जयपुर लिट फेस्ट (जेएलएफ) के दसवें संस्करण को देख कर साल 2011 में उमेश विनायककुलकर्णी के निर्देशन में आई मराठी फिल्म ‘देउल’ याद आती है. यह फिल्म एक निश्चल औरसरल व्यक्ति के स्वप्न से शुरू होती है. यह स्वप्न भगवान दत्ता स्वामी से संबंधितहै. इस स्वप्न के खुलासे के बाद एक गरीब गांव कैसे धर्म, राजनीति और बाजार के असरमें आकर परंपराच्युत, भ्रष्ट और संवेदनहीन होता है... ‘देउल’ इसकी दास्तान है.‘देउल’ का अर्थ हिंदी में मंदिर है. नाना पाटेकर, गिरीश कुलकर्णी और सोनालीकुलकर्णी जैसे बेहतरीन कलाकारों के अभिनय से रची यह फिल्म हंसाते हुए भी एक गंभीरविमर्श में मुब्तिला रहती है और खुद में मौजूद कुछेक पात्रों के अकेलेपन और दर्द कोउत्सव में बदल देती है, लेकिन इस नकारात्मकता और पराजय में कोई गैरजिम्मेदारी नहींबल्कि एक टीस है जो सोचने पर बाध्य करती है. यह टीस ‘देउल’ को एक बड़ी फिल्म बनातीहै. जेएलएफ में अजमेर से आई एक अध्यापिका बताती हैं कि वह इस लिट फेस्ट को साल 2008 सेही देखती आ रही हैं. पहले यहां इतनी भीड़ नहीं होती थी. नमिता गोखले खींच-खींच करलोगों को सेशन सुनने के लिए बाध्य करती थीं. लेकिन फिर इस साहित्य उत्सव में धर्म,राजनीति, सिनेमा और बाजार से जुड़े लोकप्रिय लोगों को बुलाना और उनका आना शुरू हुआ.और अब आप देख ही रहे हैं कि कोई ऐसी जगह नहीं है जहां आपको धक्का या किसी अपरिचितकी कुहनी न लगे. यहां आने-जाने-खाने-पीने सब पर आपको स्कैन किया जा रहा है. यहस्कैनिंग आपके भीतर के आदमी की भी स्कैनिंग है. इस प्रक्रिया से आजिज आ चुके एकस्थानीय लेखक ने बताया कि इस पूरे उत्सव में एक वक्त में इतना फर्जीवाड़ा हो रहा हैकि लगता ही नहीं कि साहित्य के नाम पर ये सब भी हो सकता है. वह आगे बताते हैं कि यहउत्सव साहित्य का उत्सव नहीं है. दरअसल, यह अपसंस्कृति की चाशनी में लिपटा हुआटूरिज्म है. राजस्थानी रजवाड़े जो मुरझा रहे थे, उन्हें इस उत्सव ने खाद-पानी दे दिया. आखिरराजघराने से वास्ता रखने वाली एक मुख्यमंत्री जो अपने कुल असर में एक सोशलाइट है,आखिर अपने मुरझा रहे वर्ग के लिए और क्या कर सकती थी कि अपने सारे संसाधन और खजानेएक ऐसे उत्सव के लिए खोल दे जो हाशिए की आवाजों की मुखरता वाले एक दौर मेंउच्चवर्गीय-अस्मिता-संकट के मसले को इतने बाजारू ढंग से सुलझा सके. डिग्गी पैलेस सेकरीब 14 किलोमीटर दूर स्थित प्रताप नगर में हिंदी के सबसे बड़े कवियों में से एकऋतुराज रहते हैं. वह इतने बड़े कवि हैं कि हिंदी साहित्य के प्रकाशकों को उनकी कोईखबर नहीं है. वह इतने बड़े कवि हैं कि हिंदी साहित्य के जिन प्रकाशकों ने उनकेकविता-संग्रह छापे हैं, वे साल में एक बार रॉयल्टी के नाम पर उन्हें कभी 114, कभी335 तो कभी 420 रुपए का चैक भेज देते हैं. एक प्रकाशक ने उनके कविता-संग्रह पररॉयल्टी देना तो दूर कोई कॉन्ट्रेक्ट तक भी साइन नहीं किया. उसे साफ लगता है किउसने ऋतुराज को छाप कर उन पर एहसान किया है. इस प्रकाशक का नाम नोट कर लीजिए, यहइलाहाबाद का साहित्य भंडार है. ऋतुराज एक बार को छोड़ कर कभी जेएलएफ में नहीं गएहैं. स्थानीय होने और बुलावा आने के बावजूद वह ऐसा क्यों करते हैं, यह पूछने पर वहजेएलएफ को भयावह बताते हैं. मुहावरे में कहें तो जिन्हें ठीक से पानी पिलाए जाने की जरूरत है, ऐसे लोगों को तीनदिन में लाखों बार 30 रुपए की मसाला चाय पिला चुके व्यक्ति से यह पूछने पर कि आपकोपता है कि साहित्य क्या होता है? राजस्थानी परिधान में सर्वहारा होने से कुछ दूरीपर खड़ा वह व्यक्ति अपनी बहुत व्यस्तता और कुछ संकोच में शर्माते हुए कहता है कि यहीसब होता होगा... बड़े लोगों का कुछ काम. लगभग सारे कला-उत्सवों में पंडाल की तरहमौजूद रहने वाला एक फेस्टिवलखोर जरा-सा छेड़ने पर बेसुरे सितार की तरह बज उठता है.वह कहता है कि इस लिट फेस्ट में मैनिपुलेशन बहुत हावी है. कुछ चेहरे कई-कई सेशंस में नजर आते हैं. दलित साहित्य पर अनु सिंह चौधरी बात कर रहीहैं. बताइए उन्हें भला क्या पता है दलित साहित्य के बारे में. यों लगता है कि इसउत्सव पर विचारवंचित लोग ही हावी हैं. सारा सुख वही लूट रहे हैं जो किसी के प्रतिकमिटेड नहीं हैं. एक सेशन से दूसरे सेशन के बीच में इतने विज्ञापन हैं कि लगता हीनहीं कि आप बाजार से दूर हैं. दिल्ली से आए और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे दो छात्रबताते हैं कि वे यहां पहली बार आए हैं. उन्हें यहां मजा आ रहा है. वह कान में यह भीबताना चाहते हैं कि लड़कियों की लाइन यहां सब जगह लड़कों से लंबी है. आखिरी किताबकौन-सी पढ़ी थी, यह पूछने पर वे बगलें झांकने लगते हैं. बुक स्टोर में क्या उनकाजाना हुआ यह पूछने पर वे कहते हैं कि अभी नहीं गए लेकिन जाएंगे जरूर. जयपुर लिट फेस्ट के प्रसंग में यहां तक आते-आते यह लगने लगता है कि इसकेकर्ता-धर्ता संभवत: वर्तमान की वास्तविक पीड़ाएं जानते हैं और इसलिए ही उन्हेंसार्वजनिक स्पेस में प्रस्तुत नहीं करते हैं, क्योंकि यह प्रकटीकरण न सिर्फ उन्हेंबल्कि उस सार्वजनिकता को भी एक अनिर्वचनीय प्रायश्चित से भर देगा, जो ऐसे अवसरों परप्रस्तुत होती है. इस मायने में जेएलएफ के प्रायोजक, आयोजक, संयोजक, सहयोगी औरज्यूरी ऐसे प्रकटीकरणों से जो उनके बेहद मॉड किस्म के डेलीगेट्स के लिए असुविधाजनकहों, बचकर एक ऐसा रास्ता चुनते हैं जो कतई अनैतिक, भ्रष्ट और गैरजिम्मेदार है. भिन्न-भिन्न भारतीय भाषाओं में प्रतिवर्ष भारतीय यथार्थ के जटिल और क्रूरतम सत्य केनजदीक जाकर बेहद बारीकी और कलासंपन्न वैभव के साथ बहुत सारी रचनाएं संभव हो रहीहैं. इन्हें अक्सर बड़े श्रम के साथ यातनाएं झेल कर खुद के खर्चे पर या आपसी सहयोगके बलबूते पर मुमकिन किया जाता है. इस प्रकार की रचनाओं को देख पाना भी उतना हीमुश्किल होता है, जितना कि उन्हें रचना. ऐसी सच्चाइयों के विरुद्ध जाकर जेएलएफ जारीहै. तीसरे दिन भी कई सेशन हुए, लेकिन इन पंक्तियों का लेखक बहुत ईमानदारी सेस्वीकार करता है कि उत्सव-स्थल के बहुत नजदीक होने के बावजूद उसने किसी भी सेशन मेंहिस्सा नहीं लिया. *** इन्हें भी पढ़ें :मैं प्रोफेशनल मुस्लिम नहीं हूं : सईद नकवीजेएलएफ पहला दिन: संक्षेप ही तो समस्याहै