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मेट्रो में चल रहे कई लोगों की धड़कन ये एक बात जानकर तेज हो सकती है

और ये बहुत वाहियात बात होगी.

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12 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 21 अक्तूबर 2017, 04:37 PM IST)
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दिल्ली में मेट्रो के बिना काम चलना मुश्किल है. इसे दिल्ली की लाइफलाइन कहा जा सकता है. रोज़ लाखों लोग ऑफिस से घर, घर से ऑफिस, एयरपोर्ट और देर रात पार्टी करके घर जाने के लिए मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं. दिल्ली मेट्रो 2002 में लॉन्च हुई थी. ड्राइवरों की गिनती के हिसाब से दिल्ली मेट्रो दुनिया का दसवां सबसे बड़ा मेट्रो सिस्टम है. मेट्रो को ऐसे लोग ऑपरेट करते हैं, जो कभी-कभी लगातार 6 घंटों तक काम करते हैं. सिर्फ इसलिए, ताकि हम सुरक्षित ढंग से टाइम पर पहुंच सकें.

इन ऑपरेटर्स में कुछ महिलाएं भी हैं, जिनके परिवार वाले उन पर गर्व महसूस करते हैं. 2015 में दिल्ली मेट्रो की अलग-अलग लाइन्स को संभालने के लिए 60 फीमेल ऑपरेटर्स थीं. दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ( DMRC) में कॉर्पोरेट कम्युनिकशेन के जनरल मैनेजर अनुज दयाल बताते हैं, ' 2002 में जब दिल्ली मेट्रो शुरू हुई थी, तब हमने पहले फ़ेज़ में दो महिला ड्राइवर्स रखे थे. ये संख्या बढ़ी है, फिर भी ये पुरुषों से कम है. हाल ही में गुड़गांव रैपिड मेट्रो का उद्घाटन हुआ. इसमें भी महिला ड्राइवर्स को रखा गया है.' सरकार में मौजूद सूत्रों का कहना है, 'महिला ट्रेन ऑपरेटर्स का मिलना मुश्किल होता है, क्योंकि बहुत सारी महिलाएं तो अप्लाई ही नहीं करतीं और जो करती भी हैं, उनमें से ज़्यादातर बेसिक एग्ज़ाम भी पास नहीं कर पातीं.'

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दिक्कत यही है. लोग ड्राइविंग और महिलाओं को लेकर ऐसी सोच रखते हैं. टेक्निकल पोस्ट पर सिलेक्शन के लिए पहले एक लिखित एग्जाम होता है, फिर साइकोलॉजिकल टेस्ट और आखिर में एक इंटरव्यू. महिलाओं को हर दिन सड़क पर पुरुषवाद झेलना पड़ता है. मुझे नहीं लगता कि आपको ये बताने की ज़रूरत है कि वो क्या करते हैं. महिला ड्राइवर सड़क पर ज़रा सी भी गलती कर दे, तो ये लोग नर्क मचा देते हैं. हो सकता है DMRC और रैपिड मेट्रो में ऐसा न होता हो, लेकिन जैसे ही लोगों को पता चलेगा कि जिस मेट्रो में वो बैठे हैं, उसे कोई लड़की चला रही है, तो वो पीछे जरूर यही सोचेंगे.

हिंदुस्तान टाइम्स ने हाल ही में दो महिला ट्रेन ऑपरेटर्स के इंटरव्यू लिए. ये दोनों गुड़गांव रैपिड मेट्रो लाइन में काम कर रही हैं. इनका नाम है प्रिया सचान और गायत्री सिंह. इन पर न सिर्फ इनके परिवार को गर्व है, बल्कि यात्री भी दोनों को बहुत इज़्जत देते हैं, इनमें से कई यात्री तो चाहते हैं कि उनकी बेटी भी बड़ी होकर ऐसा काम करे. सरकारी अधिकारियों का सोचना है कि ये काम टेक्निकल है, इसलिए उनके पास जितनी एप्लिकेशन्स आती हैं, वो ज़्यादातर पुरुषों की होती हैं. जो लोग सिलेक्ट होते हैं, उनकी 7-8 महीने की ट्रेनिंग होती है. इन्हें सीधे-सीधे ट्रेनें कंट्रोल करने को नहीं दे दी जाती हैं. पहले इनके हाथ सिम्युलेटर पर बैठाए जाते हैं. पढ़े-लिखे ये ऑपरेटर्स अपने डिसीज़न को लेकर बहुत क्लियर होते हैं.

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इन्हें इस बात का अहसास होता है कि इनकी नौकरी कितनी ज़िम्मेदारियों भरी है. लेकिन बात तो यही है कि अब भी DMRC की ये नौकरी लड़कियों की पहली पसंद नहीं है. जो महिलाएं यहां नौकरी कर रही हैं, उन्हें अपने परिवार का पूरा सपोर्ट है. लेकिन ऐसा ज़्यादातर केसज़ में नहीं होता. आज डीटीसी और टैक्सियों में भी महिलाएं काम कर रही हैं. फिर भी सब कुछ परिवार की मर्ज़ी पर निर्भर करता है. लोग सोचते हैं कि महिलाएं अच्छी ड्राइवर नहीं हो सकतीं. परिवार वाले भी अपने घर की महिला के लिए 'सेफ़' नौकरी चाहते हैं. ऐसे में महिलाएं एक ट्रेन ऑपरेटर की नौकरी में जो फ़ायदे हासिल कर सकती हैं, उनसे दूर रह जाती हैं. महिलाओं की पोस्टिंग होमटाउन में न हो, तो उन्हें रहने के लिए घर भी दिया जाता है. लोगों की सोच में बदलाव आना बहुत ज़रूरी है, तभी मेट्रो ऑपरेटर की नौकरी में महिलाओं की गिनती बढ़ेगी.


ये आर्टिकल अंग्रेज़ी में टीना दास ने लिखा है और इसका हिंदी अनुवाद रुचिका ने किया है.


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