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शांतिप्रिय लोगों की ख़ामोशी मुसलमानों की इस नस्ल को खत्म कर देगी

इन मुस्लिमों के घर जला दिए गए हैं. बचकर भाग रहे हैं तो पानी में डूब कर मर रहे हैं. ये तस्वीरें झकझोरने वाली हैं.

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5 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 5 सितंबर 2017, 12:53 PM IST)
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कई हज़ार रोहिंग्या मुस्लिम बांग्लादेश पलायन कर गए हैं. कुछ बॉर्डर पर ही रोक दिए गए हैं. (Photo : Reuters)
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रोहिंग्या मुस्लिम. ये वो कौम है. जो म्यांमार में मौत को हराने के लिए संघर्ष कर रही है. घर में रुकना चाहते हैं तो हिंसा मौत बनकर आ जाती है. घर से निकलते हैं तो समुद्री पानी उनको अपनी आगोश में सुला ले रहा है. भले ही इंसानियत की आंख का पानी ख़ुश्क हो गया हो, लेकिन समुद्री पानी को हया आ रही है कि कैसे इन रोहिंग्या मुस्लिम के दर्द को नेस्तनाबूद कर दूं. इसी सोच में पानी दरबदर भटक रहे इन मुस्लिमों को हमेशा के लिए एक गहरी नींद में सुला दे रहा है. सब खामोश हैं. मानवता की बात करने वाले. वो लोग भी जो सहिष्णु होने का दावा करते हैं.
बच्चों और बुजुर्गों को बचाने के संघर्ष रोंगटे खड़े कर देता है. (Photo : Reuters)
बच्चों और बुजुर्गों को बचाने के संघर्ष रोंगटे खड़े कर देता है. (Photo : Reuters)

वो बुद्धिस्ट भी तमाशा देख रहे हैं और कातिल बने जा रहे हैं जो खुद को शांतिप्रिय कहते हैं. इन मुसलमानों को भागते हुए सब देख रहे हैं, लेकिन कोई भी उनका हाथ थामने को तैयार नहीं है. क्यों सिर्फ? इसलिए क्योंकि वो हमारे मज़हब के नहीं. क्यों मुस्लिम देश भी खामोश हैं, क्या इन मुसलमानों से किसी को कोई फायदा नहीं होने वाला है?
ईद-उल-अज़हा के दिन रोहिंग्या मुस्लिम ने नमाज़ पढ़कर अपनी हिफाज़त की दुआ की. (Photo : Reuters)
ईद-उल-अज़हा के दिन रोहिंग्या मुस्लिम ने नमाज़ पढ़कर अपनी हिफाज़त की दुआ की. (Photo : Reuters)

इन मुसलमानों के लिए म्यांमार में इतनी नफरत कि उनके घरों को जलाया जा रहा है. उन्हें क़त्ल किया जा रहा है. उनको देश से भगाया जा रहा है. मगर आंग सान सू की को लगता है जैसे कुछ पता नहीं. वे बर्मा के राष्ट्रपिता आंग सान की बेटी हैं, जिनकी 1947 में राजनीतिक हत्या कर दी गई थी. ये सच है कि आंग सान सू की ने बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना के लिए लंबा संघर्ष किया है. लेकिन सैनिक सरकार का विरोध करने वाली सू की का सत्ता में होने के बाद भी खामोश रहना हैरान करता है.
आंग सान सू की. (Source : Reuters)
आंग सान सू की. (Source : Reuters)

आर्कबिशप डेसमंड टूटू से लेकर मलाला यूसुफजई तक- 12 नोबल पुरस्कार विजेता स्टेट काउंसलर आंग सान सू की से अपील कर चुके हैं. शांति की अपीलों को दरकिनार करते हुए पूरे मामले पर सू की ने बड़े ही रहस्यमय ढंग से चुप्पी साध रखी है. इस मामले में वह अपने पिता आंग सान जैसा रवैया ही अपनाती दिख रही हैं, जिन्होंने 1947 में पांगलॉन्ग वार्ता में रोहिंग्या प्रतिनिधियों को बुलाना जरूरी नहीं समझा था. यह सम्मेलन अलग-अलग जातीय समूहों को बर्मा के नए संघ में लाने के लिए था.
म्यांमार छोड़कर मुसलमान अपनी जान बचाने के लिए दरबदर भटक रहे हैं. (Photo : Reuters)
म्यांमार छोड़कर मुसलमान अपनी जान बचाने के लिए दरबदर भटक रहे हैं. (Photo : Reuters)

इन तस्वीरों को देखकर कोई भी हिल जाएगा. इंसानियत बाकी होगी तो दिमाग सुन्न हो जाएगा. कैसे इंसान, इंसान को मार रहा है. दुनिया जंगल बन रही है. लगता है सबको बोलने के लिए अपनी बारी का इंतजार है.
बॉर्डर क्रॉस करने के दौरान बंगाल की खाड़ी में बोट पलट गई. मौत से बचकर भाग रहे रोहिंग्या पानी की गोद में सो गए.
बॉर्डर क्रॉस करने के दौरान बंगाल की खाड़ी में बोट पलट गई. मौत से बचकर भाग रहे रोहिंग्या पानी की गोद में सो गए.

2 सितंबर की खबर है. म्यांमार सरकार का कहना है कि देश के पश्चिमोत्तर में रोहिंग्या बहुल इलाके में पिछले हफ्ते के दौरान 2600 से अधिक घर जला दिए गए. कई दशक के बाद यह अपने आप में सबसे खतरनाक हिंसा थी, जिसमें मुस्लिम अल्पसंख्यक शामिल थे.
म्यांमार के कई गांवों में रोहिंग्या मुस्लिम के ढाई हज़ार से ज्यादा घर जला दिए गए. (Photo : Reuters)
म्यांमार के कई गांवों में रोहिंग्या मुस्लिम के ढाई हज़ार से ज्यादा घर जला दिए गए. (Photo : Reuters)

म्यांमार के कोटनकौक, मिनलुट और कयिकनपयिन गांवों के और मुंगतॉ के दो वार्डो के कुल 2,625 घर जलाए गए हैं. म्यांमार के अफसरों ने रहाइन स्टेट के गांवों में घटी इस घटना के लिए अराकान रोहिंगया साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) को जिम्मेदार ठहराया है, जो कथित तौर पर रोहिंग्या मुसलमानों की रक्षा करती है.
घरों में आग लगने (Photo : Reuters)
म्यांमार के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हिंसा में 400 लोग मारे गए.  (Photo : Reuters)

अफसरों का कहना है कि रोहिंग्या विद्रोहियों ने सुरक्षाबलों पर 31 अगस्त को सुनियोजित हमले किए, जिसके बाद से सुरक्षाबल और विद्रोहियों के बीच हिंसा जारी है. इसके बाद से ही रोहिंग्या मुस्लिम पलायन को मजबूर हो गए हैं. बचने के लिए हजारों रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश भाग रहे हैं, लेकिन सीमा पर फंसे हैं. दूसरी तरफ सरकार ने रहाइन इलाके में रहने वाले हजारों बौद्धधर्मियों को सुरक्षित निकाला है.
सिर पर छत तो बड़ी बात है. खाने के लिए भी नहीं मिल पा रहा है. (Photo : Reuters)
सिर पर छत तो बड़ी बात है. खाने के लिए भी नहीं मिल पा रहा है. (Photo : Reuters)

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा कि म्यांमारी सेना द्वारा जारी आगजनी और हत्या की घटनाएं ही इस इलाके में नरसंहार और तबाही के लिए जिम्मेदार हैं. सरकारी अफसरों ने उत्तरी रहाइन की गैर मुस्लिम आबादी का जिक्र करते हुए बताया था कि सेना की कार्रवाई में कम से कम 400 लोग मारे जा चुके हैं और 11,700 जातीय निवासी इलाके से पलायन कर गए हैं.
अबतक कई हज़ार मुस्लिम म्यांमार से पलायन आर गए हैं. (Photo : Reuters)
अबतक कई हज़ार मुस्लिम म्यांमार से पलायन आर गए हैं. (Photo : Reuters)

म्यांमार सेना का कहना है कि जो 400 लोग मारे गए वो उग्रवादी थे. अगर वो उग्रवादी थे तो फिर क्यों बाकी को सुरक्षा नहीं दी जा रही, जो उन्हें अपनी जिंदगी बचाने के लिए गांव छोड़ने पड़ रहे हैं. क्यों उनके घर जला दिए जा रहे हैं. क्यों उन्हें इतना मजबूर कर दिया गया है कि वो पैदल सरपट दौड़े जा रहे हैं. वो भाग रहे हैं नौकाओं से. वो भाग रहे हैं कीचड़ में.
अगर म्यांमार में रुकते हैं तो हिंसा में जान जा रही है. भागते हैं तो पानी में डूब जा रहे हैं. (Photo : Reuters)
अगर म्यांमार में रुकते हैं तो हिंसा में जान जा रही है. भागते हैं तो पानी में डूब जा रहे हैं. (Photo : Reuters)

उस कीचड़ में जहां कदम बढ़ाना मुश्किल है. लेकिन वो इसलिए मुश्किल नहीं लग रहा, क्योंकि मौत उनका पीछा कर रही है. नौकाएं डूब जा रही हैं. वो मर जा रहे हैं. सवाल ये भी है कि अगर सेना उग्रवादियों को मार रही है तो फिर बच्चों की लाशें क्यों सामने आ रही हैं?
मरने वालों में मर्द ही नहीं औरतें और बच्चे भी हैं, जिनकी लाशें कलेजा काटती हैं. (Photo : Reuters)
मरने वालों में मर्द ही नहीं औरतें और बच्चे भी हैं, जिनकी लाशें कलेजा काटती हैं. (Photo : Reuters)

2 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की प्रवक्ता विवियान तान ने कहा, '25 अगस्त को हिंसा फैलने के बाद से करीब 60 हज़ार लोग बांग्लादेश पहुंच चुके हैं.' 1 सितंबर को म्यांमार के स्थानीय अधिकारियों ने जो आंकड़ा दिया था, उससे यह आंकड़ा करीब 20 हज़ार ज्यादा है.
मर जा रहे लोगों की कब्रें ऐसी जगह बन रही हैं, जहां उनके रिश्तेदारों का आना भी होगा या नहीं. (Photo : Reuters)
मर जा रहे लोगों की कब्रें ऐसी जगह बन रही हैं, जहां उनके रिश्तेदारों का आना भी होगा या नहीं. (Photo : Reuters)

कौन हैं रोहिंग्या मुस्लिम ?

रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार के रहाइन (राखिन के नाम से भी जाना जाता है) स्टेट में रहने वाले अल्पसंख्यक हैं. जो सुन्नी इस्लाम को मानते हैं. ये रोहिंग्या भाषा बोलते हैं. प्रतिबंध होने की वजह से ये पढ़े-लिखे नहीं हैं. सिर्फ बुनियादी इस्लामी तालीम ही हासिल कर पाते हैं. इस देश में सदियों से हैं. 1400 के आसपास ये रहाइन में आकर बसे थे. 1430 में ये रहाइन पर राज करने वाले बौद्ध राजा नारामीखला के दरबार में नौकर थे. राजा ने मुस्लिम एडवाइजरों और दरबारियों को अपनी राजधानी में जगह दी. रहाइन स्टेट म्यांमार का वेस्ट बॉर्डर है, जो बांग्लादेश के बॉर्डर के पास है. यहां के शासकों ने भी मुगल शासकों की तरह अपनी सेना में मुस्लिम पदवियों को रखा और इस तरह मुस्लिम कम्युनिटी वहां पनपती गई.
बांग्लादेश बचकर भाग रहे लोगों की कई बोट पानी में समा गईं हैं. जो जिंदा हैं उनका संघर्ष जारी है. (Photo : Reuters)
बचकर भाग रहे लोगों की कई बोट पानी में समा गईं हैं. जो जिंदा हैं, उनका संघर्ष जारी है. (Photo : Reuters)

कैसे बढ़ी नफरत?

साल 1785 बर्मा के बौद्धों का अटैक. रहाइन पर कब्ज़ा कर लिया. ये म्यांमार में पहला मौका था, जब मुस्लिमों को मारा गया. जो बाकी बचे उन्हें वहां से खदेड़ दिया गया. इस दौरान करीब 35 हजार लोग बंगाल चले गए. 1824 से 1826 तक हुआ एंग्लो-बर्मीज वार. 1826 में रहाइन अंग्रेजों के कब्जे में आ गया. अंग्रेजों ने बंगालियों को बुलाया और रहाइन इलाके में बसने को कहा. इसी दौरान रोहिंग्या मूल के मुस्लिमों को भी रहने के लिए प्रोत्साहित किया. बड़ी तादाद में बंगाल और भारत से प्रवासी वहां पहुंचे. रहाइन के बौद्धों में एंटी मुस्लिम फीलिंग पनपने लगी और ये ही जातीय तनाव अब बड़ा रूप ले रहा है.
इन मुसलमानों के पास अपनी दुआएं हैं. आंसू हैं. किसी का कोई सहारा नहीं है. (Photo : Reuters)
इन मुसलमानों के पास अपनी दुआएं हैं. आंसू हैं. किसी का कोई सहारा नहीं है. (Photo : Reuters)

दूसरा वर्ल्ड वार. जापान का इस इलाके में दबदबा बढ़ा. अंग्रेज रहाइन छोड़ गए. बस फिर क्या मुस्लिम और बौद्ध एक दूसरे को क़त्ल करने लगे. रोहिंग्या मुस्लिमों को लगा अंग्रेजों का संरक्षण मिले तो वो सेफ रह सकते हैं, इसलिए इन्होंने जापानी सैनिकों की जासूसी की. जापानियों का पता चला तो मुस्लिमों पर और जुल्म बढ़ गया. हत्याएं हुईं, रेप किये गए. लाखों मुस्लिम एक बार फिर बंगाल चले गए.
कहां वो मसीहा, जो इनको हत्याओं से बचा ले. (Photo : Reuters)
कहां वो मसीहा, जो इनको हत्याओं से बचा ले. (Photo : Reuters)

नहीं मिली सिटीजनशिप

1962 में जनरल नेविन की लीडरशिप में तख्तापलट हुआ. रोहिंग्या मुस्लिमों ने रहाइन में एक अलग रोहिंग्या देश बनाने की मांग की. सैनिक शासन ने रोहिंग्या लोगों को सिटीजनशिप देने से इनकार कर दिया. तब से ये बिना देश वाले बनकर रह रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्ट में जिक्र हुआ कि रोहिंग्या दुनिया के ऐसे मुस्लिम हैं, जिनका सबसे ज्यादा दमन हुआ.
म्यांमार की इस हिंसा में हिंदू लोग भी दरबदर हो गए हैं. वो भी सेना के ज़ुल्म के शिकार हैं. (Photo : Reuters)
म्यांमार की इस हिंसा में हिंदू लोग भी दरबदर हो गए हैं. वो भी सेना के ज़ुल्म के शिकार हैं. (Photo : Reuters)

बर्मा के सैनिक शासन ने 1982 में सभी राइट्स छीन लिए. तब से अबतक कई बार इनकी बस्तियों को जलाया गया. जमीने हड़पी गईं. मस्जिदों को ढहाया गया. देश से खदेड़ा गया. नए स्कूल, मकान, दुकानें और मस्जिदें बनाने की इजाजत नहीं है.


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