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नैना साहनी मर्डर केस: जब कांग्रेस नेता सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी को तंदूर में जला दिया था

आज दिल्ली हाइकोर्ट ने सुशील शर्मा को रिहा करने के आदेश दिए हैं.

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21 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 21 दिसंबर 2018, 11:31 AM IST)
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सुशील शर्मा और नैना साहनी.
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दिल्ली हाइकोर्ट ने नैना साहनी तंदूर मर्डर केस में जेल में सजा काट रहे सुशील शर्मा को रिहा करने के आदेश दिए हैं. सुशील को कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी. सुशील ने हाइकोर्ट में अपील की थी कि वो 23 साल से जेल में सजा काट रहा है. अब उसे मानवीय आधार पर रिहा कर देना चाहिए. कोर्ट ने उसकी अर्जी मान ली है और अब उसको रिहा किया जाएगा. क्या है ये तंदूर मर्डर केस की पूरी कहानी, आइए जानते हैं.



2 जुलाई 1995

रात के साढ़े ग्यारह बजे

पेट्रोलिंग पर दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल अब्दुल नज़ीर कुंजू और होमगार्ड चंदर पाल थे. पास में ही होटल अशोक यात्री निवास था, जिसके अन्दर था बगिया रेस्टोरेंट. गश्त पर घूम रहे कुंजू को सब्जियां बेचने वाले और उनके साथ खड़े कुछ लोग शोर मचाते दिखाई दिए. कुंजू ने भीड़ की नज़र का पीछा किया, तो देखा बगिया रेस्टोरेंट से आग और धुएं की लपटें उठ रही थीं. अनारो देवी भी उन लोगों में से एक थीं. सब्जी बेचती थीं. सबसे आगे खड़ी रेस्टोरेंट की तरफ देख रही थीं. सबसे पहले उन्हीं ने चिल्लाकर लोगों का ध्यान खींचा. कुंजू ने देखा तब तक लोग चिल्ला रहे थे, “होटल में आग लग गयी है. होटल में आग लग गयी है.” कुंजू ने होमगार्ड चंदरपाल को वहीं रोके रखा, खुद दौड़कर पुलिस वैन तक पहुंचे, फायर ब्रिगेड को बुलाया और फ़ोर्स को इन्फॉर्म किया. वहां फ़ोर्स पहुंची, तो होटल का मैनेजर केशव कुमार वहां मौजूद था. एक तंदूर के ऊपर लकड़ियाँ जल रही थीं, लपटें उठ रही थी. केशव आग धधका रहा था. पूछने पर उसने बताया, 'कांग्रेस के पुराने बैनर जला रहे हैं.'

पर सच्चाई कुछ और थी. उस तंदूर में नैना साहनी की लाश जल रही थी.

नैना साहनी और सुशील शर्मा. कांग्रेस के दो जुझारू जवान कार्यकर्ता. यूथ कांग्रेस के मेंबर. इनकी कहानी शुरू होती है वहां से, जहां से कोई भी लव स्टोरी शुरू होती है. लेकिन अंत ऐसा हुआ, जिसने देश की चूलें हिलाकर रख दीं.


नैना साहनी.
नैना साहनी.

सुशील शर्मा यूथ कांग्रेस में अपनी पहचान काफी तेजी से बना रहा था. नैना साहनी ने भी डीयू से पढ़ाई खत्म करके कमर्शियल पायलट का लाइसेंस ले लिया था. इन दोनों को प्यार हुआ और इन्होंने साथ रहना डिसाइड किया. दोनों लिव-इन में रह रहे थे. लोग यह भी कहते थे कि इन्होंने चुपके से शादी भी कर ली थी. कई जगहों पर ख़बरों या रिपोर्ट वगैरह में उन्हें पति-पत्नी ही लिखा गया.

मंदिर मार्ग के पास के गोल मार्केट में इन दोनों का फ्लैट था. पर साथ रहने के कुछ समय बाद से सुशील और नैना के बीच टेंशन बढ़ गई थी. नैना खुद को सुशील की तरफ से बोर होता हुआ महसूस कर रही थी और सुशील को अपना करियर डांवाडोल होता दिख रहा था. उसके दिमाग में इस शक ने भी घर कर लिया था कि नैना के किसी दूसरे मर्द के साथ रिश्ते हैं. नैना भी मन ही मन ऑस्ट्रेलिया जाने की सोच रही थी. इसके लिए तैयारी भी शुरू कर दी थी उसने.

इन सबके बीच में फंसा सुशील शर्मा 2 जुलाई 1995 की उस शाम जब घर लौटा, तो नैना फ़ोन पर थी. हाथ में ब्लडी मेरी का ग्लास लिए. ब्लडी मेरी वोडका टमाटर का जूस मिलकर बनती है. नैना टोमेटो सूप में वोडका मिलाकर पीती थी. उस रात उसने पास की विडियो शॉप के जगदीश तनेजा को फ़ोन करके दो फिल्मों के कैसेट मंगवाए थे.

सुशील को देखकर नैना ने फ़ोन रख दिया. ड्रिंक ऑफर की. तब तक विडियो शॉप से प्रदीप शर्मा कैसेट देने उनके घर आया. उसे घर में कुछ भी एबनॉर्मल नहीं दिखा. वो चुपचाप कैसेट देकर वापस चला गया.

उसके जाने के बाद सुशील ने फ़ोन का रिसीवर उठाकर रीडायल का बटन दबाया. फ़ोन उधर से उठाया मतलूब करीम ने.

मतलूब करीम कौन? वही इंसान, जिसके साथ नैना के नाजायज़ सम्बन्ध होने का शक सुशील को काफी पहले से था. मतलूब की आवाज़ सुनकर सुशील का गुस्सा आपे से बाहर हो गया.


सुशील शर्मा ने बाद में बताया उसे कुछ भी याद नहीं उस दिन क्या हुआ था.
सुशील शर्मा ने बाद में बताया उसे कुछ भी याद नहीं उस दिन क्या हुआ था.

सुशील ने नैना से सवाल किये. उसके अन्दर का लवर हर्ट हो गया था. उसने पूछा क्यों नहीं ख़त्म हुआ ये अभी तक? क्यों नैना अभी तक उस मतलूब नाम के इंसान से चिपकी हुई है?

नैना ने ठंडा सा जवाब दिया, 'इससे सुशील का कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए.'

इस एक जवाब ने सुशील का खून खौला दिया. वो अपनी दराज के पास गया. उसके अन्दर से अपनी पिस्तौल निकाली, चार गोलियां डालीं और मुड़कर एक भी सेकण्ड गवांए बिना तीन गोलियां दाग दीं. सुशील को अंदाजा भी नहीं था कि ये एक सेकण्ड उसकी ज़िन्दगी के बीस साल खा जाने वाला है.

नैना के सिर और गले में दो गोलियां लगीं, तीसरी गोली छिटक गई. चंद सेकेण्ड तड़पकर नैना अपने ही खून के तालाब में उस बिस्तर पर ढेर हो गई. सुशील की पिस्तौल में एक गोली अब भी बाकी थी. वो वहीं बैठ गया. उसका दिमाग अब तेजी से चल रहा था. नैना की लाश को ठिकाने लगाना भी ज़रूरी था. लेकिन उससे पहले ये जानना ज़रूरी था कि किसी ने गोलियों की आवाज़ तो नहीं सुनी. सुशील ने उसी बेडशीट में नैना की लाश को लपेटा, जिस पर वो खून से लथपथ पड़ी थी. फिर सुशील ने उस गट्ठर को डाइनिंग टेबल के ऊपर रखे प्लास्टिक कवर में भी लपेट दिया. बाहर आकर झांका, तो सुशील ने चैन की सांस ली. चार फ्लोर के उस अपार्टमेंट में किसी को भनक तक नहीं लगी थी कि उनके बीच एक मर्डर हो चुका है.

नैना मर चुकी थी.लेकिन उसकी कहानी पूरा देश सुनने वाला था. सिहरने वाला था. सुशील का अगला कदम था- नैना की लाश को यमुना में फेंकना.

खून साफ़ करने और कपड़े बदलने के बाद सुशील अपनी मारुति 800 कार सीढ़ियों के पास लेकर आया और नैना की लाश को डिक्की में डाल दिया. उस समय दो लोगों ने उसे ऐसा करते हुए देखा. जगदेव सिंह- दूसरे ब्लाक के उनके पड़ोसी और अम्बा दास- वो कांस्टेबल जो उस समय गश्त पर था. उसने सुशील को गाड़ी ड्राइव करके ले जाते हुए देखा. इन दोनों को सपने में भी अंदेशा नहीं रहा होगा कि इनकी गवाही देश की सबसे बर्बर हत्याओं में से एक का रुख बदलने वाली साबित होगी.

सुशील लाश लेकर निकला तो सही, लेकिन यमुना ब्रिज पर उस रात काफी ट्रैफिक था. गाड़ियां एक-दूसरे से चिपककर आगे बढ़ रही थीं. इस हालत में लाश को वहां से फेंकना खतरे से खाली नहीं होता. सुशील को अब ख्याल आया उसके बगिया रेस्टोरेंट का. उसने गाड़ी मोड़ ली. वहां तकरीबन रात के 10:15 बजे पहुंचकर पार्किंग में गाड़ी लगाकर सुशील ने मैनेजर केशव को बुलाया. उसे बताया कि उससे बहुत बड़ी गलती हो गयी है. सुशील ने केशव को बताया कि उसे तंदूर में ये सुबूत जलाकर राख करना है. केशव की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, लेकिन वो अपने मालिक का आदेश टाल नहीं सका. वो एक 'वफादार' मैनेजर था. बगिया रेस्टोरेंट में बैठकर खाना खा रहे लोगों से रिक्वेस्ट की गयी कि रेस्टोरेंट बंद किया जा रहा है, वो लोग जल्द से जल्द खाना ख़त्म कर निकल जाएँ. फिर लाइट ऑफ कर दी गईं और स्टाफ को बाहर खाना खाने के लिए 25-25 रुपये पकड़ा दिए गए.

रात के 10:50 बजे

केशव और सुशील नैना की लाश को अन्दर तंदूर के पास ला चुके थे. केशव के कपड़े लाश से टपकते खून से दोबारा भीग चुके थे. लाश को तंदूर में उल्टा गया. आसपास पड़े लकड़ी के टुकड़ों को तोड़-तोड़कर लाश के ऊपर रखा गया. केशव दौड़कर गया और अमूल बटर के चार बड़े पैकेट ले आया. तंदूर के ऊपर रखी नैना साहनी की लाश पिघलते हुए बटर के साथ धू-धू कर जलने लगी.

नैना साहनी की अंतिम विदाई यही बनकर रह जाती, अगर सब्जी बेचने वाली अनारो देवी आग की लपटें देखकर चिल्लाती नहीं. और कुंजू का ध्यान वहां नहीं जाता. वहां पहुंचे लोगों ने केशव से पूछा, तो उसने जवाब दिया कि वो कांग्रेस का कार्यकर्ता है और कांग्रेस के पुराने बैनर, पोस्टर और रद्दी पेपर जला रहा है. लेकिन मांस के जलने की बदबू ने उनकी पोल खोल दी. सुशील शर्मा वहां से भाग चुका था. तंदूर में लगी आग बुझाई गयी, तो अन्दर से जली हुई लाश के हिस्से और हड्डियां मिलीं.


जब पुलिस ने सुशील को गिरफ्तार किया था.
जब पुलिस ने सुशील को गिरफ्तार किया था.

कुंजू ने बताया, “मैंने अन्दर देखा तो एक लाश सुलगती हुई दिखाई दी. ऐसा लग रहा था कि किसी औरत की टांगें हैं, जो नीचे की साइड से आधी जल गई थीं. उसकी आंतें बाहर निकल रही थीं. तंदूर के पास एक काला पॉलिथीन भी पड़ा था, जिस पर खून के धब्बे थे.”

डीएनए टेस्ट के मिलान के बाद पक्का हो गया कि ये नैना साहनी की ही लाश थी. सुशील शर्मा वहां से भाग तो निकला था, लेकिन ज्यादा समय तक छिपकर नहीं रह सका. आखिर में 10 जुलाई 1995 को उसने सरेंडर कर दिया.

पहली ऑटोप्सी में मौत का कारण जलना बताया गया, लेकिन दूसरी ऑटोप्सी में शरीर के टुकड़ों से गोलियां लगने का सुबूत मिला. आज तक इस केस को उदाहरण बनाकर पेश किया जाता है दूसरे केसों में कि आखिर दो बार ऑटोप्सी क्यों करानी चाहिए. 7 नवम्बर 2003 को डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने सुशील शर्मा को मौत की सजा सुनाई. केशव कुमार को हुई सात साल की कठिन कैद, क्योंकि उसने इस हत्या को छुपाने में सुशील का साथ दिया था. सुशील ने इसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की. 19 फरवरी 2007 को हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला बरकरार रखने का निर्णय सुनाया. फिर अपील हुई. इस बार सुप्रीम कोर्ट ने सुशील को दोषी ठहराया, लेकिन सजा उम्रकैद की कर दी. उनके हिसाब से सुशील को मौत की सजा देने का मतलब इसलिए नहीं था, क्योंकि उसका कोई पिछला ऐसा रिकॉर्ड नहीं रहा है अपराध का. और ये हत्या भी उसने निजी वजहों से की, समाज के खिलाफ कोई अपराध नहीं था ये. निजी था.

कई रिपोर्ट्स में ये भी कहा गया था कि नैना की लाश के टुकड़े किए गए थे. लेकिन ऐसा नहीं था. लाश को बस लपेट कर गट्ठर बनाकर तंदूर में डाल दिया गया था. बाद में पुलिस को भी कोई हथियार वगैरह नहीं मिला. ऑटोप्सी में भी ऐसा कुछ पता नहीं चला.

2015 में पहली बार सुशील शर्मा पैरोल पर छूटकर बाहर आया. उसने कहा,

“उस दिन का सब कुछ धुंधला है. मुझे आज तक याद नहीं उस दिन क्या कैसे हुआ. एक सेकण्ड के हिस्से में सब कुछ हो गया और उसने मेरे बीस साल खा लिए.”




ये स्टोरी प्रेरणा प्रथम सिंह ने की है




वीडियो-Tandoor Murder Case की जांच करने वाले दिल्ली पुलिस के कॉप Maxwell Pereira से बात

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