'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे में मोदी अभी भी सबसे लोकप्रिय, विपक्षी आसपास भी नहीं
प्रधानमंत्री की अपनी लोकप्रियता अब भी बेदाग है, जो आर्थिक मोर्चे पर सरकार के कमजोर प्रदर्शन की भरपाई करती है. उन्हें महंगाई और बेरोजगारी जैसी सभी समस्याओं पर ध्यान देने की जरूरत है, जो सर्वे में सामने आई हैं.

नरेंद्र मोदी न केवल भारत के सियासी फलक पर, बल्कि दुनिया में भी विरली राजनैतिक परिघटना हैं. यह लगातार ज्यादा से ज्यादा जाहिर होता जा रहा है. भारतीय प्रधानमंत्री की निरंतर लोकप्रियता को आप भला और कैसे समझा सकते हैं, वह भी तब जब लोकतांत्रिक दुनिया के दूसरे नेताओं, चाहे वह अमेरिका के जो बाइडन हों, फ्रांस के एमानुएल मैक्रां, जर्मनी के ओलफ शोल्ज, कनाडा के जस्टिन ट्रूडो या जापान के फूमियो किशिदा की स्वीकृति रेटिंग में गिरावट आई है.
यह इसके बावजूद है कि भारत की आर्थिक वृद्धि दर महामारी से पहले के स्तर पर नहीं लौटी है और अब भी जारी कोविड-19 की महामारी, यूक्रेन पर रूस के आक्रमण और अब ताइवान के मुद्दे पर चीन और अमेरिका के बीच घुमड़ते टकराव की वजह से खरामा-खरामा दस्तक देती आर्थिक मंदी को लेकर दुनिया भर में अनिश्चितता और चिंता बढ़ी है. अमेरिका स्थित डेटा इंटेलिजेंस कंपनी मॉर्निंग कंसल्ट पोलिटिकल इंटेलिजेंस के 4 अगस्त को जारी 22 लोकतांत्रिक देशों के वैश्विक सर्वे में मोदी की स्वीकृति रेटिंग 75 फीसद बताई, जो उन पांच नेताओं से भी काफी अधिक थी जिनकी रेटिंग में बढ़ोतरी देखी गई. जबकि सर्वे में शामिल बाकी नेताओं की लोकप्रियता खासी गिरी है (मसलन, बाइडन की रेटिंग गिरकर 38 फीसद पर आ गई).

सी-वोटर के साथ मिलकर किए गए इंडिया टुडे के ताजातरीन देश का मिजाज (MOTN) सर्वे से देश में मोदी की प्रभावशाली (उनके आलोचक इसे निरंकुश कहेंगे) राजनैतिक मौजूदगी की तस्दीक होती है. घरेलू आर्थिक दुश्वारियों के बावजूद उनकी लोकप्रियता रेटिंग 66 फीसद पर है, जो अगस्त 2021 के मुकाबले 12 फीसदी अंक बढ़ी है. हालांकि, महामारी के दुष्प्रभाव पूरी तरह तारी होने से पहले अगस्त, 2020 की 78 फीसद की शानदार ऊंचाई जितनी नहीं है. 53.4 फीसद के साथ मोदी को अब भी अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त नेता माना जाता है, जो उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वियों राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल से बहुत ज्यादा है, जिनमें से दोनों की स्वीकृति इकाई अंक में है. यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर भी कोई मोदी की लोकप्रियता का मुकाबला नहीं कर सकता, जबकि अमित शाह और योगी आदित्यनाथ दोनों दूर क्षितिज पर झिलमिलाती रोशनी की तरह दर्ज किए गए हैं. मोदी को अब भी आजादी के बाद देश का सबसे अच्छा प्रधानमंत्री आंका जाता है. अटल बिहारी वाजपेयी खासे फासले के साथ दूसरे पायदान पर हैं और फिर उनके बाद इंदिरा गांधी, मनमोहन सिंह और जवाहरलाल नेहरू हैं. ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि क्योंकि मोदी के पूर्ववर्ती खासकर नेहरू और इंदिरा नई पीढ़ी को कम याद हैं.
मोदी अभी भी लोकप्रियअलबत्ता मोदी ने एक और बड़े रुझान को धता बता दिया है और वह है सत्ता विरोधी भावना. देश का मिज़ाज सर्वे बताता है कि अगर आज चुनाव हों, तो अपने प्रधानमंत्री काल के नौवें साल में मोदी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को संसद में लगातार तीसरा बहुमत तक दिलवाएंगे. नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) के 9 अगस्त को एनडीए छोड़ने से पहले एनडीए का 307 सीट जीतना तय था, जो साधारण बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों से 35 ज्यादा थीं. लेकिन मई 2019 के लोकसभा चुनाव में वास्तव में जीती गई एनडीए की 352 सीटों से 45 कम थीं. एनडीए का आंकड़ा 2019 से ही कम होता जा रहा है, जब उस साल महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना ने अपना रास्ता अलग कर लिया और शिरोमणि अकाली दल और तेलुगु देशम पार्टी सरीखे साथी भी उसे छोड़कर चले गए.
अलबत्ता, मोदी और भाजपा देश का मिज़ाज सर्वे के इस नतीजे से ज्यादा उत्साहित हो सकते हैं कि पार्टी 283 सीटों के साथ अपने दम पर बहुमत हासिल करेगी, जो पिछले दो सर्वेक्षणों में संदेह के घेरे में था. लोकसभा में 40 सांसद भेजने वाले बिहार सरीखे राजनैतिक तौर पर अहम राज्य में सत्ता हाथ से निकल जाने से समीकरण थोड़े-बहुत बदल गए हैं. नीतीश के रुखसत होने के तुरंत बाद किए गए सी-वोटर के स्नैप पोल में एनडीए को करीब 21 संसदीय सीटों का नुकसान होने का अनुमान है, जिससे भाजपा की कुल सीटें 283 से 275 पर आ जाएंगी, जो अपने दम पर सरकार बनाने के लिए काफी होंगी.
मोदी की निजी लोकप्रियता एनडीए सरकार की स्वीकृति रेटिंग को भी ऊपर उठा रही है, जो 56 फीसद पर है. मगर देश का मिज़ाज सर्वे में शामिल लोग अर्थव्यवस्था को संभालने के सरकार के तरीके से साफ तौर पर नाखुश हैं. उनमें से बहुमत (67 फीसद) ने कहा कि 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति या तो बिगड़ी या जस की तस है, जिससे उसका अच्छे दिन का वादा झूठा साबित हुआ. ज्यादातर अपनी माली हालत में सुधार की संभावना को लेकर निराश थे. 73 फीसद ने बेरोजगारी की स्थिति को गंभीर माना. यह धारणा बीते डेढ़ साल से ज्यादा वक्त से कायम है. जब पूछा गया कि क्या वे खुश हैं, तो हां में जवाब देने वाले लोगों के प्रतिशत में छह महीने पहले के मुकाबले अच्छी-खासी गिरावट दर्ज की गई.
पांच बड़ी कामयाबियांलोग जिन चीजों को मोदी सरकार की कामयाबियां और नाकामियां मानते हैं, वे उसके लिए देश का मिज़ाज सर्वे के नतीजों को गंभीरता से लेने की सच्ची चेतावनी होनी चाहिए. एनडीए सरकार की जो पांच शीर्ष कामयाबियां गिनाई गईं, उनमें कोविड महामारी को संभालने के उसके तरीके ने, जो पिछले सर्वेक्षणों से बड़ा उलटफेर है, राम मंदिर के निर्माण को चौथे स्थान पर धकेल दिया, जबकि कश्मीर में अनुच्छेद 370 का खात्मा दूसरे स्थान पर आ गया, उसके बाद भ्रष्टाचार मुक्त राजकाज, और फिर काले धन पर कड़ी कार्रवाई पांचवे स्थान पर आ गई. इसके विपरीत, मोदी सरकार की पांच बड़ी नाकामियों में से तीन का स्वरूप आर्थिक है. चाहे वो महंगाई हो, बेरोजगारी या कम आर्थिक वृद्धि. तीनों मिलकर 69 फीसद लोगों को परेशान कर रहे हैं. यह मोदी सरकार के लिए साफ खतरे की घंटी होनी चाहिए.
ऐसे में मोदी की गगनचुंबी लोकप्रियता परिघटना और विरोधाभास दोनों है. इस पेचीदा दोहरेपन के क्या कारण हैं? पिछले घटनाक्रमों में कुछ सुराग मिलता है. यूपीए सरकार के नौवें साल में मनमोहन सिंह को गिरती आर्थिक वृद्धि दर के साथ भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ा था. 2013 में किए गए देश का मिज़ाज सर्वे ने 2014 में यूपीए-2 का सफाया होने की भविष्यवाणी की. यहां तक कि 1971 में जबरदस्त बहुमत के साथ पुनर्निर्वाचित होने के बावजूद इंदिरा गांधी भी अपने नौवें साल में लड़खड़ा गईं. तेल के वैश्विक झटकों से उत्पन्न प्रचंड महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी का नतीजा चौतरफा राजनैतिक बेचैनी में सामने आया, जिसकी वजह से उन्हें जून, 1975 में आपातकाल लगाना पड़ा. मोदी उस रुझान को ललकारते मालूम देते हैं, महामारी की दस्तक से पहले आ धमकी गंभीर आर्थिक गिरावट के बावजूद उनकी लोकप्रियता बुलंदी पर है.

जानकारों ने इसके कुछ निश्चित कारण पता लगाए हैं. चुनाव सर्वेक्षक आम तौर पर चार प्रमुख मुद्दों को लेते हैं- महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय सुरक्षा, जो राजनैतिक लोकप्रियता तय करते और चुनावी आधार माने जाते हैं. बेरोजगारी और महंगाई मोदी सरकार के खिलाफ जाते हैं, तो दूसरे दो कारक उनके पक्ष में काम कर रहे हैं. भ्रष्टाचार के किसी बड़े घोटाले या बदनामी से मोदी सरकार के पाए नहीं डोले, जैसा मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी सालों में हुआ था. देश का मिज़ाज सर्वे (MOTN) से इस धारणा की झलक मिलती है, जिसमें भ्रष्टाचार मुक्त राजकाज और नोटबंदी मोदी सरकार की शीर्ष पांच उपलब्धियों में आए हैं. जब महामारी को संभालने की बात आती है, हालांकि दूसरी लहर के दौरान सरकार कई मामलों में बेहद कमतर रही, लेकिन उसने अपने विशाल टीकाकरण अभियान से उसकी बहुत अच्छी भरपाई की, जिसे दुनिया के नेताओं की सराहना भी मिली. इन कारकों ने मिलकर मोदी सरकार में जनता का विश्वास बड़ी हद तक बढ़ाया. मोदी सरकार को दोष से बचाने में महामारी और यूक्रेन की लड़ाई ने भी मदद की, क्योंकि ये दोनों ही ऐसे बाहरी कारक माने जाते हैं जिन्होंने देश की आर्थिक दुश्वारियों को और तीखा किया.
मोदी का लोगों से जुड़ावइस राजनैतिक गुणा-भाग से परे मोदी ने मतदाताओं के साथ असाधारण जुड़ाव विकसित किया है, जो उन्हें ईमानदार, अत्यंत मेहनती राजनेता की तरह देखते हैं, जो जनता की भलाई के लिए उत्सुक है पर साथ ही दृढ़प्रतिज्ञ और निर्णायक भी है. इसमें चीन और पाकिस्तान के बाहरी खतरों से निबटने के उनके तरीके के बारे में आम धारणा भी शामिल है, जिसमें मोदी की विदेश नीति को गरजदार शाबासी मिली है. महामारी से पैदा आर्थिक झटकों के बावजूद एक के बाद एक देश का मिज़ाज सर्वेक्षणों के दौरान यह धारणा बढ़ती गई है कि देश की समस्याओं के समाधान के लिए मोदी सबसे अच्छा दांव हैं. सी-वोटर के संस्थापक-संपादक यशवंत देशमुख कहते हैं कि सीईओ के अंदाज में मोदी के सरकार चलाने की वजह से वोटरों ने एक के बाद एक सर्वे में उनका इतना बढ़-चढ़कर अनुमोदन किया. राज्य स्तर पर भी यही रुझान मिलता है, जिसमें नवीन पटनायक और ममता बनर्जी अच्छा प्रदर्शन करते हैं, वैसे ही जैसे अरविंद केजरीवाल करते हैं. नतीजा यह कि ये नेता सत्ता विरोधी रुझान को धता बता पाते हैं.
विपक्ष की बेतरतीबी ने भी एनडीए सरकार के पक्ष में काम किया और उसकी रेटिंग बढ़ाने में मदद की. कांग्रेस खुद को दुरुस्त बनाने में नाकाम रही और अंतर्कलह से लड़ने में इतनी व्यस्त है कि मोदी को ठोस चुनौती नहीं दे पा रही है. वहीं केजरीवाल की बढ़ती कामयाबी और खासकर पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) की भारी जीत के बावजूद उनकी राष्ट्रीय पहुंच सीमित है. विपक्षी गठबंधन की अगुआई के लिए (बिहार से पहले) वे सबसे अच्छे दांव के तौर पर उभरे, लेकिन दिक्कत यह है कि उनमें नेतृत्व के गुण तो हैं, लेकिन उनके पास संगठन नहीं है.
राहुल गांधी की मुश्किल इससे बिल्कुल उलट है. आप के मुकाबले कांग्रेस के पास अखिल भारतीय मौजूदगी वाला संगठन है, पर उन्होंने अब तक संगठन को एकजुट करने और गठबंधन की अगुआई करने की क्षमता नहीं दिखाई. वे अपनी आलोचनाओं का जवाब भी नहीं दे पाते, खासकर उनके उन कई विदेशी सैर-सपाटों को लेकर होने वाली आलोचनाओं का, जिनके बारे में कुछ स्पष्ट नहीं किया जाता. इससे लगता है कि राजनीति उनके लिए मोदी की तरह जिंदगी भर की प्रतिबद्धता के बजाए शौक (हॉबी) ज्यादा है. कांग्रेस आर्थिक मुद्दों को लेकर भी सरकार पर पुरजोर हमला नहीं बोल सकी. हाल ही में हुए संसद सत्र के दौरान उन्होंने महंगाई और बेरोजगारी पर राष्ट्रीय विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की कोशिश की, पर इसके लिए बेमेल समय चुना क्योंकि नेशनल हेराल्ड की मिल्कियत में कथित वित्तीय अनियमितताओं पर प्रवर्तन निदेशालय उन्हीं दिनों राहुल और सोनिया गांधी दोनों से पूछताछ कर रहा था.
विपक्षी नेताओं की सीमाएंअन्य विपक्षी नेताओं की भी अपनी-अपनी सीमाएं हैं. ममता पश्चिम बंगाल में मोदी और भाजपा की मजबूत विरोधी साबित हुईं और 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्हें धूल चटाई, लेकिन बाद में खुद को मोदी के राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर पेश करने की उनकी कोशिशें रंग नहीं लाईं. बिहार में भाजपा को गच्चा देकर महागठबंधन में लौटने से नीतीश मोदी को चुनौती देने वाले गंभीर विपक्षी दावेदार बने हैं. मगर राजनैतिक पलटी खाने से उनकी राजनैतिक साख पर बट्टा लगा है. ऐसे में फिलहाल टीना या टीआइएनए (देयर इज नो ऑल्टरनेटिव या कोई विकल्प नहीं) कारक बहुत ज्यादा मोदी के पक्ष में है.

मोदी के अपनी लोकप्रियता बनाए रखने का दूसरा बड़ा कारण अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करके और कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाकर हिंदुत्व के एजेंडे को पूरा करने और साथ ही व्यापक कल्याणकारी एजेंडे को लागू करके समाजवादी नारे को हथियाने के चतुर मिश्रण में है, जिसका उन्होंने अनुसरण किया. केरल को छोड़कर देश भर में वाम दलों के पतन की बदौलत भाजपा फल-फूल पाई. इस तरह विपक्ष में बर्नी सैंडर्स जैसी कोई विश्वसनीय शख्सियत नहीं है, जो मोदी से सवाल कर सके कि नौकरियां देने, कीमतों को काबू करने, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने और गरीबी कम करने के लिए उन्होंने क्या किया या इस देश का मिज़ाज सर्वे से उभरकर आई इस धारणा का लाभ उठा सके कि उनकी सरकार की आर्थिक नीतियां बड़े कारोबार की तरफदारी करती हैं.
मोदी उग्र राष्ट्रवादी कार्ड असरदार ढंग से खेलने में भी कामयाब रहे हैं, खासकर पाकिस्तान और चीन से भारत के निबटने के मामले में, जिसने उन्हें देश का मिज़ाज सर्वे में शामिल लोगों के बीच समर्थन दिलवाया. उन्हें सख्त नेता के तौर पर देखा जाता है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के बेहतर से बेहतर हितों को पूरा करते हुए देश की आर्थिक मुश्किलें दूर करने में जी-जान से जुटा है. हालांकि देश का मिज़ाज सर्वे से कुछ परेशान करने वाले रुझान सामने आए. उनमें यह मानने वालों की अच्छी-खासी तादाद भी है कि भारतीय लोकतंत्र खतरे में है और सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहे हैं. ये मोदी सरकार के लिए चेतावनी के संकेत होने चाहिए कि सब कुछ अच्छा-भला नहीं है.
पहले अलग चाल-ढाल की पार्टी के तौर पर देखी जाने वाली भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता पाने के फेर में अपनी वह चमक खो रही है. पार्टी मध्य प्रदेश, गोवा और हाल ही में महाराष्ट्र में दलबदल करवाकर विपक्ष की सरकारों को अस्थिर करने में कामयाब रही, पर यह हरेक के गले नहीं उतरा. मोदी सरकार पर अपने विरोधियों को डरा-धमकाकर खामोश करने के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) सरीखी केंद्रीय जांच एजेंसियों को उनके पीछे लगाने का आरोप भी लगाया जा रहा है. इस सर्वे में शामिल कई लोग विधायकों में सेंध लगाने की भाजपा की तरकीब का समर्थन करते हैं और उसे जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का दोषी नहीं ठहराते. मगर पार्टी इस तथ्य से बहुत आराम महसूस नहीं कर सकती, क्योंकि इसे मंजूर और नामंजूर करने वालों के बीच फासला काफी कम हुआ है. छल-प्रपंच और पैंतरेबाजी के बावजूद अब आप एक भी भाजपा शासित राज्य से गुजरे बिना कन्याकुमारी से केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और अब बिहार होते हुए काठमांडू जा सकते हैं. लिहाजा पार्टी की लाचारियां कायम हैं.

मोदी के लिए दूसरी अनिवार्यता यह है कि नेतृत्व की मजबूत दूसरी कतार विकसित करें जो उनके पद छोड़ने के बहुत बाद भी उनकी सरकार की पहलों को आगे बढ़ाए और उनके इंडिया#100 विजन को जमीन पर उतारे. देश का मिज़ाज सर्वे में नितिन गडकरी, अमित शाह और राजनाथ सिंह मोदी सरकार के सबसे अच्छा काम करने वाले मंत्रियों के तौर पर उभरे. राजनाथ और निर्मला सीतारमण के अलावा शाह, योगी आदित्यनाथ और गडकरी मोदी की विरासत संभालने के लिए पसंदीदा विकल्प भी हैं. मगर इनमें से किसी के पास वह करिश्मा और प्रतिष्ठा नहीं है, जो मोदी को देश भर में हासिल है और इस पर पार्टी और उसके मार्गदर्शक आरएसएस को जरूर विचार करना चाहिए.
आर्थिक संकट की भ्रम वाली दलीलदेश का मिज़ाज सर्वे से मोदी सरकार के लिए सबसे अहम बात यह उभरकर आती है कि उसे खासकर आर्थिक मोर्चे पर जनता की तकलीफों को दूर करना चाहिए. यह दलील भ्रामक है कि अगर आर्थिक संकट इतना ज्यादा होता तो जनाक्रोश फूट पड़ता. जब अग्निवीर योजना लाई गई, कई राज्यों में नौकरियों के आकांक्षियों की तरफ से स्वत:स्फूर्त उपद्रव फूट पड़े, जिन्हें लगा सरकार रोजगार के मामले में उन्हें चकमा दे रही है. यह कई दबी हुई हताशाओं का संकेत था जो अप्रत्याशित रूप से दहक सकती थीं. रातोरात ऐलानों के जरिए कृषि कानूनों और अग्निवीर योजना को पारित करने में जो चौंकाने और धाक जमाने की तरकीब अपनाई गई, वह उलटे नतीजे देने वाली साबित हुई.
प्रधानमंत्री शायद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की किताब से सीख लेकर रुपए के अवमूल्यन, तेल आयात, मूल्य वृद्धि, यूक्रेन संकट के नतीजों, लघु उद्योग क्षेत्र के पुनर्निर्माण और नौकरियों के सृजन सरीखे मुद्दों से निबटने के लिए उच्च अधिकार प्राप्त संकट प्रबंधन समूहों का गठन कर सकते हैं. महामारी में संकट के हरेक पहलू को संभालने के लिए, चाहे वह अस्पतालों में बिस्तर हों, टेस्ट किट, पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट या टीके हों, मोदी ने ठीक यही किया जो काफी असरदार रहा. ऐसा करने से अहम मसलों को संभालने में एकजुटता आएगी, खासकर उनके मंत्रिमंडल के साथियों में, जिनकी प्रवृत्ति अलग-थलग काम करने और सीधे प्रधानमंत्री से निर्देश लेने की है. बुनियादी ढांचे के विकास में तालमेल के लिए सभी प्रमुख मंत्रियों और हितधारकों को साथ लाने वाला गतिशक्ति पोर्टल शुरू करने की प्रधानमंत्री की पहल सही दिशा में कदम है.
प्रधानमंत्री रहते अपने आठ सालों में मोदी अभी तक विकास और जनकल्याण पर ध्यान देने और हिंदुत्व के एजेंडे को पूरा करने के बीच नाजुक संतुलन कायम रखने में कामयाब रहे. अगर अर्थव्यवस्था की फिसलन जारी रहती है, तो भाजपा 2024 में वोटरों का दिल जीतने के लिए ध्रुवीकरण के मूल विकल्प का सहारा लेने के लोभ में पड़ सकती है. मोदी को इस लोभ से बचना चाहिए. इस देश का मिज़ाज सर्वे का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करें और देश को उच्च वृद्धि की राह पर मजबूती से वापस लाएं. भारत को मौजूदा गर्त से निकलने का रास्ता दिखाने के लिए मोदी के पास अनुभव, राजनैतिक कुशाग्रता, साधन और उपाय और करिश्मा है. देश का मिज़ाज सर्वे बताता है कि लोग उन पर न केवल भरोसा करते हैं बल्कि उनके कामयाब होने पर बाजी भी लगाए हैं. उन्हें चाहिए कि हमें किसी भी सूरत में निराश और नाकाम न होने दें.
सर्वे का सैंपल साइजइंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वेक्षण सामाजिक-आर्थिक अनुसंधान के क्षेत्र में दुनिया भर में जाने-माने नाम सी-वोटर ने 15 जुलाई 2022 और 31 जुलाई 2022 के बीच किया, जिसमें सभी राज्यों के सभी लोकसभा क्षेत्रों को समाहित करते हुए 22,861 उत्तरदाताओं के इंटरव्यू किए गए. वोट और सीटों की पूर्वानुमान गणना के दीर्घकालिक रुझानों के लिए इन नमूनों के अलावा फरवरी 2022 और जुलाई 2022 के बीच सीवोटर के नियमित ट्रैकर डेटा के 96,676 इंटरव्यू का भी विश्लेषण किया गया.
यह लेख इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने लिखा है.
नेतानगरी: राज्यसभा चुनाव का तिहाड़ जेल कनेक्शन शो में पता चल गया

