'लक्स सुपरहिट फिल्म' के बहाने दूरदर्शन ने हमारा सब्र आजमाया
आज डीडी का हैप्पी बड्डे है. तुमको ये सारी चीजें याद हैं कि नहीं?
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फोजी सीरियल में शाहरुख खान
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संडे की दुपहरिया रही. 12 बजने में आध घंटा रह गया था. दिमाग चेतक की तरह दौड़ रहा था. एक 12 वोल्ट की बैट्री चाहिए थी. घर में टीवी था. लेकिन घर यूपी के ऐसे गांव में था, जहां बिजली दिन और रात पाली के हिसाब से आती थी. माने एक हफ्ते दिन और एक हफ्ते रात. संडे के दिन में कभी नहीं रहती थी. लेकिन दूरदर्शन पर दोपहर ठीक 12 बजे शक शक शक शक शक्तिमान आता था. वही ब्लैक एंड व्हाइट टीवी और दूरदर्शन संजीवनी था हमारे लिए. सन 99 का साल था ये. शक्तिमान देखने के लिए ही पापा से जिद करके टीवी मंगाए थे. सेकेंड हैंड, दो हजार की.

पहले एपिसोड में ऐसे आया था शक्तिमान
टीवी आने के बाद भी क्या होता. कबूतर के मूत से तो चलना नहीं था. कबूतर हमारे घर में बहुत थे. वो अंटीना तीलियों वाला अब उनके बैठने के काम ही आता था. तो ये बैट्री खोज अभियान हर संडे का था. लेकिन महीनों ऐसा चलता रहा. बैट्री कभी मिल जाती, कभी नहीं मिलती. जब नहीं मिलती तो सीन बड़ा हृदय विदारक होता. तकिये में मुंह दिए घंटों रोते रहते. लेकिन हमने कभी जुगाड़ में कोई कमी नहीं उठा रखी. ठाकुर उदयराज सिंह के घर फटा पुराना ट्रैक्टर था. लेकिन बैट्री उसमें नई थी. हम दो दिन पहले से तेल पानी लेकर जुट जाते थे ठाकुर को पिघलाने में. कई बार उसने हेल्प की भी. लेकिन कभी कभी ऐन वक्त पर उसका ट्रैक्टर खेत जोतने या मिट्टी ढुलाई के लिए जाता तो रोना पड़ता था.

पारले जी...द टेस्टी हेल्दी फूड प्रजेंट्स
संजोग कभी कभी बन जाता था. मंगलवार की रात 9 बजे भी आता था शक्तिमान. और लाइट आ जाती. छोटी मोटी दीवाली होती थी उस रात. हम तीन भाई थे. तीन मोर्चे पर लगते थे. एक छत पर अंटीना घुमाने जाता. एक नीचे खड़ा होकर अंदर बरामदे में सिग्नल पास करता. आ गया, चला गया कहना उसका काम था. सबसे बड़े वाले वो घुमाने वाला चैनल जिस स्पीड से कान पकड़कर ऐंटते थे कि कभी कभी हाथ में आ जाता था. वो थोड़ा ढीला हो गया था. तो जिस जगह सिग्नल पकड़ता था वहां वो रुकता ही न था. तो उसके नीचे ईंट रखकर रोका जाता था. इसको ऐसे समझ सकते हो जैसे किसी किताब के पन्ने हवा से न पलटें इसके लिए उस पर सीमेंट की बोरी रख दी जाए.
तो ये था दूरदर्शन का जलवा. सिर्फ शक्तिमान ही नहीं था इसमें. उससे भी पहले से रामानंद सागर का श्री कृष्ण आता था. सर्वदमन जब कृष्ण एकदम बारीक मुस्की छांटते थे, उस मुस्की को देखने साइकिल से चार किलोमीटर दूर दौड़ जाते थे. क्योंकि तब घर में टीवी नहीं आया था. टीवी तब आया जब कृष्ण ने कॉन्सपिरेसी करके समूचे कौरव वंश को मुआ दिया. माने फाइनल स्टेज पर था अपने.

कृष्ण के रोल में सर्वदमन बनर्जी

मुजरिम कितना भी होशियार हो, वो कोई सुराग जरूर छोड़ जाता है
रंगोली देखने का टाइम नहीं होता था सुबह. वो वक्त गुल्ली डंडे और कंचे खेलने में निकल जाता था. अर्ली मॉर्निंग का शो था न. और हेमा मालिनी के महात्म्य का इतना असर बालमन पर पड़ना जरूरी भी नहीं था. वो तो पापा चाचा लोगों के दिमाग का फितूर थीं. एक चीज वो थी जिसे अपन लोग को देखने की मनाही थी काफी वक्त तक. फ्राइडे नाइट साढ़े नौ बजे आने वाली 'लक्स सुपरहिट फिल्म.' तो रजाई के अंदर से एक आंख बाहर निकाल कर देखते थे. पड़ोस के चचा लोग भी खटिया पर उकड़ू बैठे देखते थे. जैसे ही अन्ताब बच्चन लात चलाना शुरू करता, चचा लोग अइस्सबास का जयघोष करने लगते.
क्रिकेट वालों को सचिन की लत दूरदर्शन ने लगाई. लेकिन अपना पाला पिकनिक अंताक्षरी वाले सचिन से पड़ा था. दोपहर में 11 बजे के आसपास आता था. लेकिन पइसा वसूल था भैया. मउज आ जाती थी.
डीडी मेट्रो दूरदर्शन से ज्यादा मनोरंजक था
लेकिन कान इधर लाओ एक बात बताएं. जितना मसाला और वैरायटी दूरदर्शन के अकेले चैनल ने दे दी थी. उतना तमाम न्यूज, डेली शो, फिल्मी वगैरह मिलकर भी नहीं दे सकते. ये बात एक कागज में लिखो. उसको गधे की पूंछ के बाल से बांधकर ताबीज में पैक करो और गले में डाल लो. याद करना कि किसी ने बताया था. अब जय दूरदर्शन.
दूरदर्शन पर एक चंद्रकांता भी आती थी. ये वीडियो देख लो याद आ जाएगा.
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पहले एपिसोड में ऐसे आया था शक्तिमान
टीवी आने के बाद भी क्या होता. कबूतर के मूत से तो चलना नहीं था. कबूतर हमारे घर में बहुत थे. वो अंटीना तीलियों वाला अब उनके बैठने के काम ही आता था. तो ये बैट्री खोज अभियान हर संडे का था. लेकिन महीनों ऐसा चलता रहा. बैट्री कभी मिल जाती, कभी नहीं मिलती. जब नहीं मिलती तो सीन बड़ा हृदय विदारक होता. तकिये में मुंह दिए घंटों रोते रहते. लेकिन हमने कभी जुगाड़ में कोई कमी नहीं उठा रखी. ठाकुर उदयराज सिंह के घर फटा पुराना ट्रैक्टर था. लेकिन बैट्री उसमें नई थी. हम दो दिन पहले से तेल पानी लेकर जुट जाते थे ठाकुर को पिघलाने में. कई बार उसने हेल्प की भी. लेकिन कभी कभी ऐन वक्त पर उसका ट्रैक्टर खेत जोतने या मिट्टी ढुलाई के लिए जाता तो रोना पड़ता था.

पारले जी...द टेस्टी हेल्दी फूड प्रजेंट्स
संजोग कभी कभी बन जाता था. मंगलवार की रात 9 बजे भी आता था शक्तिमान. और लाइट आ जाती. छोटी मोटी दीवाली होती थी उस रात. हम तीन भाई थे. तीन मोर्चे पर लगते थे. एक छत पर अंटीना घुमाने जाता. एक नीचे खड़ा होकर अंदर बरामदे में सिग्नल पास करता. आ गया, चला गया कहना उसका काम था. सबसे बड़े वाले वो घुमाने वाला चैनल जिस स्पीड से कान पकड़कर ऐंटते थे कि कभी कभी हाथ में आ जाता था. वो थोड़ा ढीला हो गया था. तो जिस जगह सिग्नल पकड़ता था वहां वो रुकता ही न था. तो उसके नीचे ईंट रखकर रोका जाता था. इसको ऐसे समझ सकते हो जैसे किसी किताब के पन्ने हवा से न पलटें इसके लिए उस पर सीमेंट की बोरी रख दी जाए.
तो ये था दूरदर्शन का जलवा. सिर्फ शक्तिमान ही नहीं था इसमें. उससे भी पहले से रामानंद सागर का श्री कृष्ण आता था. सर्वदमन जब कृष्ण एकदम बारीक मुस्की छांटते थे, उस मुस्की को देखने साइकिल से चार किलोमीटर दूर दौड़ जाते थे. क्योंकि तब घर में टीवी नहीं आया था. टीवी तब आया जब कृष्ण ने कॉन्सपिरेसी करके समूचे कौरव वंश को मुआ दिया. माने फाइनल स्टेज पर था अपने.

कृष्ण के रोल में सर्वदमन बनर्जी
रात में 10 बजे जागने की कोई सूरत नहीं होती गांव में. न बिजली होती थी. न मोबाइल लैपटॉप होते थे. जिनके भरोसे आंखों में दिया बारे रात 12-1 बजे तक फेसबुक- इंस्टा तकते रहें. लालटेन में तेल पड़ता था घर के कामों के लिए. या पढ़ाई के लिए. उसको जलाकर रात आने का इंतजार एक ही सूरत में हो सकता था. कि रात सोमवार की हो. और 10 बजे से सुराग- द क्लू चालू हो जाए. सुदेश बेरी जब उसमें इंस्पेक्टर भारत बनके आता था अपनी जिप्सी से इनवेस्टिगेशन करने. और श्रीवास्तव को सुबूत दिखाने बुलाता था. डरावने माहौल में भी अकेला पिल जाता था. कोट के अंदर सीने में चिपकी पिस्टल किस बिजली की तेजी से निकलती थी. और अपने मुंह पर अंगूठा प्लस मध्यमा उंगली फेरते हुए वो कहता था- मुजरिम कितना भी होशियार हो, कोई न कोई सुराग जरूर छोड़ जाता है. तो भैया उस भौकाल के सामने CIA का हेड कीचड़ भरने लगे. 007 धारी जेम्स बॉन्ड मुंह पर कालिख लगा निकल जाएं. अंत में 'यू आर अंडर अरेस्ट' देखने तक सांस रुकी रहती थी भाईसाब.

मुजरिम कितना भी होशियार हो, वो कोई सुराग जरूर छोड़ जाता है
रंगोली देखने का टाइम नहीं होता था सुबह. वो वक्त गुल्ली डंडे और कंचे खेलने में निकल जाता था. अर्ली मॉर्निंग का शो था न. और हेमा मालिनी के महात्म्य का इतना असर बालमन पर पड़ना जरूरी भी नहीं था. वो तो पापा चाचा लोगों के दिमाग का फितूर थीं. एक चीज वो थी जिसे अपन लोग को देखने की मनाही थी काफी वक्त तक. फ्राइडे नाइट साढ़े नौ बजे आने वाली 'लक्स सुपरहिट फिल्म.' तो रजाई के अंदर से एक आंख बाहर निकाल कर देखते थे. पड़ोस के चचा लोग भी खटिया पर उकड़ू बैठे देखते थे. जैसे ही अन्ताब बच्चन लात चलाना शुरू करता, चचा लोग अइस्सबास का जयघोष करने लगते.
क्रिकेट वालों को सचिन की लत दूरदर्शन ने लगाई. लेकिन अपना पाला पिकनिक अंताक्षरी वाले सचिन से पड़ा था. दोपहर में 11 बजे के आसपास आता था. लेकिन पइसा वसूल था भैया. मउज आ जाती थी.
नॉस्टैलजिक करने के चक्कर में अपन दूरदर्शन के डाउन फाल के बारे में भी हल्का सा जानकार हो लेते हैं. जब डीडी मेट्रो आया. तो इसका चस्का चरम पर पहुंच गया था. अपन गांव की बात बता रहे हैं. शहर वाले इससे डिस्कनेक्ट हो सकते हैं. काहे कि यहां केबिल वेबिल में तमाम चैनल आते थे तब भी. हम सिर्फ शक्तिमान और कृष्णा वाले लोग थे. तो इधर मेट्रो पर नाइन गोल्ड वगैरह की पहुंच हुई. उधर शक्तिमान झाड़ियों में अपना जनम खोजने लगे. अपन बोर होने लगे. हाईस्कूल की क्लास भी सिर पर वज्रप्रहार करने को तैयार. फिर जो टीवी का चस्का कम पड़ा. फिर कभी नहीं खाज हुई वैसी. अब मेरे पास 5-6 साल से टीवी नहीं है. और कस्सम से बड़ा सुकून है. ये मोबाइल और लैपटॉप हमारा टाइम बचाने आए थे. यही सब वक्त खाए लेते हैं. टीवी भी होता तो अल्ला जाने क्या होता.

डीडी मेट्रो दूरदर्शन से ज्यादा मनोरंजक था
लेकिन कान इधर लाओ एक बात बताएं. जितना मसाला और वैरायटी दूरदर्शन के अकेले चैनल ने दे दी थी. उतना तमाम न्यूज, डेली शो, फिल्मी वगैरह मिलकर भी नहीं दे सकते. ये बात एक कागज में लिखो. उसको गधे की पूंछ के बाल से बांधकर ताबीज में पैक करो और गले में डाल लो. याद करना कि किसी ने बताया था. अब जय दूरदर्शन.
दूरदर्शन पर एक चंद्रकांता भी आती थी. ये वीडियो देख लो याद आ जाएगा.
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