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तो बोलो ऑस्कर किसका?

एक जा भिड़ा भालू से, दूजा बेचारा मंगल पर छूटा, तीजा कयामत के बाद की दुनिया में भटका पानी की तलाश में.

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17 जनवरी 2016 (अपडेटेड: 27 फ़रवरी 2016, 09:31 AM IST)
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बचपन से ऑस्कर का हल्ला सुन रहे हैं. जागरण के विदेश पन्ने पर एक ढाई कॉलम की तस्वीर और सिंगल कॉलम की खबर. लड़के कुछ फिल्मों के नाम याद कर लेते. ताकि क्विज में सामने वाले को चित्त कर सकें. हमने भी याद कर लिया. भानु अथैया पहली भारतीय थीं, जिन्हें गांधी फिल्म की कॉस्ट्यूम के लिए ऑस्कर मिला. अफसोस भी हुआ. कि बताओ. गांधी जी अपने. मगर उनका रोल किया फिरंगी ने. एक ढंग का दिलीप कुमार, बच्चन या नसीर न मिला इनको. और तब सात समंदर पार बैठे एक इंसान ने सुन ली. आईएफएस अफसर विकास स्वरूप के नॉवेल पर पिक्चर बनाई. स्लमडॉग मिलियेनर. उसके लिए खूब ऑस्कर घर आए. गुलजार, रहमान...रसेल भी. देश को एक दम से साउंड रिकॉर्डिंग का दैवीय महत्व दिखने लगा. इधर कुछ बरसों से जागरूकता बढ़ी है. अच्छी अंग्रेजी फिल्में खूब रिलीज होती हैं देश में. सिर्फ इंडिपेंडेंस डे, गॉडजिला और मैडागास्कर भर का मार्केट नहीं रह गया है. इंग्लिश के चैनल भी काम आते हैं. वहां देखने का एक फायदा ये भी रहता है कि सारा ध्यान डायलॉग समझने पर नहीं लगाना पड़ता. सबटाइटल्स जिंदाबाद. अच्छी क्वॉलिटी के. वर्ना लैपटॉप पर सही एसआरटी फाइल के लिए जगह बनाते रहो. उसके बाद वीएलसी पर सेकंड घटा-बढ़ाकर उनकी पटरी बैठाओ. ऑस्कर फिर आ गया है. अमरीका में इतवार की शाम. हिंदुस्तान में सोमवार की पौ फटने का वक्त. अवॉर्ड बंटेंगे. आह और वाह होगी. कोई फक-वक बोलकर ऊप्स भी कर सकता है. 'यो ऑस्कर सो व्हाइट' पहले ही चल रहा है. हिंदी के न्यूज चैनल भी पैकेज काटेंगे. जिसमें सबसे ज्यादा फुटेज उस कैटिगरी के अवॉर्ड को मिलेगी, जिसे प्रियंका चोपड़ा देंगी. चाहे उसके नॉमिनेशन भी ठीक से पता न हों. प्रॉड्यूसर पांच पन्ने लिख मारेंगे. अच्छा है. किसी भी बहाने सही. फिल्मों पर बात तो हो. ध्यान तो जाए. mihir pandya the lallantopहमारा ध्यान कई दिनों से लगा था. बार बार आता कि 'दी लल्लनटॉप' के रीडर्स को ऑस्कर पर कुछ अच्छा और अलग पढ़ने को मिले. इसके लिए हमने चिरौरी की. अपने दोस्त से. मिहिर पंड्या. डीयू के मास्टर साब. एमफिल पीएचडी सिनेमा पर. एक किताब भी. शहर और सिनेमा वाया दिल्ली. पर ये सब तो ब्लर्ब पर लिखे खातिर रहे तो ही अच्छा. आप यूं समझ लें. कि मिहिर जो है उसकी पहली महबूबा सनीमा ही है. दूसरी मेरी दोस्त सुमन है. इन दोनों पर अलग से किसी रोज और बात करेंगे. कमाल का जोड़ा है. इश्क से इश्क हो जाए. ऐसा कुछ. आज आप मिहिर पंड्या के लिखे दो आर्टिकल पढ़ेंगे. पहला, ऑस्कर किसको मिलेगा. ये कौन तय करता है. और जो तय करते हैं, वो कौन होंगे. ये कौन तय करता है. दूसरा, ऑस्कर की रेस में शामिल तीन फिल्में. मनुष्य की जीने की चाह के तीन फलक दिखाती. बचे, बढ़ो और बनाओ. कि जीना, सिर्फ जीना भी जीवन का सबसे सुंदर मकसद और तरीका हो सकता है. पढ़िए. खोजकर इन फिल्मों को देखिए भी. सिनेमा हॉल में, डीवीडी पर, लैपटॉप पर. लल्लन तो पहले ही सब निपटा चुका है. शो ऑफ करता रहता है. आप भी इसे पढ़ शो के लिए गो हों. - सादर, सौरभ
एक जा भिड़ा भालू से, दूजा बेचारा मंगल पर छूटा, तीजा कयामत के बाद की दुनिया में भटका पानी की तलाश में : तो बोलो ऑस्कर किसका? दि रेवेनेंट : 12 नॉमिनेशन मैक्सिकन निर्देशक एलेजांद्रो गोजांलेज़ इनारेट्टू आदिम मनोभावों के चितेरे हैं. वे अपने दौर के उन चुनिंदा निर्देशकों में से हैं जो 'कान' के कलावादियों और हॉलीवुड के व्यवसायवादियों दोनों के चहेते हैं. स्पेनिश भाषा में बनाई उनकी पहली फ़िल्म ‘अमोरेस पेरोस’ की बहुधागात्मक पटकथा आजकल विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है और उनकी ‘बाबेल’ तो आधुनिक समय में सभ्यताओं के मध्य संवादहीनता और संघर्ष को समझने के लिए प्राइमर के समान है. उनकी ताज़ा निर्देशित ‘दि रेवेनेंट’ के नायक हैं लियोनार्डो डि केप्रियो, और यह लियोनार्डो भैय्या का एक और जबर प्रयास है ऑस्कर कमेटी में बैठे बुढ्ढों को बरगलाने का. अमेरिका का यह चहेता सितारा और करोड़ों दिलों की धड़कनों का राजा उस सुनहरी मूर्ति से अभी तक दूर ही रहा है. लेकिन इस बार शायद उसका दावा सबसे मज़बूत है. इनारेट्टू की यह नई फ़िल्म ‘दि रेवेनेंट’ दर्शक को 19वीं सदी के अमेरिका में ले जाती है जहां अभी तक मूल निवासियों और गोरे आक्रांताओं के बीच खूनी संघर्ष जारी है. और इससे बड़ा संघर्ष है दुर्दम्य प्रकृति के खिलाफ, जो ज़रा भी रहमदिल नहीं है. यहां ह्यू ग्लास के किरदार में लियोनार्डो जानवरों की खालों की तलाश में भटकते गोरे दल के अनुभवी रास्ता सुझानेवाले हैं, जिन्हें अपने ही दल के एक दुष्ट सदस्य का धोखा सहना पड़ता है. लेकिन मरा समझकर लावारिस छोड़ दिए गए ग्लास अपनी ही राख़ से वापस उठ खड़े होते हैं और निकल पड़ते हैं मन में एकमात्र उद्देश्य लेकर - बदला. साउथ डेकोटा में साल 1823 में ह्यू ग्लास पर हुआ जंगली भालू का भयानक हमला, उनकी मृत्युशैया से सलामती की बीहड़ अकेली यात्रा और उस यात्रा में ज़िन्दा बचे रहना, अब तो यह सब अमेरिकी दंतकथाओं का हिस्सा बन गया है और इस कहानी पर हॉलीवुड में पहले भी फिल्में बनी हैं. इनारेट्टू की ‘दि रेवेनेंट’ अपनी पटकथा के लिए इसी घटना पर साल 2001 में लिखे गए माइकल पंक के उपन्यास को आधार बनाती है. बेशक यह बदले की कथा है और आप चाहें तो हॉलीवुड की ‘ब्रेवहार्ट’ से लेकर बॉलीवुड की ‘शोले’ तक को याद कर सकते हैं, लेकिन ‘दि रेवेनेंट’ को सामान्य बदले की कथा समझने की गलती ना करें. इसका असली चमत्कार उस दुरूह गढ़त में है जिसके माध्यम से यह निर्जन ठंडे प्रदेश की काया को परदे पर जीवित करती है. यहां असली चुनौती हत्यारी कुदरत से है. इमैनुअल लुबेज्की की चमत्कारिक सिनेमैटोग्राफ़ी इसका सबसे बड़ा आकर्षण है और उन्होंने कथा में असलियत का रंग भरने के लिए तक़रीबन पूरी फ़िल्म बिना किसी कृत्रिम रौशनी के शूट की है. वे पहले टेरेंस मलिक के सिनेमैटोग्राफ़र रहे हैं, वही मलिक जिनकी फिल्में अपने वातावरण की गढ़त से ही पूरी कथा कह जाती हैं. इन्हीं वजहों से ‘दि रेवेनेंट’ तकनीकी पुरस्कारों में भी बड़ी दावेदार है और लुबेज्की का ‘ग्रैविटी’ और ‘बर्डमैन’ के बाद लगातार तीसरा ऑस्कर पक्का माना जा रहा है. शायद इसके साथ ही लुबेज्की बस ‘चमत्कार’ पैदा कर ऑस्कर जीतने के आरोपों से भी तर जाएं. पूरी फ़िल्म में निरंतर वाइड एंगल कैमरा लेंस का इस्तेमाल करते हुए इनारेट्टू और लुबेज्की ने परिवेश को किरदारों से ज़्यादा अहम बना दिया है. परदे पर ग्लास का जीवट विकट है, लेकिन उसका प्रकृति से संघर्ष इंसानी सहनशक्ति की अंतिम हद को छूता है. यह देखने में मुश्किल फ़िल्म है. कठिन, कठोर, कष्टप्रद. ख़ासकर भालू का इंसान पर हमले वाला प्रसंग असंभव क्रूरता लिए है. लेकिन इसे बड़े परदे पर देखे बिना छुटकारा नहीं. फ़िल्म जब भी भारतीय सिनेमाघरों में आए, इस अनुभव को प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए. मैड मैक्स फ्यूरी रोड: 10 नॉमिनेशन मैड मैक्स इस साल की ‘बाप’ फ़िल्म है. सत्तर साला आस्ट्रेलियाई निर्देशक जॉर्ज मिलर ने तीस साल से बंद अपनी पुरानी एक्शन सीरीज़ का ऐसा बक्सा खोला है कि सारे चाहने वाले चित्त देखते रहे. कहते हैं कि इस बूढ़े निर्देशक के दिल में आज भी एक सोलह साल का लड़का छिपकर बैठा है. लड़के का जिगर उसकी हथेली में उछल रहा है और उसी निडर जिगरे से यह फ़िल्म निर्देशित की गई है. ऑस्कर में ऐसा कम होता है कि गर्मी की छुट्टी वाली मसाला एक्शन रिलीज़ ऑस्कर जूरी में बैठे बुढ़ऊ निर्माता-निर्देशकों की भी पसंद बन जाए. लेकिन मैड मैक्स को झोली भर के नॉमिनेशन मिले हैं. FURY ROAD मैड मैक्स बाबू की कहानी कुछ यूं है कि दुनिया बस ख़तम है और तेल-पानी इतना कम कि उनके लिए विश्वयुद्ध लड़ा जा सकता है. जिनका पानी पर कब्ज़ा है, उनका राज है. बीहड़ रेगिस्तान में हमारे हीरो मैक्स (टॉम हार्डी) को सरदार इम्मोर्टन जो के युद्ध लड़ाकों ने पकड़ा है और उसे सरदार के लड़ाकों को खून सप्लाई करने की ज़िन्दा मशीन बना दिया है. इधर सरदार के चंगुल से उसकी लड़ाका फ्यूरिओसा (चार्ली थेरॉन) सरदार की कैद में फंसी रानियों को ले भाग निकली है. मैक्स और फ्यूरियोसा मिलते हैं, दुश्मनों से लोहा लेते हैं और निकलते हैं उस हरियाली भरे स्वर्ग की तलाश में जिसे फ्यूरिओसा ने आखिरी बार बचपन में देखा था. लेकिन इस तबाह पृथ्वी पर अब हरितिमा कहां, स्वर्ग कहां. ‘मैड मैक्स फ्यूरी रोड’ का दार्शनिक पहलू इसे हमारे द्वारा अपने ही हाथों की जा रही पृथ्वी की तबाही और आधुनिक पूंजीवाद के आत्महंता चरित्र पर कठोर टिप्पणी बना देता है. फिर सबसे ऊपर मैड मैक्स इंसानी इरादों और इच्छाशक्ति की कथा है, जिसमें ज़िन्दा बचे रहने की सबसे आदिम जद्दोज़हद के मध्य इंसानी साझेदारी और निडरता के सबसे उजले भाव नज़र आते हैं. वैसे ऑस्कर में और उससे बाहर भी, आउट-एंड-आउट एक्शन फ़िल्म को आलोचकों का ऐसा प्यार मिलना अपूर्व है. इस प्यार की वजह है कि ‘मैड मैक्स’ का सांस-रोकू चकाचक एक्शन समकालीन ब्लॉकबस्टर हॉलीवुड की तरह कम्प्यूटर पर ‘पोस्ट प्रोडक्शन’ में नहीं रचा गया है. मिलर ने हॉलीवुड के वीएफ़एक्स, सीजीआई, मशीनी एनिमेशन में खोते जा रहे साइंस फ़िक्शन एक्शन सिनेमा को उसकी पुरानी हाड़-मांस-मज्जा वापस देकर उसे फ़िर ज़िन्दा कर दिया है. फ़िल्म देखते हुए हॉलीवुड की पुरानी क्लासिक वेस्टर्न फ़िल्में याद आती हैं और पटकथा-संपादन ऐसा चुस्त है कि गति के भंवरजाल में जैसे सांस उखड़ने लगती है. मैड मैक्स की सबसे तगड़ी दावेदारी इस साल तकनीकी पुरस्कारों में ही होनेवाली है. साउंड डिज़ाइन और साउंड मिक्सिंग, जो इस फ़िल्म की आत्मा हैं, के ऑस्कर में इसे हराना मुश्किल होगा. दि मार्शियन : 7 नॉमिनेशन हाल में Quora जैसी सवाली-जवाबी स्वयंभू ज्ञानी वेबसाइट्स से लेकर व्हाट्सएप जैसे नाई की दुकान सरीखे गॉसिप नेटवर्क तक, सिनेमाप्रेमियों के बीच एक सवाल चुटकुले की शक्ल में घूमता रहा. सवाल था, ये मैट डेमन भैया को उनकी हर नई फ़िल्म में ज़िन्दा बचाकर लाने में अब तक कितने पैसे बहा दिए भाई? स्पीलबर्ग अंकल की ‘सेविंग प्राइवेट रेयान’ में उनको बचाने के चक्कर में टॉम हैंक्स भैया की लंका लग गई थी, तो गुरुघंटाल नोलान की ‘इन्टरस्टेलर’ में किसी दूसरी आकाशगंगा में फंसे उन्हें बचाने आए मैथ्यू मैकॉन्ही दद्दा की उन्होंने खुद से लंका लगा दी थी. the martrian ‘आदत से मजबूर’ डेमन भैया की नई फिल्म ‘दि मार्शियन’ में उन्हें साथी लोग गफलत में मंगल पर छोड़ आए हैं, और अब उन्हें बचाए जाने के लिए घरेलू नीले प्लेनेट से इस लाल पत्थर गृह तक दूसरी पार्टी के आने का इंतज़ार करना है. और इस बीच एक असंभव काम करना है - ज़िन्दा बचे रहने का काम. जहां हवा-पानी-मिट्टी सब आपके खिलाफ़ हो, वहां फ़कत ‘आलू उगाना’ भी कैसा द्वितीय विश्व युद्ध जीतने जैसा अहसास पैदा करता है, यह ‘दि मार्शियन’ की कथा बखूबी बताती है. मार्क वाट्नी के किरदार में मैट डेमन यहां ग्रह पर अकेले ऑक्सीजन में नाइट्रोजन मिलाकर पानी बनाते हैं और अपनी पॉटी से खाद बनाकर आलू उगाते हैं. और इस बीच पृथ्वी पर उन्हें बचाने का अभियान चलता रहता है. आजकल हॉलीवुड की समर ब्लॉकबस्टर्स का बड़ा बाज़ार एशियाई देशों में है और इसकी झलक उनकी कास्टिंग में दिखती है. यहां भी किताब वाली कहानी में नासा में बैठे मंगल ऑपरेशन के बॉस का नाम वेंकट कपूर था और हवा थी कि अपने इरफ़ान ख़ान इस भूमिका में दिखेंगे, लेकिन इरफ़ान ने मंगल पर छूटे मार्क वाट्नी को बचाने के बजाए ‘पीकू’ में बच्चन साब की कब्ज़ संबंधी समस्या से जूझना ज़रूरी समझा. नतीजा, कहानी का चीनी-जापानी कनेक्शन तो बच गया लेकिन हिन्दुस्तानी कनेक्शन किताब से फ़िल्म तक पहुंचते पहुंचते गायब. वैसे दूसरी जगह पर एंडी वेयर के बेस्टसेलिंग नॉवल पर आधारित फ़िल्म की पटकथा किताब के प्रति काफ़ी ईमानदार है. विज्ञान फंतासी और सरवाइवल कथा होते हुए भी इसके नायक की गढ़त में जो एक ख़ास किस्म के बेपरवाह सटायर का पुट मिला हुआ है, वो इसे एक नए स्वाद की कहानी बनाता है. और यहीं मैट डेमन की जीत छिपी है. उन्होंने किरदार की इस बेपरवाह गढ़त को किसी संजीवनी बूटी की तरह पकड़ा है और इसीलिए बाक़ी कई मामलों में पिछड़ती यह विज्ञान फंतासी उनके अभिनय के बल पर ऑस्कर में क्लास वन कैटेगरी वाली फ़िल्मों में आ जाती है. बाकी दोनों फ़िल्मों के मुकाबले इसके दावे भले कमज़ोर हों, लेकिन मनोरंजन में कहीं कोई कमी नहीं.

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