आज गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ यानी गाबो का जन्मदिन है. उनकी कुछ बातों का बहुतसुंदर अनुवाद करके अशोक पांडे ने अपने मशहूर ब्लॉग ‘कबाड़खाना’ पर लगाया था. विश्वके महानतम लेखकों में शुमार मार्केज़ को याद करते हुए यहां हम ये सदा काम आने वालीबातें ‘कबाड़खाना’ से साभार प्रस्तुत कर रहे हैं... अगर एक पल को ईश्वर यह भूल जाएकि मैं चीथड़ों से बना एक गुड्डा नहीं हूं और मुझे जीवन की एक कतरन अता फरमाए तो मैंशायद वह सब नहीं कहूंगा जो मैं सोचता हूं. मैं उस सब की बाबत सोचूंगा जो मुझे कहनाहोगा. मैं चीजों को उनकी कीमत से नहीं बल्कि इस बात से आंकूंगा कि उनका अर्थ क्याहै. मैं कम सोऊंगा और यह सोचता हुआ सपने ज्यादा देखूंगा कि आंखें बंद करते ही हम एकमिनट में रोशनी के साठ सेकेंड गंवा देते हैं. जब दूसरे लोग मटरगश्ती कर रहे होंगेमैं चलूंगा और जब वे सो रहे होंगे जगूंगा. जब दूसरे बोल रहे होंगे तो मैं सुनूंगाऔर एक बढ़िया चॉकलेट आइसक्रीम का मजा लेने के बारे में सोचूंगा. अगर ईश्वर मुझे जीवनकी एक कतरन अता फरमाएगा तो मैं साधारण पोशाक पहनूंगा, मैं अपनी देह ही नहीं अपनीआत्मा को भी उघाड़ते हुए सबसे पहले अपने को सूरज के सामने उछाल दूंगा. मेरे ख़ुदा!अगर मेरे पास एक दिल होता तो मैं अपनी नफ़रत को बर्फ़ पर लिखता और सूरज के बाहर आनेका इंतज़ार करता. वान गॉग के सपने के साथ मैं बेनेदित्ती की कविता को सितारों मेंउकेर देता और सेरात एक कविता मेरे वास्ते एक प्रेमगीत होती जिसे मैं चंद्रमा को पेशकरता. अपने आंसुओं से मैं गुलाबों को सींचता ताकि उनके कांटों के दर्द और उनकीपंखुड़ियों में पुनर्जन्म लिए चुंबनों को महसूस कर पाऊं. मेरे ख़ुदा अगर मेरे पासजीवन की एक कतरन होती तो मैं एक भी ऐसा दिन न बीतने देता जब मैं उन लोगों से,जिन्हें मैं प्यार करता हूं कहता कि मैं उन्हें प्यार करता हूं. मैं हरेक औरत औरहरेक आदमी को यकीन दिलाता कि वे मेरे सबसे प्यारे हैं और यह कि मैं प्यार से प्यारकरता हुआ जिए चला जाऊंगा. मैं उन इंसानों पर यह साबित करूंगा कि यह सोचने में वेकितने गलत हैं कि एक बार बूढ़ा हो जाने पर वे प्यार नहीं कर सकते, वे नहीं जानते किप्यार करना बंद करने पर ही वे बूढ़े होते हैं. एक बच्चे को मैं पंख दूंगा, लेकिन उसेखुद उड़ना सीखने दूंगा. मैं बूढ़ों को सिखाऊंगा कि मृत्यु बड़ी उम्र के कारण नहींबल्कि भूल जाने की वजह से आती है. तुमसे मैंने इतना सारा सीखा है, इंसानो! मैंनेसीखा है कि हर कोई पहाड़ की चोटी पर रहना चाहता है बिना यह जाने कि सच्ची खुशी इसबात में है कि उस पर चढ़ा कैसे गया है. मैंने सीखा है कि जब एक शिशु सबसे पहले अपनेपिता की उंगली को अपनी नन्ही हथेली में जकड़ता है, वह हमेशा के लिए उसे अपने साथ जकड़लेता है. मैंने सीखा है कि आदमी को दूसरे आदमी को नीची निगाह से देखने का अधिकारतभी है जब वह उसे उसके पैरों पर खड़ा करने में मदद कर रहा हो. मैंने तुमसे कितनी हीबातें सीखी हैं, इंसानो! लेकिन सच यह है कि उनका ज्यादातर किसी काम का नहीं होताक्योंकि जब वे मुझे उस सूटकेस के भीतर रख रहे होंगे, बदकिस्मती से मैं मर रहाहोऊंगा.-------------------------------------------------------------------------------- वीडियो- एक कविता रोज़: जैसे पुरानी मोहब्बतों में चिठ्ठियां फेंका करते थे लोग