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'कोई हिंदी का चेतन भगत बोलता है तो गाली लगती है'

पढ़िए 'नई हिंदी' के नौजवान लेखक दिव्य प्रकाश दुबे का इंटरव्यू.

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फोटो - thelallantop
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कुलदीप
8 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 8 नवंबर 2016, 10:02 AM IST)
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80-90 के दशक के नॉस्टैल्जिया को दिव्य प्रकाश दुबे ने बड़ा साफ-सुथरा करके लिखा है. पढ़ते हुए आप स्माइल करते चलते हैं. उनकी कहानियों में क्षेपक की तरह आने वाले 'वन लाइनर्स' इस पीढ़ी के लिए ज्यादा संबद्ध है. वे पाठक संख्या में जितने भी हों, उन्होंने स्कूल के बाद अगर दूसरी बार हिंदी की किताब उठाई है तो इसका श्रेय आप दिव्य और उनके जैसे दो-चार लेखकों को दिया जाना चाहिए. 'साहित्य आजतक' प्रोग्राम में दिव्य प्रकाश हमारे साथ होंगे. अगर आप आओगे तो आपके भी साथ होंगे. उनके बारे में और जानना हो तो ये इंटरव्यू पढ़ो.
उनकी तीसरी किताब 'मुसाफिर कैफे' आई. 10 दिन में इसकी 5 हजार कॉपी बिक गई. हिंदी किताबों की बिक्री के लिहाज से ये बहुत अच्छा आंकड़ा है. इसके पहले उनकी दो किताबें 'टर्म्स एंड कंडिशंस अप्लाई' और 'मसाला चाय' आ चुकी है.
दिव्य पेशे से मार्केटिंग मैनेजर हैं. मुंबई में रहते हैं. हमने उनसे फोन पर बात की.
गुरु इत्ता टाइम कहां से निकालते हो?
नहीं हम तो वर्किंग वाले मोड में ही रहते हैं. साल भर में 100 छुट्टियां होती हैं, सैटरडे संडे वाली. तो मैं छुट्टियों को एक-दो दिन करके नहीं देखता, 100 दिन करके एक साथ सोचता हूं, फिर मैनेज करता हूं. और जो लोग नौकरी करते हुए लिख ऱहे हैं, उनका स्टेबल रिलेशनशिप में होना बहुत जरूरी है.
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'टर्म्स एंड कंडिशंस अप्लाई', 'मसाला चाय' और अब 'मुसाफिर कैफे'. राइटिंग स्टाइल में क्या बदलाव आए हैं?
पहले 'तुरंत कुछ लिखा, तुरंत फीडबैक चाहिए' वाला हिसाब-किताब था. जैसे एक घंटे में कुछ लिखा. फेसबुक पर डाल दिया. जैसे लोग लिखते हैं, 'लिखी जा रही किताब का अंश.' लेकिन वो फर्जीवाड़ा है. नॉवेल लिखना या किताब लिखने का मतलब है, खुद का होल्ड करना. लंबा गेम खेलना है तो होल्ड करना है. TnC में बहुत सारी कहानियां सिंगल या दो कैरेक्टर हैं. धीरे धीरे कहानियां कॉम्प्लेक्स हुईं. कई किरदार हुए तो एक लंबे अंतराल में सोचना पड़ा कि ऐसा क्या करें कि पाठक पहले पेज से 150 पेज तक जाए तो सही. धीरे-धीरे समझ में आया. ये वैसा ही है कि जंगल में आप लालटेन लेकर जाओ तो एक बार में एक ही कदम दिखता है. लेकिन चलते-चलते पूरा रास्ता दिख जाता है.
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इससे पहले आपका लिखा जो पढ़ा था, उसमें कॉलेज, कैंटीन, बैक बेंच, प्लेसमेंट, शादी की बात, ये सब था. अब ऐसा लगता है कि सुधा और चंदर के साथ आपके किरदार एक कदम आगे बढ़ गए हैं. जमी हुई नौकरी है. क्या आप स्टूडेंट्स के साथ सर्विस सेक्टर के नौकरीपेशा नौजवानों को भी केटर करना चाहते हैं? और इसके बाद किरदार और परिपक्व होंगे?
अच्छा ऑब्जर्वेशन है. 'मसाला चाय' और 'टीएनसी' में बहुत कुछ नॉस्टैल्जिया से आता था. मुझे लगा कि यार ये खेल तो मुझे समझ में आ गया. अब ऐसा काम करता हूं जो नहीं आता. फिर नॉवेल लिखनी शुरू की. 30-35 पन्ने लिख के छोड़ दी. मजा नहीं आ रहा था. फिर वो बात है ना, 'जमाने से आगे तो बढ़िए मजाज. ज़माने को आगे बढ़ाना भी है.' मैं नॉस्टैल्जिया से बोर हो गया था. सारी कहानियां नॉस्टैल्जिया से जुड़ी थीं. नैचुरली किरदारों में एक ग्रोथ तो थी. वो मुहल्ले का ही लड़का है जो बड़ा होकर चंदर हो गया.
शादी को लेकर आपके क्या विचार हैं?
हा हा हा. वही है यार जो लिख दिया. शादी तभी होती है, जब तीन लोग हों. दो लोग हों तो कोई शादी करता है क्या? और ये बात आदमी शादी करके ही जान सकता है.
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जब लोग 'हिंदी का चेतन भगत' कहते हैं तो कैसा लगता है?
गाली लगती है. ये बात ये भी बताती है कि हिंदी में हमारे पास कोई पैरलल नहीं है. बहुत सारे लोग मिलते हैं तो कहते हैं कि प्रेमचंद के बाद बस आपको पढ़ा है. पर पूरा सच ये है कि उस आदमी ने दसवीं में प्रेमचंद की एक-दो कहानी पढ़ी थी. तब से उसे हिंदी फिक्शन पढ़ा ही नहीं था. जो बिकता है, उसे आप क्या बोलोगे. आप हिंदी का सुरेंद्रमोहन पाठक किसे बोलेंगे? हिंदी में बिकने वाले लेखक के लिए हमारे पास मेटाफर ही नहीं. लाखों में बिकते थे पाठक, अब पचास हजार बिकने में नानी याद आ रही है.
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चेतन से मुलाकात तो हुई होगी?
दो बार मुलाकात है चेतन है. एक बार कहीं आया था. तो एक दोस्त ने कहा कि फोटो खिंचा लो. कैप्शन डालना, 'अंग्रेजी वाले चेतन भगत के साथ'. स्टार एंकर हंट हुआ था. लखनऊ से मैं भी शॉर्टलिस्ट हुआ था. चेतन भगत और दीपक चौरसिया जज थे. चेतन ने पूछा कि एमबीए करके एंकर क्यों बनना है? मैंने कहा कि आप ही का बिगाड़ा हुआ हूं. एमबीए कर लिया तो सपना नहीं देख सकता क्या? तो चेतन ने बाकी लोगों से कहा कि देखो इन लोगों की वजह से क्रिटिसिज्म होता है हमारा. थोड़ी गहमागहमी हो गई. बाद में बाहर मिला तो अलग से हाथ मिलाया और बोला कि कैमरे के सामने ऐसा होता है.
चेतन भगत तो ठीक हैं. आपके फेवरेट लेखक कौन हैं?
राही मासूम रज़ा. जहां के वे हैं, मैं भी वहीं का हूं. गाजीपुर का. ऐसे लोगों की हिंदुस्तान में पूजा होनी चाहिए. दूसरे, मनोहर श्याम जोशी हैं. उनके जैसी टीवी राइटिंग कोई कर नहीं पाया हिंदुस्तान में.
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अब तक मिला सबसे चौचक कॉम्प्लिमेंट?
हा हा. एक तो यही आया थी कि यार तुमने शादी बहुत जल्दी कर ली. बाकी तारीफ तो बहुत तरीकों से की जा सकती है. पीयूष मिश्रा ने ये बोला था कि तुमने अनुराग को दी अपनी कहानियां? पढ़वाओ उसे. तब मेरी कोई किताब नहीं छपी थी.
वन लाइनर्स कितने जरूरी हैं, इस तरह के नॉवेल के लिए. कहां से लाते हैं?
आप कोई वाकया लिखते हो, फिर आपको आपको बताना तो पड़ता है कि ओवरवॉल हुआ क्या. वहीं पर वनलाइनर्स काम आते हैं. वन लाइनर्स कहानी का एक हिस्सा एकदम से कंप्लीट कर देती है. 'समराइज' कर देती हैं. कई बार वनलाइनर्स पहले से दिमाग में आ जाते हैं. जैसे ये वाला था- 'कहानियां कोई भी झूठ नहीं होतीं. हो चुकी होती हैं, या हो रही होती हैं, होने वाली होती हैं.' ये पहले ही सोच लिया था. फिर मैं मार्केटिंग का आदमी हूं तो वो मुझमें है थोड़ा, बात को एक झटके में कह देना.
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लिखने का मैकेनिज्म और माहौल कैसा? कितना ट्रैवल कर पाते हैं? कहां कहां कहानियां खोजते हैं. नौकरी करते करते लिख लेते हैं या छुट्टी लेकर?
टेबल पर हर लेखक जब बैठता है तो वो उसका इंडिविजुअल टाइम है. एकांत. मजा आना चाहिए. वो मजा जितने में भी आ जाए. सोचकर बैठते हैं तो उतना ही नहीं होता है. कई बार एक लाइन ऐसी आ जाती है कि मजा आ जाए. वो आपको अपने 'अननोन' (अज्ञात) पर छोड़ना पड़ता है. यह प्रार्थना जैसा है. लिखते हुए आप खुद को छोड़ देते हैं. एडिटिंग में ऐसा नहीं होता. वो दिमाग से करते हैं.
लिखते हुए आप जितना ज्यादा सरेंडर करेंगे उतना अच्छा निकलकर आएगा. लोग अपना लिखा काट नहीं पाते. मेरा पहला ड्राफ्ट जल्दी आता है, फिर एडिटिंग में टाइम लगता है. लिखने के लिए जो सरेंडर चाहिए वो हमें मांओं से सीखना चाहिए. सरेंडर मांओं से सरेंडर सीखना चाहिए. मां से रश्क होता है कि उन्हें जितना विश्वास भगवान पर है, उतना मुझे खुद पर नहीं है. कोई कहता था कि जब आप किताब लिख रहे हो तो 95 परसेंट मजा किताब छपने से पहले आ जाता है. अच्छी बात है कि हम एक बार में एक से ज्यादा किताब नहीं पढ़ पाते. वरना ये भी मंदिर मस्जिद हो जाता.
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दिव्य प्रकाश दुबे.

थोड़ा Vague सवाल है, लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि आपका लाइफ गोल क्या है? फिल्म विल्म?
फिल्म और टीवी के लिए लोग बुलाते भी हैं. लेकिन वो यार राइटर मीडियम है नहीं. वो ऐसे आदमी की तरह ट्रीट करते हैं कि ये टाइप करके ले आएगा. कम लोग हैं जिन्हें फिल्मों में लिखकर सम्मान मिलता है. वो सम्मान किताब में है. मैं चाहूंगा कि कभी मेरी लिखी किताब पर फिल्म बनाई जाए. दूसरा, एयरपोर्ट पर आदमी किताब उठाए तो ये सोचकर न रख दे कि ये हिंदी की है या मराठी की है. ये इनफीरियर फीलिंग खत्म हो.
आपके साथ के जो लेखक हैं, निखिल, सत्य व्यास, आशीष चौधरी वगैरह. आप लोग आपस में एक-दूसरे के राइटिंग स्टाइल पर बात करते हैं? कि यार तू वन लाइनसर्स अच्छे लिखता है या तेरी ये स्टाइल मस्त है.
हां एक व्हॉट्सएप ग्रुप है. निखिल, मैं, सत्य व्यास और आशीष चौधरी का. वहां हम फेसबुक पर क्रांति करने वाली लड़कियों की बात तो करते हैं. ऐसी बातें जिन्हें पब्लिक कर दें तो हमारी किताबें बिकनी बंद हो जाएं. लेकिन इसी ग्रुप पर हम ईमानदार फीडबैक भी एक-दूसरे को देते हैं. अभी मकसद ये नहीं है कि किसी एक की बिक्री 10 हजार हो जाए. उससे बेहतर है कि हमारे सब के मिलाकर 50 हजार हो जाएं. अभी लड़ाई वहां नहीं है कि यार तुम्हारी इतनी बिक गई, हमारी इतनी. शैलेश (भारतवासी) की अच्छी बात ये है कि वो ज्यादा खुश नहीं होते, न उदास होते हैं.
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नौकरी करते हुए लिखना, थकान भरा नहीं है? मतलब मैं तो रोज घर से दफ्तर आने-जाने में ही थक जाता हूं.
यार मैं यहां की थकावट वहां निकाल लेता हूं और वहां की यहां. मुझे किसी ने जबरदस्ती थोड़े ही न लिखने भेजा है. अपनी मरजी से लिख रहा हूं. लोगों को डिफाई करते हुए आ रहा हूं. अब तो वैसा है कि जैसे सोना, वैसे लिखना.
और जिस तरह की नौकरी है, थोड़ी ट्रैवलिंग लगी रहती है. अपब्रिंगिंग से आती है. बचपन में कई स्कूल बदले. बनारस से लेकर गाजियाबाद तक. हर जुबान-कल्चर के लोगों के साथ रहा. वहां भी जहां 8 घंटे लाइट जाती थी और वहां भी जहां कटती नहीं थी. घूमना कोई इकलौती चीज नहीं है जो आपको राइटर बना दे. उसका मतलब कंफर्ट जोन से बाहर आने से है. आप घर में बैठे-बैठे वैसा कर सकते हैं. बशर्ते नया नया पढ़ते रहें. जैसे जर्मन कार या जापानी कार चलाकर, उसके एक्सीलीरेटर दबाकर मैं जर्मनी या जापान के बारे में उतना नहीं जान सकता. लेकिन मैं वहां की रद्दी से रद्दी किताब पढ़ के वहां के बारे में थोड़ा बहुत आइडिया लगा सकता हूं. और ये इंटरनेट का दौर है.
अब क्या लिख रहे हैं?
एक वेब सीरीज लिखकर रखी हुई है. वेट कर रहा हूं कोई खरीद ले. एकाध फिल्में अधूरी हैं.
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उन लोगों से कुछ कहना है जो हिंदी साहित्य के पुरोधा हैं और जो आप जैसे नौजवान लेखकों को कम भाव देते हैं?
उन लोगों से कुछ कहना नहीं है. मिलेंगे तो अब भी पैर ही छुएंगे. मेरा पर्सनल तजुर्बा उनके साथ कोई बुरा नहीं है. लेकिन मैंने उनके अप्रूवल का कभी वेट नहीं किया. कभी काशीनाथ सिंह कहें कि क्या कूड़ा कर्कट छप रहा है. मैं इस अप्रूवल का वेट नहीं कर रहा. मैं विनम्रता से कहना चाहूंगा कि आई डोंट केयर. जिस मिनट मैं उनका सोचूंगा तो नहीं लिख पाऊंगा, जो लिख रहा हूं. एक्चुली जैसे ही हम 'नई वाली हिंदी' कहते ही, पुरानी हिंदी को मान्यता मिलती है. पुरानी हिंदी के राइटर एक लेवल के परे नहीं जा रहे. कोई इस आशा में है कि सुधीश पचौरी या अशोक वाजपेयी कुछ बोल दें तो मैं धन्य हो जाऊंगा, तो वही सबसे बड़ा फेलियर है. जो लोग रिएक्शन दे रहे हैं. वही असली हैं. अवॉर्ड किसी को भी मिले लेकिन हम लोग हीरो तो हैं. गोविंदा की फिल्म की तरह.
आने वाले समय में आपके किस्म का लेखन और आलोचक दोनों बने रहेंगे?
पैरलल चलेगा. हर कोई अपना मेनस्ट्रीम करने की सोच रहा है. आप लेफ्ट खड़े हो या राइट खड़े हो. बहुत सारे ऐसे लोग हैं कि छोटी सी पतली सी पगडंडी से वहां पहुंच कर दोनों तरफ की रिएलटी देख रहे हैं. आलोचकों के काम ज्यादा एग्जिस्ट नहीं करेंगे. लोग पढ़ने के बाद इतने रिएक्टिव हो गए हैं. तुरंत फोटो भेजते हैं. आलोचक आलोचक वाला कौन देखता है. वर्चुअली एग्जिस्ट नहीं करते वे भी. वो तो मुझे नहीं लगता कि आने वाले समय में वो बचेगा. पाठक की राय ही अहम होगी. कुछ लोग ओपिनियन लीडर जरूर होंगे, पर पाठक ही दाखिल-खारिज करेगा.


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