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कौन है ये असम का लड़ाका, जिसे नरेंद्र मोदी ने सैल्यूट किया?

इंडियन आर्मी ने इसे गजब तरीके से याद रखा है.

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फोटो - thelallantop
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ऋषभ
24 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 24 नवंबर 2016, 11:48 AM IST)
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आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट किया. एक लड़के के बारे में. नॉर्थ-ईस्ट का लड़का. नाम लचित बोरफूकन. प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं इसके जन्मदिवस पर इसकी बहादुरी को सैल्यूट करता हूं.
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कौन है ये लड़का? क्या किया है इसने? लचित बोरफूकन इतिहास से आता है. जिसे हम किताबों में पढ़ते हैं. जो नहीं पढ़ते, वो जमाने की याद से मिट जाता है. पर कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनकी दंतकहानियां चलती हैं. लोग मजे लेकर सुनाते हैं. श्रद्धा भी रहती है. इमोशन भी रहता है. पर इसके साथ एक और बात भी है. इतिहास में हो ना हो, लचित बोरफूकन को इंडियन आर्मी में स्पेशल जगह मिली है. ये बाद में बतायेंगे.
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जब भी इतिहास पढ़ते तो एक प्रश्न दिमाग में आता. कि मुगल साम्राज्य पेशावर से बंगाल तक फैला था. दक्षिण भारत में भी मुगल सेनाएं जाती थीं. दूर-दूर तक इनके सूबेदार थे. पर इनका साम्राज्य असम में क्यों नहीं था? असम का एरिया तो धन-संपदा से भरा था. कौन था असम में? असम में अहोम राजा राज करते थे. अहोम वंश ने असम को हजार साल से बचा के रखा था. मुहम्मद गोरी की सेना का भी सामना किया. मुगलों की सेना का भी. कभी-कभी हार जाते, पर किसी को टिकने ना देते. इसी क्रम में औरंगजेब की नजर पड़ी असम पर. उसने तय किया कि इसको तो अपने हाथ में लेना है. आंबेर के राजकुमार रामसिंह प्रथम के नेतृत्व में अपनी सेना भेज दी. अहोम सेना का कमांडर था लचित. 24 नवंबर 1622 को जन्मा ये लड़का अपने शौर्य और टेंपर के लिये जाना जाता था. डेयर-डेविल. पर यहां रामसिंह की सेना बहुत ज्यादा बड़ी थी. 4000 पैदल ट्रूपर. 30000 पैदल सैनिक. 2000 धनुर्धारी. 40 पानी के जहाज. 21 राजपूत राजाओं के नेतृत्व में. मुगल सेना मैदान की लड़ाई में सबको निपटा सकती थी. पूरा हिंदुस्तान उन लोगों ने ऐसे ही जीता था. लचित को पता था कि ये लड़ाई मैदान में लड़ के नहीं जीती जा सकती. लचित ने इसके लिये प्लान बनाया. मुगल सेना के पास पानी के जहाज तो थे. पर पानी पर लड़ने का कोई अनुभव नहीं था. अहोम सैनिकों को ये अनुभव पूरा था. तो चतुराई इसी में थी कि खिलाड़ी को अपनी पिच पर बुलाया जाये. जब मुगल सेना आगे बढ़ी तो अहोम सेना पीछे हट गई. मुगलों को लगा कि अहोम सेना डर गई है. यही लगाना भी था. क्योंकि मुगल सेना को ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे खींच के लाना था. बीच-बीच में गुरिल्ला लड़ाई चल रही थी.
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पर एक लड़ाई गड़बड़ हो गई. मुगल सेना ने दस हजार अहोम सैनिकों को काट दिया. राम सिंह को बढ़त मिल गई. हिम्मत भी मिली. तुरंत संदेशा भेजवाया अहोम राजा चक्रध्वज सिंह के पास कि सरेंडर कर दो. प्रस्ताव नामंजूर कर दिया गया. अहोम राजा इतने कमजोर नहीं थे. उधर कमांडर लचित बीमार पड़ गया.

पर बीमार हालत में ही लचित ने स्पीच दी- जब मेरी सेना मरने-मारने के लिए तैयार है तो मैं एक बीमारी का बहाना लेकर घर बैठने तो नहीं जाऊंगा. बिना मरे-मारे कोई वापस नहीं जाएगा.

फिर शुरू हुई लड़ाई. इस लड़ाई को सराईघाट की लड़ाई के नाम से जाना जाता है. सराईघाट में ब्रह्मपुत्र नदी पतली हो जाती है. नदी किनारे मुगल सेना को घेर लिया गया. आगे-पीछे दोनों तरफ से. मुगल सेनापति मुनव्वर खान को गोली लग गई. वो उठे नहीं फिर. मुगल सेना अपने कमांडर के गिरते ही तितर-बितर हो गई. लचित की सेना ने धर दबोचा. मुगलों की बुरी तरह हार हुई. लड़ाई के एक साल बाद बीमारी के चलते ही लचित की मौत हो गई.
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भारत ने लचित को भुलाया नहीं है. NDA से पास होने वाले बेस्ट कैडेट को लचित बोरफूकन अवॉर्ड मिलता है.

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