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देश के लोगों के लिये इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, भाजपा के लोगों के लिये अमित शाह?

प्रधानमंत्री ने तो ये नया नियम लगाया देश में.

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ऋषभ
30 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 30 नवंबर 2016, 09:55 AM IST)
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सवाल ये है कि कौन सा डॉक्टर अपना ऑपरेशन खुद करता है? और जिसका ऑपरेशन होना चाहिए, अगर वही डॉक्टर को निर्देश देने लगे तो क्या होगा? खबर आई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को भाजपा के निर्वाचित प्रतिनिधियों (सांसद-विधायक)  से कहा है कि 8 नवंबर से लेकर 31 दिसंबर तक के अपने बैंक ट्रांजैक्शन डिटेल्स 1 जनवरी 2017 को पार्टी चीफ अमित शाह को सौंप दें. 8 नवंबर को 500 और 1000 के नोट बैन हुए थे. और 31 दिसंबर उनको जमा करने की आखिरी डेट है. प्रधानमंत्री ने जोर देकर दो बार रोकर कहा कि ये देश हित में लिया गया फैसला है. इससे काला धन सामने आएगा. अपराधी पकड़े जाएंगे. जनता को थोड़ी दिक्कत है. सह लें. विपक्ष ने पार्लियामेंट और सड़कों पर काफी हंगामा किया क्योंकि जनता को कैश मिलने में समस्या लगातार आ रही है. ये भी कहा जा रहा है कि सरकार के फैसले का पता बड़े लोगों को पहले ही लग चुका था. कोई भी बड़ा आदमी नोट बदलवाने की समस्या से नहीं जूझ रहा है. आम लोग ही इस मुसीबत का सामना कर रहे हैं. पर सरकार ने इन बातों को नहीं माना है. ठीक है. पर अमित शाह ही पार्टी के लोगों की जांच क्यों करेंगे? क्या पार्टी के लोगों के लिये इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के लोग जांच नहीं करेंगे? या अमित शाह इनकम टैक्स वालों की मदद कर रहे हैं कुछ काम अपने हाथ में लेकर? ये पूरी सूचना जनता के ही सामने क्यों नहीं डाल दी जा रही है? पॉलिटिकल पार्टियां खुद को आरटीआई से अलग क्यों रख रही हैं? एक डेटा जर्नलिज्म वेबसाइट है, 'फैक्टली', जिसके मुताबिक भाजपा के पास सबसे ज्यादा अनएकाउंटेड पैसा है. मतलब नहीं पता कि ये पैसा कहां से आया है, किसने दिया है. इनके ठीक बाद कांग्रेस का नंबर है. अगर कोई 20 हजार रुपये से कम का डोनेशन देता है तो अभी तक यही नियम है कि उसका नाम किसी को बताया नहीं जायेगा. ये किसी से छुपा नहीं है कि 20 करोड़ का भी डोनेशन 20 हजार में तोड़ कर कैसे दिया जा सकता है. इसके अलावा पॉलिटिकल पार्टियों को इनकम टैक्स रिटर्न भी नहीं भरना पड़ता. पार्टियों का 75 प्रतिशत डोनेशन का कोई रिकॉर्ड नहीं है. इनको जमीन भी सस्ती दरों पर मिल जाती है. अभी हाल में ही बिहार भाजपा पर ढेर सारी जमीनें खरीदने का आरोप लगा है. ये आम लोगों के ठीक उलटा है. हर इंसान को अपनी सारी इनकम और सोर्स बताना होता है. पर लोगों के प्रतिनिधियों के संगठन को इससे पूरी छूट है. आप आरटीआई भी नहीं लगा सकते. पर क्यों? अगर ये अपना सारा डेटा साइट पर डाल दें तो लोग आरटीआई भी नहीं लगायेंगे. Association for Democratic Reforms नाम के एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी. तो सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि क्यों आरटीआई ना लगाई जाए पार्टियों पर. इसका गोल-मोल जवाब दे दिया गया. ये किसी से छुपा नहीं कि किस तरह राजनीति और कॉरपोरेट का गठजोड़ देश को कमजोर बनाते चला जा रहा है. दोनों एक-दूसरे को फायदा पहुंचाने की जुगत में आम इंसान से उसका सवाल पूछने का भी अधिकार छीन रहे हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री ने संविधान और संस्थान के इतर पार्टी चीफ अमित शाह को ही अपना नया शाहकार बना के पेश किया है. इसके समर्थन में ये कहा जा सकता है कि ये बिल्कुल ठीक है कि पार्टी में ही पहले जांच हो रही है. पर नोटबंदी और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के दावों के मुताबिक सब पर नजर रखी जा रही है. ऐसे में क्या भाजपा के नेताओं पर नजर नहीं रखी जा रही? या फिर अमित शाह की नजर ज्यादा तेज है? ये किस तरह की हायरार्की है, ये किस तरह का फिल्टर है? सीधे नेताओं से उनके ट्रांजैक्शन सार्वजनिक करने को क्यों नहीं कहा जाता? पर ऐसा नहीं होगा. क्योंकि 2013 में जब पॉलिटिकल पार्टियों पर आरटीआई लगाने की बात हुई थी तब सबने अपनी शत्रुता भुलाकर एक सुर से इसका विरोध किया. उस वक्त सब भाई-बहन लग रहे थे. लगा ही नहीं था कि ये लोग एक-दूसरे को हमेशा नीचा दिखाते रहते हैं. अगर ब्लैक मनी के चक्र को तोड़ना है तो पहला कदम खुद ही उठाना होगा. इसके लिये जरूरी है कि सामाजिक और संवैधानिक संस्थानों की अहमियत देखी जाए. इसे व्यक्तिवादी ना बनाया जाए.

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