6 दिसंबर 1992. भारत के सीने से कभी न मिटने वाली तारीख. बाबरी मस्जिद को उन्मादीभीड़ ने ढहा दिया. बाबरी विवाद यूं तो बेहद पुराना और आज भी बादस्तूर जारी है.लेकिन 1992 से 6 साल पहले एक ऐसा सांसद थे, जिसने बाबरी विवाद की वजह से मुसलमानोंसे 'रिपब्लिक डे' के बायकॉट करने का ऐलान किया. जनता पार्टी से सांसद सैयदशहाबुद्दीन. 23 दिसंबर 1986 को नवगठित अखिल भारतीय बाबरी मस्जिद कॉन्फ्रेंस नेमीडिया को बुलाया. मकसद था 26 जनवरी के बायकॉट का ऐलान. शुरू में इस ऐलान पर ज्यादाकिसी ने ध्यान नहीं दिया लेकिन बाद में मामला तूल पकड़ता गया. सैयद शहाबुद्दीनबाबरी मस्जिद के हक में बोलने वाले बड़े नेताओं में शुमार थे. सैयद शहाबुद्दीन नेउस साल मुसलमानों को 'सरकारी समारोहों' से अलग रहने की अपील करार दी. लेकिन इस अपीलसे हालात बिगड़ चुके थे. जानकार बताते हैं कि इस ऐलान से आठ करोड़ मुसलमानों औरसरकार के बीच संबंधों में भारी कड़वाहट भर जाने का अंदेशा पैदा हो गया. फैसले कामुसलमानों ने ही किया विरोध ऐसा नहीं था कि इस ऐलान से सरकार और मुसलमानों के बीचसंबंध मधुर थे. खासकर मुसलमानों और बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के बीच कड़वाहट तो पहलेसे ही थी. लेकिन इस फैसले से खतरे पहले के मुकाबले ज्यादा बढ़ गए थे. इंका के एकबागी नेता आरिफ खां के मुताबिक, इस फैसले से दोनों समुदायों में इतना ज्यादाअविश्वास पैदा हो जाएगा, जितना कुल मिलाकर हुए सांम्प्रदायिक दंगों से भी न हुआहोगा. इसी को देखते हुए सैयद शहाबुद्दीन के इस फैसले का कुछ मुस्लिम नेताओं नेविरोध भी किया. करीब दो दर्जन प्रतिष्ठित मुसलमानों ने इस फैसले के खतरे को देखतेहुए साझा बयान जारी किया था. ज्यादातर ने माना कि इससे तनाव और झगड़े बढ़ेंगे औरअंजाम ये होगा कि महत्वपूर्ण और प्रतिभाशाली मुस्लिम लोकतांत्रिक भारत से कट जाएगा.इस फैसले में सैयद के साथ इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष सुलेमान सेठ भीखड़े नजर आए. हालांकि दोनों को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा. चंद्रशेखर नेशहाबुद्दीन के खिलाफ नहीं की कार्रवाई जनता परिवार अध्यक्ष चंद्रशेखर ने मुस्लिमनेताओं ने इस फैसले पर विचार करने की अपील की. चंद्रशेखर ने कहा, 'गणतंत्र दिवस देशके लिए खुशी मनाने का दिन है. चाहे कितनी भी उत्तेजना क्यों न हो. किसी भी समुदायको इस समारोह का महत्व घटाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.' हालांकि उन्होंने सैयदशहाबुद्दीन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. सैयद शहाबूद्दीन के इस फैसले को बाबरीमस्जिद के पक्ष में खड़े लोगों की तरफ से किया एक गलत फैसला बताया जाता है. 1992में बाबरी विध्वंस के बाद सैयद सक्रिय राजनीति से दूर ही रहे. लेकिन इतिहास मेंसंभवत: वो पहले ऐसा राजनेता बन गए थे, जिसने लोकतंत्र के पर्व रिपब्लिक डे का विरोधकिया.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें: कहानी शहाबुद्दीन की जिसने दो भाइयों को तेजाब से नहला दिया था 25 सालका डॉन जिसने CM की सुपारी ली थी राजस्थान का सबसे बड़ा गुंडा AK-47 लेकर बकरियांचुरा रहा है