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  • Pakistan Trapped in a 3-Front Crisis: Afghanistan Border War, Baloch Insurgency & Iran-Saudi Pressure. Is Another 1971 Coming?

पाकिस्तान के अफगानिस्तान-बलूचिस्तान से जंग करने की वजह सऊदी अरब तो नहीं?

पाकिस्तान अफगानिस्तान, बलूचिस्तान और ईरान-सऊदी तनाव के बीच फंसा है. क्या वो जानबूझकर जंग बढ़ा रहा है? पाकिस्तान की सीनियर जर्नलिस्ट आरजू काज़मी की मानें तो अफगानिस्तान बॉर्डर पर पाकिस्तानी सेना की हलचल के पीछे सउदी अरब है.

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31 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 05:40 PM IST)
Afghanistan Pakistan border conflict
पाक-अफगान वॉर की असली वजह हैरान कर देगी! (फोटो- रॉयटर्स)
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दुनिया इस वक्त मिडिल ईस्ट को घूर रही है. अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले, खाड़ी में बढ़ता तनाव, और हर तरफ युद्ध की गंध. लेकिन इसी शोर में एक खबर चुपचाप साउथ एशिया के दरवाजे पर खड़ी है. और ये खबर सिर्फ एक झड़प नहीं, पूरे इलाके की दिशा बदल सकती है.

ये कहानी पाकिस्तान की है. एक ऐसा मुल्क जो हमेशा दूसरों की आग में रोटियां सेंकने की कोशिश करता रहा, लेकिन अब उसकी अपनी रसोई में ही आग लग चुकी है. पाकिस्तान इस वक्त तीन मोर्चों पर लड़ रहा है. अफगानिस्तान के साथ सीमा पर युद्ध जैसे हालात, बलूचिस्तान में बगावत की लपटें, और तीसरा डर जो उसे ईरान-सऊदी अरब के झगड़े में घसीट सकता है.

और मजेदार बात ये है कि कुछ पाकिस्तानी पत्रकार और विश्लेषक कह रहे हैं कि पाकिस्तान जानबूझकर अफगानिस्तान के साथ तनाव बढ़ा रहा है. ताकि वो ईरान के खिलाफ संभावित युद्ध से खुद को बचा सके.

पाकिस्तान सरकार की पोल खोलने के लिए मशहूर पत्रकार आरज़ू काज़मी ने एक टीवी डिबेट में कहा,

“सऊदी से ये डिफेंस डील करके आए हैं, जिसके तहत एक पर अटैक को दूसरे मुल्क पर अटैक माना जाएगा. अब सऊदी अरब पर ईरान के अटैक हो रहे हैं. हमारे फील्ड मार्शल और पीएम दोनों सऊदी होकर आए हैं. तो क्या पता वहां से कहा गया हो कि हम पर अटैक हो रहा है, आप भी शामिल हो जाएं”

आरज़ू यहीं पर नहीं रुकीं, बल्कि आगे कहा,

“हो सकता है कि उनसे बचने के लिए पाकिस्तानी सेना ने अफगानिस्तान और बलूचिस्तान पर हमले तेज किये हों. ताकि सऊदी से कहा जा सके कि भई हम खुद एक जंग लड़ रहे हैं. ऐसे में आपके पास अपनी सेना कैसे भेज सकते हैं.”

आरजू मानती हैं कि तालिबान और TTP जैसे संगठन पाकिस्तान के भीतर सीधा हमला नहीं कर सकते. हद से हद वो फिदाइन अटैक करेंगे. जबकि ईरान मिसाइल मार-मार कर इस्लामाबाद को थर्रा सकता है. ऐसे में ईरान के बचाए अफगानिस्तान से पंगा लेना ज्यादा सुरक्षित ऑप्शन है.

ये बात जितनी फिल्मी लगती है, उतनी ही खतरनाक भी है. क्योंकि अगर ये सच है, तो पाकिस्तान सिर्फ अपनी जनता के साथ नहीं, पूरे साउथ एशिया के साथ जुआ खेल रहा है.

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अफगानिस्तान मोर्चे पर तैनात पाक सेना (फोटो- रॉयटर्स)

तीन मोर्चे… और तीनों में बारूद

पाकिस्तान की हालत आज ऐसी है जैसे कोई आदमी एक साथ तीन जगह आग बुझाने भाग रहा हो, और हर जगह आग और तेज हो रही हो. पहला मोर्चा अफगानिस्तान के साथ है. जहां तालिबान सत्ता में है और पाकिस्तान की उम्मीदों का जनाजा निकल चुका है.

दूसरा मोर्चा बलूचिस्तान है. जहां पाकिस्तानी सेना और बलूच विद्रोही संगठनों के बीच लड़ाई अब सिर्फ छिटपुट हमलों तक सीमित नहीं रही. तीसरा मोर्चा पाकिस्तान का वो डर है, जो उसे अरब दुनिया की राजनीति में घसीट सकता है. खासकर ईरान और सऊदी अरब के बीच बढ़ती दुश्मनी में.
अब ये तीनों मोर्चे अलग-अलग नहीं हैं. ये एक ही कहानी के तीन चैप्टर हैं. और इस कहानी का अंत अगर गलत दिशा में गया, तो पाकिस्तान के नक्शे पर सवाल उठ सकते हैं.

सबसे पहले अफगानिस्तान… दोस्त से दुश्मन बनने की पूरी कहानी

2021 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया था, तो पाकिस्तान में मिठाइयां बंटी थीं. पाकिस्तानी सत्ता के गलियारों में जश्न का माहौल था. वजह साफ थी. पाकिस्तान को लगा कि अब अफगानिस्तान में उसका आदमी बैठा है.

यानी भारत विरोधी सरकार, पाकिस्तान समर्थक सरकार, और डूरंड लाइन पर चुप रहने वाली सरकार. लेकिन तालिबान ने आते ही पाकिस्तान को वही जवाब दिया जो हर कट्टरपंथी ताकत देती है. वो किसी का मोहरा नहीं बनती. वो खुद मोहरे चलाती है.

और यहीं पाकिस्तान की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल सामने आई. तालिबान को पाकिस्तान ने सालों तक पाला. ट्रेनिंग दी. पैसा दिया. छुपाया. लेकिन सत्ता में आने के बाद तालिबान ने पाकिस्तान की बात मानने से इनकार कर दिया.

अब नतीजा ये है कि पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते दोस्ती से निकलकर ओपन वॉर की तरफ बढ़ गए.

एयर स्ट्राइक, ड्रोन अटैक और हजारों मौतें… ये लड़ाई मजाक नहीं

हाल के महीनों में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के भीतर हवाई हमले किए हैं. कई रिपोर्टों में दावा है कि काबुल के आसपास भी हमले हुए. जवाब में तालिबान ने भी पाकिस्तान की चौकियों पर ड्रोन हमले किए.

मतलब साफ है. ये सिर्फ सीमा पर गोलीबारी नहीं रही. ये अब सैन्य टकराव है.

पाकिस्तान का कहना है कि वो अफगानिस्तान में छिपे TTP आतंकियों को मार रहा है. जबकि तालिबान इसे अफगान नागरिकों पर हमला बता रहा है. कुछ रिपोर्टों के मुताबिक इस संघर्ष में अब तक 1,000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और करीब 1 लाख लोग विस्थापित हुए हैं.

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तीन तरफा मोर्चे पर घिरा पाकिस्तान (फोटो- रॉयटर्स)

अगर ये आंकड़े सही हैं, तो ये युद्ध की शुरुआती तस्वीर है. और युद्ध जब शुरू होता है, तो खत्म होने तक किसी के हाथ में नहीं रहता.

काबुल के नशा मुक्ति केंद्र पर हमला… और पाकिस्तान की छवि पर दाग

सबसे दर्दनाक घटना बताई गई एक नशा मुक्ति केंद्र पर हमला, जिसमें अफगान अधिकारियों के मुताबिक 400 लोगों की मौत हुई. अब सोचिए. अगर किसी देश की राजधानी के पास इस तरह की घटना हो, तो वहां की जनता क्या सोचेगी?

तालिबान चाहे जैसा भी शासन हो, लेकिन अफगान जनता के मन में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा पहले से था. अब वो गुस्सा नफरत में बदल रहा है. और यही वो जगह है जहां पाकिस्तान की रणनीति उलटी पड़ सकती है. क्योंकि अफगानिस्तान में पाकिस्तान विरोधी भावना जितनी बढ़ेगी, TTP और अन्य विद्रोही गुटों को उतनी हवा मिलेगी.

डूरंड लाइन… एक लकीर जिसने 100 साल से युद्ध का बीज बोया हुआ है

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच झगड़े की जड़ है डूरंड लाइन. 1893 में ब्रिटिश अफसर मोर्टिमर डूरंड ने ये लाइन खींची थी. ये लाइन 1,600 मील लंबी है और इसने पश्तून इलाकों को दो हिस्सों में बांट दिया.

पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है. लेकिन अफगानिस्तान की किसी भी सरकार ने, चाहे राजशाही हो, लोकतंत्र हो या तालिबान, इसे कभी आधिकारिक बॉर्डर नहीं माना. 

अफगानिस्तान के लिए ये सीमा नहीं, जख्म है. एक ऐसा जख्म जो हर पीढ़ी में ताजा होता है.

तालिबान और फेंसिंग विवाद… पाकिस्तान की बाड़, तालिबान का बुलडोजर

तालिबान के सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान ने डूरंड लाइन पर फेंसिंग तेज कर दी. उसे लगा कि अब सीमा सुरक्षित हो जाएगी. लेकिन तालिबान ने वहां बाड़ उखाड़नी शुरू कर दी. ये सिर्फ बाड़ हटाने की बात नहीं थी. ये एक संदेश था.

तालिबान कह रहा था कि हम इस लाइन को मानते ही नहीं. हम आपकी बनाई सीमा को कबूल नहीं करते. और पाकिस्तान के लिए ये सीधी चुनौती थी. क्योंकि पाकिस्तान की पूरी सुरक्षा नीति इसी बॉर्डर पर टिकी है. अगर अफगानिस्तान इसे मानने से इनकार करता है, तो पाकिस्तान की सीमा सुरक्षा एक स्थायी संकट बन जाती है.

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अफगानिस्तान ने कभी नहीं मानी डूरंड लाइन (फोटो- रॉयटर्स)

पश्तून राष्ट्रवाद… पाकिस्तान का पुराना डर, जो अब जाग रहा है

पाकिस्तान को सबसे बड़ा डर सिर्फ तालिबान या TTP का नहीं है. उसका असली डर पश्तून राष्ट्रवाद है. क्योंकि पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और अफगानिस्तान के पश्तून इलाकों के लोग खुद को एक ही नस्ल और संस्कृति का मानते हैं.

अगर कभी पश्तूनों में अलग देश की मांग जोर पकड़ गई, तो पाकिस्तान का उत्तर-पश्चिम हिस्सा हिल सकता है. तालिबान की मौजूदगी इस राष्ट्रवाद को ताकत देती है. और पाकिस्तान को यही बात रात में सोने नहीं देती.

TTP… पाकिस्तान का पाला हुआ भस्मासुर

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP. ये वही संगठन है जो पाकिस्तान की सेना, पुलिस और आम नागरिकों पर हमले करता है. पिछले चार सालों में इस संगठन ने पाकिस्तान में करीब 4,000 लोगों को मार डाला, ऐसा कई रिपोर्ट्स और थिंक टैंक्स का दावा है.

पाकिस्तान कहता है कि तालिबान TTP को पनाह दे रहा है. लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा ज्यादा खतरनाक है. TTP पाकिस्तान की ही बनाई हुई फैक्ट्री का प्रोडक्ट है.

पाकिस्तान ने आतंक की जो फसल बोई, अब वही काट रहा है. पाकिस्तान ने दशकों तक जिहादी संगठनों को अपनी विदेश नीति का हथियार बनाया. कश्मीर में इस्तेमाल के लिए, अफगानिस्तान में दबदबा बनाने के लिए, और भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर के लिए.

लेकिन आतंकवाद कोई रिमोट कंट्रोल कार नहीं होता. वो एक वायरस होता है. जो एक दिन अपने ही सिस्टम को खा जाता है. आज TTP वही कर रहा है. और सबसे खतरनाक बात ये है कि TTP के पास आधुनिक अमेरिकी हथियार हैं. वो हथियार जो नाटो सेनाएं अफगानिस्तान छोड़ते वक्त पीछे छोड़ गई थीं.

थर्मल साइट्स, एम-16 राइफल्स, नाइट विजन डिवाइस. अब ये आतंकी पाकिस्तान की सेना को उसी के घर में चुनौती दे रहे हैं. यानी पाकिस्तान की सेना जिसे खुद को ऑल पॉवरफुल समझने की आदत थी, उसे अब गांवों और पहाड़ों में छिपे लड़ाके घुमा रहे हैं.

पाकिस्तान की सेना क्यों बौखला रही है?

पाकिस्तान की सेना का पूरा नैरेटिव ये रहा है कि वो देश को सुरक्षित रखती है. वो सबसे मजबूत संस्था है. वो देश की रीढ़ है. लेकिन जब हर दूसरे दिन सैनिक मारे जाएं, चौकियों पर हमले हों, और जनता का भरोसा टूटने लगे, तो सेना का सबसे बड़ा हथियार यानी डर खत्म होने लगता है.

और डर खत्म होने का मतलब है सत्ता कमजोर होना. यही वजह है कि पाकिस्तान की सेना अफगानिस्तान में घुसकर स्ट्राइक कर रही है. वो एक संदेश देना चाहती है कि हम कमजोर नहीं हैं. लेकिन ये संदेश दुनिया से ज्यादा अपने ही देश के लिए है.

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अपने ही पाले आतंक का शिकार हो रहा पाकिस्तान (फोटो- रॉयटर्स)

दूसरा मोर्चा: बलूचिस्तान… जहां पाकिस्तान अपने ही लोगों से लड़ रहा है

अगर अफगानिस्तान वाला संकट पाकिस्तान की सीमा सुरक्षा का संकट है, तो बलूचिस्तान वाला संकट पाकिस्तान के अस्तित्व का संकट है. बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है. प्राकृतिक संसाधनों से भरा हुआ. गैस, खनिज, तांबा, सोना, समुद्र तट, और रणनीतिक बंदरगाह ग्वादर. 

लेकिन बलूचिस्तान की जनता का आरोप है कि उन्हें सिर्फ लूटा गया. उनका पानी, उनकी जमीन, उनके संसाधन सब छीन लिए गए. और बदले में उन्हें गरीबी और बंदूकें मिलीं. यही गुस्सा आज बलूच लिबरेशन आर्मी यानी BLA जैसे संगठनों को ताकत दे रहा है.

बलूच बगावत सिर्फ आजादी की मांग नहीं, आर्थिक बदले की आग भी है

बलूचिस्तान में आंदोलन केवल अलग देश की मांग नहीं है. ये उस सिस्टम के खिलाफ बगावत है जो उन्हें हाशिये पर रखता है. CPEC यानी चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को पाकिस्तान विकास की कहानी बताता है. लेकिन बलूच इसे शोषण की कहानी कहते हैं.

उनका कहना है कि चीन और पाकिस्तान मिलकर उनके इलाके से पैसा निकाल रहे हैं, लेकिन उनके बच्चों को स्कूल नहीं, अस्पताल नहीं, नौकरी नहीं.
अब जब भूख और अपमान एक साथ मिलते हैं, तो विद्रोह जन्म लेता है.

BLA के हमले और चीनी नागरिकों को निशाना बनाना… पाकिस्तान के लिए डबल संकट

पहले बलूच विद्रोही, पाकिस्तानी सेना और सरकारी ठिकानों पर हमला करते थे. लेकिन अब उन्होंने चीनी नागरिकों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है. ये पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा झटका है. क्योंकि चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा आर्थिक सहारा है. IMF के बाद अगर कोई देश पाकिस्तान को सांस दे रहा है, तो वो चीन है.

अगर चीन को लगे कि पाकिस्तान चीनी प्रोजेक्ट्स और नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो CPEC की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था वैसे ही ICU में है. मतलब बलूचिस्तान का संकट सिर्फ सुरक्षा नहीं, आर्थिक मौत का खतरा भी बन रहा है.

तीसरा मोर्चा: ईरान-सऊदी का झगड़ा… और पाकिस्तान का डर

अब आते हैं उस एंगल पर जो इस पूरी कहानी को और दिलचस्प बनाता है. पाकिस्तानी पत्रकार आरजू काजमी ने दावा किया कि पाकिस्तान अफगानिस्तान के साथ तनाव जानबूझकर बढ़ा रहा है. 

कारण? ईरान-सऊदी तनाव. उनके मुताबिक पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक तरह का समझौता है कि अगर एक देश पर हमला होगा तो उसे दोनों पर हमला माना जाएगा. अब अगर ईरान सऊदी अरब पर हमला करता है, तो सऊदी पाकिस्तान से मदद मांग सकता है. और पाकिस्तान की समस्या ये है कि वो ईरान से लड़ नहीं सकता.

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तालिबान से जंग पाकिस्तान का बहाना? (फोटो- रॉयटर्स)

पाकिस्तान, ईरान से लड़ क्यों नहीं सकता?

पहली वजह है भूगोल. पाकिस्तान और ईरान की सीमा लगती है. अगर युद्ध हुआ तो पाकिस्तान के पश्चिमी इलाके जल जाएंगे. दूसरी वजह है अंदरूनी राजनीति. पाकिस्तान में शिया आबादी भी है. ईरान से लड़ाई हुई तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा.

तीसरी वजह है आर्थिक हालत. पाकिस्तान के पास युद्ध लड़ने का पैसा नहीं है. उसके पास पेट्रोल खरीदने के भी पैसे नहीं हैं, युद्ध तो बहुत दूर की बात है. और चौथी वजह है बलूचिस्तान. ईरान के साथ युद्ध हुआ तो बलूचिस्तान में विद्रोह को बाहरी समर्थन मिलने का खतरा बढ़ जाएगा.

मतलब ईरान के खिलाफ युद्ध पाकिस्तान के लिए आत्महत्या जैसा होगा.

तो क्या अफगानिस्तान वाला मोर्चा एक बहाना है?

यही सवाल सबसे बड़ा है. अगर पाकिस्तान दुनिया को दिखाना चाहता है कि "हम तो खुद अपने पड़ोसियों से परेशान हैं", तो अफगानिस्तान वाला तनाव उसके लिए एक कूटनीतिक ढाल बन सकता है.

वो कह सकता है कि हमारी सेना पहले से फ्रंट पर लगी है. हम सऊदी के लिए फौज नहीं भेज सकते. ये रणनीति हो सकती है. लेकिन इसमें रिस्क इतना बड़ा है कि खेल बिगड़ भी सकता है. क्योंकि अफगानिस्तान के साथ युद्ध बढ़ा तो पाकिस्तान में आतंकवाद बढ़ेगा. शरणार्थी बढ़ेंगे. सेना पर दबाव बढ़ेगा. और अर्थव्यवस्था और गिरेगी. यानी ईरान से बचने के लिए अफगानिस्तान में आग लगाना अपने ही घर में सिलेंडर फोड़ने जैसा है.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था: वो दीवार जो हर संकट में दरक रही है

अब जरा पाकिस्तान की आर्थिक हालत को समझिए. क्योंकि युद्ध, विद्रोह और राजनीति सबका पेट पैसा ही भरता है. पाकिस्तान की GDP ग्रोथ तेजी से गिरी है. 2021-22 में 6.1 प्रतिशत. 2022-23 में लगभग 0.29 प्रतिशत. मतलब देश की आर्थिक गाड़ी लगभग रुक चुकी है.

अब इसके साथ जोड़िए महंगाई. 2021 में 8.9 प्रतिशत. 2023 के मई में 38 प्रतिशत. 38 प्रतिशत महंगाई का मतलब है कि आम आदमी की जिंदगी नरक बन जाती है. दूध, आटा, दाल, दवाई, पेट्रोल सब सपने जैसा हो जाता है.

विदेशी मुद्रा भंडार: पाकिस्तान की जेब में बस सिक्के बचे हैं

2021 में पाकिस्तान के पास करीब 20 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार थे. 2023 जून में ये गिरकर करीब 4 बिलियन डॉलर रह गए.

ये वही स्टेज है जहां देश दिवालिया होने लगता है. क्योंकि आयात रुक जाता है. डॉलर खत्म होने लगता है. और बाजार में अफरा-तफरी फैल जाती है. पाकिस्तान के लिए ये संकट किसी भी बम से ज्यादा खतरनाक है.

ये भी पढ़ें- यूरेनियम से कैसे होता है न्यूक्लियर ब्लास्ट? ईरान से छीनने पर क्यों तुले हैं ट्रंप?

रक्षा बजट बनाम विकास बजट: पाकिस्तान की प्राथमिकता साफ है

2023-24 के बजट में पाकिस्तान ने रक्षा के लिए PKR 1,804 बिलियन रखे. जबकि विकास बजट (PSDP) रखा PKR 950 बिलियन. मतलब स्कूल, अस्पताल, सड़कें, रोजगार सब बाद में. पहले बंदूक.

ये आंकड़ा बताता है कि पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था अब भी वही पुरानी बीमारी से ग्रस्त है. सेना मजबूत रहेगी, जनता चाहे भूखी रहे. और यही बीमारी पाकिस्तान को अंदर से खोखला कर रही है.

पाकिस्तान की सेना जनता की नहीं, अपनी सत्ता की रक्षा कर रही है

जब कोई देश विकास बजट से दोगुना रक्षा बजट रखता है, तो इसका मतलब सुरक्षा नहीं होता. इसका मतलब होता है सत्ता बचाने की कोशिश. पाकिस्तान की सेना का रोल सिर्फ बॉर्डर पर लड़ना नहीं है. वो देश की राजनीति में भी निर्णायक ताकत रही है. सरकारें बनाना, गिराना, मीडिया कंट्रोल करना, और विरोधियों को जेल में डालना.

अब जब देश आर्थिक संकट में है, तो सेना को डर है कि जनता का गुस्सा उसके खिलाफ फूट सकता है. इसलिए सेना खुद को और मजबूत कर रही है. लेकिन ये वही फार्मूला है जिसने 1971 में पाकिस्तान को तोड़ा था.

1971 का भूत: क्या पाकिस्तान फिर टूट सकता है?

1971 में पूर्वी पाकिस्तान ने अलग होकर बांग्लादेश बना लिया था. उस समय भी तीन चीजें थीं. एक, आर्थिक असमानता. दूसरा, राजनीतिक दमन. तीसरा, सेना का अत्याचार. 

आज बलूचिस्तान में वही माहौल बनता दिख रहा है. बलूचिस्तान के लोग कहते हैं कि उन्हें गायब किया जाता है. उनके नेताओं को उठाया जाता है. उनकी लाशें मिलती हैं. और उनकी आवाज दबाई जाती है.

अगर किसी समाज में इंसाफ खत्म हो जाए, तो वहां अलगाववाद मजबूत होता है. यही इतिहास का नियम है.

क्या बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो सकता है?

ये सवाल अभी तुरंत का नहीं है. लेकिन संभावनाओं को नकारा भी नहीं जा सकता. बलूचिस्तान के अलग होने में सबसे बड़ी बाधा ये है कि पाकिस्तान की सेना वहां बेहद मजबूत मौजूदगी रखती है.

दूसरी बाधा ये है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अभी तक बलूच आंदोलन को खुलकर समर्थन नहीं देता. लेकिन तीसरी बात ये है कि पाकिस्तान की कमजोरी बढ़ रही है.
और जब कोई देश अंदर से कमजोर होता है, तो बाहरी ताकतें भी मौके खोजती हैं.

भारत, ईरान, अफगानिस्तान, और यहां तक कि कुछ पश्चिमी देश भी इस संकट को अपने फायदे के हिसाब से देख सकते हैं. 

पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन भारत नहीं, उसका अपना सिस्टम है

पाकिस्तान हमेशा भारत को अपना मुख्य दुश्मन बताता आया है. लेकिन सच ये है कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी लड़ाई उसके भीतर चल रही है. उसके भीतर एक सेना है जो राजनीति पर कब्जा चाहती है. उसके भीतर एक कट्टरपंथ है जो समाज को पीछे खींच रहा है. उसके भीतर आर्थिक बदहाली है जो जनता को तोड़ रही है. और उसके भीतर प्रांतों की नाराजगी है जो देश को बांट सकती है.

भारत से युद्ध का डर दिखाकर पाकिस्तान की सेना अपने देश के भीतर अपनी सत्ता बचाती रही है. लेकिन अब जनता के सामने सवाल है. आटा महंगा है, बिजली महंगी है, नौकरी नहीं है. तो दुश्मन कौन है? ये सवाल सेना को परेशान कर रहा है.

अफगानिस्तान के साथ जंग बढ़ी तो भारत पर क्या असर होगा?

भारत के लिए पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव दो तरह से असर डाल सकता है. 

  • पहला असर सुरक्षा का है. अगर पाकिस्तान में आतंकवादी समूह बिखरते हैं या कमजोर होते हैं, तो कुछ गुट भारत की तरफ ध्यान मोड़ सकते हैं. क्योंकि जब संगठन दबाव में होता है, तो वो नया मोर्चा खोलकर खुद को प्रासंगिक दिखाने की कोशिश करता है.
  • दूसरा असर रणनीतिक है. अगर पाकिस्तान की सेना अफगान बॉर्डर में उलझी रहती है, तो भारत के खिलाफ उसकी क्षमता घट सकती है. लेकिन ये अच्छी खबर जितनी दिखती है, उतनी सीधी नहीं है. क्योंकि कमजोर पाकिस्तान ज्यादा खतरनाक भी हो सकता है. कमजोर देश अक्सर अस्थिरता फैलाते हैं.

दक्षिण एशिया पर असर: शरणार्थी, आतंकवाद और अस्थिरता का तूफान

अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच युद्ध और बढ़ता है, तो शरणार्थियों की संख्या बढ़ सकती है. लाखों लोग सीमा पार करने की कोशिश करेंगे. पाकिस्तान पहले ही अफगान शरणार्थियों को लेकर नाराज है. और अफगानिस्तान में भी स्थिति स्थिर नहीं.

इसका असर पूरे दक्षिण एशिया में पड़ सकता है. मानव तस्करी, ड्रग्स का कारोबार, हथियारों की स्मगलिंग, और आतंकी नेटवर्क फैल सकते हैं. यानी ये लड़ाई सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान की नहीं रहेगी. ये पूरे क्षेत्र की समस्या बन जाएगी.

पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा: एक साथ तीन फ्रंट संभालने की क्षमता नहीं

पाकिस्तान के पास न पैसा है, न स्थिर सरकार है, न जनता का भरोसा. और फिर भी उसे एक साथ तीन जगह लड़ना पड़ रहा है. अफगान सीमा पर सेना लगी है. बलूचिस्तान में ऑपरेशन चल रहे हैं. और ईरान-सऊदी तनाव में पाकिस्तान पर दबाव बन सकता है.

इतिहास बताता है कि जब कोई देश एक साथ कई मोर्चों पर उलझता है, तो वो टूटने लगता है. सोवियत यूनियन टूट गया. युगोस्लाविया टूट गया. और पाकिस्तान 1971 में टूट चुका है. मतलब खतरे की घंटी यूं ही नहीं बज रही.

पाकिस्तान का सबसे बड़ा हथियार: "हम परमाणु ताकत हैं"

अब पाकिस्तान के पास एक आखिरी कार्ड बचता है. वो है उसका परमाणु हथियारों का नैरेटिव. पाकिस्तान बार-बार दुनिया को याद दिलाता है कि वो न्यूक्लियर पावर है. इसका मतलब यह भी है कि दुनिया पाकिस्तान को पूरी तरह गिरने नहीं देगी. क्योंकि अगर पाकिस्तान अराजकता में चला गया, तो परमाणु हथियारों की सुरक्षा सबसे बड़ा वैश्विक संकट बन जाएगी.

यही वजह है कि अमेरिका, चीन और खाड़ी देश पाकिस्तान को किसी न किसी तरह बचाते रहते हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या हमेशा बचाया जा सकता है?

चीन क्या करेगा? CPEC का भविष्य पाकिस्तान की स्थिरता पर टिका है

चीन पाकिस्तान में निवेश इसलिए करता है क्योंकि उसे ग्वादर बंदरगाह और अरब सागर तक पहुंच चाहिए. CPEC चीन की बेल्ट एंड रोड योजना का अहम हिस्सा है. लेकिन अगर बलूच विद्रोही लगातार चीनी नागरिकों पर हमला करेंगे, तो चीन का धैर्य टूट सकता है.

चीन पैसा लगाता है, दान नहीं करता. और अगर पाकिस्तान सुरक्षा नहीं दे सकता, तो चीन निवेश धीमा कर सकता है या शर्तें और कड़ी कर सकता है. इसका मतलब पाकिस्तान और ज्यादा कर्ज में डूबेगा. और कर्ज का मतलब है राजनीतिक गुलामी.

सऊदी अरब का दबाव: पाकिस्तान के लिए दोस्ती नहीं, मजबूरी

सऊदी अरब और पाकिस्तान की दोस्ती पुरानी है. लेकिन ये दोस्ती बराबरी की नहीं रही. पाकिस्तान सऊदी से पैसा लेता है, तेल उधार लेता है, और कई बार अपनी सेना के अफसर भी सऊदी सुरक्षा में भेजता है.

अब अगर ईरान और सऊदी के बीच तनाव बढ़ा, तो सऊदी पाकिस्तान से मदद मांग सकता है. पाकिस्तान के लिए ये मुश्किल फैसला होगा. क्योंकि सऊदी को मना किया तो आर्थिक मदद रुक सकती है. और माना तो ईरान से दुश्मनी. यानी पाकिस्तान दोनों तरफ से फंस सकता है.

पाकिस्तान की रणनीति अगर सच में अफगान मोर्चा खोलने की है, तो ये बेहद खतरनाक चाल है

अगर आरजू काजमी का दावा सही है कि पाकिस्तान जानबूझकर अफगानिस्तान से लड़ाई बढ़ा रहा है, तो ये एक शॉर्टकट पॉलिटिक्स है. क्योंकि युद्ध कोई बहाना नहीं होता. युद्ध एक ऐसी आग है जो बहाने से नहीं बुझती.

पाकिस्तान शायद सोच रहा है कि अफगानिस्तान के साथ तनाव दिखाकर वो सऊदी से बच जाएगा. लेकिन असल में वो खुद को दोहरी तबाही में डाल रहा है. एक तरफ सीमा पर युद्ध. दूसरी तरफ अंदर आतंकवाद. और तीसरी तरफ आर्थिक दिवालियापन. ये तीनों मिलकर किसी भी देश को तोड़ सकते हैं.

पाकिस्तान चौराहे पर है, और हर रास्ता खतरनाक है

पाकिस्तान इस वक्त ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां हर रास्ते पर खाई है. अगर वो अफगानिस्तान से भिड़ता है, तो TTP और तालिबान के साथ संघर्ष बढ़ेगा. अगर वो बलूचिस्तान को दबाने की कोशिश करता है, तो वहां की जनता और ज्यादा भड़केगी, और चीन भी परेशान होगा.

अगर वो सऊदी के साथ खड़ा होता है, तो ईरान दुश्मन बनेगा. और अगर वो किसी के साथ नहीं खड़ा होता, तो उसकी आर्थिक मदद रुक सकती है.

मतलब पाकिस्तान का असली संकट बाहरी नहीं, अंदरूनी है. उसकी नीति, उसकी सेना, और उसकी राजनीति ने उसे ऐसी जगह पहुंचा दिया है जहां अब हर फैसला उसे और कमजोर करेगा.

1971 का इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं है. वो पाकिस्तान की आत्मा में लिखा हुआ है. और अगर उसने समय रहते अपनी नीतियां नहीं बदलीं, तो इतिहास खुद को दोहराने में देर नहीं लगाएगा.

दुनिया इस वक्त ईरान पर नजर रख रही है. लेकिन साउथ एशिया में असली भूचाल पाकिस्तान के नीचे पनप रहा है. और ये भूचाल अगर फटा, तो झटका सिर्फ इस्लामाबाद को नहीं लगेगा. दिल्ली, काबुल, तेहरान, बीजिंग और वॉशिंगटन तक इसकी गूंज जाएगी.

वीडियो: Pakistan Afghanistan Conflict: पाकिस्तान और अफगानिस्तान जंग की वजह क्या है?

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