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हिंदू-मुस्लिम ऐसे रहते थे कि अंदाजा नहीं था, कोई 'तीसरी कौम' पंजाब के टुकड़े कर जाएगी

पंजाब बंटवारे के 70 साल में पढ़िए पहली क़िस्त.

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9 अगस्त 2017 (अपडेटेड: 9 अगस्त 2017, 04:54 AM IST)
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(Source : defence forum india)
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अमनप्रीत सिंह गिल
अमनप्रीत सिंह गिल

बंटवारे का दर्द वो ही अच्छी तरह जानते हैं, जिन्होंने इस दर्द को खुद सहा. जिन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा हो. जिन्होंने अपनों को खोया हो. उन्हें ये दर्द आज भी सालता रहता है. देश का बंटवारा हुआ. दंगे हुए. क़त्ल हुए. इस बंटवारे पर तमाम लेखकों ने उपन्यास लिखे, कहानियां लिखीं. अगस्त का महीना है, इसी महीने में देश आज़ाद हुआ. आज़ाद हुआ मगर टुकड़े हो गए. 
यहां आप पढ़िए पंजाब का बंटवारा. पंजाब का दर्द. इसको लिखा है अमनप्रीत सिंह गिल ने. अमनप्रीत दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाते हैं. वो 'नॉन कांग्रेस इन पंजाब' किताब लिख चुके हैं. पंजाब बंटवारे के 70 साल सीरीज़ में आप जानेंगे पंजाब को, जो 6 किस्तों में है. पढ़िए पहली क़िस्त.


पिछले साल जब अमृतसर में ‘पार्टिशन म्यूज़ियम’ बनाने की बात चली तो यह बात नागवार सी गुजरी. विभाजन का अनुभव पंजाबी लोगों के लिए इतना दुखान्तक, भयावह, सन्न कर देने वाला और शर्मसार कर देने वाला था कि इसको भुला देना ही उचित लगता था. दिल्ली में बहुत सारे बुजुर्ग ऐसे हैं जो विभाजन की याद के नाम पर चुप्पी साध लेते हैं.
70 Years of Punjab Partition

विभाजन के साथ जुड़ा दुखान्तिक अनुभव कोई एक तरह का नहीं था कि इंसान सीने पर पत्थर रखकर सह लेता. विस्थापन, कत्ल, बलात्कार, अपहरण, नमौशी, बदहाली, कमीनगी, विश्वासघात और हैवानियत, इन सबको कोई क्यों याद करे? इसीलिए म्यूज़ियम की एक मीटिंग में मैंने किश्वर देसाई को यह जताया कि इसमें विभाजन के अनुभव की बजाए अविभाजित पंजाब की साझा जीवन-शैली को याद करना ज्यादा जरूरी है.
source : travelfilmarchive
source : youtube (travelfilmarchive)

विभाजन से पहले का पंजाब इतिहास बन चुका है. इस समय के लोगों के आपसी सद्भाव के अवशेष आज बहुत कम बचे हैं. रंजीत सिंह के जमाने में पंजाबियों के सद्भाव को शाह मुहम्मद ने, इन शब्दों में याद किया था :

‘‘राजी बहोत रहदें मुसलमान-हिंदू, कदे नहीं सी तीसरी जात आयी..’’

शाह मुहम्मद को यह अंदाजा नहीं था कि एक सदी बाद यह तीसरी कौम (अंग्रेज़) पंजाब के टुकड़े कर जाएगी. हंसता-खेलता पंजाब नफरतों में बंट गया. जो उसके अपने थे वो छिटक गए. कुछ इधर रह गए. कुछ उधर चले गए.
बंटवारे में हज़ारों लोग इधर से उधर हुए (Source : AP)
बंटवारे में हज़ारों लोग इधर से उधर हुए (Source : AP)

अविभाजित पंजाब में साझा जीवन शैली कोई हैरानी की बात नहीं थी. भाषा तो सभी की एक ही थी. रिहायशी आबादियां, छिटपुट को छोड़कर, सांप्रदायिक दायरों में नहीं बसी थीं.
source : travelfilmarchive
source : youtube (travelfilmarchive)

सांप्रदायिक पहचान को कायम रखने के लिए पंजाब का मध्यम वर्ग ही तत्पर था, जिसको इस पहचान के चलते अंग्रेजी राज की सुख-सुविधाओं में से हिस्सा मिलना था. साधारण लोगों के लिए तो रोटी ही चंद्रमा थी, जिसकी मध्यम रोशनी में वह जिंदगी का अंधकार काटने की कोशिशों में लगे रहते थे. रोज़ाना ज़िदगी में हिंदू-मुस्लिम का सद्भाव एक सहज क्रिया थी, जिसका कोई विशेष प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं रहती थी. इस सद्भाव में कहीं-कहीं सांप्रदायिक पहचान अपना कुरुप चेहरा भी दिखाती थी. रेलवे स्टेशनों पर मौज़ूद हिंदू पानी और मुसलमान पानी के कुंभ, अंग्रेजी निजाम की सांप्रदायिक कर्तव्यनिष्ठा का दम भरते थे.
https://www.youtube.com/watch?v=jCf8GJGSLjc
चुनाव, नौकरियां, शिक्षा, व्यापारिक कोटा, फौज की भर्ती, सार्वजनक जीवन का हर पहलू सांप्रदायिक पहचान पर निर्भर करता था. जुबान चाहे पंजाबी थी लेकिन इसमें भी लिपि के बखेड़े सांप्रदायिक आधार पर मौजूद थे. पंजाब का सामुहिक धार्मिक अनुभव, सहनशीलता और सद्भाव वाला था. इस सहनशीलता की सबसे बड़ी बुनियाद ‘सूफीवाद' था. पंजाब में हिंदू, सिक्ख और मुस्लिम धर्मों को सूफीवाद की परंपरा एक परस्पर सूत्र में बांधती थी. उस समय तक पंजाब में सांप्रदायिक हिंसा की मिसालें सिर्फ अंगुलियों पर गिनी जा सकती थी.
अविभाजित पंजाब में जीवन एक सहज गति से चल रहा था, जब देश और पंजाब के विभाजन का निर्णय किसी उल्कापिंड की तरह यहां पर गिरा और यहां  के इंसानी धरातल पर एक गहरा गड्ढ़ा कर गया.
भारत और पाकिस्तान का बंटवारा एक देश का बंटवारा था. पंजाब और बंगाल दो प्रांतों का.
अल्लामा इक़बाल (बीच में) और चौधरी रहमत अली ( इक़बाल के दाएं )
अल्लामा इक़बाल (बीच में) और चौधरी रहमत अली ( इक़बाल के दाएं )

1937 के चुनाव में मुस्लिम लीग को यू.पी. में मिनिस्ट्री का हिस्सा न बनाया जाना, 1938 में काँग्रेसी मंत्रीपरिषदों के त्यागपत्र को जिन्ना द्वारा ‘मुक्ति दिवस’ का नाम देना, 1930 में अल्लामा इकबाल की उत्तर-पश्चिमी मुस्लिम-बहुत राज्यों का स्वायत्त राज्य बनाने की स्कीम, रहमत अली द्वारा ‘पाकिस्तान नाउ ऑर नेवर’ का किताबचा, 1939 में मुस्लिम लीग के कराची में दो कौमों का सिद्धांत, 1940 के लाहौर अधिवेशन में पकिस्तान का प्रस्ताव,
लाहौर अधिवेशन
लाहौर अधिवेशन

1942 में ‘क्रिस्प मिशन’ द्वारा पाकिस्तान की संभावना की अप्रत्यक्ष हिमायत, अप्रैल 1946 में कैबिनेट मिशन द्वारा पाकिस्तान के विचार का विरोध, लेकिन व्यवहार में उसके लिए जम़ीन तैयार कर देना. यह सबकुछ एक बारूद की शक्ल में मौजूद था. जिन्ना द्वारा 16 अगस्त 1946 के दिन ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही’ का दिन घोषित करने से इस बारूद में पलीता लगा गया. इसकी वजह से ‘कलकत्ते का कत्लेआम’ हुआ जिसमें 4000 लोग मारे गए.
कलकत्ता में दंगे हुए और हजारों ओग मारे गए. (Source : defence forum india)
कलकत्ता में दंगे हुए और हजारों ओग मारे गए. (Source : defence forum india)

अक्टूबर में नोआखली के भयानक फस़ाद हुए. इन खबरों ने पश्चिमी पंजाब के पोठोहार में मार्च 1947 में हिंदू-सिक्खों के कत्लेआम को उत्साहित किया.
इस सूरते-हाल में समझ यही आ रहा था कि भारत-पाक विभाजन होने से सांप्रदायिकता खत्म नहीं होगी, जब तक पंजाब और बंगाल का सांप्रदायिक विभाजन नहीं होता. पंजाब का मामला ज्यादा पेचिदा था क्योंकि यहां पर सिक्ख एक तीसरी शक्ति की शक्ल में मौजूद थे. सिक्ख नेताओं के दबाव में कांग्रेस ने 5 अप्रैल 1947 को पंजाब को मुस्लिम और गैर-मुस्लिम हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव पारित किया. माउंटबेटन ने ‘3 जून प्लान’ में इस मांग को मानने के लिए एक ‘हदबंदी कमीशन’ की स्थापना का ऐलान किया, जिसका अध्यक्ष सिरिल रेडक्लिफ़ था. इसका उद्देश्य पंजाब और बंगाल की क्षेत्रीय हदबंदी करना था. इसके साथ ही ‘पंजाब पार्टिशन कमेटी’ बनायी गई जिसमें गोपीचंद भार्गव, सरदार स्वर्ण सिंह, मुमताज़ दौलताना और ज़ाहिद हुसैन थे.
punjab

इसका उद्देश्य विभाजन की प्रक्रिया का संचालन करना था और साझा-पंजाब के प्रशासनिक अमले, संपत्ति, संस्थान, देनदारियां, आधार संरचना आदि हर चीज़ को बांटना था. इस समय तक आबादी के तबादले की न कोई संभावना बनी थी और न ही किसी ने ऐसा कोई अंदेशा प्रकट किया था. इस संभावना के प्रति ऐसी उच्च स्तरीय अलगर्जी पंजाब में 5 से 7 लाख लोगों के कत्लेआम का कारण बनी. अंग्रेजी मुहावरे के लिहाज से यूं कह ले कि उस वक्त तक कमरे में बैंठे हाथी पर किसी की नज़र ही नहीं पड़ी.

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