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भगवान जगन्नाथ की पूरी कहानी, कैसे वो लकड़ी के बन गए

राजा इंद्रद्युम्न की कहानी, जिसने जगन्नाथ रथ यात्रा की स्थापना की थी.

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रुचिका
23 जून 2020 (अपडेटेड: 22 जून 2020, 05:21 AM IST)
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पुरी में श्री जगन्नाथ का मंदिर है. जहां इनकी आम भगवानों की तरह पत्थर की नहीं बल्कि लकड़ी की मूर्ति रखी हुई है. ये भगवान कैसे प्रकट हुए इसकी एक कहानी बहुत फेमस है. जहां लिखी है, उसका नाम आप पूरा पढ़ेंगे नहीं. फिर भी मैं बता दूं. ये स्कंद पुराण के वैष्णव खंड के ‘पुरुषोत्तम क्षेत्र महात्म्य’ में लिखी हुई है. ओह पूरा पढ़ लिया. शाबाश.
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गुफा के पास जगन्नाथ का रोहिनी कुंड नाम का अपना एक पर्सनल स्विमिंग पूल था. और एक एवरग्रीन बरगद का पेड़ भी. स्विमिंग पूल ऐसा जिसमें एक डुबकी, स्वर्ग की सैर करा दे. एक बार एक कौआ इस स्विमिंग पूल में गिर गया. बाहर आया उस टिपिकल भगवान वाले लुक के साथ, जिस लुक को हम पहले डिसक्राइब कर चुके हैं.
यमराज को माधव से बहुत जलन होती थी. सोचते होंगे, ‘मैं यहा लावे में और वो स्विमिंग पूल में डुबकी लगा रहा है.’ ऐसे में यमराज क्यूट फेस लेकर जगन्नाथ के पास पहुंचे. उनको दोस्ती की दुहाई दी. जगन्नाथ इमोशनल हो गए. यमराज से कहा, ठीक है मैं गायब हो रहा हूं, लेकिन ब्रेक के बाद फिर आऊंगा.’
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बीच रास्ते में ही पता चल गया कि भगवान नहीं मिलेंगे. राजा रोने लगा. नारद ने समझाया, ‘बेटा रोते नहीं हैं, टिपिकल भगवान को खुश करने के लिए टिपिकल सहस्र अश्वमेध यज्ञ करो. यानी हज़ारों घोड़ों की बलि चढ़ाओ. बलि का मतलब विद्वानों ने अलग-अलग बताया है. इसका मतलब हर कोई घोड़ों की जान लेना नहीं मानता. इससे भगवान लकड़ी वाले फॉर्म में दर्शन देंगे.
ये सारे नीली पहाड़ी पर पहुंचे. इन्होंने देखा, वहां आधे शेर और इंसान के लुक वाले नरसिंह, दैत्य हिरण्यकश्यप को मारने में लगे हुए हैं. नरसिंह भी भगवान हैं, तो उन्हें खुश करने के लिए राजा ने पहले उनका मंदिर बनवा दिया. माधव ये सब कहीं से देख रहे थे. खुश हो गए. सोचा, ‘थोड़ा जादू दिखाने का टाइम आ गया है. लेकिन इनसे लकड़ी वाले लुक में ही मिलूंगा.’

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स्पाइडरमैन ने कहा है, ‘बड़ी ताकत के साथ, बड़ी ज़िम्मेदारियां भी आती हैं’. ठीक वैसे ही जैसे नए पड़ोसियों के यहां दावत खाने पहुंचो और उनके घर में कुछ सामान न हो, तो आपको उलटा उन्हें खाने पर बुलाना पड़ता है. अब राजा को भगवानों के लिए मंदिर बनवाना था. राजा अच्छा था, उसने अपनी सारी जमा-पूंजी मंदिर बनवाने में लगा दी. नाराद ने कहा, ‘मैं पापा को बुला लाता हूं. राजा ने कहा, ‘रुको तनिक मंदिर बन जाने दो, मैं भी साथ चलूंगा स्वर्ग.’

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गाला नाम का एक राजा था. उसके पास अब भी माधव के टिपिकल भगवान वाले लुक की मूर्ति थी. राजा इंद्रद्युम्न को पता चला तो गाला के घर से मूर्ति उठवा दी. इंद्रद्युम्न ने सोचा होगा, ‘लकड़ी वाले मिल रहे हैं, ये पत्थर के लेकर बैठा है.’ गाला गुस्से से लाल हो गया. लेकिन जैसे ही पता चला कि ब्रह्मा जी इस काम में लगे हैं, फिर खुश हो गया. रथ से उतारकर मूर्तियों को मंदिर में रखवा दिया गया. इसके बाद ब्रह्मा अपने घर चले गए. इंद्रद्युम्न ने भी सारी ज़िम्मेदारी गाला को सौंपी और ब्रह्मा जी के पीछे-पीछे स्वर्ग चले गए.



इस स्टोरी के लिए इनपुट 'सुभाष पाणी' की बुक 'रथ यात्रा' से लिया गया है.


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'रथ यात्रा' बुक का कवर



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