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मां को बता दो आज एक गिलास दूध पिए हैं, तो खुश हो जाती हैं

जाने कैसे. शायद यही मोह और चाहत उनकी बीमारी है.

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14 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 14 जुलाई 2016, 12:14 PM IST)
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Symbolic Image. source: Reuters
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लोग अक्सर हमें निराशावादी कहते हैं. कहते हैं तुम हर उस चीज़ में भी बुरा देखती हो जिसमें कुछ भी देखने की ज़रुरत ही नहीं होती. हो सकता है.
लेकिन निराशा को हमेशा बुरा क्यों मानते हैं? क्या इंसानी जिंदगी बुरी है? बिलकुल नहीं. हम भी नहीं मानते. क्या सारे लाव-लश्कर हटा कर देखने पर पैदा होने और मरने वाली जिंदगी में कोई आशा है? शायद नहीं. तो इसमें बुरा क्या है?
ऐसी जिंदगी बिमारी है. और उससे सिर्फ दुख और भार मिलता है. लेकिन ये किसी को बुरा लगता है? बिलकुल नहीं. दुखी होना तो सबको पसंद है. मम्मी एक दिन झल्ला कर बोलीं कि ड्राअर में से सारी बची हुई दवाइयां और खाली शीशियां फ़ेंक दो. हम गए और तीन ड्राअर में से बीसों प्लास्टिक की होम्योपैथिक दवाई वाली छोटी-छोटी बोतलें ले आएं. और दो-तीन पॉलीथीन भर के अंग्रेजी दवाइयों के खोके, जिनमें दो-तीन गोलियां बची हुई थी. सब उठा के छत पर ले गए. फिर ऊंचाई से सब नीचे गिरा दिए. कुछ सेकंड तक हल्की, खोखली आवाज़ होती रही. फिर बंद. फिर दिन भर हमसे कुछ बोला नहीं गया. अजीब सा भरोसा रहता था उन छोटी शीशियों पर. उन शीशियों की बदौलत ही मम्मी चलती-फिरती रहेंगी. खड़े होकर रोटी बना लेंगी. दवाई ख़तम होने वाली है तो फिर से नई आ जाएगी. और फिर यही सब होगा. ये साइकिल है. ये तभी टूटती है जब दवाई खाने के बाद भी मम्मी एक दिन बिस्तर पर पड़ जाती हैं. फिर समझ आता है कि ये बस गोलियां हैं. शरीर हड्डी और मांस से बनता है. और वक़्त और भरोसे से चलता है.
मम्मी की बीमारी है मोह और चाहत. उन्हें लोगों से मोह है, गोदरेज की अलमारी से मोह है, टेबल क्लॉथ से मोह है. उम्र के साथ लोग और चीज़ें बढ़ते जाते हैं. उनका मोह बढ़ता जाता है. उन्हें चाहत है कि बच्चों की शादी देख लें, फिर उनके बच्चों को देख लें. ये चाहत भी बढ़ती जाती है. सबकी मम्मी ऐसी ही होती हैं.
मम्मियां अजीब होती हैं. ये कभी बोर ही नहीं होतीं. उनको कभी 'एक्सिसटेनशिअल क्राइसिस' नहीं होता. बता दो कि आज एक गिलास दूध पिए हैं, तो खुश हो जाती हैं. पता नहीं कैसे? पापा की जिंदगी डर और उम्मीद से बनी है. अजीब कॉम्बिनेशन है. जहां उम्मीद होगी वहां डर कैसे हो सकता है! लेकिन उम्मीद सबसे बड़ा डर है. उम्मीद होने का डर. फिर टूट जाने का डर. वैसे ही जैसे भीड़-भाड़ में मोबाइल लेकर जाओ तो डर कि खो न जाए. और न ले जाओ तो डर कि साथ वाले खो न जाएं. हमारे और भइया के बहुत आगे चले जाने का डर. फिर हमारे बहुत पीछे छूट जाने का डर. उनके लाए हुए कपड़े हमें न पसंद आने का डर. हमारे बच्चे रह जाने का डर. फिर हमारे बड़े हो जाने का डर. हमें किसी चीज़ से डर नहीं लगता. छिपकली, चूहा, शेर, ऊंचाई, पानी, किसी चीज़ से नहीं. हमें डर लगता है जब पापा बाहर गए हों और दिन भर फ़ोन न करें. डर लगता है जब भइया सड़क पार करता है. डर लगता है जब घर से फ़ोन आता है, पर मम्मी बात नहीं करतीं. जब पापा का कोलेस्ट्रोल बढ़ जाता है, तब डर लगता है. ये बड़ा बोझिल डर होता है. ये कभी खतम नहीं होता. इसका कोई इलाज नहीं होता.
कितना बुरा है कि हमेशा के लिए हमारे डर, उम्मीद, मोह सब कुछ को बांध दिया गया है. जिसे कोई विरक्ति, कोई 'घर छोड़-छाड़ कर निकल जाना', कोई 'घर-परिवार से तंग आ जाना' खोल नहीं सकता.
मार्केट मेरे पापा को बूढ़ा होना सिखाता है. हमसे ज़्यादा बार्बर को पापा के सफ़ेद होते बालों की चिंता होती है. सलून में खिचड़ी बालों वाला बार्बर मेरे पापा को बोलता है कि आप तो पचास के लगते ही नहीं. बस बाल रंगवा लीजिये तो गज़ब लगेंगे. हंस कर 'हेयर कलरिंग सर्विस' बेचने वाला वो ख़ुद भी बूढ़ा हो रहा है. और उसे भी पता है कि जिंदगी नाम की बीमारी का कोई इलाज नहीं है. मार्केट मेरी मम्मी को एंटी-रिंकल क्रीम बेचते हुए बताता है कि वो कितनी यूनीक हैं. और कैसे वो जीवन भर चालीस की बनी रह सकती हैं. दवाई की शीशी आती है तो सबके दिल पर एक कांच सा भार आ जाता है. वो खाली होती है, तो ऐसा ही होता है. फिर नई आ जाती है. ये भी उम्मीद और डर जैसी साइकल है. अक्सर डॉक्टर और बार्बर एक ही लगते हैं हमें. दोनों वक़्त बेचने के फ़िराक में. 'बस ऐसे ही चलेगा...जब तक चले...' प्रॉब्लम ये है कि ये सब कभी रुकता नहीं. तब भी शादियां होती हैं, बच्चे होते हैं, उन्हें बड़े अरमानों के साथ बड़ा किया जाता है. ये सोचकर कि यही सब तो 'जीवन की खुशियां हैं.' फिर वही होता है जो हमेशा होता रहा है. कवि लोग कभी इस 'चलते रहने' को जीवन की जीत मान कर सेलिब्रेट करते हैं. कभी इससे तंग आ जाते हैं. जिंदगी नाम की बीमारी हर बार लोग अपने बच्चों तक फैलाते हैं. हर बार सिर्फ डर, उम्मीद और ऐसी ही चीज़ों का भार पैदा होता है. और इसका कोई इलाज भी नहीं. सिर्फ दवाइयां हैं. 'कुछ करने का सपना', 'चार दिन की जिंदगी में खुशियां फैलाना' ये सब दवाइयां हैं. धीरे-धीरे मेरी मम्मी की तरह दवाई और मरीज़ बहुत करीब आ जाते हैं. पता नहीं चलता कि कौन किस पर निर्भर है.
फिर एक दिन सारी छोटी-छोटी बोतलें और खाली खोके फ़ेंक दिए जाते हैं. हल्की और खोखली आवाज़ के साथ. फिर समझ आता है कि शरीर हड्डी और मांस से बनता है. और वो सिर्फ वक़्त और भरोसे से चलता है.

  ये स्टोरी 'दी लल्लनटॉप' के साथ इंटर्नशिप कर रही पारुल ने लिखी है.  

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