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देश में पेट्रोल 38 रुपये प्रति लीटर हो सकता है, जानिए कैसे

समझिए कहां पेच फंसाती है सरकार.

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15 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 15 सितंबर 2017, 05:01 AM IST)
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देश में पहली बार ऐसा हुआ है, जब डीज़ल की कीमत पेट्रोल की कीमत से ज्यादा हो गई है.
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जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स. इसके बारे में तो आपको पता होगा ही. नहीं भी है तो बता देते हैं. ये अपने देश की नई कर व्यवस्था है जो 1 जुलाई 2017 से लागू हो चुकी है. लागू करते वक्त कहा गया था कि ये व्यवस्था इसलिए लागू की जा रही है कि अब एक देश-एक टैक्स सिस्टम होगा. चलो, सबने इस बात को मान भी लिया. लेकिन कुछ चीजें इसके दायरे से बाहर कर दी गई हैं. इनमें से एक है पैट्रोलियम उत्पाद. यानी हम जो पेट्रोल-डीजल इस्तेमाल करते हैं वो जीएसटी के दायरे में नहीं आता है.
GST
भारत में 1 जुलाई 2017 से GST लागू हो गया है.

अगर इसे भी जीएसटी के दायरे में ला दिया जाए तो क्या होगा. होगा ये कि अगर पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में रखा जाए, तो उसकी कीमतें 70 रुपये से गिरकर सीधे 38 रुपये पर आ जाएंगी. यानी सीधे तौर पर 32 रुपये की बचत होगी. वित्त मंत्री अरुण जेटली जिस जीएसटी काउंसिल को लीड कर रहे हैं, उनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या काउंसिल पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के सुझावों पर ध्यान देगी. जीएसटी काउंसिल वो संस्था है, जो देश में जीएसटी को लागू करने के लिए बनी है. इसमें केंद्र के साथ ही राज्यों के भी प्रतिनिधि शामिल हैं. अब की हालत यै है कि पिछले तीन साल में पेट्रोल और डीजल की कीमतें सबसे ज्यादा हैं. धर्मेंद्र प्रधान ने ट्विट कर कहा था,
पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाकर ही तेल की कीमतों को ठीक किया जा सकता है. पैट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने से तेल की कीमतें कम हो जाएंगी.
 
एक उदाहरण लेते हैं. दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 70 रुपये से ज्यादा है. दिल्ली में जीएसटी रेट 12 फीसदी मानें और इसे पेट्रोल की कीमतों पर अप्लाई करें, तो दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 38.10 रुपये हो जाएगी. अगस्त 2014 में आखिरी बार पेट्रोल की कीमतें 70 रुपये तक पहुंची थीं. उस वक्त कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में 98 डॉलर प्रति बैरल थीं. लेकिन अब के हालात अलग हैं. फिलहाल कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर प्रतित बैरल हैं.

पेट्रोल-डीजल की कीमतें इतनी ज्यादा क्यों?

Petrol 2
जिस रेट पर तेल खरीदते हैंं, उसका आधे से ज्यादा पैसा टैक्स का होता है.

इंडियन ऑयल की ओर से जारी डाटा के मुताबिक रिफाइनरी में पेट्रोल की कीमत 26.65 रुपये होती है. डीलरों को ये पेट्रोल 30.70 रुपये प्रति लीटर के रेट पर मिलता है. दिल्ली में जब कोई आम आदमी इस पेट्रोल को खरीदने जाता है, तो इसकी कीमत 70.39 रुपये हो जाती है. इसका सीधा सा मतलब है कि 39.41 रुपये टैक्स और डीलर के कमीशन के तौर पर चले जाते हैं.

अब भी VAT के दायरे में है तेल

VAT Diesel
अलग-अलग राज्यों में VAT की दर अलग-अलग है.

अब जबकि जीएसटी लागू हो चुका है, टैक्स के लायक अधिकांश चीजों को इसके दायरे में लाया जा चुका है. लेकिन पेट्रोल-डीजल पर अब भी VAT (वैल्यू ऐडेड टैक्स) ही लग रहा है. देश के अलग-अलग राज्यों में वैट की दर अलग-अलग है. वैट एक तरह का बिक्री कर है जिसे राज्य सरकार लेती है. टैक्स उपभोक्ता को चुकाना पड़ता है. पेट्रोलियम प्लानिंग ऐंड एनालिसिस सेल (PPAC), दिल्ली के आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में पेट्रोल-डीजल पर वैट की दर 27 फीसदी है. वहीं मुंबई, थाणे और नवी मुंबई में वैट की दर 47.64 फीसदी है. इससे सीधे तौर पर दो राज्यों के बीच तेल की कीमतों में 9 रुपये का अंतर आ जाता है.

ऊंची कीमतों के लिए केंद्र भी तो जिम्मेदार है

Excise
केंद्र सरकार सेंट्रल एक्साइज टैक्स वसूलती है.

पेट्रोल-डीजल पर केंद्र भी एक्साइज ड्यूटी लेता है. एक्साइज ड्यूटी ऐसा टैक्स है जो देश में किसी चीज के उत्पादन और उसकी बिक्री पर लगता है. इसे केंद्र सरकार वसूलती है और इससे मिले पैसे का उपयोग लोगों के काम आने वाली सुविधाओं के लिए किया जाता है. PPAC के आंकड़ों के मुताबिक नवंबर 2014 से अब तक पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 54 फीसदी बढ़ गई है. इसी तरह से वैट की दर में 46 फीसदी और डीलर के कमीशन में 73 फीसदी तक इजाफा हुआ है.
इसी तरह से डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी में 154 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. वैट 48 फीसदी बढ़ा है और डीलर के कमीशन में 73 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. 2014 से अब तक पैट्रोल और डीजल पर 12 बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई जा चुकी है.
केंद्र और राज्य मिलकर पैट्रोलियम उत्पादों पर जो टैक्स ले रहे हैं, उसी का नतीजा है कि फिलहाल तेल की कीमतें 2014 वाले रेट में पहुंच गई हैं. ऐसा तब है जब कच्चे तेल की कीमतें आधे से भी कम हुई हैं. यही वजह है कि 2014-15 में पैट्रोलियम उत्पादों से जो रेवेन्यू 3.32 लाख करोड़ रुपये मिला था, वो 2016-17 में बढ़कर 5.24 लाख करोड़ रुपये हो गया है.

जीएसटी के दायरे में आ जाए तेल तो क्या होगा?

GST Rate
भारत में जीएसटी की दरों को पांच हिस्सों में बांटा गया है.

अगर पैट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाता है तो इनकी कीमतों में काफी हद तक कमी आ जाएगी. जीएसटी के अभी जो रेट हैं, वो पांच हिस्सों में बंटे हुए हैं. इनका दायरा है 0, 5, 12, 18 और 28 फीसदी. अब इनकी कीमतों पर 12 फीसदी से तो कम टैक्स नहीं ही लगाया जाएगा. चलिए मान लेते हैं तेल आ गया जीएसटी के दायरे में और इस पर टैक्स लग गया 12 फीसदी. अब इस टैक्स के साथ आप दिल्ली में पेट्रोल खरीदने जाएंगे तो पड़ेगा 38.1 रुपये का. यानी अभी जो रेट है उसकी तुलना में 32 रुपये सस्ता. अगर 18 फीसदी भी जीएसटी मान लें तो पेट्रोल की कीमत 40.05 रुपये ही होगी. जीएसटी की अधिकतम दायरा 28 फीसदी है. अगर ये रेट भी अप्लाई कर दिया जाए तो दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत मात्र 43.44 रुपये प्रति लीटर ही होगी. 28 फीसदी जीएसटी के बाद अगर लग्जरी कार पर लगने वाला सेस भी जोड़ दिया जाए तो भीब पेट्रोल की कीमत 50.91 रुपये प्रति लीटर ही होगी, जो फिलहाल मिलने वाले तेल की तुलना में 20 रुपये प्रति लीटर सस्ता होगा.
Petrol Aaj Tak
GST की सबसे अधिकतम दर 28 फीसदी लागू करने के बाद भी कीमतें अभी की तुलना में कम रहेंगी.

दिल्ली में डीजल फिलहाल 58.72 रुपये प्रति लीटर है. 12 फीसदी जीएसटी लगने के बाद इसकी कीमत 36.65 रुपये हो जाएगी. 18 फीसदी जीएसटी के बाद डीजल की कीमत 38.61 रुपये प्रति लीटर होगी. 28 फीसदी जीएसटी के बाद डीजल की कीमत 48.88 रुपये प्रति लीटर होगी. अगर लग्जरी कार पर लगने वाला सेस भी जोड़ दिया जाए, तो भी एक आम आदमी को एक लीटर डीजल के लिए 49.08 रुपये ही देने होंगे. मतलब सीधे तौर पर प्रति लीटर एक आदमी को 9.64 रुपये की बचत होगी.

...तो दिक्कत क्या है भाई

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राज्यों की मंजूरी न मिलने की वजह से तेल GST के दायरे में नहीं आ पा रहा है.

दिक्कत ये है कि जैसे ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों को जीएसटी के दायरे में लाने की बात होती है, राजनीति शुरू हो जाती है. जीएसटी ऐक्ट के तहत पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने का फैसला जीएसटी काउंसिल ही कर सकती है. इस जीएसटी काउंसिल में कई राज्यों के प्रतिनिधि हैं. अब पेट्रोल-डीजल से जिन राज्यों को इतना राजस्व मिल रहा है, वो एक झटके में तो अपनी सोने की अंडे देने वाले मुर्गी को छोड़ नहीं ही देंगे. ऐसे में जब तक सभी राज्य सहमत नहीं होते हैं, हमारी-आपकी जेब पर ऐसे ही भार बढ़ता रहेगा.


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