यह चिट्ठी 'दी लल्लनटॉप' के रीडर नवीन चौधरी ने लिखी है. मार्केटिंग के पेशे मेंहै, लेकिन लिखने का कीड़ा है. खास तौर से व्यंग्य का और व्यंग्य भी मिर्ची लगानेवाला. कहते हैं कि अगर किसी की कमजोर नस छू रहे हैं तो कृपया वो पहले वहां बांस कीखपच्ची बांध ले. इनके पास एक DSLR भी है, यानी फोटोग्राफी का शौक भी पाल रखा है.इनकी बीवी ने इनकी कार्यकुशलता देखते हुए सिर्फ बड़े मामलों में टांग अड़ाने की इजाजतदी है. इसलिए ये लौकी की सब्जी खाते हुए आज कन्हैया कुमार की स्पीच पर एक ओपन लेटरलिख बैठे हैं.--------------------------------------------------------------------------------प्यारे कामरेड कन्हैया ये कोई ओपन लेटर टाइप नहीं है, पर वैसा सा ही समझ लो. तुम तकपहुंचे न पहुंचे, पर सोचे लिख लेते हैं. देखो, यूँ तो हम कोशिश करेंगे कि सिर्फमुद्दे की बात लिखें पर व्यंग्य लिखने वाले आदमी है, दो-चार शब्द आ जाएँ तो इग्नोरकर देना. पर्सनल हमले भी नहीं करना चाहूँगा तुम पर, पर अब बात निकलेगी और थोडापर्सनल हो जाऊं तो ‘भूल चूक लेनी देनी’ समझ लेना. वैसे मैं जानता हूँ तुम मेरीअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करोगे. तुम तो हीरो बन गए हो, तुम्हें अब सबजानते हैं. कल तक कुछ चैनल तुम्हारे अंडरवियर का रंग भी बता देंगे. मेरे साथ ऐसा हैनहीं तो मुझे आगे बढ़ने से पहले अपना इंट्रो खुद ही देना होगा. तुम में और मुझ मेंकुछ समानताएं हैं और असमान तो बहुत कुछ है. मैं भी तुम्हारी तरह बिहार के एक गरीबपरिवार से आता हूँ जो मेहनत करके अब एक मुकाम पर है. मैं भी तुम्हारी तरह छात्रराजनीति में था, आज से 17 साल पहले यूनिवर्सिटी का चुनाव भी लड़ा था. फर्क इतना साहै कि जब मैं चुनाव लड़ा तब मैं वाकई स्टूडेंट था 21 साल का. मेरी यूनिवर्सिटी मेंछात्र नेता छात्र ही होता है (25 साल से नीचे), शादी या बाप बनने की उम्र मेंपीएचडी करने वाला नहीं. पीएचडी में भी एनरोल किया था, पर पूरा नहीं किया. अगर करतातो 25-26 साल की उम्र तक पूरी कर चुका होता, क्योंकि मेरे लिए मुफ्त कुछ नहीं था.तुम्हारी उम्र तक आते आते तो मैं महीने का 4000 टैक्स दे रहा था ताकि कहीं कोई नेताउस पैसे से घूस खा सके और कहीं कोई गरीब बच्चा फेलोशिप पा सके. खैर मुद्दे पर आतेहैं. तुम तो यूं ही कई दिनों से ख़बरों में हो पर कल से तुम्हारे छूटने के बादमीडिया में हिस्टीरिया ऐसा फैला कि तुम्हारा भाषण न देख पाने का मुझे मलाल रहा. अबदेखता कैसे, मुझे तो काम करके कमाना है ताकि टैक्स दे सकूं और कुछ गरीब छात्रों कीपढाई में मेरा भी योगदान हो. आज मौका मिला तो वीडियो देखा. मजा आया, क्या मजा ले लेकर बोले, क्या चुटकी ली, क्या सरकार पर बरसे, कैसे तुमने बताया कि तुम्हारीगिरफ़्तारी इसलिए हुई कि देश से गरीबी न हटे, भुखमरी रह जाये, वेमुला से ध्यान हटजाये. सुना था कि तुम अपने भाषण की वजह से जीते थे इसलिए भी सुनने में इंटरेस्ट थापर तुम्हारा भाषण बिल्कुल सलमान की फिल्म की तरह निकला. उसमें मसाला तो बहुत था परकंटेंट मिसिंग था जिससे पता चले कि जिन मुद्दों से तुम्हें आज़ादी चाहिए उन परतुम्हारे पास आइडिया क्या है. पर कोई बात नहीं, जब अपने खर्चे पर नून तेल का इंतजामकरोगे तो ये आइडियाज भी आ जायेंगे. जिस तरह सरकार जनता का ध्यान इधर उधर करकेमुद्दे से ध्यान हटाती है वैसे ही तुम भी ये बात पूरी तरह उड़ा गए कि ये सारा मामलातुम्हारी विचारधारा का नहीं, देश विरोधी नारे लगाने का था. तुम्हारी बात मानता हूंकि तुमने देश विरोधी नारे नहीं लगाए, पर ये भी पूरी तरह से सच है कि जिस सभा में येसब हुआ वहां तुम थे और चूँकि तुमने भाषण भी दिया था तो तुम उस कार्यक्रम से जुड़ेहुए भी थे. अध्यक्ष होने के नाते तुम्हारे पास ये क्षमता थी, औरों से कहीं ज्यादाकि तुम उन्हें रोक पाते पर तुमने ऐसा नहीं किया क्योंकि तुम उनकी अभिव्यक्ति कीस्वतंत्रता की रक्षा कर रहे थे. उस स्वतंत्रता की रक्षा करते टाइम तुम JNU के बाहरकी जनता की भावनाओं को भूल गए जिन्हें पता भी नहीं कि कोई उनके टैक्स के पैसे पर'भारत की बर्बादी' का गीत गा रहा है. अपने भाषण में कहा कि JNU की ABVP, बाहर कीABVP से ज्यादा रैशनल है. यकीन मानो, ठीक इसी तरह JNU के बाहर की दुनिया JNU सेज्यादा रैशनल है. वो सब देखती और समझती है. उसने ये भी देखा कि कैसे देश विरोधीनारे लगे, कैसे सरकार ने इसका राजनीतिकरण किया, कैसे फर्जी ट्वीट पर बयान आया औरकैसे देश विरोधी नारे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया गया. कुछ नहीं छूटा,सब देखा. कल तुम्हारे छूटने के बाद सबने तुम्हें सुना भी, इसलिए नहीं कि तुम नएगाँधी हो, इसलिए कि हम ज्यादा रैशनल है और सबको सुनते हैं. कोर्ट ने माना है कि तुमप्राथमिक तौर पर दोषी नहीं दिखते, इसलिए आज शक होने के बावजूद तुम्हें निर्दोषमानते हैं, ना कि तुम्हारे साथियों की तरह कोर्ट को ही ज्युडिशियल किलिंग का दोषीमानते हैं. तुमने कहा कि JNU के साथ लोग इसलिए खड़े हैं क्योंकि JNU सही को सही औरगलत को गलत कहता है. मैं इंतज़ार करता रहा कि कब तुम कहोगे कि उमर खालिद और उसकेसाथियों के नारे गलत थे, पर तुम सरकार को गरीबी बढ़ाने के लिए कोसने में इतने व्यस्तथे कि भूल गए कि असली मुद्दा ही यही था. यूं भी उमर खालिद के बारे में कहना आसाननहीं क्योंकि तुमने अगर साथ दिया तो झूठे साबित हो जाओगे, अगर कहा कि नारे उसनेलगाये तो वो बयान हो जायेगा. अगर तुम वाकई भारत के खिलाफ उठने वाली आवाज़ के विरोधमें हो तो इस तरह से सेफ क्यों खेलना? क्यों नहीं यहां पर भी खुलकर सामने आना? वैसेआज एक और इंटरव्यू में देखा कि तुम कोर्ट में मामला होने के नाम पर इस पर बोलने सेसाफ़ बच निकले, पर मेरे दोस्त आज जो तुमने कोर्ट के डंडे के बाद कहा है किअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भी कुछ सीमायें है, काश वो 9 फरवरी को कह के खालिद कोरोक लिया होता तो आज न मोदी, न स्मृति और न राहुल किसी को भी JNU के नाम पर राजनीतिकरने का मौका न मिलता. आज तुमने ये भी कहा कि तुम्हें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसाहै, तो मेरे भाई ये भरोसा अफज़ल गुरु वाले फैसले पर क्यों नहीं? तुम उस सभा में थेऔर वहां भाषण भी दिया गया था जिसमें अफज़ल की सजा को ज्युडिशियल किलिंग कहा था. जिसडेमोक्रेसी की तुम बात कर रहे हो, जिस संसद में लड़कर तुम हक़ मांगना चाहते हो, उसीसंसद पर, उसी डेमोक्रेसी पर इस अफज़ल गुरु ने हमला किया था. आज तुमने कहा कि तुमअफज़ल को आदर्श नहीं मानते. तुम्हारे इस बयान में यूं तो मुझे कोर्ट की फटकार का असरदिखा, पर फिर भी अच्छा लगा. हमारे लोगों पर हमला करना न तो डेमोक्रेसी है, न हीअभिव्यक्ति. ये मर्डर है, वैसा ही जैसा पश्चिम बंगाल में तुम्हारी विचारधारा केविरोधियों का होता आया है. तुमने कहा कि सौ बार सूरज को चाँद कहने से वो चाँद तोनहीं हो जायेगा, वही चीज मैं भी तुमसे कहना चाहता हूँ. सौ बार भारत की बर्बादी जैसेनारे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहने से वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होजायेगा और न ही अफज़ल गुरु शहीद कहलायेगा. देश के रैशनल नागरिक के लिए ये दोनोंबातें देशद्रोह ही हैं. तुमने कहा कि देश में बहुत खतरनाक प्रवृति जन्म ले रही है.तुमने आधी बात कही, पूरा करना भूल गए, वो मैं कर देता हूँ. देश के खिलाफ नारे लगानाऔर फिर उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सही साबित करना एक खतरनाक प्रवृतिहै. अगर तब भी सही साबित न हो तो सरकार बनाम अभिव्यक्ति बनाना उससे भी ज्यादाखतरनाक. तुम और कुछ मीडिया वाले भी अभी यही कर रहे हो. तुम अब जब संविधान में आस्थाजताने लगे हो और हीरो भी बन चुके हो तो कोशिश करना कि इस तरह की खतरनाकप्रवृत्तियों का तुम हर तरफ से विरोध करो. उनका भी करो जो विरोधी को पाकिस्तानभेजते हैं और उनका भी जो पाकिस्तान में कश्मीर मिलाना चाहते हैं. तुमने कहा कि जेलमें तुमने बहुत कुछ सीखा. मैंने आज तुम्हें सुना तो लगा वाकई जेल जाना तुम्हारे लिएअच्छा रहा, इसलिए नहीं कि तुम हीरो बन गए बल्कि इसलिए कि तुम्हे अब वो सब दिख रहाहै, और तुम हर उस बात को बोल रहे हो जो अब तक मिसिंग थी. मुझे अच्छा लगा तुम्हाराडेमोक्रेसी में यकीन करना. करना भी चाहिए क्योंकि तुम जेल भेजे गए थे, वर्ना तुमजिस विचारधारा से आते हो उसमें इतिहास रहा है कि जो विरोध करे उसे जेल मत भेजो, जानसे मार दो. बंगाल और केरल प्रत्यक्ष प्रमाण है. मुझे अच्छा लगा कि जेल से आने केबाद तुम्हें आज दिख रहा है की देश में कितनी भुखमरी और गरीबी है, कितने किसान मररहे हैं. क्योंकि तुम पहले देख न पाए जिस विचारधारा के तहत तुम गरीबी हटाने के जनताकी चुनी सरकार का विरोध कर रहे हो, उसी विचारधारा की सरकार के 30 साल तक होने केबावजूद पश्चिम बंगाल आज भी देश के उन राज्यों में है जहाँ सबसे ज्यादा गरीब लोगरहते हैं. तुमने कहा कि भारत से नहीं, तुम भारत में आज़ादी मांग रहे हो. अरे भाईहमारे यहां तो इतनी आज़ादी है कि आधा बांग्लादेश आजाद होकर यहीं घूम रहा है और कभीकभी पाकिस्तानी भी समुद्र के रास्ते मुंबई तक आ जाते हैं. भारत की बर्बादी के नारेलगाने वालों से हमें इसलिए परेशानी होती है क्योंकि समुद्र के रास्ते से जो मुंबईआते हैं उन्हें मदद ऐसे ही कुछ नारे लगाने वालों से मिलती है. अगर तुम्हें वाकईभारत में आज़ादी चाहिए तो सिर्फ गरीबी से ही नहीं, विचारधारा के नाम पर होने वालीहत्याओं से भी आज़ादी मांगो, मांगो आज़ादी वामपंथ या दक्षिणपंथ के नाम पर गरीबों केबेवकूफ बनाने से, मांगो आज़ादी जातिवादी आरक्षण से. वो मांगो जो हर आम आदमी को हक़दिलाये न कि वो जो विचारधारा के आधार पर उल्लू बनाये. हर आदमी अपने तरीके से समाजके लिए काम करता हैं. मैं प्रोडक्टिविटी लाकर जीडीपी बढ़ाने में मदद करता हूँ, टैक्सदेता हूँ. ये मेरा तरीका है, तुम अपनी पसंद का कोई और तरीका अपनाओ और दो समाज कोअपनी तरफ से कुछ. लाओ ऐसा आईडिया जो सालों से कोई कामरेड नहीं लाया. अगर लाया होतातो तो आज भी दुनिया में इतने गरीब न होते और तुम्हारी विचारधारा के सबसे ज्यादासमर्थक होते. जो भी तरीका अपनाओ, जो भी आईडिया लाओ, भाई बस ये याद रखना कि भारत कीबर्बादी के नारे से और नक्सलवाद से, न तो गरीबी हटेगी और न किसान का भला होगा. मुझेपता है कि तुम्हें या तुम्हारे JNU के कई साथियों को मेरी लिखी बातें बकवास लगेंगी.लगनी भी चाहिए क्योंकि तुम इसे हमारे खरचे पर afford कर सकते हो. वैसे मुझे भीतुम्हारी ये वामपंथी विचारधारा समझ नहीं आती क्योंकि जिस जिस देश ने अपनाया डूबगया. इसमें प्रोडक्टिविटी है नहीं, और जब सत्ता आती है तो वो गरीब के लिए तुम नारेलगाते हो उसी को तुम बाकी पार्टियों की तरह भूल जाते हो. बिलकुल वैसे ही, जैसेतुमने कहा कि तुम अपनी ‘गरीब मां’ से 3-3 महीने तक बात करना भूल जाते हो. वैसे तुमकैसे 3-3 महीने अपनी मां से बात नहीं करते? जब तुम अपने गरीब परिवार का हाल तक नहींपूछ पाए, तो जिन गरीबों के लिए तुम नारे लगाते हो उनको क्या पूछोगे? मुझे तो हरहफ्ते पापा को फ़ोन करके बोलना होता था – End money, send money क्योंकि हमारी सिर्फफीस में सरकार का योगदान था. जैकेट का खर्च हमें खुद उठाना होता था क्योंकि वो किसीमेरे जैसे टैक्सपेयर की जेब से नहीं आता था. ऊपर मैंने जो लिखा उसमें नया कुछ नहीं.तुम्हारी आइडियोलॉजी नई नहीं, देश में गरीबी नई बात नहीं. वामपन्थ ने दुनिया भर मेंबकैती के अलावा कुछ किया नहीं ये भी सबको पता है और तुम्हें भी. फिर ऐसा क्या है किये सब अलग-अलग पार्टी वाले राजनीतिज्ञ और मीडिया के एक सेक्शन जो तुम्हारीविचारधारा के उलट नीरा राडिया जैसों के साथ मिली रही है वो तुम्हें लेकर कल से बिछेपड़े हैं? ये सब तुम्हें लेकर इतने आह्लादित इसलिए है क्योंकि कन्हैया कुमार, तुमकॉन्डम हो. कॉन्डम के दो काम होते हैं – पहला संक्रामक बीमारी रोकना, और दूसरा आतीहुई प्रोडक्टिविटी को रोकना और प्रोडक्टिविटी रोकते हुए भी मजा देना. एक बार जबप्रोडक्टिविटी रुक गयी और मजा आ गया फिर वो कॉन्डम को फेंक दिया जाता है. आज विपक्षके पास कोई चेहरा नहीं जो किसी तरह सरकार का सकारात्मक विरोध कर सके. तुम एकटेम्पररी सोल्यूशन दिख रहे हो जो काम काज भी रुकवाएगा और मजा भी देगा. तुमने कहा किकुछ मीडिया वाले उधर से पाते हैं. तुम्हारी ये बात उतनी ही सच है जितनी ये कि कुछमीडिया वाले इधर से भी पाते हैं. जो उधर से पाते हैं, वो तुम्हे गलत दिखायेंगे,doctored वीडियो दिखायेंगे, और जो इधर से पाते हैं वो तुम्हारे नाम पर गलत को सहीसाबित करेंगे, राजनैतिक विरोध की खातिर आतंकवादियों के भी गले लगेंगे. अभी तुम्हारेको वो सब राजनेता समर्थन दे रहे हैं जिन्होंने इस देश को गरीबी और भुखमरी से आजादीनहीं मिलने दी. वो तुम्हारे साथ खड़े हो कर उस चीज से आजादी मांग रहे है जो उन्हींका दिया हुआ है. मीडिया जो इधर से पाता है, वो राजनेताओं के behalf पे गरीबी केनारे से सुर में सुर मिलाके तुम्हें नया हीरो बनाये हुए है. हवा में गरीबी से आज़ादीके नारे लगाना अलग है और वाकई उसके लिए सीरियस आइडियाज लेकर काम करना अलग. अब जबतुम कॉन्डम बन ही गए हो तो एक सलाह है - बनना है तो संक्रामक बीमारी रोकने वालेकॉन्डम बनना न कि बाकि वामपंथियों की तरह प्रोडक्टिविटी रोकने वाले. डॉटेड कॉन्डमबनना कि फील आये, वर्ना बकैती तो सालों से गरीबी के नाम पर होती ही आई है. तुमने हीकहा था हम भारतीय भूलते बहुत जल्दी हैं अगर तुम मीडिया और राजनीतिज्ञों के हाथोंकॉन्डम बन गए तो याद रखना कि तुम्हे भूलने में ज्यादा टाइम नहीं लगेगा. और तो और जोतुम कॉन्डम बने तो कल ज्ञान देव आहूजा को गिनती बढाकर 3001 करनी पड़ जाएगी. जातेजाते एक और बात - इन्कलाब जिंदाबाद (यकीन मानो, इसमें लाल सलाम से ज्यादा ताकत है)तुम्हारा टैक्सपेयर भारतीय साथी जिसे भारतवासी होने पर गर्व है.