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देश को तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के PM मोदी के दावे पर विपक्ष का पलट वार

PM के दावे पर विपक्ष बोला, 'देश को तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में मोदी सरकार का कोई हाथ नहीं'

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21 अगस्त 2023 (अपडेटेड: 21 अगस्त 2023, 11:16 PM IST)
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मोदी सरकार के दावों पर विपक्ष उठा रहा सवाल
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2024 के चुनाव को अब गिन-चुन के 8 महीने रह गए हैं. प्रधानमंत्री के हालिया भाषण सुनेंगे, मसलन अविश्वास प्रस्ताव वाला भाषण या 15 अगस्त को लाल क़िले से हुआ राष्ट्र के नाम संबोधन. दोनों में प्रधानमंत्री ने अपनी तीसरी पारी की मुनादी पीटी है. तीसरी पारी में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना देंगे, ऐसा भी कहा. विपक्ष और एक्सपर्ट्स कह रहे हैं: जिस राह पर हमारी अर्थव्यवस्था है और बाक़ी देशों की रफ़्तार जितनी सुस्त है, ये काम खुद-ब-खुद हो जाएगा. इसमें आपका कोई करिश्मा नहीं. और जैसा हमने पहली पंक्ति में बताया, चुनाव आ रहे हैं. मतलब विपक्ष भी आक्रामक हो ही रहा है.

दी लल्लनटॉप ने 27 जुलाई को एक ग्राउंड रिपोर्ट की थी - ठेले से खेत तक. टमाटर के दाम बुर्ज ख़लीफ़ा छू रहे थे, तो हमने जानना चाहा कि अगर किसान का टमाटर मंडी में 40 रुपये प्रति किलो बिका, तो आप तक यही टमाटर 200 रुपये में कैसे पहुंचता है? इसी रिपोर्ट के दौरान हमें मिले थे, रामेश्वर. उनका वीडियो बहुत लोगों तक पहुंचा. राहुल गांधी ने उन्हें घर तक बुलाया. और फिर बात पक्ष-विपक्ष के तर्कों में उलझने लगी. लेकिन जिन लोगों तक ये वीडियो पहुंचा, साथ में एक बात भी पहुंची: जो सब्ज़ी बेच रहा है, उसी के पास खाने को नहीं है. अर्थव्यवस्था की जो उपलब्धियां सरकार गिना रही है, अगर वो सच है, तो रामेश्वर की हालत भी हमारी ही अर्थव्यवस्था की सच्चाई है. दोनों को इग्नोर नहीं किया जा सकता.

पहले तो आप कुछ आंकड़ों पर नज़र डालिए. क्योंकि आंकड़े झूठ नहीं बोल सकते. 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने कहा था- 'भारत ने महंगाई पर नियंत्रिण रखने के लिए कई प्रयास किए हैं. हमें सफलता भी मिली है.' लेकिन 15 अगस्त को ही अख़बारों में खुदरा महंगाई दर भी छपी थी. जून में थोड़ी राहत मिली थी कि जुलाई में एक बार फिर बाजार में आग लग गई. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में खुदरा महंगाई की दर 7.44 फीसदी पर रही. महंगाई दर का यह स्तर 15 महीनों में सबसे ज्यादा है. और मोदी सरकार के राज में ऐसा तीसरी बार हुआ जब महंगाई की दर RBI के 4 फीसदी के लक्ष्य से ही उपर नहीं गई. उसने 6 फीसदी की ऊपरी टॉलरेंस लिमिट को भी लांघ दिया. ये मौसम बारिश का है तो उसी भाषा में समझिए. पानी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है.  

बात आगे बढ़ाई जाए उससे पहले जान लेते है कि हैं कि रिटेल महंगाई क्या होती है? और महंगाई का घटना या बढ़ना कैसे तय होता है. जब हम और आप बाजार जाकर खाने-पीने या अपनी जरूरत के दूसरे सामान खरीदते हैं, तो इस तरह की महंगाई को मापने का तरीका कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI)है. मतलब ये कि हम सामान और सर्विसेज के लिए जो दाम चुकाते हैं, CPI उसी को मापता है. फिलहाल देश में करीब 300 सामान ऐसे हैं, जिनकी कीमतों के आधार पर रिटेल महंगाई का रेट तय होता है.

और ये मंहगाई घटती-बढ़ती कैसे है? महंगाई का बढ़ना और घटना आमतौर पर किसी भी चीज की डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करता है. अगर लोगों के पास पैसे ज्यादा होंगे तो वह ज्यादा चीजें खरीदेंगे. ज्यादा चीजें खरीदने से चीजों की डिमांड बढ़ेगी और साथ में दाम भी. एक दूसरी स्थिति में भी कीमत बढ़ सकती है. जब आम लोगों के पास पैसे उतने ही हों, लेकिन चीज़ों की सप्लाई कम हो जाए. जैसा पहले टमाटर और अब प्याज के साथ हुआ. ऐसे में वही चीज़ खरीदने के लिए आपको ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ेंगे.

NSO यानी नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस की रिपोर्ट बताती है कि जुलाई में सबसे ज्यादा सब्जियां महंगी हुई हैं. उसके बाद अनाज, दाल मसाले और दूध और उससे बने उत्पादों के भाव बेतहाशा बढ़े हैं. जुलाई में सब्जियों के दाम 37 फीसदी से ज्यादा उछले हैं. रिटेल महंगाई में सबसे ज्यादा हाहाकार टमाटर ने मचाया. जुलाई में टमाटर के दाम करीब 200 फीसदी चढ़ गए हैं . यह आंकड़ा साढ़े पांच साल में सबसे ज्यादा है. इसके बाद अदरक के 177 फीसदी, लहसुन 70 फीसदी और मिर्च के दाम 50 फीसदी बढ़े हैं.

और सिर्फ सब्जियां ही नहीं मसाले भी खूब महंगे हुए हैं. जुलाई में मसालों के दाम करीब 22 फीसदी से ज्यादा बढ़े. इसी तरह अनाज भी 13 फीसदी महंगा हुआ है. राज्यों के हिसाब से देखें तो 22 में से 14 राज्यों में महंगाई की दर 7 फीसदी से ऊपर रही है. सिर्फ दिल्ली, असम, जम्मू और कश्मीर और पश्चिम बंगाल में महंगाई 6 फीसदी के नीचे रही हैं.

टमाटर, अदरक, लहसुन, मिर्च. कोई भी सब्जी बनाने के लिए ये सब बेसिक चीज़े हैं. इसीलिए यहां - ''महंगा है तो कम खाओ, मत खाओ'' वाला लॉजिक बेतुका हो जाता है. आप कपड़े या गाड़ी खरीदने में किफायद देख सकते हैं. कटौती कर सकते हैं. लेकिन थाली में कटौती किसी के लिए भी एक मुश्किल फैसला होता है. इसीलिए खाने के मामले में खुदरा महंगाई का बढ़ना एक बड़ी खबर होती है.

अभी तक आपने जुलाई की महंगाई जानी. अब जरा आज के दामों पर नज़र डाल लेते हैं. 20 अगस्त को
- एक किलो चावल के दाम 42 रुपये. यही दाम एक साल पहले 37 रुपये थे.
- एक किलो आटा 35 रुपये में है. पिछले साल 32 रुपये था.
- तुअर दाल जिसे हम अरहर दाल के नाम से जानते है. 140 रुपये प्रति किलो बिक रही है. जबकि पिछले साल यही दाल 110 रुपये में मिल रही थी.
- दूध जो पिछले साल 52 रुपये में एक लीटर मिलता था. आज दूध के दाम 57 रुपये प्रति लीटर है.
- प्याज पिछले साल 25 रुपये में एक किलो मिलता था. आज 30 में बिक रहा. नासिक जैसी मंडियों में जो हाहाकार मचा है, उसके बाद से कयास लगाए जा रहे हैं कि ये कीमत और ऊपर जा सकती है.
- और जिसकी इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा है. टमाटर. पिछले साल टमाटर के दाम 34 रुपये थे. आज 85 रुपये में बिक रहा है.

जो दाम हमने आपको अभी बताए ये किसी मॉल या शॉपिंग कॉम्लेक्स के नहीं हैं. ये सारे आंकड़े हमने मिनिस्ट्री ऑफ कन्ज़्यूमर अफेयर्स की वेबसाइट से निकाले हैं. तो यहां एक बात पर ध्यान दीजिए. ये सरकारी आकंड़े हैं. जब आप बाजार में खरीदने जाएंगे तो हर आइटम 2-4 रुपये महंगा ही मिलेगा.

हालांकि, सरकार तेल के दाम दिखाकर अपनी पीठ थपथपा सकती है. पिछले साल जो सरसों का तेल 172 रुपये में मिल रहा था. वो इस साल 142 में है.  लेकिन सोचने वाली बात ये है कि दिन भर दिहाड़ी पर काम करने वाले कितने लोग 140 या 142 रुपये लीटर सरसों का तेल खरीदने की स्थिति में होंगे. कीमत बहुत बढ़ने के बाद कुछ नीचे आ भी जाए, तो उसमें बड़ी राहत नहीं खोजी जा सकती.

आर्थिक मोर्चे की एक तस्वीर और भी है. हम विश्व की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हैं. प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि अगर 2024 में अगर वो लौटे तो देश विश्व की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाएगा. दुनिया की बड़ी रेटिंग एजेंसीज़ भी देश के आर्थिक स्थिति की तारीफ कर रही हैं. रेटिंग एजेंसी फिच का कहना है कि भारतीय बैंकों के लिए काम करने का माहौल मजबूत हुआ है. कोविड-19 महामारी से के दौरान पैदा हुए आर्थिक जोखिम भी कम हो गए हैं. मूडी ने भी भारत का आर्थिक भविष्य स्टेबल बताया है. हालांकि मूडी ने मणिपुर हिंसा और राजनीति और सामाजिक स्तर पर असहमतियों के घटते स्पेस पर चेताया भी है. मोटे तौर पर विश्व पर आर्थिक एजेंसियां भारत की तारीफ करती ही नज़र आ रही हैं.

अब यहां से आप भारतीय अर्थव्यवस्था की दो तस्वीरें देखिए. एक तरफ तो बाज़ार में ऐसी महंगाई पसरी है कि खाने की थाली भी भरना मुश्किल है. दूसरी तरफ विश्व की एजेंसियां और हमारी सरकारी सरकार ये दावा कर रही हैं कि आर्थिक मोर्चे पर तो सब अच्छा चल रहा है. किसी भी देश के लिए एक सीमित महंगाई को अर्थव्यवस्था की तरक्की के लिहाज़ से अच्छा माना जाता है. लेकिन जो महंगाई दर हम झेल रहे हैं क्या उसे अच्छा माना जाना चाहिए.

ये तो एक पक्ष है. कि वैश्विक मंदी चल रही है. रूस-यूक्रेन का युद्ध है. लेकिन एक पक्ष और है. पूर्व में JNU के प्रोफ़ेसर और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने लिखा है कि भाजपा आर्थिक मोर्चे पर अपनी पीठ थपथपा रही है. दुहाई दे रही है कि कैसे कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध से आई वैश्विक मंदी से भी हम बच गए. अपने सपोर्ट में यूनाइटेड नेशन्स, IMF और वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट्स लगा रही है. लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इस गुलाबी चित्रण से अलग है. हाशिए पर रहने वाले लोगों को भयंकर बेरोज़गारी का सामना करना पड़ रहा है — ख़ासकर महिलाओं और युवाओं को. बड़ी संख्या में किसान भी कृषी की दुर्दशा की शिकायत करते हैं. और जिस ट्रिलियन डॉलर डेटा का हवाला दिया जाता है, उच्च पदों पर बैठे अधिकारी इस डेटा की सटीकता पर भी संदेह जताते हैं. और इसके कारण क्या हैं? बकौल अरुण कुमार, दो बड़े कारण हैं. भाई-भतीजावाद - जिसे क्रोनीवाद भी कहते हैं - और भ्रष्टाचार. क्रोनीवाद की वजह से NPA बढ़ रहा है, आर्थिक प्रशासन कमज़ोर हो रहा है. दूसरी तरफ़, भ्रष्टाचार के मामले कायम हैं. इन दोनों की वजह से टेबल के नीचे वाला कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है.

अगले साल चुनाव हैं और महंगाई सरकार को भी दिख रही है. और यही वजह है कि दामों पर कंट्रोल करने के लिए प्याज के निर्यात पर 40 फीसदी कस्टम ड्यूटी लगा दी है. हाल में NDTV के कार्यक्रम में पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्री हरदीप पुरी ने LPG दाम घटाने को लेकर भी बयान दिया. उन्होंने कहा कि जल्द ही LPG के दामों में राहत मिलेगी. इसके अलावा ऐसी खबरें भी आईं कि सरकार अलग-अलग मंत्रालयों से 1 लाख करोड़ के बजट को रिलोटकर पेट्रोल-डीज़ल और खाने के सामान के दामों में महंगाई को रोकने की कोशिश करेगी.

तो सवाल है कि नरेंद्र मोदी सरकार कर क्या रही है? कुछ कर भी रही है या ये दावे भी हवाई हैं? International Food Policy Research Institute  में सीनियर फ़ेलो अविनाश किशोर के मुताबिक़, ग़रीब भारतीयों की जेब पहले से ही काटी जा रही है और अनाज की कीमतों का बढ़ना, किसी भी सरकार के लिए जोख़िम ही है. और कोई सरकार ये जोख़िम उठाना नहीं चाहती. ख़ासतौर पर चुनावी

पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था और तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था के अरमान के पीछे एक कहानी और है. कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि हम अभी पांचवी अर्थव्यवस्था बने ही नहीं हैं. भारत के GDP डेटा में भारी त्रुटियां हैं. जब नोटबंदी की घोषणा की गई, तभी से असंगठित क्षेत्र में गिरावट आ रही है. लेकिन आधिकारिक डेटा में इसे शामिल नहीं किया गया है. इसलिए, घटते हुए क्षेत्र को भी बढ़ता हुआ बता दिया जाता है. नतीजतन, GDP और विकास दर के अनुमान असली आंकड़ों से ज़्यादा हैं. UN, IMF जैसी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों का काम डेटा इकट्ठा करना नहीं है. वो आधिकारिक डेटा के साथ काम करती हैं. इसीलिए इन त्रुटियों को दोहराती हैं. जिन एक्सपर्ट्स का ये तर्क है, उनके हिसाब से हम अभी आठवे या नवे स्थान पर हैं. हालांकि, सरकार ने इस पर कोई सफ़ाई नहीं दी है. और ये व्याख्या-सापेक्ष है.

ये तो हमने आपको दिक्क़तें बताईं. लेकिन हमारा कौल है, कि आपको उम्मीद की बात भी बताई जाए. थिंक टैंक ICRIER में प्रोफे़सर अशोक गुलाटी ने अर्थव्यवस्था और ग़रीबी पर एक ज़रूरी और दिलचस्प टिप्पणी की है. स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि पिछले पांच सालों में उनकी सरकार ने साढ़े 13 करोड़ लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाला है. अशोक लिखते हैं, कि भारत अगले पांच से 10 सालों में ग़रीबी को लगभग ख़त्म करने की राह पर है. मगर कुपोषण अभी भी गंभीर समस्या है. ऊपर से जलवायु परिवर्तन, हीट-वेव और अचानक आने वाली बाढ़, न केवल भारत की खाद्य प्रणाली के लिए बल्कि ग़रीबी उन्मूलन के लिए भी बहुत बड़ी चुनौती है. और इन चुनौतियों से कैसे निपटें? Gender-responsive apporach के साथ. माने महिलाओं को अर्थव्यवस्था का सक्रिय हिस्सा बना कर. अगर हम अपने वर्क-फ़ोर्स में महिलाओं की भागीदारी को देखें, तो 2021-22 के आंकड़ों के हिसाब से ये 30 फ़ीसदी से भी कम है. अगर हम उनकी साक्षरता में सुधार करें, युवा महिलाओं की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करें, उनके स्किल-डेवलपमेंट पर ध्यान दें, तो ग़रीबी, भूख और कुपोषण का समाधान किया जा सकता है.

2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लिए, अगले पांच सालों में भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए और अगले हज़ार बरसों में भारत को महान बनाने के लिए "सबका साथ, सबका विश्वास" को चुनावी नारे से आगे बढ़ना होगा. पॉलिटकल विल चाहिए होगी कि आख़िरी व्यक्ति तक विकास पहुंचे. नहीं तो तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था केवल ऊंची इमारतों में बंद होकर रह जाएगी. ज़रूरी है कि हम अर्थव्यवस्था को लेकर एक ऐसी अप्रोच के साथ आगे बढ़ें कि GDP के लिहाज़ से और पर-कैपिटा इनकम के लिहाज़ से जो हमारी पोज़िशन है, उसका फ़र्क़ कम हो.  

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