बातें बड़ी कॉमन हैं. कई बार की सुनी हुईं. मगर हम गौर नहीं करते. क्योंकि उन्हें सचमान बैठे हैं. वो क्या है न कि जब झूठ भी सलीके से बोला जाए और बार-बार बोला जाए तोवह कब सच बन जाता है, पता ही नहीं चलता. कुछ ऐसे ही बातें हैं जो मैंने अक्सरसुनीं. बेटी को और कितना पढ़ाओगे? जहेज़ की तैयारी कब शुरू करेंगे? आखिर उसे दूसरे हीघर जाना है? बेटी की शादी के लिए कुछ बचा भी रहे हो या नहीं? बेटी है बड़ीज़िम्मेदारी है. पैदा होने से लेकर शादी तक बार-बार ये ही सवाल. इन सवालों के जवाबचाहे बाप की मुश्किल हल करते हो, मगर बेटी कमज़ोर, और कमज़ोर होती जाती है.घर में बार-बार लड़की को एहसास कराया जाता है, ये बाबुल का अंगना है. बेटी अभी बापके घर है जैसी कहावतें गढ़ दी गई हैं. यानी अगर बेटी अपने बाप के घर है तो सब सहीहै. इस बात को इतनी बार बोला जाता है कि उसे एहसास हो जाए. यहां के अलावा उसे बाकीजगह परेशानियां ही उठानी पड़ेंगी. इतना प्यार लुटाएंगे कि बस पूछो मत साथ ही कहेंगेये सब खुशियां यहीं हैं, कर लो मौज. ससुराल में ऐसा कुछ नहीं मिलेगा. बेटी पैदाहुई. पहले तो उसका पैदा होना ही गलत समझा जाता था. मगर अब कुछ अक्ल आई है तो मुबारकबाद देने वाले आते हैं. मगर साथ ही एक जुमला पेश करते हैं. पहले अल्लाह बेटा ही देदेता तो अच्छा रहता. और अगर दूसरी भी बेटी हुई तो फिर वही मुबारकबाद, लेकिन अफ़सोसके साथ कि इस बार तो बेटी ही दे देता अल्लाह. खैर, मुझे इस बात में नहीं पड़ना है.मुझे तो प्यारे अम्मी-अब्बा से कुछ बात करनी हैं जो अपनी बेटी को खुश देखने केचक्कर में कब कमज़ोर बना बैठते हैं, उन्हें खुद इस बात का इल्हाम नहीं होता. फिर ऐसीनसीहतें शुरू होती हैं कि बेटी के दिमाग में ससुराल का खौफ बैठ जाए. सास का खौफ.रीति रिवाजों का खौफ. ये न करना वो न करना का खौफ. प्यारी सी नसीहत दी जाएंगी.'जैसा सास कहे वैसा ही करना. कोई शिकायत न सुनने को मिले. मतलब ऐसी ऐसी बातें किजैसे उसकी शादी नहीं, बल्कि वो उनसे दो दो हाथ करने जा रही है.source- filter copyसबसे खतरनाक तो ये बात होती है कि ससुराल में सब्र करना. मतलब अब चाहे कुछ भी होजाए. बस लड़की को सब्र करना है. अगर कुछ बोलने की कोशिश करेगी तो वो उसकी बत्तमीजीमें काउंट कर दिया जाएगा. ये सब्र कब उस लड़की पर ज़ुल्म बनके टूटना शुरू हो जाता है.पता ही नहीं चलता. मगर अम्मी अब्बा ये ही समझाते रहते हैं वो ससुराल है तेरी. न कितेरे अपने अब्बा जी का घर. बर्दाश्त तो करना पड़ेगा. क्यों भाई, क्यों करना पड़ेगा.बर्दाश्त. अगर सब्र करने की आदत न डाली होती तो वो अपना हक़ नहीं मरने देती. ज़ुल्मको बर्दाश्त न करती. सब्र करना अलग बात है और ज़ुल्म सहकर चुप रह जाना अलग. अगर सब्रऔर ज़ुल्म का फर्क समझाया होता तो वो मज़बूत होती.symbolic imageएक और जुमला है जो मीठे ज़हर सा जिंदगी में घुल जाता है. जब बेटी रुखसत होकर ससुरालचली जाती है तो सबकुछ लड़की पर ही डाल दिया जाता है कि जैसे उसे ही एडजस्ट होना है,बाकी किसी ससुराल वालों को नहीं. जब उसे वहां ये ताने सुनने को मिलते हैं कि हमारेयहां ऐसा नहीं होता, ये तुम्हारे घर होता होगा. अपने घर की बातें अपने घर छोड़ो.मतलब एक लड़की जो कम से कम 18 साल एक घर में गुज़ार कर आई है उसे एकदम ऐसे चेंज करनेकी कोशिश की जाती है जैसे वो लड़की नहीं बल्कि कोई पीतल का बर्तन हो और उसपर फटाक सेकलई चढ़ाएं और उसका इस्तेमाल कर लें. जब ये परेशानियां वो झेलना शुरू करती है तो उसेसमझाने के लिए एक और ज़हरीली लाइन परोस दी जाती है. 'अभी शुरुआत है.' शुरू के कुछमहीने में दिक्कतें आती ही हैं. सब ठीक हो जाएगा. और ये ठीक होने के इंतजार में कबघर टूट जाता है इसका अंदाज़ा अम्मी अब्ब्बा भी नहीं लगा पाते.जब कुछ ज्यादा ही हद होती है तो लड़की अलग होने का फैसला करती है. मगर फिर उसे डरायाजाता है. बेटी का असली घर उसका ससुराल ही होता है. वो तुम्हारा शौहर है अगर दोबातें झेल लोगी तो कुछ बुरा नहीं हो जाएगा. किसी भी इन्सान के लिए आसान नहीं होताकि वो अपनी पुरानी जिंदगी को भुला दे. अतीत सामने आता है. बार-बार आता है. फिरक्यों बेटी से ही उम्मीद की जाती है कि वो अपनी पुरानी जिंदगी को भुला दे.आप अपनी बेटी से खूब प्यार कीजिये. मोहब्बत लुटाइए. मगर बार बार उसके ज़हन में वोबातें न डालिए जिससे उसे लगने लगे कि उसकी जिंदगी महज़ सास, ससुराल और शौहर तक हीमहदूद है. इनको खुश रखना है नहीं तो गुनाह-ए-अज़ीम हो जाएगा. उसकी जिंदगी इन बातोंके अलावा भी खूबसूरत हो सकती है. अगर आप उसे ये बता सको कि सब्र कब तक करना है,ताकि वो सब्र समझकर ज़ुल्म को न बर्दाश्त करने लगे. उसे बताइए कि जो बाबुल का घर हैवही ससुराल. ससुराल कोई खतरनाक जगह नहीं.-------------------------------------------------------------------------------- झूठ बोलना गुनाह है, और सबसे ज्यादा झूठ ‘खुदा की कसम’ खाकर ही बोला गयादहेज के लुटेरों, ‘मेहर’ देते वक्त ही शरीयत क्यों याद आती है?