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खुला ख़त: कंगना, अब थैंक यू बोलो अौर आगे बढ़ जाअो

कंगना, ये तुम्हारा समय है. आगे देखने का समय. आगे बढ़ने का समय. क्यों पीछे मुड़कर देखना अौर कीचड़ में पांव देना. मिट्टी डालो.

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29 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 23 मार्च 2018, 06:02 AM IST)
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कंगना,

ये चिठ्ठी मैं एक तिहरी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री को नहीं लिख रहा हूं. ये चिठ्ठी मैं बिना किसी खान नायक के सवा दो सौ करोड़ कमानेवाली फिल्म की नायिका को नहीं लिख रहा हूं. ये चिठ्ठी मैं हिन्दी सिनेमा की highest paid अदाकारा को नहीं लिख रहा हूं.

ये चिठ्ठी मैं तुम्हें लिख रहा हूं. एक लड़की को लिख रहा हूं.

बीते कुछ दिनों से तुम्हारा नाम खबरों की सुर्खियों में है. अगले हफ्ते ही तुम्हें भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिलने वाला है. स्वर्ण कमल. लगातार दूसरे साल. बाइस भाषाअों में सर्वश्रेष्ठ होने का सुख. तुम्हें खबरों में होना ही चाहिए.

ऐसे में यह जानना दुखद है कि ये खबरें तुम्हारे भावी सम्मान से जुड़ी नहीं हैं. उन खबरों में एक महानायक अभिनेता, 'जिसका नाम भी लेना गैरज़रूरी है', से तुम्हारे कथित प्रेम प्रसंग अौर अनर्गल झगड़ों के किस्से भरे हैं. ज़्यादातर खबरों का भाव चटखारे लेनेवाला है. किसी के निजी जीवन का सार्वजनिक तमाशा बनते देख जिस तेज़ी से हमारे यहां तमाशबीन आ जुटते हैं, वही यहां हुआ है. चंद लोगों की जिन्दगियां जल रही हैं अौर बहुत सारे लोग उसके चारों अोर खड़े आग ताप रहे हैं. इस अाग में कहीं हमारे मीडिया का, खासकर मनोरंजन से जुड़ी पत्रकारिता का दहन भी सम्मिलित है.

सिनेमा का घनघोर शौकीन होने के बावजूद, मैंने ये तमाम खबरें नहीं पढ़ी. आज भी अगर पेशे की ज़रूरत ना होती तो नहीं ही पढ़ता. मैंने इसके बदले तुम्हारी कुछ फिल्में देखीं अौर तुम्हें ये चिठ्ठी लिखने का फैसला किया.

तुम्हें पता है कंगना, जब भी मैं किसी बहस में लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा की बचाव की मुद्रा में उतरता हूं तो कौनसा किस्सा सुनाता हूं? मैं बताता हूं कि चाहे जितनी नाइंसाफी दिखती हो इस मायानगरी में, लेकिन एक गज़ब का पोएटिक जस्टिस भी है यहां. कि चाहे यहां स्टार के निखट्टू बेटे को हीरो बनने से कोई ना रोक पाए, लेकिन सबसे ऊंची कुर्सी हमेशा किसी 'आउटसाइडर' को ही मिलती है. चाहे वे पेशावर के थोक फलविक्रेता के बेटे युसुफ़ खान हों, चाहे वे अमृतसर में पैदा हुए स्कूल हेडमास्टर के बेटे जतिन खन्ना हों, चाहे वे इलाहाबाद के हिन्दी कवि के बेटे अमिताभ बच्चन हों अौर चाहे वे खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान के अनुयायी अौर स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र शाहरुख खान हों.

तुम्हारा नाम भी इसी क्रम में आता है. ऊपर लिखे इन तमाम नामों की तरह तुम भी इस मायानगरी में 'कहीं अौर' से आई हो. एक 'आउटसाइडर' जिसने हिन्दी सिनेमा के शिखर को छुआ है. तुमने उस दुनिया को देखा अौर जिया है, जिसे इस इंडस्ट्री की संतानें ठीक से जानती भी नहीं हैं. एक पहाड़ी लड़की जिसके पास दांव पर लगाने को कोई बड़ा सरनेम नहीं, सिर्फ महत्वाकांक्षाएं थीं.

अौर वो जो नायक है, 'जिसका नाम भी लेना गैरज़रूरी है', उसके पीछे चाहे कौन सा भी सरनेम हो. ये लैगेसी नहीं है.

आज तुम जिस लड़ाई में उलझी हो, मुझे नहीं पता कि तुम्हारे पास उसकी कौनसी वजहें हैं.  मुझे यह भी नहीं पता कि यह सच में व्यक्तिगत लड़ाई है या कोई पीआर वॉर है. जो ईमेल्स लीक हो रही हैं, जो तस्वीरें जारी की जा रही हैं, रह-रहकर जो बयान आ रहे हैं, जो आरोप लगाए जा रहे हैं.. मुझे नहीं पता कि उनसे आखिर क्या साबित होने वाला है. अौर मेरी जानने में दिलचस्पी भी नहीं है.

मुझे बस इतना ही कहना है तुमसे, कि तुम्हें इसकी ज़रूरत नहीं है. जहां से मैं खड़े होकर देख रहा हूं, वहां से तो बिल्कुल नहीं.

मैं इस देश के प्रीमियर विश्वविद्यालय की बैचलर्स की कक्षाअों में हिन्दी पढ़ाता रहा हूं. क्योंकि हिन्दी पढ़ाता हूं इसलिए मेरी कक्षा में तीन चौथाई लड़कियां होती हैं. क्यों? तुम तो जानती हो, जैसे होम साइंस 'लड़कियों के लिए' बना विषय है वैसे ही हिन्दी को भी दोयम दर्जे का विषय अौर 'लड़कियों का विषय' बना देने की घनीभूत कोशिशें हुई हैं बीते सालों में. लेकिन मैं इसे अपनी खुशकिस्मती समझता हूं कि मेरी क्लास में आधी से ज़्यादा लड़कियां होती हैं. मैंने अपने जीवन के कितने महत्वपूर्ण सबक इन्हीं लड़कियों से सीखे हैं.

तुम्हें पता है कंगना, जेंडर अौर सिनेमा पर क्लास लेते हुए मैं उन्हें तमाम सिनेमाई क्लासिक्स दिखाने के बाद अन्त में कौनसी फिल्म का हिस्सा दिखाता हूं?

वो तुम्हारी 'क्वीन' का क्लाईमैक्स है. जहां रानी अपने ब्वायफ्रेंड विजय से मिलने उसके घर जाती है. उसी ब्वायफ्रेंड से जिसने रानी से शादी ऐन फेरों के पहले तोड़ दी थी. उसी ब्वायफ्रेंड से जिसने उसके परिवार की भर बिरादरी में बेइज़्ज़ती करवाई. वही ब्वायफ्रेंड जिसके द्वारा तोड़े दिल की किरचों को समेटने रानी अकेले ही अपने हनीमून ट्रिप पर चली गई थी. लेकिन रानी इस आखिरी मुलाकात में विजय से क्या कहती है? यहीं सारी पिक्चर का सार है. जीवन का भी.

रानी उसकी हथेली पर सगाई की अंगूठी वापिस रखती है अौर उसके गले लगकर कहती है, 'थैंक यू'. अौर हतप्रभ विजय को वहीं छोड़ खिलखिलाती हुई आगे बढ़ जाती है.

थैंक यू, क्योंकि विजय मना नहीं करता तो करोड़ों की शादी अौर दहेज के नीचे दबे उसके माता-पिता शायद इस बोझ से कभी ना उबर पाते.

थैंक यू, क्योंकि विजय मना नहीं करता तो रानी को विजयलक्ष्मी कैसे मिलती.

थैंक यू, क्योंकि विजय मना नहीं करता तो रानी को इतने प्यारे दोस्त कैसे मिलते.

थैंक यू, क्योंकि विजय मना नहीं करता तो रानी कैसे जान पाती कि दुनिया के हर देश में आंसू अौर हंसी का रंग एक होता है.

थैंक यू, क्योंकि विजय मना नहीं करता तो रानी विजय जैसे लड़के की खोखली मॉडर्निटी की असलियत कैसे जान पाती.

थैंक यू, क्योंकि विजय मना नहीं करता तो रानी अपने आप को कैसे जान पाती. कैसे उड़ पाती आज़ादी के इस खुले आकाश में.

हर उस लड़की को अपने जीवन में मिले ऐसे किसी भी लड़के से अौर रिश्ते से, जो उसकी अौर उनके रिश्ते की सही वकत ना समझे, दोनों से जल्दी से जल्दी आज़ाद हो जाना चाहिए. अौर इस आज़ादी का तरीका क्या हो, वही जो 'क्वीन' की रानी का था. 'थैंक यू'. मैं अपनी क्लास में पढ़नेवाली हर लड़की को यही सबक देता हूं, कि ऐसा हर रिश्ता टूटना दरअसल एक अहमक से आज़ादी होता है अौर उसके गम में रोने के बजाए उसे 'थैंक यू' बोलकर आगे बढ़ जाना चाहिए. उसके प्रति बैर मन में बसाने के लिए जगह कहां है आखिर. देखो इस दुनिया को, कि कितना कुछ खूबसूरत बिखरा है यहां दिल में बसाने को.

तुमने एक बार बताया था कि 'क्वीन' की पहले से तैयार स्क्रिप्ट में तुमने शूटिंग के दौरान कई चेंज कर दिए थे. फिल्म के कई संवाद दरअसल खुद तुम्हारे दिमाग अौर अनुभव की उपज हैं, जो फिल्म को एक कमाल का नैसर्गिक स्वाद देते हैं. यह असर इतना गहरा था कि निर्देशक ने तुम्हें संवाद लेखन में सह-क्रेडिट दिया. ज़रा सी रचनात्मक छूट लेकर मैं आज यह मानना चाहता हूं कि वो अन्त भी तुम्हारा रचा था. कि वो 'थैंक यू' तुमने कहा था. कि तुम जानती हो कि कुछ लड़ाइयां इस दुनिया में ऐसी होती हैं, जो अन्तत: बेमतलब होती हैं अौर उनसे किसी का भला नहीं होता. कि तुम्हारे सामने साबित करने को कुछ नहीं, सिवाए तुम्हारे काम के. कि किसी के निजी जीवन से उसके काम को जज करने वाले, वो भी एक स्त्री अभिनेता को, इस लायक ही नहीं हैं कि उन्हें कोई भी जवाब दिया जाए. कि वो तुम्हारा काम है जो बोलता है, बोलेगा.

हां, तीन तारीख की शाम को जब एक मंडी, हिमाचल की लड़की एक कानपुर, यूपी की लड़की अौर एक झज्जर, हरियाणा की लड़की की दोहरी भूमिकाअों को निभाने के लिए राष्ट्रपति से पुरस्कार लेने को आगे बढ़ेगी तो मैं खड़े होकर तालियां बजाऊंगा. ये पक्का वादा.

मिहिर.

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