तस्वीरें: आगे नंगी तलवार, पीछे गवर माता थीं सवार
राजस्थान के इस इवेंट में सिर्फ राजघराने के लोगों और राजपूतों को मिलती है एंट्री. हम आपके लिए वहीं की तस्वीरें ले आए हैं.
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फोटो - thelallantop
ये आर्टिकल और तस्वीरें हमें लिख भेजी हैं. अनुराधा कंवर भाटी ने. सीधे राजस्थान से. साल भर किले की ऊंची-अंधेरी दीवारों में बंद बग्गियों, शस्त्रों, अस्त्रों, जेवरों और गवर माता को एक दिन सबके सामने आने का मौका मिलता है.
हमारी-आपकी किस्मत. अनुराधा उस रोज वहीं थीं. फिर क्या था ढेरों फोटो हम तक पहुंची हैं. क्योंकि उनको लगा ‘दी लल्लनटॉप’ से शेयर करनी चाहिए. आप भी lallantopmail@gmail.com पर कायदे का कंटेंट भेज सकते हैं. ठीक लगा तो हम छापेंगे.
संस्कृतियां न्यायपूर्ण नहीं रहीं लेकिन उनका एक अस्तित्व तो है ही. ये हमारे अतीत से जुड़े रहने का दरवाजा है. कि हम चीजें कैसे करते थे? ऐसा ही त्योहार है गणगौर का. गण मतबल शिव और गौर मतलब पार्वती. गृहस्थों के लिए इस दंपत्ति को आदर्श माना गया है और भारत में बहुत से राज्यों में इसे मनाया जाता है. होली के दूसरे दिन से ये शुरू होता है. आमतौर पर 18 दिन ये सेलिब्रेशन और रस्में चलती हैं. विवाहित, नव-विवाहित औरतें सुहाग की लंबी उम्र और प्रेम के लिए और कुंआरी लड़कियां अच्छे वर के लिए ये पूजा करती है. व्रत रखे जाते हैं. बीकानेर में गणगौर की पूजा तकरीबन हर जाति के घर में होती है. कोई 70 साल पहले तक शहर रियासत के अधीन था तो होली के बाद यहां के जूनागढ़ किले से गवर की सवारी निकाली जाती थी. इस बार भी 9 अप्रैल शाम को इवेंट हुआ. मैं भी तैयार थी. पूरे साल किले की ऊंची-अंधेरी दीवारों में बंद बग्गियों, शस्त्रों, अस्त्रों, जेवरों और गवर माता को इस एक दिन सबके सामने लाया जाता है. मुख्य कक्ष तक आप तभी पहुंच सकते हैं अगर आप राजपूत हों या राजघराने से ताल्लुकात रखते हों. इसी Advantage के सहारे मैं देवराला कक्ष तक पहुंची. अंदर केवल महिलाएं ही जा सकती थीं. इस समय स्वयं को सौभाग्यशाली माना मैंने. ऊंचे प्रवेश द्वारों, नक्काशीदार चौखटों से गुजरती हुई मैं एक विशाल, ठण्डे, भव्य कक्ष में पहुंची. परिचित का नाम बताने पर बड़ी विनम्रता से बैठाया गया. बीकानेर के ही अलग-अलग घरानों की स्त्रियां लकड़ी से बनी गवर को कुंदन के गहनों से सजा रही थीं. लग रहा था सच में किसी महिला को सजाया जा रहा है.
संस्कृतियां न्यायपूर्ण नहीं रहीं लेकिन उनका एक अस्तित्व तो है ही. ये हमारे अतीत से जुड़े रहने का दरवाजा है. कि हम चीजें कैसे करते थे? ऐसा ही त्योहार है गणगौर का. गण मतबल शिव और गौर मतलब पार्वती. गृहस्थों के लिए इस दंपत्ति को आदर्श माना गया है और भारत में बहुत से राज्यों में इसे मनाया जाता है. होली के दूसरे दिन से ये शुरू होता है. आमतौर पर 18 दिन ये सेलिब्रेशन और रस्में चलती हैं. विवाहित, नव-विवाहित औरतें सुहाग की लंबी उम्र और प्रेम के लिए और कुंआरी लड़कियां अच्छे वर के लिए ये पूजा करती है. व्रत रखे जाते हैं. बीकानेर में गणगौर की पूजा तकरीबन हर जाति के घर में होती है. कोई 70 साल पहले तक शहर रियासत के अधीन था तो होली के बाद यहां के जूनागढ़ किले से गवर की सवारी निकाली जाती थी. इस बार भी 9 अप्रैल शाम को इवेंट हुआ. मैं भी तैयार थी. पूरे साल किले की ऊंची-अंधेरी दीवारों में बंद बग्गियों, शस्त्रों, अस्त्रों, जेवरों और गवर माता को इस एक दिन सबके सामने लाया जाता है. मुख्य कक्ष तक आप तभी पहुंच सकते हैं अगर आप राजपूत हों या राजघराने से ताल्लुकात रखते हों. इसी Advantage के सहारे मैं देवराला कक्ष तक पहुंची. अंदर केवल महिलाएं ही जा सकती थीं. इस समय स्वयं को सौभाग्यशाली माना मैंने. ऊंचे प्रवेश द्वारों, नक्काशीदार चौखटों से गुजरती हुई मैं एक विशाल, ठण्डे, भव्य कक्ष में पहुंची. परिचित का नाम बताने पर बड़ी विनम्रता से बैठाया गया. बीकानेर के ही अलग-अलग घरानों की स्त्रियां लकड़ी से बनी गवर को कुंदन के गहनों से सजा रही थीं. लग रहा था सच में किसी महिला को सजाया जा रहा है.
बीकानेर: यहां भरता है मेला, जहां सजते हैं ऊंट
कक्ष में कुछ और महिलाएं भी थीं जो राजपूत नहीं थीं. राजा-महाराजाओं के राज में इन्हें दरोगियां कहा जाता था. यानी सेविका. किसी रानी और दरोगी के संबंध सखी जैसे होते थे, जाहिर है बीच में एक प्रोटोकॉल भी होता था लेकिन जब दरोगी के बराबर अधिकारों की चेतना समाज में नहीं थी तब वे भी जीवन में सामाजिक रूप से नीचे होते हुए भी जीती जाती थीं. इस रॉयल इवेंट में दरोगियां महत्वपूर्ण कड़ी रही हैं जो बाहर की रस्मों को पूरा करती थीं, खासकर उस दौर में जब रानियां परदे में रहती थीं, पराए मर्दों के आगे नहीं जाती थीं तब दरोगियां बाहरी मर्दों से सब communicate करती थीं. जैसे 'जोधा अकबर’ फिल्म में जो औरतें जोधा के इर्द-गिर्द रहती हैं. खैर, मैं कक्ष में तस्वीरें लेती रहीं और बाद में घरानों की स्त्रियों ने कैमरे में अपनी तस्वीरें बड़े चाव से देखी, ये उनकी जिंदगी में पहली बार हुआ शायद. ये तस्वीरें ही बाहरी दुनिया से उनका वास्ता करवाएंगी. गवर को तैयार करके बाहर चौक में गद्दी पर रखा गया. वहां नृत्य और गीतों के बीच सवारी निकाली जानी थी. एक महिला जो सालों से इस रस्म में शामिल हो रही हैं, जो अब काफी बूढ़ी हो चुकी हैं, वे धीरे-धीरे नाचने का प्रयास कर रही थीं. पंडित जी भी थे. बूढ़े भी, अधेड़ भी. वे साधारण बोलचाल में भी मां-बहन की बात करते चलते हैं. जूनागढ़ फोर्ट के राइट साइड में पीछे की तरफ चौतीना कुंआ है जहां से नगर के मुख्य बाजार की सड़क 'किंग एडवर्ड मेमोरियल रोड’ शुरू होती है. कुंए पर गवर को पानी पिलाने ले जाया जाता है. पुलिस की तैनाती भी इस प्रमुख सालाना इवेंट में है. आम जनता सड़क के दोनों ओर खड़ी है. फोटो ले रही है, हाथ जोड़ रही है. पुरुष तलवार लेकर सीधे तने रक्षक की भांति चल रहे हैं. बीच में हंसी-ठठ्टा भी जरा कर लेते हैं. पीछे घोड़ों पर पुलिसकर्मी हैं और महिला पुलिस भी है. गवर सशक्त स्त्री की तरह सजी-धजी, स्वतंत्र रूप से सड़क पर पुरुषों को लीड करती हुई आगे रहती दिखती है, वो किले की दीवारों को लांघती लगती है. उम्मीद है वो सुहाग के साथ खुद स्त्रियों के लिए भी सशक्तिकरण लेकर आएं. खैर, चौतीने कुंए पर चांदी की बड़ी झारी में पानी भरकर लाल कसूंबे (वस्त्र) में गीला करके गणगौर का मुंह पौंछा जाता है. और ये Royal procession बिना किसी बाधा के लौटने लगता है और लौट आता है. हाजिर है झलकियां. फोटो पर क्लिक जमाएं और देखें तस्वीरें... [lallantop-gallery id=15925]
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