ये आर्टिकल गौरव सावंत ने डेली-ओ के लिए लिखा है.-------------------------------------------------------------------------------- ‘#सन्देशटूसोल्जर्स’ इस सीजन का नया फ्लेवर है. और ये होना भी चाहिए. इससे पताचलता है हम अपने वर्दी वाले लोगों के प्रति कृतज्ञ हैं. प्राइम मिनिस्टर मोदी नेदेश की रक्षा करने वाले सैनिकों के लिए लिखने को कहा है और ये ठीक बात है. मैंनेसियाचिन ग्लेशियर और लाइन ऑफ़ कंट्रोल से रिपोर्टिंग की है. ऐसी जगहें जहां एक घंटाभी खड़े रहना मुश्किल है, वहां खड़े होकर ये सैनिक पूरे साल हमारी रक्षा करते हैं.मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, हर दीवाली उन्होंने सैनिकों के साथ मनाई है. कहागया है कि वो सैनिकों से बहुत जुड़ाव महसूस करते हैं. फिर भी ऐसा क्यों है कि सैनिकरक्षा मंत्रालय से अपने विकलांगता पेंशन की लड़ाई लड़ रहे हैं? क्यों ऐसा है कि वोसमान वेतन के लिए लड़ रहे हैं? इस #सन्देशटूसोल्जर्स में कहां कम्युनिकेशन गैपहै? क्यों पाकिस्तानी सैनिकों और आतंकवादियों से लड़ने के बावजूद उन्हें साउथ ब्लॉककी ब्यूरोक्रेसी से भी लड़ना पड़ रहा है? क्यों सर्विस हेडक्वार्टर और ब्यूरोक्रेसीसमान वेतन पर भिड़े हुए हैं? नौकरशाहों और आर्मी, नेवी, एयर फ़ोर्स के सीनियरअधिकारियों की मीटिंग के बाद सिवाय रक्षा मंत्रालय से एक बयान जारी करने के, इसमसले पर कुछ भी नहीं हुआ है. उड़ी हमले के बाद सेना के जवान काफी उत्साह में थे किउन्हें पाकिस्तानी आतंकवादियों पर सर्जिकल स्ट्राइक करने के लिए हरी झंडी मिली.मुझे बताया गया कि सेना के कमांडर काफी खुश थे कि जब एलओसी पर पीर पंजाल के उत्तरऔर दक्षिण में कई सर्जिकल स्ट्राइक्स का प्लान बना तब प्रधानमंत्री मोदी उस पर अपनीनज़र बनाए हुए थे. सूत्र बताते हैं कि हर बातचीत में वो इस बात पर जोर दे रहे थे किअपने सैनिकों को नुकसान हुए बिना दूसरी तरफ ज्यादा नुकसान किया जाए. सरकार का कहनाहै कि डिफेंस के साथ कोई मतभेद नहीं हैं. रक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा‘समान सर्विस रैंक में कोई कटौती नहीं की गई है. 1991 में इस व्यवस्था को स्पष्टकिया गया था. जिसे 1992, 2000, 2004 और 2005 में दोहराया गया है.' लेकिन रक्षासेवाओं ने ब्यूरोक्रेसी पर पूरी सच्चाई न बताने का आरोप लगाया है. इंडिया टुडे कोकुछ ख़ास सूत्रों ने बताया- ‘सरकार इस मामले के लिए बैठाई गई मंत्रियों की एक कमिटी के आदेशों पर कुछ क्यों नहीं बोल रही? इस कमिटी की अगुवाई प्रणव मुखर्जी ने की थी.इस कमिटी ने जनवरी 2009 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट ने समान वेतन केमुद्दे का बड़ी बारीकी से अध्ययन किया था. कमिटी ने कहा सेना का लेफ्टिनेंट कर्नल(आईएएफ का विंग कमांडर और नेवी का कमांडर) भारत सरकार के डिप्टी सेक्रेटरी सेसीनियर होगा. तब भारत सरकार में डायरेक्टर कर्नल(आर्मी), ग्रुप कैप्टन(एयरफोर्स) औरकैप्टन(नेवी) के बराबर होता था. इससे 2009 में इसका समाधान हो गया था.’ मीडिया सेआधिकारिक रूप से बात न करने की शर्त के बावजूद, एक अधिकारी ने मुझे बताया कि सरकारने मंत्री कमिटी की रिपोर्ट पर चुप्पी साध रखी है. सर्विस हेडक्वार्टर अभी इस बारेमें स्पष्ट नहीं है कि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को 2009 तक के इन पहलुओं कीजानकारी है या नहीं. या उन्हें 2005 तक की ही अधूरी जानकारी दी गयी. ब्यूरोक्रेसीपर शक है कि वो सरकार को इन पुराने पहलुओं पर भटका रही है. हालांकि पर्रिकर ने पूरेपहलुओं पर जांच का वादा किया है. सेनाओं और उससे जुड़े अनुभवी लोगों को न्याय काइंतज़ार है. छठवें वित्त आयोग ने लेफ्टिनेंट कर्नल को जॉइंट डायरेक्टर के बराबर औरकर्नल को डायरेक्टर के बराबर कर दिया. मंत्री कमिटी ने 2009 में कहा था किलेफ्टिनेंट कर्नल जॉइंट डायरेक्टर से सीनियर होगा. एक अधिकारी जो इस आदेश सेप्रभावित हुए उन्होंने कहा ‘2016 के आदेश में क्यों जॉइंट डायरेक्टर को कर्नल के औरडायरेक्टर को ब्रिगेडियर के बराबर कर दिया गया.’ ‘विकलांगता पेंशन से लेकर वन रैंकवन पेंशन तक सरकार के फैसलों और आदेशों में अंतर है. हमें लगता है सरकार को विकलांगसैनिकों के बारे में रक्षा अकाउंट से गलत आंकड़े दिये गये हैं. गलत आंकड़ों से गलतफैसले हुए. लेकिन हमें न्याय की पूरी उम्मीद है.’ सूत्रों ने आगे बताया. सर्विसहेडक्वार्टर रक्षा मंत्रालय से खुश नहीं है. उसने कहा कि जिन 2003, 2005 और 2008 केआदेशों का सरकारी प्रवक्ता ने ज़िक्र किया वो आदेश 2009 के मंत्री कमिटी के निर्णयको निरस्त नहीं कर सकते. हालांकि सर्विस हेडक्वार्टर ने पर्रिकर से अपना पक्ष रखनेका समय मांगा है लेकिन कुछ सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि कई अधिकारी कोर्ट तकजाने की तैयारी कर रहे हैं.