लोग नोट के लिये लाइनों में लगे हैं. कुछ लोगों को नोट मिल जा रहे हैं. कुछ लोगोंको नहीं मिल रहे हैं. सरकार कह रही है कि कुछ दिनों में ये समस्या खत्म हो जायेगी.पर ये तो तय है कि कुछ लोगों को समस्या खत्म होने के बाद भी नोट नहीं मिलेंगे.क्योंकि उनके पास ना तो पुराने नोट थे ना ही एकाउंट में पैसे. तो मिलेगा कहां से.एक सवाल है. अगर सरकार अभी नोट छाप ही रही है तो इसी प्रोसेस में खूब सारा छाप केगरीबों में बांट क्यों नहीं देती? सबके हाथ में चार पैसे आ जाते. बदमाशों का ब्लैकमनी निकल जाता और गरीब लोगों के एकाउंट भर जाते. पर सरकार ऐसा करेगी नहीं. भगवान परसे तो गरीब लोगों का भरोसा उठ ही गया है. क्योंकि पैसे तो वो देते नहीं. उलटा लेलेते हैं. सरकार को क्या दिक्कत है. मशीन है, लोग हैं. छाप रहे हैं तो छाप दें. नोटनहीं दे रहे तो क्या सरकार बेवफा है? कुछ मजबूरियां होती हैं. यूं ही कोई बेवफानहीं होता. इसको समझना पड़ेगा. पैसा क्या है? कुछ नहीं है. कागज का टुकड़ा है. इसकीअपनी कोई कीमत नहीं होती. पर इसकी कीमत इस बात से तय होती है कि इससे कितना सामानखरीदा जा सकता है. अगर सामान नहीं खरीदा जा सकता था तो इसकी कोई जरूरत नहीं थी. तोमूल में है सामान. कितना सामान देश में पैदा होता है, कितना बाहर भेजा जाता है,कितना मंगाया जाता है. इसी के आधार पर पैसे की कीमत तय होती है. अगर देश में कुछपैदा ना हो, कुछ बने ही नहीं तो पैसे की कोई कीमत ही नहीं रहेगी. अब मान लीजिए किएक देश में 5 लोग ही रहते हैं. 5 किलो चावल उगाया जाता है. और कुछ नहीं होता देशमें. यही चावल ही है. अब यहां पर नोट छप के आये हैं. 100 रुपये के 5 नोट. चावल 100रुपये किलो है. एक इंसान के पास 200 रुपये हैं. तीन के पास 100-100 रुपये. एक केपास कुछ नहीं है. तो पहला इंसान दो किलो चावल खरीद सकता है. तीन एक-एक किलो खरीदसकते हैं. एक खरीद ही नहीं सकता. अब अगर नोट छापकर आखिरी व्यक्ति को 300 रुपये देदिये जायें तो क्या होगा? अब मार्केट में 800 रुपये हो जायेंगे. चावल 5 किलो.खरीददार 5. तो अब मार्केट में चावल का दाम बढ़ जायेगा. और ये रुपये के हिसाब से हीनहीं बढ़ेगा. एक स्थिति एज्यूम करिए. नोट छप के आये हैं. सबको नहीं पता है. आखिरीव्यक्ति को 300 रुपये मिले. वो झटपट जा के तीन किलो चावल खरीद लेता है. अब मार्केटमें बस दो किलो ही चावल बचा. खरीददार हैं चार. एक के पास 200 रुपये. तीन के पास100-100 रुपये. कुल 500 रुपये. अब फट से चावल का दाम 250 रुपये किलो तक हो सकता है.ज्यादा भी हो सकता है. एकदम क्राइसिस हो जायेगी. लोग लाइन में लग जायेंगे. परमिलेगा नहीं. ब्लैक मार्केटिंग हो जायेगी. एक किलो बेच के कह देंगे कि खत्म हो गया.फिर 300 रुपये किलो बेचने लगेंगे. रुपये की कीमत गिर जायेगी. जो सामान 100 रुपयेमें मिल रहा था वो 300 रुपये में मिलेगा. तो यही वजह है कि सरकार नोट नहीं छापतीहै. मजबूरी है. वरना कोई भी सरकार नोट छाप के गरीबों में बांट देती. और हमेशा केलिए अमर हो जाती. इसीलिये हमेशा बातें होती हैं मेक इन इंडिया की. कि कैसे ज्यादासे ज्यादा सामान बन सके. उसी हिसाब से पैसे की कीमत बढ़ेगी. और जितने ज्यादा लोगकाम करेंगे, उतना सामान बनेगा. उतना ही पैसा सबके पास पहुंचेगा.--------------------------------------------------------------------------------तीन दिन से घर नहीं गया था बैंक मैनेजर, हार्ट अटैक से मौतदुनिया को एक करना है तो नोट फूंक दो, सिक्के गला दोमैं एक मशीन हूं और 'नोटबंदी' के बाद मेरे अच्छे दिन आ गए हैं