सोनिया गांधी ने कहा, 'नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, शहंशाह नहीं'. लेकिन हमें लगता है कि वो हैं भी और नहीं भी. 'शहंशाह' शब्द की पूंछ पकड़ लीजिए और हमारे साथ चलिए.
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'शाह' पर्शियन राजाओं को कहा जाता था. ईरान के मोहम्मद रजा पहलवी दुनिया के आखिरी शाह थे. 1979 में ईरानी रिवोल्यूशन हुई और उनकी कुर्सी उखाड़ फेंकी गई. इसके बाद शाहों का कल्चर लिटरल सेंस में चला गया. सिर्फ भाषा में यह शब्द रह गया. तो उस दौर में जो 'शाहों का शाह' होता था, उसे शहंशाह कहते थे. इस वक्त अपने देश में एक ही ताकतवर शाह है. और सब जानते हैं कि 'शाह का शाह' कोई और नहीं, नरेंद्र भाई मोदी ही हैं.
और वो नहीं होंगे तो कौन होगा. अंधेरी रातों में, सुनसान रातों पर निकलने वाले फिल्मी 'शहंशाह' भी उनके यहां एंकरिंग करते हैं. दुनिया जहान की ताकत उनके पास है. चचा का एक शेर छोटे से बदलाव के साथ बहुत डरते-डरते लिख रहा हूं.
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लेकिन इसमें एक पेच फंस गया है. पेच ये है कि मोदी शाह हैं तो 'शहजादा' कौन है? इतिहास के मुताबिक, 'शहंशाह' और 'शाहों' के लड़के 'शहजादे' कहलाते थे. वे लड़के जिनकी नसों में शाह का खून होता था. लेकिन नरेंद्र मोदी तो किसी और के लड़के को 'शहजादा' बताते हैं. यानी वह लड़का अगर शहजादा है तो मोदी शहंशाह हो नहीं सकते. जो शहंशाह रहा होगा, उसकी तो सन् इक्यानवे में हत्या कर दी गई.
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वैसे ये बातें, सारी बातें हैं. ये लोगों ने फैलाई हैं. भावार्थ पर जाएंगे तो 'शहंशाह' वहां हो नहीं सकता, जहां लोकतंत्र है. इसी लॉजिक से कोई 'शहजादा' भी नहीं हो सकता. पर पार्टियों के भीतर, 'शहंशाह' और 'शहजादा' बनने या बने रहने के लोकतंत्र-सुलभ तरीके जरूर खोजे जा सकते हैं.