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'पाकिस्तान जिंदाबाद नारों के साथ हॉस्टल पर पत्थर फेंके'

NIT श्रीनगर में कब-क्या हुआ, एक स्टूडेंट ने लिखा है, जिसने सब अपनी आंखों से देखा.

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Source- Facebook
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आशीष मिश्रा
9 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 10 अप्रैल 2016, 08:43 AM IST)
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satyam kumar
सत्यम कुमार NIT श्रीनगर के स्टूडेंट हैं. सीएस से बी.टेक कर रहे हैं. वहां क्या हुआ सब अपनी आंखों से तब से देख रहे हैं जब ये मुद्दा, मुद्दा ही नहीं था. उन्होंने अपना देखा हुआ, अपना भुगता हुआ, लिख भेजा, इसे पढ़िए. ये जानने के लिए कि ये कोई हिंदू-मुस्लिम मामला नहीं है. ये कोई पॉलिटिकल इश्यू नहीं है. या ये कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसमें कोई पॉलिटिकल एंगल हो.
जब से श्रीनगर में आया हूं बस एक ही इंतज़ार रहा कि यहां गर्मी कब आएगी. कब अपनी आस्तीन को ऊपर चढ़ाकर घूम सकेंगे. गर्मी तो नहीं आई पर आस्तीन ऊपर चढ़ा, मुट्ठियां भी भिंची, और यहां की ठंडक में गजब गर्मी का अहसास हुआ. 55 साल पुराने एन आई टी श्रीनगर में जब हम आए तो जगह की संवेदनशीलता के लिहाज से मन में तरह-तरह के सवाल थे. पर जैसे-जैसे दिन बीतते गए यहां की हॉस्पिटैलिटी और सुंदरता को देखकर सारे भ्रम मिट गए. पर 31 मार्च की शाम वर्ल्ड टी-20 सेमीफाइनल के बाद जब इंडिया की हार हुई तो गज़ब का नजारा देखने को मिला. जहां हमारी आंखें और दिल भरे हुए थे. नींद कोसों दूर थी और पूरे देश में गम का माहौल था. वहीं पर कश्मीर में पटाखे छुडाए जा रहे थे. कश्मीरी छात्र ख़ुशी से चिल्ला रहे थे. ऐसी बात नहीं है की हम इंडिया के जीतने पर चीयर नहीं करते थे पर हमने कभी राजनीतिक, धार्मिक या फिर हिंसक मुद्दा नहीं बनाया. यहां तक तो ठीक था पर जब पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगने लगे. और हमारे हॉस्टल के पीछे कैंटीन साइड से पत्थर फेंके जाने लगे  तब तक भी खुद को बचाने की कोशिश की. कुछ को माइनर चोट भी आई. पर जैसे ही हिंदुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगे. लगा जैसे धिक्कार है देश का हिस्सा होने पर. हम और हमारे हॉस्टल के लगभग 500 बच्चों के खून खौल उठे. हम रात में कुछ न कर सकने के लिए बेबस थे क्योकि हमारे हॉस्टल का गेट लॉक था. हम रात इस प्लानिंग के साथ सोए कि सुबह डायरेक्टर सर के पास चलेंगे और इन छात्रों के खिलाफ एक्शन लेने की मांग करेंगे. और सुबह ही पहुंच गए डायरेक्टर ऑफिस के सामने. वहां डायरेक्टर ऑफिस के सामने लगभग सभी बैच के छात्र आ गए. पर प्रशासन हमारे पक्ष में कुछ करता हुआ नहीं दिख रहा था. हम नारे लगाने वालों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई चाहते थे. पर ऐसा कुछ नहीं होने वाला था. प्रशासन बस हमें आश्वासन दे रहा था. हम चाहते थे हमारे कॉलेज में भी तिरंगा फहराया जाए. पर उन्होंने हमें इसकी इजाजत नहीं दी, आखिर क्यों अपने ही देश में अपना झंडा क्यों नहीं? बस फिर क्या था. लगभग 2200 छात्र जो कि यूपी, बिहार, राजस्थान और देश भर की अलग-अलग जगह के बच्चे एक जगह इकठ्ठा हुए और उसके बाद भारत माता की जय, इंकलाब जिंदाबाद, वंदे मातरम के नारे लगने लगे. इसी बीच कश्मीरी छात्रों का ग्रुप आ गया जिसमें कश्मीर यूनिवर्सिटी के छात्र भी थे. उनसे हमारी तीखी नोकझोंक हुई और कुछ लोगों को चोटें भी आई. वो पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने के साथ-साथ आज़ादी की मांग कर रहे थे. उसके कुछ देर बाद लोकल पुलिस आ गई और उन्होंने आंसू गैस के गोले दागे. हम भागने लगे तो हम पर पत्थर फेंके. बाद में वहां के एसएसपी, डीएम, और अन्य अधिकारी आए और हमें सुरक्षा का आश्वासन दिया.
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मैच को लेकर जो भी कॉलेज में हुआ उसके बाद कश्मीरी प्रोफ़ेसर हमें हमारे करिअर को लेकर डरा रहे थे. फ्यूचर बर्बाद करने की धमकी दे रहे थे. प्रोफेसर्स की इन धमकियों से हम काफी डर गए कि अब हमारा क्या होगा. जिसके लिए हमने तीन दिन हड़ताल की. लेकिन कॉलेज प्रशासन मीडिया को मेनगेट के अन्दर आने ही नहीं दे रहा था. वो वहीं से उन्हें यह कहकर वापस भेज दे रहे थे कि सबकुछ ठीक- ठाक है. क्लासेज चल रही हैं. लेकिन रियलिटी तो कुछ और ही है. अंदर हम लगातार हो रही बारिश में भीग-भीग कर हड़ताल कर रहे थे पर कोई पूछने वाला नहीं था, और हमें हमारे हॉस्टल गेट से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा था. हमारी हड़ताल में कोई ये तक नहीं पूछने आया की आखिर हम चाहते क्या हैं? हमारा मुद्दा ये था कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय से कोई अधिकारी आए और हम उनके सामने अपनी बात रख सकें. हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है कश्मीर में मीडिया का ना होना. कुछ हैं, उसमे से कुछ या तो हमारे खिलाफ लिखने वाले हैं और कुछ जो लिखना चाहते हैं पर उन्हें हम तक आने ही नहीं दिया जा रहा था. आज तक कोई भी मीडिया हमारे तक नहीं आई है. न्यूज़ पेपर्स में या न्यूज़ चैनल्स पर जो भी दिखाया गया है वो सब हमारे द्वारा सोशल साइट्स पर डाली गई वीडियोज या फिर इंफोर्मेशन का नतीजा है.
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अचानक भीड़ को देख पुलिस एक्टिव हो उठी. वो हमें पीछे की ओर धकेलने लगे. हमने कहा हम मीडिया से मिलने आए थे पर उन्होंने हमारी एक नहीं सुनी. हमने प्रोटेस्ट किया तो तुरंत हम पर लाठीचार्ज कर दिया. हम लोग हजारो की संख्या में थे. भागने लगे तो कोई फिसला, किसी की पीठ पर लाठी पड़ी. वो वही गिर गया और उस एक को पांच-पांच लोगों ने मिलकर पीटा. हम लोगों को दौड़ा लिया गया. इस भगदड़ में लगभग 40 को खूब पीटा गया. लाठी से किसी के सिर में मारा. तो किसी के हाथ में, किसी के पैर में मारा तो किसी की गर्दन पर. किसी को मारने से चोट लगी. कोई गिरकर चोट खा गया. जो जहां गिरा उसको वहां तब तक पीटा गया जब तक कि इनका मन नहीं भर गया. मैं भाग रहा था. मेरी चप्पल मेरे पैर से निकल गई. मुड़कर चप्पल के पास देखा तो वहां से बस दो कदम पीछे गिराकर एक बच्चे को पीट रहे थे. उसके सिर से खून निकल रहा था फिर भी उसे पीट जा रहे थे. हम भागते-भागते हॉस्टल तक आए और 'कश्मीर पुलिस हाय हाय' और 'WE WANT - MHRD' के नारे लगाने लगे. नारे लगाते हुए जब फिर से हॉस्टल कैंपस से बाहर कॉलेज कैंपस में आये तो फिर से हमारे ऊपर लाठीचार्ज किया गया. इस बार तो पहले से भी ज्यादा बेरहमी से पीटा गया. एक विकलांग लड़का जो मेस से चाय पीकर वापस जा रहा था. उसे भी पीट दिया. मारते-मारते हमारे हॉस्टल में घुस गए. उसके बाद वहां उन्हें जो भी मिला उसको पीटते चले गए. लाठियां जहां पडीं. वहां जिंदगी भर के लिए निशान दे गईं. हर तरफ बस यही दिखाई दे रहा था कि कोई लंगड़ाता हुआ आ रहा है और कोई रोता हुआ आ रहा है. कोई उठा कर लाया जा रहा है. इस तरह से वो दिन हमारी जिंदगी के लिए खूनी साबित हुआ. लगभग 50 से ज्यादा स्टूडेंट्स को चोटें आई जिनमें से तीन आईसीयू में भर्ती हैं. एक लड़के के दोनों हाथ टूट गए हैं. एक लड़के का एक पैर और एक हाथ टूट गया. कितनों की पीठ में खतरनाक घाव आए हैं. किसी की आंख सूजी है तो कोई चल नहीं पा रहा. किसी भी कानून में ये नहीं लिखा कि लाठीचार्ज में कमर के ऊपर मारा जाए. आखिर हमारी गलती क्या है? यही कि हम देश के अपमान को नहीं सह सके. यही कि हमने तिरंगे को झुकने नहीं दिया. हमने देश का विरोध करने वालों का खुद को खतरे में रखते हुए भी सामना किया. बदले में हमें क्या मिला? घाव. कुछ लोग JNU में देशविरोधी नारे लगाते हैं वो हीरो बन जाते हैं. हमने यहां की संवेदनशील परिस्थिति में भी देशद्रोहियों का विरोध किया तो हम पर लाठियां बरसी. JNU में तो बस देशविरोधी नारे लगे थे और मीडिया कवरेज ने उसे जबरदस्त मुद्दा बनाया. यहां तो हमारी जान पर बन आई और कोई मीडिया नहीं. कोई लिखने वाला नहीं हम पर. आखिर क्या कर रही है वो सरकार जो हमारी मदद कर सकती है. हमारा आंदोलन दबाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है. हमारे फेसबुक पेज हैक किए जा रहे हैं. उस पर हमारे खिलाफ पोस्ट देखने को मिल रही है. हमारे कॉलेज कैंपस में सोशल साइट्स को बैन कर दिया गया था. हमारे खिलाफ अफवाहों वाले ट्वीट किये जा रहे हैं. प्रशासन हमारे साथ राजनीति कर रहा है. मीडिया अब भी गेट तक आ रही है और उसको अंदर नहीं आने दिया जा रहा है.
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हम सभी जानते हैं कि इस तरीके के अफवाहों से हिंदू-मुस्लिम वाली बात हो जाएगी और साम्प्रदायिक दंगे होने की संभावना बढ़ जाएगी. और कॉलेज प्रशासन की भी यही मंशा है कि ऐसा हो जाए जिससे कि मीडिया का ध्यान हमारी तरफ से हट जाए और हमारा आंदोलन धीमा पड़ जाए. शायद ऐसी अफवाह फ़ैलाने वालों को मालूम नहीं कि सिर्फ कश्मीर में ही मुस्लिम नहीं हैं. गैर-कश्मीरी छात्रों में भी मुस्लिम हैं. जो हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं. जुम्मे की नमाज थी और हमारा पूरा प्लान ये रहा कि हमें किसी भी लोकल की नमाज के बीच में कोई शोर-शराबा नहीं करना है. नमाज़ के दौरान हम सभी अपने हॉस्टल में रहेंगे जिससे उनकी नमाज़ में कोई बाधा न आए. और उनकी जुम्मे की नमाज़ भी अच्छे से हो गई. हम साफ़ तौर पर कहना चाह रहे हैं.
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जम्मू और कश्मीर के डिप्टी सीएम निर्मल सिंह को आना था पर उन्होंने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए आना कैंसिल कर दिया. जहां उन्हें एक घंटे के लिए आने में डर लग रहा है. वहां हम अपनी दिन-रात बिता रहे हैं. सरकार हमारे साथ ये सौतेला व्यवहार क्यों कर रही है. मैडम स्मृति ईरानी जी ने भी अपना आना 13 तारीख को फिक्स किया है. इसमें भी पॉलिटिक्स है उन्हें लगता है की तब तक ये बच्चे ठंडे पड़ जाएंगे और हो सकता है. उन्हें आना ही न पड़े. इस मुद्दे पर मान्यवर नरेंद्र मोदी जी की चुप्पी अभी टूटी नहीं है. कम से कम आश्वासन भरे दो लफ़्ज़ों का ट्वीट ही कर दिए होते, हम भी खुश हो जाते और उनकी भी इज्ज़त बची रहती.

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