PM आवास योजना के बाद भी नहीं घट रहीं झुग्गियां, इसका 'असल' फायदा मिल किसे रहा है?
प्रधानमंत्री आवास योजना - शहरी (PMAY-U) के दूसरे चरण का ऐलान हो चुका है. लेकिन इस योजना के पहले चरण से स्लम्स की संख्या में कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा. साल 2014 में शहरी इलाकों में 50% जनसंख्या स्लम्स में रहती थी. 2014 से 2020 तक इसमें कोई ज्यादा बदलाव नहीं हुआ. इसके पीछे की वजह जानते हैं? आखिर किसे इस योजन का ज्यादा फायदा मिल रहा है?

तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है… एक योजना है- प्रधानमंत्री आवास योजना - शहरी. इसके जरिये सरकार शहरी इलाकों में गरीब और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को पक्के घर मुहैया करवाती है. प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) के मुताबिक इस योजना के तहत 2015 से अब तक शहरी इलाकों के लिए 1 करोड़ 19 लाख घर सैंक्शन हुए. जिसमें से 83 लाख घर बनकर तैयार भी हो गए. लेकिन अब एक और आंकड़े पर गौर कीजिये. शहरों की झुग्गियों में रहने वाली आबादी का आंकड़ा.

साल 2000 में देश के शहरी इलाकों में 55% जनसंख्या स्लम्स में रहती थी. 2014 आते-आते ये आंकड़ा 50% तक आ गया. 2014 से 2020 तक इसमें कोई ख़ास बदलाव नहीं हुआ. 2020 में 49% शहरी आबादी स्लम्स में रहती थी. अगस्त 2024 में केंद्र सरकार ने योजना का नया वर्जन निकाला - Pradhan Mantri Awas Yojana-Urban (PMAY-U) 2.0 इसके तहत एक करोड़ घरों के लिए मंजूरी दी गई. लेकिन अब खड़े होते हैं कुछ सवाल.
-अगर देश में स्लम्स कम नहीं हो रहे, तो फिर सरकार के बनाए पक्के मकान मिल किसे रहे हैं?
-देश में कितने लोगों के पास अपना पक्का घर नहीं है? क्या इसका कोई नंबर हमारे पास है?
-और आबादी को कच्चे घरों या झोपड़ियों से निकालकर पक्के घर दिलाने के लिए कितने घर बनाने की जरूरत होगी?
आवास योजना-अर्बन के बेसिक शहरीप्रधानमंत्री आवास योजना अर्बन के अंदर मुख्य रूप से 4 सब स्कीम आती हैं. इनके पीछे एक लॉजिक है. ‘जाकी रही ज़रूरत जैसी, उसे मिले सुविधा वैसी’ पहले तो इन स्कीम्स के बारे में समझिए.
BLC - बेनेफिशरी लेड कंस्ट्रक्शनये स्कीम उन लोगों के लिए है जिनके पास खुद की ज़मीन है, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर हैं. यानी वो परिवार जिनकी सालाना आमदनी 3 लाख या उससे कम है. ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार आर्थिक सहायता देती है.
CLSS - क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीमये होम लोन से जुड़ी स्कीम है. माने इसके जरिये सरकार होम लोन में सब्सिडी देती है. कैसे? आर्थिक रूप से कमजोर लोग माने जिनकी घरेलू आमदनी 3 लाख से कम है. उनको ब्याज दर में साढ़े 6% की सब्सिडी दी जाती है. इसके अलावा घरेलू आमदनी 6 से 12 लाख के बीच है या फिर 12 से 18 लाख के बीच है उन्हें भी सब्सिडी मिलती है. दोनों को अलग-अलग ब्रैकेट में. इन दोनों ब्रैकेट में सब्सिडी साढ़े 6 प्रतिशत से कम होती है. कुल मिलाकर कहें तो बात ये कि ‘EMI आपकी मदद हमारी’
AHP - अफोर्डेबल हाउसिंग इन पार्टनरशिपये एक पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप है. इसे उदाहरण से समझिये. सरकार ने 100 फ्लैट्स का एक प्रोजेक्ट घोषित किया. इसे एक प्राइवेट कंपनी बनाएगी. 100 में से 35 फ्लैट वो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को देगी. इन 35 फ्लैट्स के लिए केंद्र सरकार प्रति फ्लैट डेढ़ लाख रूपये डेवलपर को देगी. कुछ रुपये राज्य सरकार भी देगी. बाकी 65 फ्लैट प्राइवेट डेवलपर अपने हिसाब से बेच देगा. माने सरकार का भी काम हो गया, प्राइवेट डेवलपर ने पैसा भी कमा लिया और जरूरतमंदों को घर भी मिल गया.
ISSR - इन-सीटू स्लम रिडेवलपमेंटइसमें स्लम्स में रहने वाले ऐसे लोग, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, उनके लिए सरकारी ज़मीन पर फ्लैट्स बनाये जाते हैं. ये भी प्राइवेट डेवलपर ही बनाता है लेकिन इसमें सभी फ्लैट्स सिर्फ जरूरतमंदों के लिए होते हैं. डेवलपर इसे किसी और को नहीं दे सकता.
आपने बेसिक तो जाना. अब एक छोटा सा थॉट एक्सपेरिमेंट करते हैं. आपके हिसाब से इनमें से किस स्कीम को इम्प्लीमेंट करना सबसे आसान है? इसमें से सबसे आसान स्कीम है BLC यानी बेनेफिशरी लेड कंस्ट्रक्शन. कैसे? सरकार को जमीन की चिंता नहीं करनी, ज़मीन पहले से लाभार्थी के पास उपलब्ध है. लाभार्थी को बस फंडिंग देने की जरूरत है.
सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस. ये एक संस्था है जो देश में पॉलिसी के लेवल पर रिसर्च करती है. इसकी एक रिपोर्ट ‘Deconstructing PMAY-U: What the Numbers Reveal' के अनुसार 2015 में जब से प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू हुई है, तब से 2024 तक जितने घरों का आवंटन हुआ है, उनमें से 62% घर BLC के तहत बने हैं. माने इस स्कीम के सबसे बड़े लाभार्थी वो हैं जिनके पास अपनी ज़मीन थी.
दूसरे नंबर पर थी CLSS. माने वो स्कीम जिसमें होम लोन में सब्सिडी दी जाती है. 21% आवास इस कैटेगरी के थे. लेकिन इस रिपोर्ट में कमाल की बात ये है कि ISSR जो स्कीम खास तौर पर झोपड़पट्टी में रहने वाले लोगों के लिए बनाई गयी थी, उसको सिर्फ 2% घर मिले. गिनती में बोले तो 2 लाख 38 हज़ार घर. और इसमें से भी बड़ा हिस्सा सिर्फ दो राज्यों में है. महाराष्ट्र और गुजरात.
पॉलिसी का कितना असर हुआ?ज्यादातर घर BLC के तहत आवंटित किये गए, यानी उन्हें मिले जिनके पास खुद की जमीन थी. अब इसमें एक बात नोटिस कीजिये. अगर कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर है तो ये बात स्वाभाविक है कि उसके पास बड़े शहर में जमीन होने की गुंजाईश कम है. ऐसे लोग छोटे शहर में ज्यादा होंगे क्योंकि वहां ज़मीन का दाम कम होता है.
ऐसा ही कुछ सेंटर फॉर सोशल एंड इकनॉमिक प्रोग्रेस (CSEP) की रिपोर्ट में भी सामने आया है. रिपोर्ट के मुताबिक BLC के तहत करीब 45 लाख से ज्यादा घर छोटे शहरों को मिले. माने आवास योजना के 40% तो अकेले उन शहरों को मिले जिनकी जनसंख्या 1 लाख से कम है.

दूसरे नंबर पर थे मीडियम साइज वाले शहर. माने वो जिनकी जनसंख्या 1 से 10 लाख के बीच है.
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अगर सभी स्कीम्स के लाभार्थियों को जोड़ा जाये, तो ये बात सामने आती है कि सबसे ज्यादा फायदा छोटे शहरों में रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर लोगों का हुआ. जो कि अच्छी बात है, क्योंकि योजनाएं और सहूलियत छोटे शहर के लोगों, खासकर गरीबों तक पहुंचने में सालों का समय लगा देती हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि बड़े शहरों में रहने वाले लोगों के हिस्से में कुछ नहीं आया. CLSS यानी होम लोन सब्सिडी वाली स्कीम के सबसे बड़े लाभार्थी बड़े शहरों के लोग थे. लेकिन यहां भी एक पेच है.

इन लाभार्थियों या कहें तो आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को इसमें सिर्फ 21% घर मिले. माने वो लोग जिनकी सालाना घरेलु आमदनी 3 लाख से कम है. इस स्कीम के तहत इसका 24% हिस्सा उन्हें मिला जिनकी आमदनी 6 लाख से ज्यादा है. माने इस मामले में लाभार्थी आर्थिक रूप से कमजोर लोग नहीं थे. लेकिन छत की समस्या बड़े शहरों की एक बड़ी दिक्कत है. अक्सर लोग छोटे शहरों से निकल कर बड़े शहरों में काम खोजने जाते हैं, और बड़े शहरों में बड़े पैमाने पर स्लम्स बन जाते हैं. या लोग एक कमरे के मकान में 10-12 लोग रहते हैं. ये समस्या कितनी बड़ी है इसे एक आंकड़े से समझिये.
12 फाइव ईयर प्लान के टेक्निकल ग्रुप के मुताबिक साल 2012 में 1 करोड़ 87 लाख घरों की कमी थी. CSEP की इस रिपोर्ट में जिक्र है कि साल 2018 तक घरों की शॉर्टेज करीब 3 करोड़ तक पहुंच गयी थी. Statista के मुताबिक साल 2020 में शहरों में रहने वाले 49% लोग स्लम्स में रहते थे. ऐसे में ये बात भी साफ़ है कि बड़े शहरी इलाकों में आवास से जुड़ी पॉलिसी की जरूरत काफी ज्यादा है.
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