छठ पर अपने ये अनुभव ऋषभ ने लिखे हैं स्वाति के विचारों (छठ में पूजा के नाम पर कईलोग ऐसा पाप करते हैं कि भगवान भी रो देते होंगे!) के जवाब में. वे पहले दी लल्लनटॉप के साथ जुड़े थे. आप भी छठ को लेकर अपने अनुभवसाझा करना चाहें तो हमें lallantopmail@gmail.com पर लिख भेजें. उपयुक्त हुआ तो प्रकाशित करेंगे.छठ के घाट पर मेरी मां, मेरी बुआओं और उनकी सहेलियों के बीच खड़ी साड़ी बदल रहीथीं. क्योंकि जिनपर देवी जी आती थीं, उन्होंने फरमान सुनाया था कि अगर इसने वोसाड़ी पहनी तो इसका बेटा मर जाएगा. हम तीनों भाई खड़े एक दूसरे को देख रहे थे. येभी देख रहे थे कि जो मेरी मां कभी घर से बाहर कदम नहीं रखती थी, उसको पब्लिक प्लेसमें कपड़े बदलवाए जा रहे थे. फिर कुछ देर बाद वहां मौजूद सारी औरतें नहा के कपड़ेबदलने लगीं. बड़े से तालाब के घाट पर गोवा के किसी बीच जैसा नजारा था. छठ की येमेरी पहली याद है.दूसरी याद भी है. सिर पर फलों से भरा बड़ा सा टोकरा रख के घर से घाट तक ले जाना औरबिना खाए वापस ले आना. पूरे रास्ते रुआंसा रहना. क्योंकि वो टोकरा भारी रहता है औरकभी भी उसके गिर जाने का डर रहता है.छठ पूजा के लिए फलों का टोकरा लिए लोग घाट तक जाते हैं.तीसरी भी है. कुछ साल बाद गंगा किनारे छठ करते हुए पता चला कि हमसे थोड़ी दूर केघाट पर जगह घेरने को लेकर झंझट हुई थी और एक मर्डर हो गया था. ये ऐसी याद है, जोकिसी न किसी रूप में हर साल ताजा हो जाती है.और चौथी. हर साल कहीं न कहीं से खबर आती है कि छठ के दौरान नदी में चार डूबे, पांचबचे. ये याद नहीं, दुस्वप्न है. ये दुस्वप्न भी नहीं, सच्चाई है. सपना इसीलिए कहाक्योंकि मैं डूब के नहीं मरा हूं तो मुझे इसकी भयावहता नहीं पता चलती. बस अखबार में‘मृतक के परिवार’ की फोटो नहीं देखी जाती. आमतौर पर ये फोटो उस विशेष वर्ग से आतीहै जिसके लिए सरकारें स्कीम पर स्कीम चलाती हैं.यहीं पर ये बातें दो पहलू अख्तियार कर लेती हैं.पहला पहलू2008 के आस-पास राज ठाकरे ने बिहारियों के खिलाफ आंदोलन चलाकर छठ पर लोगों के लगावको और भी बढ़ा दिया. उन्होंने छठ पर भी कुछ कहा था. लालू प्रसाद यादव नेप्रत्युत्तर में कहा कि मैं मुंबई जाकर छठ करूंगा. अचानक लोगों को लगा कि ये बिहारीअस्मिता पर हमला है. फिर जहां-जहां बिहारी प्रवासी थे, छठ करने लगे. शान से. अचानकये ट्रेंड बन गया क्योंकि अब ये बिहारी पहचान का प्रतीक था. इस बात की पुष्टि टीवीचैनलों के वीडियोज और अखबारों की कतरनों से की जा सकती है. हाल के वर्षों मेंज्यादा वीडियोज और कवरेज मिलेगी. इसके पीछे एक वजह है. उसे मैंने महसूस किया है.महिलाओं को इस व्रत के लिए 36 घंटे भूखा रहना पड़ता है. वैसे ये व्रत कोई भी रखसकता है.मैंने बहुत जगह काम किया है. इज्ज़त काफी मिली है. पर सच यही है कि बिहारी होनाआपको कमतर कर देता है. फिर आपको कुछ प्रूव करना पड़ता है बराबरी में आने के लिए.मेरा गांव यूपी के गाजीपुर जिले में है, जहां मैंने आठवीं तक पढ़ाई की है. दसवींकरने बिहार के बक्सर आ गया. मैं अपनी आइडेंटिटी बक्सर की ही बताता हूं लेकिन जबगाजीपुर जोड़ देता हूं तो लोगों के चेहरे के भाव थोड़े बदलते हैं. जैसे गाजीपुरबहुत बड़ा कल्चरल प्लेस रहा हो. मुख्तार अंसारी गाजीपुर से ही हैं. अंत में लोगजोड़ देते हैं कि बिहारी जैसे नहीं लगते. या कुछ उनको ठीक नहीं लगता तो कह देते हैंकि बिहारी हो न. मैं किसी को यूपाइट होना या एमपाइट होना नहीं कह सकता चाहे वो चोरीही क्यों न कर रहे हों. उन पर कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा. पर बिहारी के साथ बहुत कुछजोड़ा जा सकता है. वो न भी जोड़ें तो हम जोड़ लेंगे चाहे वो बड़ाई ही क्यों न कररहा हो.ऐसे में किसी दूसरे शहर में धूम-धाम से छठ मनाना आपको अपने होने का अहसास देता है.दूसरे शहरों में बिहारी प्रवासी काफी संख्या में कम आमदनी के रोज़गार में लगे हुएहैं. वो किसी मॉल या क्लब या वाटर पार्क में नहीं जा सकते. शहरों में काम करते हुएघूमते हुए उनको लगातार अपनी कमतरी का अहसास होता है. तो नदी किनारे इकट्ठा होना एकताकत और पहचान बनाता है. इसमें बिहारी मिडिल क्लास की बात अलग है. नॉस्टैल्जिया सेप्रेरित ये क्लास कभी-कभी अपने गांव में रहने वाली सास को खुश करने के लिए भी येत्योहार मनाता है. शायद ये उस अपराधबोध को भी कम करता है, जो शहरों में आकर मॉडर्नबनने के बाद औरतों के अंदर पैदा हो जाता है. पूरी तरह से पितृसत्तात्मक अपराधबोध.बिहार से बाहर रहने वाली महिलाएं भी छठ पूजा करती हैं.दूसरा पहलूबिहार में शहर नहीं हैं. पटना तो अशोक के टाइम ही इतना महान हो गया था कि बाकीबिहारियों की पहुंच से बाहर हो गया. बाकी कोई भी जिला विकसित नहीं है. वहां परअशिक्षा बहुत है. रोजगार के अवसर नहीं हैं. मजे करने की जगहें नहीं हैं. औरतेंज्यादातर घर में रहती हैं. लोअर क्लास के पास थोड़ी छूट है पर मिडिल क्लास की औरतोंको तो बिल्कुल ही छूट नहीं है. बच्चों के पास प्यार करने की जगहें नहीं हैं. मिलनेकी जगहें नहीं हैं. हॉस्पिटल नहीं हैं. एक अच्छी लाइफ जीने की संभावना नहीं है.ज्यादातर के पास.तो छठ एकमात्र त्योहार ऐसा है जिसमें गांव या शहर के सारे लोग तैयार होकर शाम औररात तक घर से बाहर नदी या तालाब किनारे पहुंचते हैं. औरतों के लिए तो ये एक सपनेजैसा है. अपने ही गांव में उनकी जिंदगी कट जाती है, उन्होंने तालाब या नदी नहींदेखा होता है. बुढ़ापे में ही जाने को मिलेगा. वहीं पर वो गांव की अन्य औरतों से भीमिलती हैं. उनकी ऐसी भी दोस्ती होती है जो सिर्फ त्योहार के त्योहार चलती है. वहींशहरनुमा कस्बों में छठ लड़कों और लड़कियों को एक दूसरे को पहचानने का मौका देता है.ऐसा लगता है कि पूरा शहर या गांव घाट पर उतर आया हो. देखने में अच्छा लगता है.ज्यादातर जगहों पर लोग विनम्र ही रहते हैं. शायद ही छेड़खानी या किसी अप्रिय हरकतके होने की खबर मिलती है.पूजा के लिए बड़े पैमाने पर बाज़ार सजता है.इस त्योहार के दौरान बहुत सारे छोटे फल विक्रेता भी नफा कमा लेते हैं. आमदनी केज्यादा स्रोत न होने के कारण त्योहार कमाई का एक जरिया बन जाते हैं वहां. बहुत सारेबिजनेसमैन दीवाली, धनतेरस और छठ का इंतजार करते हैं वहां.पर बात इतने पर ही खत्म हो जाती तो और बात थी.इस त्योहार में औरतों को सबसे ज्यादा दिक्कत होती है. क्योंकि ज्यादातर औरतें हीव्रत करती हैं. हालांकि कुछ पुरुष भी व्रत रखते हैं. निर्जला व्रत रखना पड़ता है 36घंटे. ज्यादातर औरतें अपने बेटों के लिए व्रत रखती हैं. हालांकि ये व्रत कोई भीकिसी के लिए रख सकता है. अगर बिहार से किसी ने माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केलिए व्रत नहीं रखा है, मतलब उनको वहां पर अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए कुछकरना पड़ेगा. कई जगहों पर मुस्लिम भी व्रत रखते हैं. क्योंकि इसमें मूर्तिपूजा नहींहोती. अपने मूल नेचर में ये व्रत पितृसत्तात्मक रहा है. रहा इसलिए कि कल्चरल प्रतीकबनने के बाद इसका पितृसत्तात्मक होना पीछे चला गया है और अब ये‘बिहार का त्योहार’होगया है.खासकर ये व्रत महिलाएं अपने बेटों के लिए रखती हैं.इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत है अस्ताचलगामी सूरज को अर्घ्य देना. हर जगह उगतेसूरज की पूजा होती है, यहां डूबते सूरज की भी होती है. हालांकि बिहार की हालत देखके लगता है कि उगते सूरज की ही पूजा करना श्रेयस्कर है. कल्चरल रूप से ये पूजा यहांमहत्वपूर्ण हो जाती है.सबकुछ इतना ही खास नहीं है. खास ये भी है कि जातिगत भेदभाव घाटों पर भी रहता है.तमाम दावों के बावजूद सच यही है कि जातिगत श्रेष्ठता घाटों की पोजीशन को लेकर दिखतीहै. जो अच्छे घाट होते हैं, वो ताकतवर सवर्णों के पास जाते हैं. जो दूर के होतेहैं, वो तथाकथित पिछड़ी जातियों के पास. जो बहुप्रचारित ठेकुआ है, वो दो तरह काबनता है. एक खुद खाने के लिए. दूसरा बांटने के लिए. बांटने मतलब तथाकथित पिछड़ीजातियों के लिए जिनके घर छठ करने का जुगाड़ नहीं होता. छठ करने वाली औरतों के भरमुंह सिंदूर पोतने को लेकर मैं कुछ नहीं कह सकता. क्योंकि कोई बाध्यता नहीं है. येठीक वैसा ही है जैसा दुर्गापूजा में बंगाल की औरतें भर मुंह सिंदूर पोत के करतीहैं.कुछ औरतें नाक से माथे तक लंबा सिंदूर लगाती हैं.इस त्योहार की सबसे रोचक चीज होती है तस्वीरें. तकरीबन हर तस्वीर में आप किसी मर्दको अपने छोटे बच्चे को गोद में लिए खड़ा पाएंगे या फिर वो अपने घर की महिलाओं कोअर्घ्य दिलाते हुए दिख जाएंगे.कुल मिलाकर एक लाइन में कहें तो बिहारी पहचान बनाने में ये त्योहार स्त्रियों कोउनके योगदान का अहसास दिलाता है. उपाय तो यही है कि 'चक दे इंडिया' के शाहरुख कीतरह सबको बुलाकर बारी बारी से डांटें कि इंडिया है तुम्हारा देश, बिहार नहीं. येबिल्कुल वैसा ही है जैसे इस्लाम की पहचान की लड़ाई को लेकर औरतें बुर्के के बचावमें उतर आती हैं.मेरे हिसाब से ज्यादातर हिंदुस्तानी त्योहार औरतों के दमन के लिए ही बने हैं. तो इसपर बहस करना बेकार है. सबसे अच्छी बात ये है कि मेरे घर में छठ मनना बंद हो गया है.क्योंकि कोई भाई छठ पर घर जाता ही नहीं. छठ में जाने वाली ट्रेनों की हालत देख लेंतो ट्रेन में चढ़ना छोड़ देंगे. गांव-घर और बाहरी दुनिया को जोड़े रखने का येप्रयास है उन लोगों का, जिनको शहर में कोई नाम नहीं मिलता.वाराणसी समेत यूपी के भी कई शहरों में छठ पूजा की जाती है.पर तमाम बातों के बावजूद हम उनको गलत नहीं ठहरा सकते जो गंदे नाले या नदी में खड़ेहोकर व्रत करते हैं. ये उनकी मजबूरी है. जिनको हर चीज के इलाज के लिए ट्रेन पकड़करदिल्ली आना पड़े, वो कर ही क्या सकता है. मुझे ये त्योहार पसंद नहीं, पर उन लोगोंकी भावना समझता हूं. उनकी मजबूरी भी. आखिर हम भी तो अपनी मजबूरी में दिल्ली की गंदीहवा रोज अंदर खींच ही रहे हैं. प्रशासन की जिम्मेदारी है ये.(नोट: मूल लेख में बदलाव किए गए हैं.)--------------------------------------------------------------------------------Also Read:'सीता बनने वाली मॉडल का घटिया सच' बताने वालों का सच महा घटिया हैभगवान बुद्ध की मूर्ति तोड़ते मुस्लिमों की इस तस्वीर की हकीकत क्या है?ठुमरी में जान फूंकने वाली गिरिजा देवी को सब अप्पा क्यों बोलते थे?Video देखें: