ये एक कांटा न्यूटन का ऑस्कर का सपना तोड़ सकता है
ऑस्कर की जूरी फिल्म पर चाहे जो कहे, यहां तो पॉलिटिक्स शुरू हो गई है.
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ऑस्कर में ऑफिशियल एंट्री करने वाली इस साल की भारतीय फिल्म
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न्यूटन फिल्म नजदीकी और दूरी वाले तमाम सारे सिनेमाघरों में धड़ल्ले से चल रही है. पहले दिन बोहनी कुछ खास नहीं हुई. लेकिन फिर ऐलान हो गया. कि ये ऑस्कर में जाएगी. ऑस्कर का भौकाल बड़ा है. फिल्मी दुनिया का सबसे बड़ा अवॉर्ड. बस एक तो वीकेंड था और फिर ऑस्कर नॉमिनेशन वाली फिल्म. दर्शक घुस पड़े. दूसरा दिन अच्छा बीता. लेकिन दिन शुरू होते ही बमचक शुरू हो गई. लोग कहने लगे कि कॉपी है. सामने एक फिल्म का पोस्टर उठा के जड़ दिया.

न्यूटन को सीक्रेट बैलट की कॉपी बताया जा रहा है
ईरान की फिल्म है. नाम है सीक्रेट बैलट. 2001 में आई थी. बाबक पयामी इसके डायरेक्टर थे. कहानी कुछ यूं थी. एक दुर्गम टापू. वहां एक दिन एक धाकड़ लड़की आती है. नाव पर सवार होकर. वो वोटिंग एजेंट है. उसे वोटिंग की इम्पॉर्टेंस पता है और इस सिस्टम पर भरोसा भी है. वो एक फौजी को पकड़ती है और कहती है कि हमको जीप से ले चलो. वोटिंग करानी है. वोट वाले बक्से जीप में भरकर वोटर खोजने का कार्यक्रम जारी हो जाता है. कभी न रुकने थकने वाली वो लड़की बहुत बतकही करती है जिससे फौजी इरीटेट होता है. थोड़े झगड़े और अनकहे रोमांस के बीच पूरी फिल्म चलती है. लास्ट में होता ये है कि मुट्ठी भर वोटर हाथ लगते हैं. लड़की का भरोसा वोटिंग से उठ जाता है. जितनी भसड़ उसमें हुई रहती है, उससे किसी का भी उठ जाएगा.

सीक्रेट बैलट फिल्म का एक सीन
अब न्यूटन और सीक्रेट बैलट में दो कीवर्ड्स कॉमन हैं. 'वोटिंग' और 'निर्जन.' एक दुर्गम जगह पर वोटिंग कराने की कोशिश दोनों फिल्मों में है. फिल्म का कॉपी या इंस्पायर्ड होने के आरोपों के बाद न्यूटन के डायरेक्टर अमित मासुरकर ने इंडियन एक्सप्रेस को बयान दिया है. उनका कहना है कि "न्यूटन सीक्रेट बैलट से न तो इंस्पायर्ड है न ही कॉपी की गई है. बल्कि लोगों को चाहिए कि दोनों फिल्में देख लें फिर आर्टिकल लिखें. हमने फिल्म की स्क्रिप्ट लिखते वक्त सीक्रेट बैलट के बारे में सुना भी नहीं था. अगर ये कॉपी होती तो बर्लिन, ट्रिबेका में फिल्माई जाती?"

न्यूटन का एक सीन
आगे कुछ और करने से पहले अनुराग कश्यप का ट्वीट देख लेना चाहिए. अनुराग का कहना है न्यूटन सीक्रेट बैलट की उतनी ही कॉपी है जितनी वतन के रखवाले से द ऐवेंजर्स.
अब बात ये है कि विवाद तो हो ही गया है. भले न्यूटन के डायरेक्टर- राइटर ने वो फिल्म देखी हो या न देखी हो. ऑस्कर की जूरी वालों ने जरूर देखी होगी. उसमें जो भी लोग होते हैं वो टॉप के फिल्मी होते हैं. उन्होंने या तो दुनिया की सबसे यूनीक फिल्में बनाई होती हैं या उनको ढेर सारे अवॉर्ड्स मिल चुके होते हैं. तो ऐसा नहीं हो सकता कि उनकी नजर से ये फिल्म न गुजरी हो. अगर उन्हें दोनों फिल्मों में समानता लगती है तो न्यूटन को आगे बढ़ने में मुश्किल आएगी. क्योंकि वहां यूनीक आइडिया और नएपन को तरजीह दी जाती है.

न्यूटन फिल्म का सीन
अब दूसरी बात. किसी फिल्म से इंस्पायर्ड होना या रीमेक बनाना जुर्म नहीं है. बशर्ते वो कॉपी लग न लगे. रीमेक के लिए राइट्स मांगने या खरीदने पड़ते हैं. हर कोई किसी न किसी से इंस्पायर्ड है. एक फिल्म बनाने वाला अचानक से उठकर नहीं बनाने लगता. किसी ने अगर 10 साल फिल्में देखने के बाद कोई फिल्म बनाई तो किसी फिल्म का कोई सीन या प्रजेंटेशन या गाना या कैमरा एंगल कॉपी कर सकता है. वो उसके अवचेतन मन में समा ही जाता है. हर फिल्म में कोई न कोई थॉट किसी किताब, किसी फिल्म या किसी गद्य-पद्य से इंस्पायर्ड रहता है. साउथ इंडिया की तो हर दूसरी फिल्म इंस्पायर्ड रहती है.
दुनिया के किसी भी महान फिल्मकार गीतकार का काम देख लेना. पारखी नजर से निहारोगे तो कहीं न कहीं से कनेक्शन निकल ही आएगा. और यहां जैसे ही किसी के कॉपी होने की बात निकलती है, सारी बहस पलट जाती है. न्यूटन की भूरि भूरि प्रशंसा करने वालों के कान में जैसे ही भनक पड़ी, उन्होंने पाला बदल लिया. ऑस्कर वाले फिल्म के साथ क्या करेंगे ये तो वक्त बताएगा लेकिन यहां जो पॉलिटिक्स शुरू हो जाती है, ये फिल्मकारों के कॉन्फिडेंस को झटका देने वाला है. उन्होंने फिल्म बनाई क्योंकि उन्हें बनानी थी. ऑस्कर के लिए नहीं बनाई थी. इसलिए ऑस्कर में चली गई है इसलिए फिल्म को पूरी तरह से खारिज करना ठीक नहीं है.
न्यूटन का रिव्यू देख लो.
इस फिल्म की अंदर की कहानी भी जान लो. फिल्म देखने से पहले जानकारी काम की होगी.
ये भी पढ़ें: इस कॉमेडी फिल्म का इंतजार 2017 में बहुत बेसब्री से है

न्यूटन को सीक्रेट बैलट की कॉपी बताया जा रहा है
ईरान की फिल्म है. नाम है सीक्रेट बैलट. 2001 में आई थी. बाबक पयामी इसके डायरेक्टर थे. कहानी कुछ यूं थी. एक दुर्गम टापू. वहां एक दिन एक धाकड़ लड़की आती है. नाव पर सवार होकर. वो वोटिंग एजेंट है. उसे वोटिंग की इम्पॉर्टेंस पता है और इस सिस्टम पर भरोसा भी है. वो एक फौजी को पकड़ती है और कहती है कि हमको जीप से ले चलो. वोटिंग करानी है. वोट वाले बक्से जीप में भरकर वोटर खोजने का कार्यक्रम जारी हो जाता है. कभी न रुकने थकने वाली वो लड़की बहुत बतकही करती है जिससे फौजी इरीटेट होता है. थोड़े झगड़े और अनकहे रोमांस के बीच पूरी फिल्म चलती है. लास्ट में होता ये है कि मुट्ठी भर वोटर हाथ लगते हैं. लड़की का भरोसा वोटिंग से उठ जाता है. जितनी भसड़ उसमें हुई रहती है, उससे किसी का भी उठ जाएगा.

सीक्रेट बैलट फिल्म का एक सीन
अब न्यूटन और सीक्रेट बैलट में दो कीवर्ड्स कॉमन हैं. 'वोटिंग' और 'निर्जन.' एक दुर्गम जगह पर वोटिंग कराने की कोशिश दोनों फिल्मों में है. फिल्म का कॉपी या इंस्पायर्ड होने के आरोपों के बाद न्यूटन के डायरेक्टर अमित मासुरकर ने इंडियन एक्सप्रेस को बयान दिया है. उनका कहना है कि "न्यूटन सीक्रेट बैलट से न तो इंस्पायर्ड है न ही कॉपी की गई है. बल्कि लोगों को चाहिए कि दोनों फिल्में देख लें फिर आर्टिकल लिखें. हमने फिल्म की स्क्रिप्ट लिखते वक्त सीक्रेट बैलट के बारे में सुना भी नहीं था. अगर ये कॉपी होती तो बर्लिन, ट्रिबेका में फिल्माई जाती?"

न्यूटन का एक सीन
आगे कुछ और करने से पहले अनुराग कश्यप का ट्वीट देख लेना चाहिए. अनुराग का कहना है न्यूटन सीक्रेट बैलट की उतनी ही कॉपी है जितनी वतन के रखवाले से द ऐवेंजर्स.
"Newton" is as much a copy of "Secret Ballot" as The Avengers is of Watan Ke Rakhwale
— Anurag Kashyap (@anuragkashyap72) September 24, 2017
अब बात ये है कि विवाद तो हो ही गया है. भले न्यूटन के डायरेक्टर- राइटर ने वो फिल्म देखी हो या न देखी हो. ऑस्कर की जूरी वालों ने जरूर देखी होगी. उसमें जो भी लोग होते हैं वो टॉप के फिल्मी होते हैं. उन्होंने या तो दुनिया की सबसे यूनीक फिल्में बनाई होती हैं या उनको ढेर सारे अवॉर्ड्स मिल चुके होते हैं. तो ऐसा नहीं हो सकता कि उनकी नजर से ये फिल्म न गुजरी हो. अगर उन्हें दोनों फिल्मों में समानता लगती है तो न्यूटन को आगे बढ़ने में मुश्किल आएगी. क्योंकि वहां यूनीक आइडिया और नएपन को तरजीह दी जाती है.

न्यूटन फिल्म का सीन
अब दूसरी बात. किसी फिल्म से इंस्पायर्ड होना या रीमेक बनाना जुर्म नहीं है. बशर्ते वो कॉपी लग न लगे. रीमेक के लिए राइट्स मांगने या खरीदने पड़ते हैं. हर कोई किसी न किसी से इंस्पायर्ड है. एक फिल्म बनाने वाला अचानक से उठकर नहीं बनाने लगता. किसी ने अगर 10 साल फिल्में देखने के बाद कोई फिल्म बनाई तो किसी फिल्म का कोई सीन या प्रजेंटेशन या गाना या कैमरा एंगल कॉपी कर सकता है. वो उसके अवचेतन मन में समा ही जाता है. हर फिल्म में कोई न कोई थॉट किसी किताब, किसी फिल्म या किसी गद्य-पद्य से इंस्पायर्ड रहता है. साउथ इंडिया की तो हर दूसरी फिल्म इंस्पायर्ड रहती है.
दुनिया के किसी भी महान फिल्मकार गीतकार का काम देख लेना. पारखी नजर से निहारोगे तो कहीं न कहीं से कनेक्शन निकल ही आएगा. और यहां जैसे ही किसी के कॉपी होने की बात निकलती है, सारी बहस पलट जाती है. न्यूटन की भूरि भूरि प्रशंसा करने वालों के कान में जैसे ही भनक पड़ी, उन्होंने पाला बदल लिया. ऑस्कर वाले फिल्म के साथ क्या करेंगे ये तो वक्त बताएगा लेकिन यहां जो पॉलिटिक्स शुरू हो जाती है, ये फिल्मकारों के कॉन्फिडेंस को झटका देने वाला है. उन्होंने फिल्म बनाई क्योंकि उन्हें बनानी थी. ऑस्कर के लिए नहीं बनाई थी. इसलिए ऑस्कर में चली गई है इसलिए फिल्म को पूरी तरह से खारिज करना ठीक नहीं है.
न्यूटन का रिव्यू देख लो.
इस फिल्म की अंदर की कहानी भी जान लो. फिल्म देखने से पहले जानकारी काम की होगी.
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