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प्रेम के मामले में विधाता 'मोहब्बतें' का नारायण शंकर क्यों बन जाता है?

जिसे मृत्यु का भय नहीं है उसे जीवन से प्यार भी नहीं हो सकता. पढ़ें हिमांशु सिंह का लेख.

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29 मार्च 2019 (अपडेटेड: 29 मार्च 2019, 01:49 PM IST)
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नारायण शंकर, यहां विधाता
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himanshu singhहिमांशु सिंह दी लल्लनटॉप के दोस्त हैं. हमें पढ़ते रहते हैं और हमारे लिए लिखते भी रहते हैं  . हमारे लिए लिखा है इसका मतलब आपके लिए लिखा है. इस बार हिमांशु बता रहे हैं कि प्रेम और भावनाओं से जब इंसान हारने लगता है तो वो कैसे कैसे खुद को समझाता, बहलाता है. देखो, कहीं अपनी कहानी न मिल जाए.
मनोहर श्याम जोशी अपने उपन्यास 'कसप' में कहते हैं कि प्रेम अपने मूल स्वरूप में अतिवादी होता है. ये बात हम काफी समय बाद समझ पाते हैं कि विधाता अमूमन इतना अतिवाद पसंद नहीं करता. विधाता अपनी पूरी ताकत लगा देता है अपने अहं को तुष्ट करने के लिये. मेरा ख्याल है कि विधाता 'मोहब्बतें' फिल्म का नारायण शंकर (अमिताभ बच्चन) होता है. हर दिन अपने स्वर्ग के अहाते में स्वर्ग के बाशिंदों की पेशी करवाता है. फिर जिन-जिन लोगों पर उसे शक़ होता है, उन्हें अंगुलियों के इशारे से अपने पास बुलाता है कि, "ऐ लड़के, यहां आओ. सुनो लड़की, तुम.... हां तुम.... इधर आओ." फिर अपनी खिचड़ी दाढ़ी खुजाते हुए चुनौतीपूर्ण लहज़े में कहता है कि, "चाहे जितनी कोशिश कर लेना तुम दोनों, चाहे जितनी ताकत लगा लेना, साथ नहीं हो पाओगे तुम कभी.... ये नारायण शंकर उर्फ भगवान का वादा है तुम दोनों से. अब जाओ धरती पर." और फिर उन्हें तमाम सालों के लिये धरती पर भेज दिया जाता है. आगे की कहानी तो आप सब जानते ही हैं. जन्म लेना, प्रेम में पड़ना और फिर वही सब चीजें जिन्हें समझदारों की ज़बान में कहा जाय तो 'कोई फायदा नहीं'. ऐसे में एक मजेदार निष्कर्ष जो हम पाते हैं, वो ये है कि शादियां स्वर्ग से बन कर नहीं, स्वर्ग से खारिज़ होकर आती हैं. कि "जाओ बेट्टा, चाहे जितनी कोशिश कर लो तुम लोग, दुनिया में चाहे किसी से भी शादी हो जाएगी तुम्हारी, पर आपस में नहीं होगी." अक्सर होता भी यही है. सबसे खूबसूरत प्रेम कथाएं सबसे दुखद विरह-गाथाएं भी तो हैं न! पर कुछ भी हो, अंत में हमें एक चेहरा चाहिए ही होता है जिसे स्मृतियों में लिये हुए हम वापस जा सकें. लेकिन अगर जीवन सच में अभागा हुआ और हमारे प्रेम का आरोप स्वीकारने वाला कोई अंत तक न मिला, तो भी ये चोर मन, मन ही मन किसी न किसी के मत्थे मनमाफिक तोहमत मढ़ ही देता है. लगता है जैसे मृत्यु के बाद वैतरिणी के तारनहार या जन्नत के रिज़वान या पैराडाईज़ के बोटमैन को हमारी स्मृतियों में वो विशेष छवि देखे बगैर हमें आगे जाने देने की अनुमति ही नहीं है. लहनासिंह, बाबू नन्हकू सिंह और दशरथ मांझी से लेकर राधा और मीरा जैसे लोगों का इन जगहों पर बड़ी बेसब्री से इंतज़ार हुआ होगा. बड़ी सहूलियत हुई होगी उन्हें यहां. भले ही इन लोगों को स्वर्ग से तमाम सालों के लिये निकाल दिया गया था, पर वापस आने पर स्वर्ग के द्वार पर इनका स्वागत खुद विधाता ने किया होगा. विधाता मन ही मन जला भी होगा इनसे. पर विधाता की अपनी मजबूरियां हैं. अमृत का घूंट पिया है उसने. मृत्यु का डर नहीं है, तो जीवन से प्रेम भी नहीं है. विधाता एक कुण्ठित बूढ़ा है.

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