‘‘यह धरती हमारा ‘चेरी ऑर्चर्ड’ है और हमें मालूम है कि यह धरती कुछ अनिवार्यपरिवर्तनों से गुजरने जा रही है – पर्यावरण के लिहाज से भी, राजनीतिक, सामाजिक औरभौतिक लिहाज़ से भी. इन परिवर्तनों के परिणाम निश्चित रूप से बहुत सुखद नहीं होंगे.इस नाटक हर पात्र जंगल में खोई किसी रूह-सा है – सुंदर, आकर्षक... लेकिन खोया हुआ.आज 21वीं सदी मे हम सब भी उसी तरह खोए हुए लोग हैं या फिर अभी भी हमारे पास किसीबेहतर कल के निर्माण का मौका बचा है?’’ ये बातें मशहूर रंगकर्मी रॉबिन दास की हैं.ये बातें उन्होंने तब एक ब्रोशर में कहीं जब वह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अंतिमवर्ष के छात्रों के साथ एंटन चेखव के नाटक ‘द चेरी ऑर्चर्ड’ को मंचित करने जा रहेथे. यह प्रसंग 5 वर्ष पुराना है और आज चेखव का जन्मदिन है यों विकीपीडिया बता रहाहै. चेखव के जन्म के 150 से ज्यादा साल गुजर चुके हैं और उनकी देहांत के 100 से भीज्यादा, लेकिन यह क्या है कि वह अब तक प्रसंग में हैं? ‘महान’ जैसा शब्द भी चेखवजैसी विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व के लिए अपर्याप्त है. चेखव पेशे से डॉक्टरथे, लेकिन वह ऐसे डॉक्टर नहीं थे कि जिसकी डॉक्टर नहीं चली तो वह लिखने लगा. ऐसेडॉक्टर तो जासूसी उपन्यासकार आर्थर कॉनन डॉयल थे. चेखव बहुत प्रतिबद्ध और कामयाबडॉक्टर थे. यों कहा जाता है कि अकाल और महामारी के दिनों में चेखव ने दौड़-दौड़ कररूस के आमजन को अपनी चिकित्सा से मदद पहुंचाई. यद्यपि टॉलस्टॉय जैसे महान लेखकों कामानना था कि चेखव की डॉक्टरी उनके लेखन में बाधा है. लेकिन खुद चेखव का मानना था किडॉक्टरी ने उनके लेखन को ज्यादा तर्कसंगत और संतुलित किया. चेखव ने डॉक्टरी को अपनीवैध पत्नी और साहित्य को अपनी प्रेमिका माना. अपने अंतिम दिनों तक भी चेखव तीन घंटेरोज नियमपूर्वक लोगों को अपनी डॉक्टरी की सेवाएं देते रहे. इस कथ्य की शुरुआत मेंचेखव के क्लासिक नाटक ‘द चेरी ऑर्चर्ड’ का जिक्र इसलिए किया गया क्योंकि यह नाटकसांस्कृतिक रूप से बीमार हो चले समाज की चिकित्सा करता है. अपनी कोशिशों में यहनाटक एक समाज, एक राज्य को बचा ले जाने की बेचैनी का बयान है. यह बयान अपने असर मेंइतना बड़ा हो जाता है कि चेरी ऑर्चर्ड इस धरती की तरह नजर आने लगता है, जिसको बचानेकी चुनौती अब सामने है. ...और आखिर में इस नाटक के एक किरदार त्रोफिमोव के इस संवादको पढ़ कर इस प्रश्न का उत्तर पाया जा सकता है कि चेखव के जन्म के 150 से ज्यादा सालगुजर चुके हैं और उनके देहांत के 100 से भी ज्यादा, लेकिन यह क्या है कि वह अब तकप्रसंग में हैं? संवाद यों है : ‘‘सारा रूस ही तो हमारा बगीचा है. धरती बहुत सुंदरहै, बहुत बड़ी है. इसमें एक से एक सुंदर चीजें हैं. ...जरा सोच कर तो देखो तुम्हारेदादा-परदादा और सारे पुरखे गुलामों को पालने वाले थे. जीते-जागते प्राणियों केमालिक थे! ...क्या तुम्हें उनकी आवाजें सुनाई नहीं देतीं? ...हम लोग अभी भी कम सेकम दो सौ साल पिछड़े हुए हैं. अभी तक हमने पाया ही क्या है? अपने अतीत के लिए हमारेपास कोई निश्चित दृष्टिकोण नहीं है. हम तो सिर्फ सूक्तियां बघारते हैं. आज के पतनऔर कमियों पर रोते हैं और वोदका पीते हैं. साफ बात है कि वर्तमान में जीने के लिएहमें अतीत से पीछा छुड़ाना होगा. हमें उसे तोड़ फेंकना होगा. और अतीत को तिलांजलि हमतभी दे सकते हैं जब इसके लिए काफी तकलीफ उठाएं. अंधाधुंध और अनथक परिश्रम करें. यहसमझ लेना.’’