जिन्ना को पाकिस्तान चाहिए था, फिर क्यों कहा, 'ये मैंने क्या कर डाला'
पंजाब बंटवारे के 70 साल की चौथी क़िस्त : इतनी तबाही कि सुनके ही कलेजा कटता है.
Advertisement

पंजाब में लाखों लोग मारे गए थे.
Quick AI Highlights
Click here to view more
यहां आप पढ़िए पंजाब का बंटवारा. पंजाब का दर्द. इसको लिखा है अमनप्रीत सिंह गिल ने. अमनप्रीत दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाते हैं. वो ‘नॉन कांग्रेस इन पंजाब’ किताब लिख चुके हैं. पंजाब बंटवारे के 70 साल सीरीज़ में आप जानेंगे पंजाब को, जो 6 किस्तों में है. पढ़िए चौथी क़िस्त.
बंटवारा हो गया. पंजाब में 1 करोड़ से ज्यादा लोगों को अपने घर ज़मीने-जायदाद और पूजा स्थल छोड़कर विस्थापित होना पड़ा. ओ एच के स्पेट ने इसको ‘विश्व इतिहास में आबादी का सबसे बड़ा विस्थापन’ बताया.

विस्थापन की असल भयावहता इसके आक्समिकता में थी. लोग पाकिस्तान बनाने के लिए तैयार थे, देश विभाजन के लिए तैयार था, अंग्रेज़ भी हिन्दुस्तान छोड़ जाने को तैयार थे, लेकिन विस्थापन के लिए कतई तैयार नहीं थे. यह तो मालूम था कि पाकिस्तान मुसलमानों का देश होगा पर यह नहीं पता था कि यह हिंदू और सिक्खों का देश नहीं रहेगा. यह भी नहीं पता था कि 47 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले अमृतसर और 40 फीसदी वाले पूर्वी पंजाब में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं रहेगी, लेकिन यह हुआ. वो भी महज़ तीन महीनों में. ये महीने थे अगस्त-सितंबर-अक्टूबर.

photo : AP
विस्थापन का पैमाना बहुत बड़ा था. लाखों लोग पहले रिफ्यूज़ी कैंपों में इकट्ठे किए जाते, फिर उन्हें रेलगाड़ियों और पैदल काफिलों में पूर्वी या पश्चिमी पंजाब में भेजा जाता था. अपने-अपने पंजाब में पहुंचकर फिर उन्हें रिफ्यूज़ी कैंप में रहना पड़ता था. लोगों की जान-माल की रक्षा करनेवाला राज ताश के पत्तों के महल की तरह ढह चुका था. पंजाब के गवर्नर जैनकिंस ने उस वक़्त लिखा था, 'हर अंग्रेज अफ़सर पहला मौका पाते ही पंजाब में से निकल जाना चाहता है.'
विस्थापन लोगों के ऊपर आसमानी बिजली की तरह गिरा था. लोग इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे, जो किसान सुबह फसल के लिए बीज बोकर आए थे. शाम को कैंप में भागने की तैयारी कर रहे थे. कश्मीर में कबाइली हमले के दौरान तो लोगों को शाम से पक रहा खाना, रात के वक्त खाना भी नसीब नहीं हुआ था. लोगों को जलते चुल्हों को छोड़कर भागना पड़ा था.

Photo : HT
घरों को छोड़कर जा रहे लोगों को यह यकीन था कि विस्थापन हमेशा के लिए है. इसलिए वह अपने कीमती समान अमानत के तौर पर अपने पड़ोसियों को सौंप गए थे. यह पड़ोसी बाद में पुलिस और चौधरियों की हवस का शिकार हुए. आज भी पाकिस्तान में ऐसे गिरोह है जो हिंदू सिक्खों की गिरती हुई हवेलियों में दबाई गई दौलत को तलाश करने का काम करते हैं.
लायलपुर और शेखुपुरा के सिक्खों ने विस्थापन की हकीकत को मानने से इंकार कर दिया था, उस वक्त 3 लाख सिक्ख लायलपुर में बैठे थे जिसे छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं था. चूहड़काना में डेढ़ लाख सिक्ख इकट्ठे हुऐ बैठे थे. पश्चिमी पंजाब के गवर्नर फ्राँसिस मुड्डी को जिन्ना की हिदायत थी की इन सिक्खों से जल्दी-से जल्दी पीछा हुड़ाया जाए.

पूर्वी और पश्चिमी पंजाब में से निकल रहे रिफ्यूज़ी की सबसे बड़ी तादाद रेलगाड़ियों में और काफिलों में पैदल चलकर अपने मुकाम तक पहुंची. 27 अगस्त से 6 नवंबर 1947 तक 673 रेलगाड़ियों में 22 लाख के करीब लोगों को एक से दूसरी जगह पहुंचाया गया. इनमें से कई गाड़ियां लाशों की गाड़ियां साबित हुईं. 18 सितंबर से 29 अक्टूबर के 42 दिन की टाइम पीरियड में 24 काफिलों में चलकर 9 लाख लोग बंटवारे की खींची गई लाइन के आर-पार गए.

कुलदीप नैयर
कुलदीप नैयर ने ताहिरा मज़हर अली के हवाले से लिखा है कि
'जिस वक्त पश्चिमी पंजाब में यह काफिले जा रहे थे और पंजाब का हर कोना तबाही का मंजर पेश कर रहा था, यह देखकर जिन्ना ने माथा पीटकर कहा था, यह मैंने क्या कर डाला.'विस्थापन और पुर्नस्थापन की कहानी साथ-साथ चल रही थी. पूर्वी पंजाब में 85 रिफ्यूज़ी कैंप और पश्चिमी पंजाब में 75 कैंप थे. कुरुक्षेत्र में 5 लाख की आबादी वाला सबसे बड़ा कैंप बनाया गया. पूर्वी पंजाब में दिल्ली समेत 12 लाख लोग कैंपों में रहे. सरकार ने इनके पुर्नस्थापन के लिए एक पुर्नस्थापना विभाग बनाया. पी.एन. थापर की अध्यक्षता में इस विभाग ने अक्टूबर 1949 में सभी कैंपों वाले रिफ्यूज़ी परिवारों का पुर्नस्थापन करके एक ऐतिहासिक कारनामा किया. त्रिलोक सिंह आई.सी.एस. ने 'स्टैडंर्ड एकड़' और 'र्गेडिड कट' के फ़ॉमूले से शरणर्थियों में जमीन बांट दी. पश्चिमी पंजाब में 20 लाख एकड़ फालतू होने के कारण सभी काश्तकार शरणार्थी परिवारों के प्रति व्यक्ति को 1 एकड़ जमीन का तोहफा देने का फैसला किया.

(Source : defence forum india)
पंजाबी शरणार्थियों की बड़ी गिनती दिल्ली में आबाद हुई. मिर्जा गालिब की दिल्ली की गलियों में अब उर्दू नहीं पोठोहारी, झांगवी और मुल्तानी सुनाई देने लगी. पश्चिमी पंजाब से आए लोगों ने दिल्ली को तरक्की की एक नई रफ़्तार दी. इनकी कामयाबियां अपने आप में नईं थीं. पुर्नस्थापन की कहानियां, स्वाभिमान की कहानियां. इन्होंने दया के पात्र बनने से इंकार कर दिया था. अखबार बेच रहे एक रिफ्यूज़ी बच्चे को किसी ने बाकी बचे पैसे रख लेने के लिए कहा तो उसने रोते हुए जवाब दिया था, 'मैं भिखामंगा नहीं हूं.'
ये भी पढ़िए :
पहली क़िस्त : अंदाजा नहीं था, कोई ‘तीसरी कौम’ पंजाब के टुकड़े कर जाएगी
दूसरी क़िस्त : पंजाब के टुकड़े हुए तो शिक्षा एक तरफ रह गई और खेती दूसरी तरफ
तीसरी क़िस्त : औरतों के जिस्म नोचे गए, रेप हुए और 5 से 7 लाख लोग मारे गए, पंजाब की ये तस्वीर रुला देती है

.webp?width=60)

