पैदा ही न करना उसका सबसे बड़ा गुनाह हो जाता है.

माफ़ी क्यों?

माफ़ी तो गलतियों की मांगते हैं. मैं ये नहीं कहती कि ये कदम औरतों के हक में नहीं है. लेकिन ये अब अभी उनके गर्भ को धर्म के अधीन मानता है. एक ऐसा धर्म, जो दुनिया के हर धर्म की तरह एक पुरुषवादी ढांचे पर काम करता है.

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