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डॉनल्ड ट्रंप ने युद्ध रुकवाए, कई संधि करवाईं, फिर भी उन्हें नोबेल प्राइज मिलना मुश्किल क्यों है?

Nobel Peace Prize: नोबेल शांति पुरस्कारों के लिए डॉनल्ड ट्रंप खुलकर दावेदारी कर रहे हैं. लेकिन उनके लिए ये राह आसान नहीं है. इसकी क्या वजह है? इतिहास में ऐसे चर्चित लोग भी हैं, जो ट्रंप से कहीं बड़ी शख्सियत रहे, लेकिन फिर भी नोबेल पुरस्कार से वंचित रह गए. कुछ ऐसे भी नाम हैं जिन्होंने ये सम्मान ठुकरा दिया.

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donald trump nobel peace prize
डॉनल्ड ट्रंप कई बार नोबेल पुरस्कार पाने की इच्छा जता चुके हैं (india today)
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राघवेंद्र शुक्ला
9 अक्तूबर 2025 (अपडेटेड: 10 अक्तूबर 2025, 02:25 PM IST)
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अमेरिका के राष्ट्रपति हैं- डॉनल्ड ट्रंप. आजकल जोर-शोर से नोबेल पुरस्कार मांग रहे हैं. 10 अक्टूबर 2025 वो तारीख है, जब इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार के विजेताओं के नाम की घोषणा हो जाएगी. जिसका सबको इंतजार है. ट्रंप का कहना है कि अगर उनके नाम का ऐलान नहीं हुआ तो ‘ये अमेरिका का अपमान होगा’. अपने रेज्यूमे में वो दुनिया भर में 7 जंगें रुकवाने का दावा लेकर घूम ही रहे हैं. उनके ‘दोस्त’ इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ-साथ भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने भी प्रस्ताव दिया है कि ट्रंप साहब को मिल ही जाए नोबेल प्राइज.

‘ये इश्क नहीं आसां…’

लेकिन सवाल है कि डॉनल्ड ट्रंप ने शांति के क्षेत्र में कितने काम किए हैं? उनके दावे तो 7-8 युद्ध रुकवाने के हैं, जिसमें वो भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया सैन्य संघर्ष को भी गिनते हैं. लेकिन उनमें कितने दावे सच हैं? ट्रंप के कुछ काम तो ऐसे हैं, जो कुछ देशों के बीच सालों से चले आ रहे संघर्ष पर विराम लगाने से जुड़े हैं. जैसे.. 

उन्होंने इसी साल कांगो और रवांडा के बीच दोस्ती कराई थी. 27 जून 2025 को उनकी मौजूदगी में दोनों देशों ने एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया कि पूर्वी कांगों में दशकों से चल रही घातक लड़ाई अब समाप्त होगी. 

ट्रंप के ओवल ऑफिस में आर्मेनिया और अजरबैजान के नेताओं ने भी एक ऐसी संधि पर हस्ताक्षर किए जिसने उनके बीच 40 साल के संघर्ष को समाप्त करने का रास्ता साफ कर दिया. एक्सपर्ट कहते हैं कि इस संघर्ष को खत्म कराने के लिए ट्रंप को श्रेय मिलना चाहिए. दरअसल, अगस्त 2025 में ट्रंप की मौजूदगी में अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिनयान ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद हाथ मिलाया और जैसे ही इन दोनों नेताओं ने हाथ मिलाया, ट्रंप ने दोनों के हाथ मजबूती से पकड़ लिए. इसके बाद दोनों देशों के नेताओं ने ट्रंप के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की सिफारिश भी कर दी.

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हाथ मिला रहे अजरबैजानी राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव (दायें) और अर्मेनियाई प्रधान मंत्री निकोल पशिन्यान (दायें), बीच में ट्रंप (X) 

इसके अलावा 5 साल पहले के ट्रंप के अब्राहम समझौते को कौन भूल सकता है? सितंबर 2020 में उनकी मध्यस्थता में संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और इजरायल के बीच अब्राहम एकॉर्ड (Abraham Accord) हुआ था, जिसमें  अरब के खाड़ी देशों और इजरायल के बीच संबंधों को सामान्य बनाने का वादा किया गया था.

ट्रंप का तो दावा है कि 7 अगस्त 2025 को थाईलैंड और कंबोडिया के बीच हुए युद्धविराम में भी उनकी ही मुख्य भूमिका थी. इसके अलावा, ईरान और इजरायल के बीच जंग भी उन्होंने ही रुकवाई थी. 

ऐसे अपने शांति अभियान में ट्रंप रूस और यूक्रेन, गाजा और इजरायल में भी समझौता कराने की कोशिश में लगे हैं. अगर वो इस काम में सफल हो जाएं तो शायद उनकी दावेदारी को थोड़ा दम मिले लेकिन फिलहाल, इतने सारे समझौतों और युद्ध रोकने के कामों के बाद भी उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिलना मुश्किल ही लगता है.

फ्रांस-24 के एक लेख में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ और स्वीडिश प्रोफेसर पीटर वॉलेनस्टीन का विचार छपा है. ट्रंप को नोबेल मिलने के सवाल पर वह साफ-साफ कहते हैं, 

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लेकिन डॉनल्ड ट्रंप उम्मीद तो कर ही रहे हैं. बड़े-बड़े मंचों से अपनी ये इच्छा वह जाहिर भी कर चुके हैं. भारत-पाकिस्तान समेत दुनिया भर में 7 जंगें रुकवाने के दावे के साथ वह ये मानकर ही चल रहे हैं कि नोबेल का शांति पुरस्कार उन्हें अब मिला कि तब मिला. यही वजह होगी कि अब दुनिया के सबसे ज्यादा चर्चित और जटिल इजरायल-गाजा के संघर्ष को रोकने के लिए वह ‘पीस प्लान’ लेकर आए हैं. उनका ये प्लान सफल रहा तो अरब इलाके का नासूर बन चुका ये युद्ध शायद रुक जाए. 

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डॉनल्ड ट्रंप खुले मंचों से नोबेल की इच्छा जता चुके हैं (India today) 

इसी संभावना पर डॉनल्ड ट्रंप के शांति का नोबेल पाने की आशा टिकी है. पीटर भी आगे कहते हैं, 

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लेकिन क्या नोबेल पुरस्कार समिति युद्ध रुकवाने को ही शांति का सबसे बड़ा प्रतीक मानती है? 

यह सवाल ट्रंप के दावे से बार-बार टकराएगा. जैसा कि एक्सपर्ट्स भी कहते हैं कि नॉर्वेजियन नोबेल समिति आमतौर पर स्थायी शांति के नायक और वैश्विक बंधुता को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं पर फोकस रखती है. ऐसी संस्थाएं जो अपने शांत कार्यों से न सिर्फ लोगों का ध्यान खींचती हैं बल्कि समाज में बड़े बदलावों की आधारशिला होती हैं. 

अमेरिका के एक न्यूज चैनल पीबीएस न्यूज को हेनरी जैक्सन सोसाइटी के इतिहासकार और रिसर्च फेलो थियो जेनोउ बताते हैं कि नोबेल प्राइज देने वाली समिति त्वरित कूटनीतिक जीत के बजाय लगातार और बहुपक्षीय कोशिशों को प्राथमिकता देती है. किसी भी लड़ाई को थोड़े समय के लिए रोकने और संघर्ष के मूल कारणों को हल करने के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है. 

इस नजरिए से देखें तो ट्रंप की कोशिश अभी तक बहुत स्थायी साबित नहीं हुई है. 

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नोबेल शांति पुरस्कार का एलान 10 अक्टूबर को होगा
ट्रंप के खिलाफ जा सकती हैं ये हरकतें

शांति पुरस्कार देने वाली 5 सदस्यों वाली समिति के अध्यक्ष जोर्गेन वाटने फ्राइडनेस ने फ्रांस-24 को बताया कि विजेता के चयन में ‘सम्पूर्ण संगठन’ या उस व्यक्ति का ‘सम्पूर्ण व्यक्तित्व’ मायने रखता है. जोर्गेन कहते हैं, 

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इस तरह से देखें तो डॉनल्ड ट्रंप के लिए नोबेल के रास्ते पर कई गड्ढे हैं. दुनिया के तमाम देशों को दी गईं उनकी कई धमकियां आड़े आ रही हैं. विश्व के हित की कई संस्थाओं के प्रति उनके 'तिरस्कार भाव' का भूत भी उनका पीछा शायद ही छोड़े. एक्सपर्ट्स का कहना है कि जलवायु परिवर्तन संबंधी चिंताओं के प्रति डॉनल्ड ट्रंप की उपेक्षा का अपना रिकॉर्ड भी उनके खिलाफ जा सकता है.

ओस्लो के शांति अनुसंधान संस्थान की प्रमुख नीना ग्रेगर मीडिया से बात करते हुए बताती हैं कि नोबेल शांति पुरस्कार के आदर्शों के विपरीत ट्रंप के कामों की लिस्ट काफी लंबी है. वह कहती हैं,

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बेंजामिन नेतन्याहू (दायें) ने डॉनल्ड ट्रंप (बायें) का नाम प्रस्तावित किया है (India today)

जेनोउ भी इस बात से सहमत हैं. उनके मुताबिक, नोबेल समिति दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं देगी, जो जलवायु परिवर्तन के संकट पर भरोसा नहीं करता. वह कहते हैं, 

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ग्रेगर कहती हैं कि नोबेल पीस प्राइज जीतने को लेकर ट्रंप का बड़बोलापन भी उनके खिलाफ जा सकता है. प्राइज देने वाली समिति नहीं चाहेगी कि उसे राजनीतिक दबाव के आगे झुकते हुए देखा जाए. उनका साफतौर पर मानना है कि इस साल ट्रंप के पुरस्कार जीतने की संभावनाएं बहुत कम हैं. क्योंकि उनकी बयानबाजी शांतिपूर्ण दृष्टिकोण की ओर इशारा नहीं करती.

डॉनल्ड ट्रंप का नामांकन न्यूयॉर्क की कांग्रेस सदस्य क्लाउडिया टेनी की बदौलत हुआ है. इसके अलावा, यूक्रेन के ओलेक्सांद्र मेरेज्को ने भी उन्हें नॉमिनेट किया था. हालांकि, बाद में यह कहते हुए उन्होंने प्रस्ताव वापस ले लिया कि ट्रंप ने यूक्रेन पर रूस के हमलों को नजरअंदाज किया और ऐसा करके उन्होंने भरोसा खो दिया है.

शांति के नोबेल के लिए इनके नाम चर्चा में

खैर, ये तो हो गई ट्रंप की बात. अब कुछ उन लोगों के बारे में जानते हैं, जिनके लिए इस साल नोबेल के शांति पुरस्कार मांगे गए हैं और उन लोगों के बारे में भी जो इस पुरस्कार के प्रबल दावेदार हैं. नोबेल समिति के मुताबिक, इस साल 338 लोगों के प्रस्ताव शांति पुरस्कार के लिए आए हैं. हालांकि, इस बार प्राइज जीतने वालों में कोई एक सर्वमान्य नाम सामने नहीं आ रहा है. लेकिन कुछ संगठन और लोग हैं, जिनके नामों पर खूब चर्चा हो रही है. 

सूडान इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स

इनमें सूडान के एड वालंटियर्स पहले नंबर हैं. सूडान इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स (SERR) वालंटियर्स का एक नेटवर्क है जो युद्ध और अकाल से पीड़ित लोगों को भोजन और मदद देने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं. 

यूलिया नवलनया

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आलोचक रहे एलेक्सी नवलनी की विधवा यूलिया नवलनया का नाम भी सामने आ रहा है. वह मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और रूस में विपक्ष का प्रमुख चेहरा हैं. तमाम बेटिंग ऐप्स पर उनके नाम पर सबसे ज्यादा दांव लगाए गए हैं. उनकी प्राइज जीतने की संभावना ट्रंप से भी ज्यादा है.  

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यूलिया नवलनया का नाम भी लिस्ट में है (India Today)
एलन मस्क

NDTV के मुताबिक, अरबपति एलन मस्क को भी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की वकालत के लिए नोबेल शांति पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया है. स्लोवेनिया से यूरोपीय संसद सदस्य ब्रैंको ग्रिम्स ने कहा कि मस्क के नामांकन के लिए एक याचिका नोबेल समिति को सौंपी गई है क्योंकि उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांति के मौलिक मानवाधिकार की वकालत की है.

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स

'कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स' का नाम भी इस लिस्ट में है. यह न्यूयॉर्क में एक एनजीओ है, जो दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है. यह संगठन पत्रकारों के सुरक्षित और बिना किसी डर के रिपोर्टिंग करने के अधिकार की रक्षा करने का दावा करता है. 

अनवर इब्राहिम

मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम भी नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित हैं. उन्हें प्रोफेसर डॉ. दातुक उस्मान बकर और प्रोफेसर डॉ. फार किम बेंग ने 'बिना ताकत दिखाए कूटनीतिक संवाद, क्षेत्रीय सद्भाव और शांति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए नामित किया है. थाईलैंड और कंबोडिया के बीच युद्ध रोकने में भी उनकी भूमिका को रेखांकित किया गया है.

ग्रेटा थनबर्ग

साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र संघ में विश्व नेताओं को तकरीबन फटकारते हुए ग्रेटा थनबर्ग का एक तीखा भाषण सामने आया था. पर्यावरण के खतरों को लेकर उदासीनता दिखाने वाले नेताओं से वह कहती हैं,

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ग्रेटा थनबर्ग पहली बार 2019 में यूएन में भाषण देकर चर्चा में आई थीं (Photo: India Today)

इस भाषण के बाद से ग्रेटा पर्यावरण कार्यकर्ता के तौर पर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गईं. अक्टूबर 2025 में वह गाजा के लिए राहत सामग्री ले जा रही विदेशी नावों में दिखी थीं, जिसे इजरायली सेना ने रोक दिया था. साल 2019 से लेकर 2024 तक वह लगातार शांति के नोबेल पुरस्कारों के लिए नामित होती रहीं लेकिन अभी तक उन्हें ये पुरस्कार नहीं मिला है. उनके समर्थक इस बार भी उनके प्राइज जीतने की उम्मीद कर रहे हैं.  

इमरान खान

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान भी इस लिस्ट में शामिल हैं. फिलहाल, वो जेल में हैं. पाकिस्तान वर्ल्ड अलायंस (पीडब्ल्यूए) और नॉर्वे की राजनीतिक पार्टी पार्टी सेंट्रम के सदस्यों ने उनके नाम का प्रस्ताव समिति को भेजा है. इससे पहले साल 2019 में भी इमरान खान को दक्षिण एशिया में शांति को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था.

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इमरान खान का भी नॉमिनेशन शांति पुरस्कार के लिए भेजा गया है (india today)
किसको मिलता है शांति का नोबेल? 

नोबेल पीस प्राइज के नाम से ही जाहिर है कि शांति के लिए ये पुरस्कार मिलता है लेकिन सवाल है किस तरह की शांति. नोबेल पुरस्कार समिति बताती है कि 

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साल 1901 से लेकर अब तक शांति का नोबेल पुरस्कार 105 बार दिया जा चुका है, जिसमें कुल 139 विजेताओं को इस सम्मान से नवाजा गया है. इनमें 92 पुरुष, 19 महिलाएं और 28 संगठन शामिल हैं. 

शुरुआत में ये पुरस्कार अक्सर संगठित शांति आंदोलन के नायकों को दिए जाते थे. बाद में यह ज्यादातर राजनेताओं पर केंद्रित हो गया, जो कूटनीति और समझौतों के जरिए अंतरराष्ट्रीय शांति, स्थिरता और न्याय को बढ़ावा देना चाहते थे. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से शांति पुरस्कार मुख्य तौर पर 4 मुख्य क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान पर दिया जाने लगा. शस्त्र नियंत्रण और निरस्त्रीकरण, शांति वार्ता, लोकतंत्र और मानवाधिकार और एक बेहतर संगठित और अधिक शांतिपूर्ण संसार के निर्माण के मकसद से किया गया काम.

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शांति का नोबेल पुरस्कार अब तक 105 बार दिया जा चुका है
इन्हें मिलना चाहिए था पर..

नोबेल पुरस्कार के इतिहास में कई महान विभूतियों की कमी भी खलती है. जिन्हें ये प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलना चाहिए था लेकिन किसी कारण से नहीं मिल पाया.  इस लिस्ट में सबसे पहला नाम है- 

महात्मा गांधी

महात्मा गांधी को पूरी दुनिया में सत्य और अहिंसा के पैरोकार के रूप में जाना जाता है. भारत की आजादी की लड़ाई में उनकी अहिंसा की रणनीतियां ‘शांति की मदद से क्रांति’ का सबसे बड़ा उदाहरण हैं लेकिन उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिला ये बात लोगों को हैरान करती है. महात्मा गांधी को 1937 और 1948 के बीच 5 बार शांति के नोबेल के लिए नामांकित किया गया था. कुछ लोगों का मानना ​​है कि साल 1948 में उन्हें ये सम्मान मिलना तय था लेकिन दुर्भाग्य से पुरस्कारों की घोषणा से पहले ही उनकी हत्या कर दी गई. उस साल ये पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया. नोबेल समिति ने अपने कमेंट में लिखा, 

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महात्मा गांधी को 5 बार नामित किया गया लेकिन प्राइज नहीं मिला (india today)

हालांकि, नोबेल समिति के बाद के सदस्यों ने इस चूक पर सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त किया. साल 1989 में जब दलाई लामा को शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो समिति के अध्यक्ष ने कहा कि ‘ये कुछ हद तक महात्मा गांधी की स्मृति को श्रद्धांजलि है’. 

लियो टॉलस्टॉय

जब भी दुनिया के महानतम साहित्यकारों की बात होगी, लियो टॉलस्टॉय का नाम उनमें जरूर होगा. वॉर एंड पीस और अन्ना केरेनिना के लेखक टॉलस्टॉय से महात्मा गांधी भी प्रभावित थे. साल 1910 में निधन से पहले 1901 से 1909 के बीच लियो टॉल्स्टॉय (Lev Tolstoy) को कुल 19 बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था. इनमें से 16 बार साहित्य के लिए और 3 बार शांति पुरस्कार के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया था. साल 1902 में तो उन्हें दोनों शांति और साहित्य के पुरस्कारों के लिए नामित किया गया था लेकिन वह कभी नोबेल प्राइज विनर नहीं रहे. नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, शांति पुरस्कार की हर नॉमिनेशन रिपोर्ट में लिखा है- 

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पोप फ्रांसिस

भारत के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला युसुफजई को जिस साल नोबेल के शांति पुरस्कारों का विजेता घोषित किया गया था, उसी साल पोप फ्रांसिस का नाम भी दावेदारों की कतार में था. अपनी सादगी के लिए विख्यात पोप फ्रांसिस ने एक साल पहले ही रोमन कैथोलिक चर्च की सबसे बड़ी गद्दी संभाली थी. कहते हैं कि फ्रांसिस खुद भी नहीं चाहते थे कि उन्हें नोबेल का शांति पुरस्कार दिया जाए. टाइम की रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी वजह है कि पोप फ्रांसिस अपनी प्रशंसा से कतराते थे.  

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पोप फ्रांसिस नोबेल प्राइज नहीं लेना चाहते थे (india today)
स्टीफन हॉकिंग

विज्ञान की दुनिया में स्टीफन हॉकिंग का नाम किसी देवदूत की तरह लिया जाता है. सिर्फ उनके असीम ज्ञान की वजह से नहीं बल्कि उनकी जिजीविषा की वजह से भी. अपने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजे गए स्टीफन हॉकिंग को भी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था. इसकी वजह बताई गई कि ब्लैक होल्स को लेकर उनकी जिस थ्योरी को यह पुरस्कार मिलना था, उस थ्योरी को साबित कर पाने का कोई तरीका अभी तक नहीं मिला है. नोबेल कमेटी हमेशा सबूत पर काम करती है और वो बड़े आइडिया को लेकर पुरस्कार की घोषणा नहीं करती. विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल प्राइज किसी वैज्ञानिक के योगदान को नहीं बल्कि उसकी खोज को दिया जाता है. खोज भी वह जिसके होने के सबूत हों.

नोबेल को बोल दिया 'नो थैंक्स'

संसार में ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने नोबेल प्राइज जीतने के बाद उसे लेने से इनकार कर दिया. इनमें सबसे चर्चित नाम है-

ज्यां पॉल सार्त्र

ज्यां-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक, लेखक, नाटककार और राजनीतिक विचारक थे. उन्हें आधुनिक अस्तित्ववाद (Existentialism) का सबसे बड़ा नेता माना जाता है. 1964 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीन-पॉल सार्त्र को उनके 'विचारों से समृद्ध और स्वतंत्रता की भावना तथा सत्य की खोज से परिपूर्ण काम के लिए' दिया गया. हालांकि, उन्होंने इसे लेने से इनकार कर दिया. इसे लेकर ज्यां-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) ने कहा कि उन्होंने हमेशा सरकारी या किसी भी तरह के आधिकारिक सम्मान ठुकराए हैं.

सार्त्र का कहना था,

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ले डुक थो

नोबेल ठुकराने वालों में ले डुक थो (Le Duc Tho) भी थे, जो एक वियतनामी राजनीतिज्ञ थे. उन्हें 1973 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, लेकिन थो ने इसे अस्वीकार कर दिया. उनका योगदान था कि उन्होंने अमेरिकी नेता और अधिकारी हेनरी किसिंजर के साथ वियतनाम युद्ध को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनके साथ किसिंजर को भी ये पुरस्कार मिला था, लेकिन थो ने ये कहते हुए इसे लेने से मना कर दिया कि ‘अभी तक शांति स्थापित नहीं हुई है’.

वीडियो: रूस की ओर से जंग लड़ रहा था भारतीय युवक, अब भारत वापस आना चाहता है

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