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सड़ी सुपारी के स्वाद और सोच का क्या रिश्ता है?

टीवी पर पान मसाले का वो ऐड देखे हो. जिसमें अन्नू कपूर बताते हैं कि राज सिरी का स्वाद लो. तब सोच निखर कर आएगी. लल्लन को इस आइडिया में दम नहीं दिखता.

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आशुतोष चचा
20 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 20 अप्रैल 2016, 10:56 AM IST)
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टीवी पर नजर जाती है तो कभी कभी एक ऐड दिखता है. उस ऐड में अन्नू कपूर होते हैं. हर ऐड में कोई ज्ञान की बात होती है. कभी बुजुर्गों का साथ देने की बात, अपने पुराने कपड़े किसी गरीब को दान करने, मां को पूज्यनीय बताने, दहेज प्रथा हमेशा के लिए मिटाने तक, सब काम की बात. लेकिन ऐड खतम होते होते स्क्रीन पर एक पाउच चमकता है. राजश्री पान मसाले का. और एक जुमला गिरता है "स्वाद में सोच है." वो पाउच देख कर हमारा स्वाद और सोच सब घास चरने चले जाते हैं. भाई कपूर साहब, ये जहर हम खाएंगे. गले और गाल गला कर मर जाएंगे. फिर ये स्वाद और सोच जन्नत में हमारे काम आएगी क्या? जन्नत का भी पक्का नहीं क्योंकि हमारे करम इत्ते अच्छे नहीं हैं. आप एक बात बताओ. आपने अपने बच्चों को बचपन से संस्कार दिए होंगे. कि बड़ों का कहा मानो. खूब पढ़ो. शरीर और हेल्थ का खयाल रखो. ये भी कि नशे की लत से बचो. तो क्या ये सब संस्कार इस स्वाद का लालच देकर सिखाए हैं? हमारे एक पड़ोसी हैं. वो अपने बच्चों को रात में सुलाने से पहले सूसू कराने ले जाते हैं. तो कहते हैं "चलो सूसू कर लो बेटा, दो रुपए दूंगा." आप भी उसी तरह कहते होंगे "बड़ों का कहा मानों, एक पुड़िया राज सिरी दूंगा." ऐसा लगता तो नहीं कि आपने इसका स्वाद लिया तब ये सोच आई. नै दांत नहीं चुगली करते आपके. वो कत्थई रंग के हो जाते हैं. उसके बाद डॉक्टर को दिखाना पड़ता है. एसिड से साफ करते हैं. एसिड माने तेजाब.
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आप ही की तरह एक आधे गुरू सन 97 में आने लगे थे. शक्तिमान याद है? जब उन्होंने छोटी छोटी मगर मोटी बातों में ये बताना शुरू किया कि ये गुटखा ये जर्दा सब जान के दुश्मन हैं. लेकिन वो आधे गुरु थे. क्योंकि उनके पास बच्चों को ललचवाने के लिए कोई स्वाद नहीं था. हमको डर लगता था कि छिप के भी खाया तो शक्तिमान देख लेगा फिर वहां अंतरिक्ष में छोड़ आएगा. जहां प्लास्टिका को छोड़ा था. आप पूरे गुरू हो. स्वाद के साथ सोच और दुनिया से मुक्ति का मार्ग एक साथ बता रहे हो. लेकिन हम आपसे एक बात बताएं. ये स्वाद लेकर हम अपनी सोच की वैलिडिटी नहीं बढ़ाना चाहते. आई एम सॉरी बॉस. राजसिरी खाकर गलियां और कोने लाल करने की सोच बहुत ही घटिया है. हम इस सोच के बिना ही अच्छे हैं. आप एक तरफ सोच का रास्ता दिखा कर एक कदम आगे बढ़ाते हैं और फिर ये सड़ी सुपाड़ी का स्वाद चटा कर टंगड़ी मार देते हैं. माफ कीजिए हमको. हम बिना सोच के ही अच्छे.

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