जम्मू कश्मीर के पुंछ में चल रहा सेना का ऑपरेशन इतना मुश्किल क्यों है?
पुंछ इलाके में चल रहे एनकाउंटर में 10 दिन के बाद भी कामयाबी नहीं मिली है!
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आतंकियों के खिलाफ सेना का अभियान 10वें दिन में एंटर कर चुका है. फोटो-PTI
जम्मू कश्मीर के पुंछ में घुसपैठियों के खिलाफ चल रहा सेना का ऑपरेशन अपने 10 वें दिन में प्रवेश कर गया है. अब ये पिछले 11 सालों में सबसे लंबा ऑपरेशन बन गया है जिसमें 9 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं. 11 अक्टूबर से हज़ारों सैनिक आतंकवादियों की तलाश में हैं. 19 अक्टूबर को जब सेना ने आम लोगों से अपने घरों में रहने की अपील की, तो लगा कि अब ऑपरेशन अपने अंतिम चरण में है. लेकिन अब ये अंतिम चरण भी लंबा होता जा रहा है. हम यही समझने की कोशिश करेंगे कि वो कौन सी चुनौतियां थीं, जिन्होंने हमारी सेना को इतने वक्त तक कामयाबी से दूर रखा.
10 दिन बाद भी नहीं मिली कामयाबी!
आप अपनी यादादश्त पर खूब ज़ोर डालेगें तो भी जम्मू कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ ऐसा कोई ऑपरेशन याद नहीं आएगा जो 10 दिन तक चला हो. मेरी जानकारी के हिसाब से पिछले 10 साल में ऐसा नहीं हुआ है. लेकिन पुंछ इलाके में चल रहे एनकाउंटर में 10 दिन के बाद भी कामयाबी नहीं मिली है. जबकि कश्मीर घाटी से हमें लगातार एनकाउंटर्स और आतंकियों को मार गिराने की खबरें मिल रही हैं. पिछले दो हफ्ते में 15 आतंकियों को कश्मीर घाटी में मारा गया है, लेकिन घाटी से ही लगते जम्मू के पुंछ में सेना के हज़ारों जवान ऑपरेशन में लगे हैं, फिर भी एक भी आतंकी के मारे जाने की जानकारी अभी तक नहीं आई है. अब तक सेना के 9 जवान हमने इस ऑपरेशन में खो दिए, जिनमें 2 जूनियर कमिशन्ड ऑफिसर भी शामिल हैं. तो ये ऑपरेशन इतना मुश्किल क्यों साबित हो रहा है और किस तरह से सेना इस ऑपरेशन को अंजाम दे रही है, इस पर विस्तार से बात करेंगे.
लाउडस्पीकर पर सेना की तरफ से ऐलान हो रहा है कि यहां रहने वाले आम लोग घरों से बाहर ना निकलें, ताकि सेना को ऑपरेशन में दिक्कत ना आए. वीडियो में आप ये भी देखिए कि किस तरह चारों तरफ जंगल से घिरे आवासीय इलाके हैं. घर के बाहर से ही जंगल शुरू हो जाता है. 3 महीने पहले की थी घुसपैठ अब नक्शे पर आते हैं. पुंछ ज़िला LoC पर पड़ता है. तीन तरफ से एलओसी लगती है, लंबाई करीब 100 किलोमीटर है. घने जंगलों वाली पहाड़ियां सीमा के दोनों तरफ फैली हैं. इसलिए आतंकियों के लिए इस इलाके से घुसपैठ करना आसान होता है. जिन आतंकियों के खिलाफ अभी ऑपरेशन चल रहा है, वो भी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से ही घुसपैठ करके ही पुंछ में घुसे थे.Poonch anti-terror operation continues in Jammu & Kashmir for over a week. Announcement being made asking locals to stay indoors and not venture out. 9 Indian soldiers made supreme sacrifice for the nation in the area. More power to India’s bravehearts for this operation. pic.twitter.com/Lfx7WS6BSh
— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) October 19, 2021

सिक्योरिटी फॉर्सेज़ का ऐसा कहना है. राजौरी पुंछ रेंज के डीआईजी विवेक गुप्ता ने मीडिया को बताया कि करीब ढाई-तीन महीने पहले आतंकियों ने घुसपैठ की थी. मतलब ढाई तीन महीने से आतंकी इस इलाके में मौजूद थे. अब इस दौरान वो जंगलों में छिपे थे या किसी की मदद से रिहाइशी इलाके में थे. इसकी जानकारी नहीं है.
अक्टूबर के पहले हफ्ते में सिक्योरिटी फॉर्सेज को इंटेलिजेंस इनपुट मिला कि पुंछ की सुरनकोट तहसील में डेकेजी के जंगल में आतंकियों का मुवमेंट है. इसके बाद यहां तैनात 16 राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों ने इलाका घेरकर सर्च ऑपरेशन शुरू किया. और फिर 11 अक्टूबर को खबर आई कि आतंकियों ने घात लगाकर 16 RR के 5 जवानों को शहीद कर दिया. इसमें एक जेसीओ भी शामिल थे.
जम्मू-कश्मीर के पुँछ ज़िले में भारतीय सेना के 5 जवान आतंकवादी हमले का शिकार हुए थे. (फ़ोटो-आजतक)11 अक्टूबर की घटना पर आतंकियों की तरफ से भी एक वीडियो जारी किया गया. 18 अक्टूबर को चैटिंग ऐप टेलीग्राम के कई ग्रुप्स पर करीब 8 मिनट का वीडियो शेयर किया गया. वीडियो में आतंकी ने खुद को PAFF से बताया था. PAFF यानी पीपल्स एंटी फासिस्ट फ्रंट. पिछले कुछ महीनों से आतंकी घटनाओं में इस संगठन का नाम आ रहा है. जिस तरह से अगस्त 2019 के बाद TRF, यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट, लश्कर ए मुस्तफा का नाम के आतंकी संगठनों के नाम सामने आ रहे हैं, उसी लिस्ट में PAFF भी है. अब लश्कर ए तैयबा, जैश ए मोहम्मद या हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे पुराने और बड़े संगठनों का नाम आतंकी घटनाओं में नहीं आ रहा. आतंकवादियों ने जारी किया वीडियो खैर, PAFF के वीडियो पर लौटते हैं. वीडियो में एक आदमी बता रहा है कि 11 अक्टूबर को क्या हुआ था. कैसे सर्च ऑपरेशन में जुटे सेना के जवानों पर रात के वक्त घात लगाकर हमला किया गया. वीडियो में नरेटर बता रहा है कि कि आर्मी की पेट्रोल पार्टी का करीब 10 घंटे तक पीछा किया गया. जब रात को सेना के जवान आराम करने के लिए रुके, तब मौका देखकर जवानों पर हमला किया गया. और उसके बाद आतंकी फरार हो गए. हालांकि सेना के अधिकारियों की तरफ से वीडियो को प्रोपगैंडा बताया गया है, कई अखबारों में सेना का अनऑफिशियल वर्ज़न छपा है.
बहुत मुमकिन है कि ये वीडियो फेक हो, सिर्फ प्रोपगैंडा के बनाया गया हो. लेकिन जिस तरह से एम्बुश हुआ, उस पर जानकार कर रहे हैं कि आतंकियों को सेना के मूवमेंट की पूरी जानकारी थी. वो एडवेंटेज पॉजिशन पर थे. देख सकते थे कि सर्च ऑपरेशन में कितने जवान शामिल हैं, कौनसे हथियारों के साथ आ रहे हैं. और इसका फायदा उन्होंने उठाया.
11 अक्टूबर की घटना के बाद सेना ने फिर से सर्च ऑपरेशन तेज़ किया लेकिन फिर फायदा उठाने में कामयाब रहे. 14 अक्टूबर को सेना और आतंकियों की नार खास के जंगल झड़प हुई. यहां 2 जवान शहीद हो गए. एक जेसीओ और एक जवान लापता हुए. जिनका शव दो दिन बाद मिला. यहां से जवानों को पीछे हटना पड़ा और आतंकी जंगल में छिपने में कामयाब रहे.
Encounter In Nar Khas Forest Area Of Poonchइसके बाद सेना ने स्पेशल फोर्सेज़ के कमांडोज़ इस ऑपरेशन में तैनात किए. ड्रोन्स से एरिया की निगरानी शुरू की. जंगल के ऊपर हेलिकॉप्टर उड़ाए जा रहे हैं. मेंढर इलाके में पड़ने वाले भट्टा दूरियां के जंगल में कॉम्बिंग ऑपेरशन चलाया जा रहा है. कॉम्बिंग ऑपरेशन यानी जैसे बालों के बीच से कंघी गुजरती है वैसे ही जंगल के इलाके से आतंकियों के लिए सेना सर्च ऑपरेशन कर रही है. भाटा दूरियां के करीब 20 किलोमीटर लंबे जंगल के स्ट्रेच को सेना के जवानों ने घेर रखा है. अब सेना कभी फाइनल असॉल्ट शुरू कर सकती है. यानी जहां आतंकियों के छिपे होने की आशंका है वहां घुसकर हमला कर सकती है. सेना प्रमुख एमएम नरवणे भी सोमवार और मंगलवार को जम्मू में थे, वो पुंछ भी गए थे. इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि सेना कितने बड़े स्तर पर इस ऑपरेशन की प्लानिंग कर रही है. ऑपरेशन इतना मुश्किल क्यों? अब आते हैं कि क्यों ये ऑपरेशन इतना मुश्किल है. पुंछ में हिमालय की पीर पंजाल रेंज की घाटियां हैं. ऊंची पहाड़ियां हैं और घने जंगल, जैसा हमने शुरू में बताया. और यहां के जंगल ऐसे हैं कि कोई अंदर घुस गया तो ढूंढ़ने में महीनों लग जाएंगे. इसका फायदा आतंकी उठाते हैं. आतंकी इन इलाकों में शेल्टर लेते हैं. एक बार आतंकी जंगल में घुस गए तो फिर इंटेलिजेंस का भी कोई फायदा नहीं होता. जंगल में सेना को घुसना ही पड़ता है. और इसमें कैजुअल्टी ज्यादा होने का डर होता है. जैसा इस ऑपरेशन में हुआ.
दूसरी वजह, जंगलों के पास ही आम नागरिक रहते हैं. इसलिए आम नागरिकों को लालच देकर या धमका कर आतंकी मदद लेते हैं. राशन की सप्लाई में मदद मिल जाती है. पुंछ के इलाके में ज्यादातर गुज्जर-बकरवाल समुदाय के लोग रहते हैं. पहले भी कई बार ऐसा हुआ कि आतंकियों ने मुखबिरी के डर में यहां के लोगों की हत्या कर दी हो. इसलिए जान जाने के डर से ह्मयून इंटेलिजेंस में भी सेना को दिक्कत आती है. बल्कि आतंकियों को इसमें मदद मिल जाती है. वो कई महीनों तक जंगल के अपने ठिकानों में आराम से रह पाते हैं. इस बार भी अंदेशा है कि आतंकियों ने आम नागरिकों से मदद ली होगी. अगर ढाई महीने पहले आतंकी पुंछ में घुसे थे, तो जाहिर है उनके पास इतना राशन नहीं होगा कि वो इतने लंबे वक्त से बिना बाहरी मदद के सर्वाइव कर जाएं. पुलिस ने 3 सिविलियन्स को आतंकियों की मदद करने के शक में हिरासत में लिया था. तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है.
(सांकेतिक फोटो - इंडिया टुडे)तीसरी वजह, आतंकी यहां आसानी से सिविलियन के बीच घुल मिल जाते हैं. इसलिए बिना इंटेलिजेंस आतंकियों की जानकारी मिलना मुश्किल है. दूर दराज के इलाके होने की वजह से सिविलियन गर्वनेंट की भी मौजूदगी ज्यादा नहीं है. ये सारी चीज़ें आतंकियों के पक्ष में में जाती है. इस इलाके में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन ज्यादा इंटेलिजेंस पर बेस्ड होते हैं. अगर इंटेलिजेंस में चूक हो गई थी, फिर आतंकियों का खोज पाना आसान नहीं होता. घना जंगल होने की वजह से ड्रोन या यूएवी भी ज्यादा मददगार नहीं होते हैं. आतंकियों के लिए छिपना आसान है. तो इन सारी वजहों से ये ऑपरेशन सेना के लिए मुश्किल साबित हो रहा है.
और ऐसा नहीं है कि पहली बार सेना को यहां इतनी दिक्कत आई है. पुंछ में आतंकियों के खिलाफ पहले भी लंबे ऑपरेशन चले हैं. 2009 के जनवरी महीने में 9 दिन लंबा ऑपरेशन चला था. इसमें 4 जवान शहीद हुए थे, जिसमें एक जेसीओ भी शामिल थे. इस ऑपरेशन में 4 आतंकियों के भी मारे जाने का दावा सेना की तरफ से किया गया था. 9 दिन सर्च ऑपरेशन चलाया गया था. लेकिन आतंकियों के शव बरामद नहीं हुए, और ऑपरेशन सस्पेंड करना पड़ा. इससे पहले 2003 में भी सेना ने ऑपरेशन सर्प विनाश चलाकर 60 से ज्यादा आतंकियों को मार गिराया था. इस ऑपरेशन में भी सेना ने हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया था. हेलिकॉप्टर्स से जंगल में आतंकियों के हाइडआउट्स पर फायरिंग की थी. ये ऑपरेशन महीनों चला था. अब मौजूदा ऑपरेशन भी उसी लेवल पर जा रहा है. देखना है कब तक आतंकी सेना से बच पाते हैं.
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