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दूसरा गुजराती : जब कभी इन चित्रों से गुजरता हूं, घंटों इस लड़की को ताकता रहता हूं

चित्रकार वेरोचॅन ने कहा, मालेकी के चित्रों को स्पर्धा के बाहर रखें अन्यथा मैं इमोशन के अतिरेक से घुटकर मर जाऊंगा.

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18 मई 2016 (अपडेटेड: 18 मई 2016, 02:01 PM IST)
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सावजराज सिंह सावजराज सिंह

भारत का सुदूर पश्चिमी सिरा, लखपत. गुजरात के सबसे अंतिम सिरे पर बसे गांव से आते हैं सावजराज सिंह. उजले कच्छ के रण से आने वाले उजली आत्मा के इंसान. इंसानों को पढ़ते हैं. समय की कहानी सुनाते हैं. इमारतों पर लिखी इबारतों का दस्तावेजीकरण अपनी स्मृति की किताब में करते हैं. पांच भाषाएं जानते हैं, लेकिन चुप्पी की जुबां सबसे बेहतर पढ़ते हैं. उन्होंने 'ज्ञान' हासिल करने के लिए हम सबकी तरह स्कूल का रास्ता नहीं चुना, मैक्सिम गोर्की की तरह जिन्दगी की खुली किताब ही उनका विश्वविद्यालय है.
गुजरात दिल्ली के लिए हाशिया है, और कहते हैं 'दिल्ली ऊंचा सुनती है'. लेकिन इतिहास में गुजरात से दिल्ली की ओर की गई यात्राएं इतिहास में की गई यात्राएं भी हैं, और भविष्य में की गई यात्राएं भी. ये लोग राजधानी को देखने के लिए एक भिन्न आइना साथ लाते हैं. ये आते हैं, और इतिहास की कहानी सुनाते हुए कई बार इतिहास बदल भी देते हैं. सावजराज हमारे साथ जुड़े विशेष लेखक हैं. हमने उन्हें दिल्ली में 'दूसरे गुजराती' का उपनाम दिया है.
यह अक्षरों से बनी एक नई मोतियों की लड़ की शुरुआत है. उनके लिखे को हम 'दूसरा गुजराती' शीर्षक से आपको पढ़वाते रहेंगे.
इस 'दूसरे गुजराती' की पिछली दो पोस्ट में हम उनकी नज़रों से दिल्ली शहर, और उनका स्मृतियों में बसा शहर लखपत देख चुके हैं.

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आज वो ईरान के चित्रकार 'इमान मालेकी' के चित्रों में इंसानी भावनाओं के रंगों की पड़ताल कर रहे हैं.


 
इमान मालेकी. समकालीन समय और आधुनिक चित्रकारी का एक महान चित्रकार. ईरान के तेहरान का रहने वाला. 1975 में तेहरान में ही पैदा हुए इस बंदे को बचपन से ही चित्रकला के प्रति न सिर्फ लगाव था, बल्कि एक नशा सा था. मां के द्वारा चित्रों के प्रति लगाई लगन इस कदर हावी हुई कि पढ़ाई-लिखाई छोड़कर सिर्फ पंद्रह साल की उम्र में ही अपने मादरे-वतन के उस समय के श्रेष्ठ रियलिस्ट चित्रकार "मुर्तज़ा केतोज़ियन" से विधिवत चित्रकला की शिक्षा लेना शुरू कर दी, और उसी उम्र में कैनवास पर अपनी मौलिक रेखाएं आंकना भी. हालांकि बाद में उन्होंने ग्राफिक्स डिजाइन में डिप्लोमा की डिग्री भी हासिल की.
पर्शियन-यूरोपियन चित्र शैली के इस श्रेष्ठ चित्रकार ने कुछ समय तक अपने चित्रों के पैसों से फिलिस्तीन और ईरान के युद्धग्रस्त एवं गरीब बच्चों के लिए खूब काम किया. और इसी रक्तपात और गरीबी से विचलित होकर कुछ महीनों तक मानसिक रूप से अस्वस्थ भी हो गए. फिलहाल इन दिनों मालेकी तेहरान के एक स्कूल में बच्चों को चित्रकला सिखाते हैं.
मेरा व्यक्तिगत मंतव्य है कि मानवीय भावनाओं को चित्रों में प्रकट करने में दूसरा कोई इनका सानी नहीं. वो चित्र के किरदार को केनवास से सीधे देखने वाले के दिलो-दिमाग पर दृश्यमान कराते हैं. लावण्य, सौंदर्य, कारुण्य और मानवीय संवेदनाओं को अपने दिल में समेटे बैठे इस चित्रकार ने सब अपने चित्रों में उड़ेल दिया और मानवीय चेतनाओं को झंकृत कर दिया.
चित्रकला का अंतरराष्ट्रीय 'बुगेरो अवॉर्ड' उन्हें मिला हुआ है. बुगेरो अंतरराष्ट्रीय कला मेले में जब उनके चित्र को प्रथम स्थान मिला तो युक्रेन के चित्रकार वेरोचॅन ने एक टिप्पणी की कि मालेकी के चित्रों को स्पर्धा के बाहर रखें अन्यथा मैं इमोशन के अतिरेक से घुटकर मर जाऊंगा. शायद वेरोचॅन, मालेकी से मजाक कर रहे थे क्योंकि वेरोचॅन को अपने चित्र के लिए दूसरा स्थान मिला था. और वेरोचॅन कोई कम चित्रकार नहीं है.
मुझे मालेकी की मॉडल से प्यार हो गया है. उसको घंटों तक देखते हुए मैं महसूस करता हूं कि वो अभी मेरे सामने दिखेगी और केनवास से बाहर आकर उदासी को मुस्कुराहट को पीछे छिपाते हुए कहेगी कि इस दिल में मत झांको; डूब जाओगे. गुजर जाओ मुसाफिर... पर मैं कभी वहां से गुजर नहीं पाता. बल्कि उसकी मुग्धता पर आंखें झर जाती है, और मैं अपना इकलौता ह्रदय हार आता हूं. जब कभी इन चित्रों से गुजरता हूं तो मैं घंटों तक इस लड़की को ताकता रहता हूं. और उसके प्यार में गुलजार हो जाता हूं.
ज्यादातर चित्रों में मालेकी ने इसी मासूम युवती को अपने चित्रों की मॉडल बनाया है. किंवदंती है कि यह युवती उनकी किशोरावस्था की प्रेयसी थी और किसी दुर्भाग्यवश छूट गई. और किंवदंती की मानें तो वो मॉडल एक वेश्या की लड़की थी, जिसे मालेकी अपना दिल दे बैठे थे. खैर, सच्चाई जो भी हो पर बाद में मालेकी ने किसी और लड़की से शादी कर ली और आजकल अपना दांपत्य जीवन निभा रहे हैं. पर इस कदर प्यार किए बिना चित्र या कविता कहां आती है?


 

'ग्रोइंग अप टुगेदर'

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'ग्रोइंग अप टुगेदर' चित्र में कमरे के अंशतः प्रकाश में दो किशोरियां ज्ञानदीप के सहारे अपनी नियति ढूंढने की कोशिश कर रही हैं. किताब लिए बैठी किशोरी के मुख पर निर्लिप्त भाव के पीछे शायद पहली बार के प्रेम में मिली कोई गहरी पीड़ा है. और पीछे की बाल किशोरी स्नेह के साथ जिज्ञासा के भाव से उसे निहार रही है.


 

'ऑमेन्स ऑफ़ हाफ़िज़'

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'ऑमेन्स ऑफ़ हाफ़िज़' चित्र में घर की छत पर चटाई बिछा कर बैठी दो युवतियां और ऊपर खुला आसमान. बस उनकी आंखों में ही कैद साफ झलकती है. जैसे दोनों मुग्ध, उदास युवतियां किताब के पन्नों पर सवार होकर कहीं दूर पहाड़ों के पार उड़ जाना चाहती हो.


 

'द विंडो'

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'द विंडो' इस चित्र में कई भाव छिपे हैं. पर मुख्यतः भाव है मुश्किलों के बीच एक आशा की खिड़की नजर आना. अंधेरे कमरे में खिड़की से अंदर आती रोशनी एक आशा की किरण हो जैसे.
हालांकि हर दर्शक का चित्र देखने के बाद अपना अलग-अलग भाव पदार्थ प्रगट होता है. किसी को कुछ दिखता है तो किसी को कुछ और...


 
सावजराज की पिछली पोस्ट-

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