23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिन पड़ता है. इसी दिन बाल ठाकरे काजन्मदिन भी है. 23 जनवरी 2018 के रोज बाल ठाकरे के जन्मदिन के दिन वरली के एनसीसीग्राउंड में शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक हुई. इस बैठक में फैसला लियागया कि शिवसेना 2019 के लोकसभा चुनाव अकेले लड़ेगी.शिवसेना 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव और 2017 के बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशनचुनाव भी अकेले लड़ चुकी है. हालांकि दोनों चुनाव के बाद वो बीजेपी के साथ गठबंधनमें लौट गई. 2019 में 'एकला चालो रे' नीति के बारे में जानकारी देते हुए पार्टी केप्रवक्ता संजय राउत ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वो शिवसेना को लगातार नीचा दिखानेकी राजनीति कर रही है.बाल ठाकरे वो शख्स थे जिन्होंने बुरे वक़्त में मोदी का साथ दिया2002 के गुजरात दंगों के वक़्त केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी 17 पार्टियों वालेगठबंधन की सरकार चला रहे थे. इनमें से कई घटक दल ऐसे भी थे जो खुद के सेकुलर होनेका दावा करते थे. राम मंदिर आंदोलन की अगुवा रही बीजेपी के साथ गठबंधन के लिए इनदलों के पास उदार छवि वाले अटल बिहारी वाजपेयी एक तर्क की तरह थे. गुजरात दंगों केबाद एनडीए पर दबाव खासा बढ़ गया था. कई घटक दल ऊंची आवाज में कह रहे थे , "Modi MustGo".इस दौर में बीजेपी के बाहर सिर्फ एक नेता था जो मोदी के पक्ष में खड़ा था. नाम बालासाहेब ठाकरे. बाल ठाकरे बाद के दौर में एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में याद करते हुएकहते हैं-"उस समय बीजेपी में साहस की थोड़ी कमी थी. किसी को गोधरा की चिंता नहीं थी, सबअहमदाबाद के दंगे पर लाठी भांज रहे थे. मैं मुंबई मेयर के बंगले पर आडवाणी से मिला.मैंने उनसे पूछा कि क्या आपने नरेंद्र मोदी के बारे में कोई फैसला ले लिया है यानहीं? उनका जवाब था, 'बाला साहेब अभी सोच रहे हैं.' मैंने उनसे कहा नहीं. मोदी कोरहना चाहिए. अगर मोदी गया तो गुजरात गया.असल में मोदी की गलती ही क्या है? जब आप पर हमला होता है तो आपको उसका प्रतिरोधकरना ही पड़ता है. दंगों की शुरुआत किसने की? किसने पहले हमला किया? पहले गोधरा हुआऔर उसके बाद अहमदाबाद में दंगे हुए."नरेंद्र मोदी और बाल ठाकरेसियासत में समीकरण तेजी से बदलते हैं. नरेंद्र मोदी के बुरे दौर में बाल ठाकरे उनकेपक्ष में खड़े थे और नरेंद्र मोदी के अच्छे दौर में उद्धव ठाकरे उनके खिलाफ खड़े हैं.2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के 4 महीने बाद ही महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावथे. शिवसेना ने सीटों के बंटवारे को मुद्दा बनाते हुए उस समय 25 साल पुराना गठबंधनतोड़ लिया. वो सभी 288 सीटों पर अकेले लड़ी और महज 63 सीटों पर सिमट गई. जबकि 260 सीटपर चुनाव लड़ी बीजेपी 122 सीटें जीतने में कामयाब रही. यह बहुमत से 20 सीट कम था औरइसी मजबूरी ने चुनाव के बाद बीजेपी और शिवसेना की 'महायुती' को फिर से खड़ा किया.बाल ठाकरे के दौर में बीजेपी महाराष्ट्र में हमेशा जूनियर पार्टनर बनकर रही.महाराष्ट्र में दोनों पार्टियों का गठबंधन 1990 के दौर में हुआ. यह राम मंदिरआंदोलन का दौर था. महाराष्ट्र आरएसएस की पैतृक जमीन है फिर भी मंदिर आंदोलन के समयमहाराष्ट्र में हिंदुत्ववादी राजनीति की कमान शिवसेना के पास रही. दोनों पार्टीहिंदुत्व की राजनीति करने वाली थी. कंफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट से बचने के लिए दोनोंदलों के बीच एक अलिखित समझौता था. महाराष्ट्र में बीजेपी शिवसेना के अधिकार क्षेत्रमें डाका नहीं डालेगी. बीजेपी के लिए यह ठीक भी था वो राष्ट्रीय स्तर की पार्टी थीऔर मराठी अस्मिता का मुद्दा उसकी सेहत के लिए अच्छा नहीं था.बाल ठाकरे के जाने के बाद उद्धव उनकी तरह का करिश्मा पैदा नहीं कर पा रहे हैं2014 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी और शिवसेना चाहे फिर से महायुती के साए मेंलौट आए हों लेकिन दोनों के बीच का खिंचाव कभी कम न हुआ. उद्धव ठाकरे ने बाज दफाकेंद्र और राज्य सरकारों को सामना में लिखे संपादकीय में निशाने पर लिया. उन्होंनेनोटबंदी और जीएसटी के मुद्दे पर मोदी सरकार की नीति पर अपनी असहमति छुपाने की कोईकोशिश नहीं की.1970 के दौर में जब शिवसेना अपने को खड़ा कर रही थी उस समय बॉम्बे म्युनिसिपलकॉरपोरेशन (BMC)उसकी पहली शरणस्थली बना. 1996 से अबतक शिवसेना BMC पर एकछत्र राजकरती आई है. 1990 में बीजेपी के साथ गठबंधन होने के बाद से 2017 तक दोनों पार्टीBMC में एकसाथ लड़ती आई थीं. 2017 के BMC चुनाव में शिवसेना ने चुनाव अकेले लड़ने काफैसला किया. चुनाव के नतीजे उद्धव ठाकरे की उम्मीद के मुताबिक आए. 227 सीटों वालीBMC में शिवसेना 90 सीट जीतने में कामयाब रही. जबकि यहां आंकड़ा पिछले चुनाव में 75पर था. बीजेपी को हालांकि पिछले चुनाव के मुकाबले 52 सीट की बढ़त मिली लेकिन उनकाआंकड़ा 83 पर जाकर अटक गया.उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे. शिवसेना के भविष्य का दारोमदार इनके कंधों परहै.क्या सचमुच बीजेपी-शिवसेना का साथ छूट जाएगा?BMC शिवसेना के लिए वो तोता है जिसमें उसकी जान बसी हुई है. BMC का सालाना बजटतकरीबन 30,000 करोड़ है. यह कई राज्यों के बजट से ज्यादा है. महाराष्ट्र में BMC केनतीजों ने बीजेपी और शिवसेना के बीच शक्ति का संतुलन साध दिया. राज्य में बीजेपी कीसरकार शिवसेना के समर्थन चल रही है और BMC में शिवसेना बीजेपी की वजह से सत्ता मेंहै.शिवसेना के तल्ख़ तेवरों के बावजूद बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन पिछले साढ़े तीन सालसे बदस्तूर जारी है. अनंत गीते केंद्र सरकार में शिवसेना के कोटे से मंत्री हैं.राज्य सरकार में भी शिवसेना के खाते से 11 मंत्री हैं. अगर शिवसेना गठबंधन तोड़ने परअमादा ही होती तो वो लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा और BMC के चुनावों की चिंता कररही होती.उद्धव ठाकरे और देवेन्द्र फडनवीसदरअसल शिवसेना पिछले 28 साल से महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ गठबंधन में है. इसदौरान बीजेपी हमेशा सूबे में जूनियर पार्टनर की तरह ही रही. 2014 के लोकसभा और उसकेबाद विधानसभा चुनाव ने सारे समीकरण पलटकर रख दिए. आंकड़ों के साथ की वजह से बीजेपीअब शिवसेना की हमाली करने से मना कर रही जबकि शिवसेना लगभग तीन दशक से चली आ रहीव्यवस्था को कायम रखना चाहती है.बीजेपी शिवसेना के लिए मजबूरी है. केंद्र की सियासत में शिवसेना के पास बीजेपी केअलावा कोई विकल्प नहीं है. कांग्रेस शिवसेना को अपने खेमे में खड़ा करने की हिमाकतनहीं कर सकती. यह 'सेकुलर ताकतों की गोलबंदी' के खांचे के उलट जाने वाली बात होगी.वैसे भी कांग्रेस के पास महाराष्ट्र में शरद पवार वाली एनसीपी जैसा विकल्प मौजूदहै.ऐसे में गठबंधन से बाहर निकलने की शिवसेना की घोषणा दबाव बनाने की राजनीति के इतरकुछ भी नहीं है. शिवसेना के पास नाम मात्र का ही सही लेकिन देश के कई कोनों में एकसंगठन है. शिवसेना इसी टूटे-फूटे संगठन के नाम पर बीजेपी पर दबाव बनाने के प्रयासमें लगी हुई है. शिवसेना को भरोसा है कि वो हिंदू वोटों में सेंध के नाम पर बीजेपीके तेवर ढीले कर पाएगी. इसकी संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है. बीजेपी मोदी लहर परसवार है. उसे महाराष्ट्र से बाहर शिवसेना के उम्मीदवारों की उतनी ही चिंता है,जितनी किसी मुख्यधारा की पार्टी को निर्दलीय उम्मीदवारों की होती है. ऐसे मेंशिवसेना का यह कदम उसे ही महंगा पड़ता दिखाई दे रहा है.--------------------------------------------------------------------------------यह भी पढ़ेंदारू चाहे कहीं भी पी लो, सबसे ज़्यादा मज़ा तो पिता के साथ पीकर ही आता है4 लाख कश्मीरी पंडितों की वो कहानी जिसे सुनाने वाले का मुंह सिल जाता हैअंगरेजी में टाइटल होता, अप क्लोज एंड पर्सनल विद अनुराग कश्यप