जिन बातों से मिलकर तैयार होती है सुबह-ए-बनारस
पति, पत्नी और वो कैमरा- 6: बनारस को जीने वाले लोगों के लिए कुछ तस्वीरें और छोटे से किस्से...
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फोटो: आशीष सिंह
पति पत्नी और वो कैमरा की ग्यारहवीं किस्त आपके सामने है. इस सीरीज में पति हैं डॉ. आशीष सिंह. जो शौकिया फोटोग्राफर हैं. पत्नी हैं आराधना. जो तस्वीरों के कैप्शन को कहानी सा विस्तार देती हैं. और जो कैमरा है. वो इनके इश्क राग का साथ देता एक शानदार भोंपा है. आज ये तीनों प्रेमी हमें सुबह-ए-बनारस दिखा रहे हैं. कुछ प्यारी सी तस्वीरे हैं और उनके कैप्शन. पढ़िए, देखिए और खुद में बसा लीजिए सुबह-ए-बनारस.
नैरेटर- आराधना सिंह. फोटो- आशीष सिंह
ये जो सुबह है, वो पोटली में भरकर कहानियां ले आती है और घाटों पर बिखरा देती है. कोई कहानियों को जीता है कोई कहानियों को देखते हुए समेटता जाता है. आंखों में. मन में. कैमरे में.
फोटो: आशीष सिंह
आशीष को अपने कैमरे से कहानियों को क़ैद करना पसंद है. पर मैं ज्यादा देर तक कैमरा पकड़े नहीं रह पाती और कहानियों के किरदारों से बतियाना शुरू कर देती हूं. जैसे कोई बताता है कि 'हमें घाटों पर ही नींद आती है, रूम में तो हमारा दमे घुटने लगता है.'
फोटो: आशीष सिंह
एक औरत बताती है कि "बनारस आते हैं तो सोने यहीं आ जातें हैं. जानती हैं ख़र्चा भी नहीं होता और सेफ़ भी है लेडीज़ लोगों के लिए.' सेफ़ सुनकर आश्चर्य तो होता है पर वो कहती है तो मान जाती हूं.
फोटो: आशीष सिंह
एक ब्रिटेन से आई हुई लड़की मेडिटेशन कर रही है. यहां मिली शान्ति और सेल्फ़ रियलाइजेशन के बारें में बात करते हुए उसकी आंखें चमक उठती हैं "इंट्स मॉय लैंड ऑफ़ स्पिरिचुअल स्टिम्यूलेशन.'
एक आदमी कबूतरों को दाना डाल रहा है. वो बहुत ताव से बताता है कि "जानती हैं कि कितना महंगा हो गया ये. रोज़ एक किलो खिलाते हैं. इ गंगा मइया की किरपा है. आप बताइए है औक़ात बड़के-बड़के लोगों की?" मैं ना में सिर हिला देती हूं.
फोटो: आशीष सिंह
एक नहाने वालों का ग्रुप है पता चलता है ये पूरा ग्रुप बाइस साल से लगातार रोज़ नहाने आता है. बिना पूछे ही बोलते हैं "अरे! खींच लीजिए फ़ोटो, हम लोगों को कोई प्राब्लम नहीं है"
फोटो: आशीष सिंह
कुछ ऐसी भी कहानियां हैं जो बिना बोले ही सुनाई दे रहीं हैं. कुत्तों के साथ सोते लोग. भिखारियों की भीख मांगने की तैयार जमातें. बच्चे जो स्कूल नहीं जाते पर अंग्रेज़ी में बतियाते हुए विदेशियों से बिज़नेस कर रहें हैं, पर जिसमें बिक रहा है तो सिर्फ उनका बचपन.
फोटो: आशीष सिंह
सोचती हूं कि तस्वीरें, कहानियां, कविताएं, किसी शायर के शेर क्या कभी सुबह-ए-बनारस को पूरी तरह क़ैद कर पाएंगे.
फोटो: आशीष सिंह
फिर सुबह को दोपहर की ओर बदलते हुए सूरज को देख जान जाती हूं कि ये सुबह क़ैद होने के लिए नहीं है रोज़ ख़त्म हो दुबारा नई होकर आने के लिए है नई और सारी अच्छी और बुरी बातों से आज़ाद सुबह-ए-बनारस.
फोटो: आशीष सिंह

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