The Lallantop
Advertisement

सरकार खूब सारे नोट छपवा के गरीबों में बांट क्यों नहीं देती?

क्या आपको भी ऐसा ही लगता है?

Advertisement
Img The Lallantop
500 का नया नोट कुछ बैंकों से मिलने लगा है.
pic
ऋषभ
18 नवंबर 2016 (Updated: 18 नवंबर 2016, 07:20 AM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
लोग नोट के लिये लाइनों में लगे हैं. कुछ लोगों को नोट मिल जा रहे हैं. कुछ लोगों को नहीं मिल रहे हैं. सरकार कह रही है कि कुछ दिनों में ये समस्या खत्म हो जायेगी. पर ये तो तय है कि कुछ लोगों को समस्या खत्म होने के बाद भी नोट नहीं मिलेंगे. क्योंकि उनके पास ना तो पुराने नोट थे ना ही एकाउंट में पैसे. तो मिलेगा कहां से. एक सवाल है. अगर सरकार अभी नोट छाप ही रही है तो इसी प्रोसेस में खूब सारा छाप के गरीबों में बांट क्यों नहीं देती? सबके हाथ में चार पैसे आ जाते. बदमाशों का ब्लैक मनी निकल जाता और गरीब लोगों के एकाउंट भर जाते. पर सरकार ऐसा करेगी नहीं. भगवान पर से तो गरीब लोगों का भरोसा उठ ही गया है. क्योंकि पैसे तो वो देते नहीं. उलटा ले लेते हैं. सरकार को क्या दिक्कत है. मशीन है, लोग हैं. छाप रहे हैं तो छाप दें. नोट नहीं दे रहे तो क्या सरकार बेवफा है? कुछ मजबूरियां होती हैं. यूं ही कोई बेवफा नहीं होता. इसको समझना पड़ेगा. पैसा क्या है? कुछ नहीं है. कागज का टुकड़ा है. इसकी अपनी कोई कीमत नहीं होती. पर इसकी कीमत इस बात से तय होती है कि इससे कितना सामान खरीदा जा सकता है. अगर सामान नहीं खरीदा जा सकता था तो इसकी कोई जरूरत नहीं थी. तो मूल में है सामान. कितना सामान देश में पैदा होता है, कितना बाहर भेजा जाता है, कितना मंगाया जाता है. इसी के आधार पर पैसे की कीमत तय होती है. अगर देश में कुछ पैदा ना हो, कुछ बने ही नहीं तो पैसे की कोई कीमत ही नहीं रहेगी. अब मान लीजिए कि एक देश में 5 लोग ही रहते हैं. 5 किलो चावल उगाया जाता है. और कुछ नहीं होता देश में. यही चावल ही है. अब यहां पर नोट छप के आये हैं. 100 रुपये के 5 नोट. चावल 100 रुपये किलो है. एक इंसान के पास 200 रुपये हैं. तीन के पास 100-100 रुपये. एक के पास कुछ नहीं है. तो पहला इंसान दो किलो चावल खरीद सकता है. तीन एक-एक किलो खरीद सकते हैं. एक खरीद ही नहीं सकता. अब अगर नोट छापकर आखिरी व्यक्ति को 300 रुपये दे दिये जायें तो क्या होगा? अब मार्केट में 800 रुपये हो जायेंगे. चावल 5 किलो. खरीददार 5. तो अब मार्केट में चावल का दाम बढ़ जायेगा. और ये रुपये के हिसाब से ही नहीं बढ़ेगा. एक स्थिति एज्यूम करिए. नोट छप के आये हैं. सबको नहीं पता है. आखिरी व्यक्ति को 300 रुपये मिले. वो झटपट जा के तीन किलो चावल खरीद लेता है. अब मार्केट में बस दो किलो ही चावल बचा. खरीददार हैं चार. एक के पास 200 रुपये. तीन के पास 100-100 रुपये. कुल 500 रुपये. अब फट से चावल का दाम 250 रुपये किलो तक हो सकता है. ज्यादा भी हो सकता है. एकदम क्राइसिस हो जायेगी. लोग लाइन में लग जायेंगे. पर मिलेगा नहीं. ब्लैक मार्केटिंग हो जायेगी. एक किलो बेच के कह देंगे कि खत्म हो गया. फिर 300 रुपये किलो बेचने लगेंगे. रुपये की कीमत गिर जायेगी. जो सामान 100 रुपये में मिल रहा था वो 300 रुपये में मिलेगा. तो यही वजह है कि सरकार नोट नहीं छापती है. मजबूरी है. वरना कोई भी सरकार नोट छाप के गरीबों में बांट देती. और हमेशा के लिए अमर हो जाती. इसीलिये हमेशा बातें होती हैं मेक इन इंडिया की. कि कैसे ज्यादा से ज्यादा सामान बन सके. उसी हिसाब से पैसे की कीमत बढ़ेगी. और जितने ज्यादा लोग काम करेंगे, उतना सामान बनेगा. उतना ही पैसा सबके पास पहुंचेगा.

तीन दिन से घर नहीं गया था बैंक मैनेजर, हार्ट अटैक से मौत

दुनिया को एक करना है तो नोट फूंक दो, सिक्के गला दो

मैं एक मशीन हूं और 'नोटबंदी' के बाद मेरे अच्छे दिन आ गए हैं

Advertisement

Advertisement

()