'बेवफाई' का वह कानून जिसे सेना बनाए रखना चाहती है
आम लोगों पर से व्यभिचार का कानूनी चाबुक सुप्रीम कोर्ट पहले ही हटा चुका है.
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सुप्रीम कोर्ट ने आम नागरिकों के लिए अडल्टरी या व्याभिचार को अपराध की श्रेणी से हटा दिया है. लेकिन यह अभी सेना में बरकरार है. सरकार इसे बनाए रखने की सिफारिश कर रही है.
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ये मामला पति-पत्नी और वो का है. पति-पत्नी के रिश्तों में अगर कोई तीसरा एंगल जुड़ जाए तो क्या यह मामला आपराधिक बन जाता है. दो साल पहले तक यही माना जाता था. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट का एक लैंडमार्क फैसला आया. इसमें व्यभिचार यानी अडल्टरी (Adultery) को अपराध की श्रेणी से बाहर निकाल दिया गया. आखिर ये अडल्टरी (Adultery) क्या है और इसके कानूनी पहलू क्या हैं? आइए इसको समझते हैं तफ्सील से.
आज हम बेवफाई का ये किस्सा क्यों सुना रहे हैं ?
बात सिर्फ इतनी सी है कि जहां आम लोगों पर से व्यभिचार का कानूनी चाबुक सुप्रीम कोर्ट पहले ही हटा चुकी है वहीं सेना में यह अब भी बरकरार है. सेना में अडल्टरी या व्यभिचार को लेकर एक अलग टर्म है. इसे 'स्टीलिंग द अफेक्शन ऑफ ब्रदर ऑफिसर्स वाइफ' कहा जाता है. मतलब अपने ब्रदर ऑफिसर (समकक्ष अधिकारी) की पत्नी के स्नेह को चुराने का अपराध. इस कानून के तहत सेना का कोई अधिकारी अगर किसी दूसरे अधिकारी की पत्नी से रिलेशन बनाने का दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई हो सकती है. सेना में व्यभिचार से जुड़ा यह कानून खत्म किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की राय मांगी थी. सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल ने पक्ष सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा है. जिसमें कहा गया है कि सेना में इस कानून को बने रहना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में सेना की तरह से सरकार ने पक्ष रखा है और कानून को बनाए रखने की बात कही है. फोटो- PTI
तीनों सेनाओं की तरफ से सरकार का कहना है कि सेनाओं को 2018 के आदेश से बाहर रखा जाना चाहिए. क्योंकि उनके अपने नियमों में व्यभिचार को एक संगीन जुर्म के रूप में देखा जाता है और दोषी पाए जाने वाले को नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है. केंद्र की इस अपील पर अदालत ने अभी फैसला नहीं दिया है और चीफ जस्टिस ने कहा है कि वो इस मामले को सुनने के लिए 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ का गठन करेंगे.
सरकार का कहना है कि सेना में काम करने वाले जब सीमा पर या दूर-दराज इलाकों में लंबे समय तक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में तैनात रहते हैं तो ऐसे में वे अपने परिवार के प्रति निश्चिन्त रहें, इसलिए सेना उनके परिवार का ध्यान रखती है. सरकार का कहना है कि ऐसे में सेना के दूसरे कर्मी या अधिकारी जब उनके परिवार वालों से मिलने जाएंगे, तब अपने परिवार से दूर तैनात कर्मियों को यह चिंता सताएगी की उनका "परिवार" कोई "प्रतिकूल गतिविधि" तो नहीं कर रहा. सरकार का कहना है कि ऐसे में व्यभिचार को एक जुर्म बनाए रखना बेहद जरूरी है. जब बेवफाई अपराध होती थी इस कानून को समझने के लिए आपको फ्लैशबैक में चलना होगा. 2 साल पीछे चलते हैं. साल 2018 से पहले का वक्त है, रोहित, रिया और कुमार (तीनों काल्पनिक नाम) ये तीनों पति, पत्नी और वो के रोल में हैं. रोहित और रिया शादीशुदा हैं. शादी के बाद सबकुछ ठीक चल रहा था. इसी बीच रिया की जिंदगी में कुमार आता है. कुमार उसके साथ दफ्तर में काम करता था. दोनों में पहले दोस्ती थी. दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों में संबंध भी बने. इस अफेयर का पता रिया के पति को चलता है. पति रोहित आईपीसी की धारा-497 के तहत इलाके के मैजिस्ट्रेट के सामने कंप्लेंट केस दायर कर सकता है. अगर आरोपी कुमार दोषी पाया जाता था तो उसे 5 साल कैद की सजा हो सकती है. 2018 में आया सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला साल 2018 की शुरुआत यानी पांच जनवरी को अडल्टरी से जुड़ा यह मामला एक जनहित याचिका के तौर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस जनहित याचिका को संवैधानिक बेंच के पास भेज दिया था. ऐसा भी नहीं था कि अडल्टरी पर पहली बार सवाल उठाए गए हों, इससे पहले 1954, 1985 और 1988 में भी अडल्टरी पर सवाल पूछे गए थे. साल 2017 में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले पर सुनवाई करते हुए सवाल किया पूछा था कि सिर्फ़ पुरुष को गुनहगार मानने वाला अडल्टरी क़ानून पुराना तो नहीं हो गया है? वहीं 1954 और 2011 में दो बार इस मामले पर फ़ैसला भी सुनाया जा चुका है, जिसमें इस क़ानून को समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला नहीं माना गया था.

सन 2018 में सुप्रीम ने बड़ा फैसला देते हुए कहा कि अडल्टरी अपराध नहीं है.
सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने एडल्टरी के खिलाफ कानून यानी धारा- 497 को रद्द कर दिया है. अब किसी और की पत्नी से संबंध बनाने वाले पुरुष पर किसी तरह का केस दर्ज नहीं हो सकेगा. मतलब यह है कि धारा-497 में अब कोई नया केस दर्ज नहीं हो सकता. अगर हम यहां पर रोहित, रिया और कुमार का मामला लाएं तो अब बदले हुए कानून के मुताबिक, रोहित के पास अब एक ही चारा बचता है कि वह कोर्ट से रिया के खिलाफ तलाक की अर्जी दाखिल करे. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले की स्थिति में रिया के दोस्त कुमार के खिलाफ रोहित अडल्टरी का आरोप लगाकर केस कर सकता था. दोषी पाए जाने पर कुमार को 5 साल तक की सजा भी हो सकती थी लेकिन मौजूदा स्थिति में कुमार के खिलाफ केस नहीं बनेगा. रिया के पति के पास कानूनी उपाय तलाक का ही रास्ता होगा. महिला पुरुष में भेदभाव करता था कानून आईपीसी की धारा 497 में व्यभिचार को बहुत ही अजीब तरीके से देखा गया था. इसमें पुरुष और महिलाओं के मामले में अलग-अलग तरह से व्यभिचार को समझा गया था. मिसाल के तौर पर अगर किसी महिला का पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाए और इसमें दूसरी महिला की सहमति हो. तो फिर शादीशुदा महिला अपने पति या फिर दूसरी महिला के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकती. कानूनी तौर पर अडल्टरी के मामले में शिकायती सिर्फ पति हो सकता है, पत्नी नहीं. यानी महिला के पति या उससे संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ कोई क्रिमिनल केस दर्ज किए जाने का कोई प्रावधान नहीं था.
दूसरा झोल यह था कि महिला के पति की मंजूरी हो और तब महिला किसी और से संबंध बनाए, तो वह अपराध नहीं था. साथ ही पति सिर्फ दूसरे मर्द पर केस दर्ज करा सकता था, अपनी पत्नी पर नहीं.अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी और शादीशुदा महिला के साथ उसकी सहमति से संबंध बनाता है, तो ऐसे संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ उस महिला का पति अडल्टरी का केस दर्ज करा सकता था लेकिन संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ मामला दर्ज करने का प्रावधान नहीं था. इस तरह के दोहरे मापदंड और असमानता को ही सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को अमान्य ठहराने का आधार बनाया. सरकार ने तब भी विरोध किया था सेना के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार ने 'स्टीलिंग द अफेक्शन ऑफ ब्रदर ऑफिसर्स वाइफ' की दलील दी है. इससे पहले भी जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तो सरकार ने इस कानून को बनाए रखने की सिफारिश की थी. सरकार की दलील थी कि इस कानून की वजह से शादी जैसी संस्था सुरक्षित रहती है. केंद्र सरकार ने तब मांग की थी कि उस याचिका को खारिज कर दिया जाए, जिसमें धारा-497 के वैधता को चुनौती दी गई है.
सुप्रीम कोर्ट को केंद्र ने यह भी बताया कि इस मुद्दे को लॉ कमिशन देख रही है. जिस प्रावधान को चुनौती दी गई है, उसे विधायिका ने विवेक का इस्तेमाल कर बनाया है ताकि शादी जैसी संस्था बचाई जा सके. केंद्र का तर्क था कि कानून भारतीय समाज, संस्कृति और उसके तानेबाने को देखकर बनाया गया है. इसको जेंडर न्यूट्रल बनाते हुए अगर महिलाओं पर भी अडल्टरी का केस चलाया जाएगा, तो शादी के बंधन कमजोर होंगे. सरकार की इन दलीलों को कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया और धारा 497 को खत्म कर दिया. अब सेना से व्यभिचार के कानून को हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सरकार की बात सुनती है या नहीं यह तो सुप्रीम कोर्ट के इस मामले पर फैसला आने के बाद ही पता चलेगा.

सुप्रीम कोर्ट में सेना की तरह से सरकार ने पक्ष रखा है और कानून को बनाए रखने की बात कही है. फोटो- PTI
तीनों सेनाओं की तरफ से सरकार का कहना है कि सेनाओं को 2018 के आदेश से बाहर रखा जाना चाहिए. क्योंकि उनके अपने नियमों में व्यभिचार को एक संगीन जुर्म के रूप में देखा जाता है और दोषी पाए जाने वाले को नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है. केंद्र की इस अपील पर अदालत ने अभी फैसला नहीं दिया है और चीफ जस्टिस ने कहा है कि वो इस मामले को सुनने के लिए 5 जजों की एक संवैधानिक पीठ का गठन करेंगे.
सरकार का कहना है कि सेना में काम करने वाले जब सीमा पर या दूर-दराज इलाकों में लंबे समय तक चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में तैनात रहते हैं तो ऐसे में वे अपने परिवार के प्रति निश्चिन्त रहें, इसलिए सेना उनके परिवार का ध्यान रखती है. सरकार का कहना है कि ऐसे में सेना के दूसरे कर्मी या अधिकारी जब उनके परिवार वालों से मिलने जाएंगे, तब अपने परिवार से दूर तैनात कर्मियों को यह चिंता सताएगी की उनका "परिवार" कोई "प्रतिकूल गतिविधि" तो नहीं कर रहा. सरकार का कहना है कि ऐसे में व्यभिचार को एक जुर्म बनाए रखना बेहद जरूरी है. जब बेवफाई अपराध होती थी इस कानून को समझने के लिए आपको फ्लैशबैक में चलना होगा. 2 साल पीछे चलते हैं. साल 2018 से पहले का वक्त है, रोहित, रिया और कुमार (तीनों काल्पनिक नाम) ये तीनों पति, पत्नी और वो के रोल में हैं. रोहित और रिया शादीशुदा हैं. शादी के बाद सबकुछ ठीक चल रहा था. इसी बीच रिया की जिंदगी में कुमार आता है. कुमार उसके साथ दफ्तर में काम करता था. दोनों में पहले दोस्ती थी. दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों में संबंध भी बने. इस अफेयर का पता रिया के पति को चलता है. पति रोहित आईपीसी की धारा-497 के तहत इलाके के मैजिस्ट्रेट के सामने कंप्लेंट केस दायर कर सकता है. अगर आरोपी कुमार दोषी पाया जाता था तो उसे 5 साल कैद की सजा हो सकती है. 2018 में आया सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला साल 2018 की शुरुआत यानी पांच जनवरी को अडल्टरी से जुड़ा यह मामला एक जनहित याचिका के तौर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस जनहित याचिका को संवैधानिक बेंच के पास भेज दिया था. ऐसा भी नहीं था कि अडल्टरी पर पहली बार सवाल उठाए गए हों, इससे पहले 1954, 1985 और 1988 में भी अडल्टरी पर सवाल पूछे गए थे. साल 2017 में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले पर सुनवाई करते हुए सवाल किया पूछा था कि सिर्फ़ पुरुष को गुनहगार मानने वाला अडल्टरी क़ानून पुराना तो नहीं हो गया है? वहीं 1954 और 2011 में दो बार इस मामले पर फ़ैसला भी सुनाया जा चुका है, जिसमें इस क़ानून को समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला नहीं माना गया था.

सन 2018 में सुप्रीम ने बड़ा फैसला देते हुए कहा कि अडल्टरी अपराध नहीं है.
सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने एडल्टरी के खिलाफ कानून यानी धारा- 497 को रद्द कर दिया है. अब किसी और की पत्नी से संबंध बनाने वाले पुरुष पर किसी तरह का केस दर्ज नहीं हो सकेगा. मतलब यह है कि धारा-497 में अब कोई नया केस दर्ज नहीं हो सकता. अगर हम यहां पर रोहित, रिया और कुमार का मामला लाएं तो अब बदले हुए कानून के मुताबिक, रोहित के पास अब एक ही चारा बचता है कि वह कोर्ट से रिया के खिलाफ तलाक की अर्जी दाखिल करे. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले की स्थिति में रिया के दोस्त कुमार के खिलाफ रोहित अडल्टरी का आरोप लगाकर केस कर सकता था. दोषी पाए जाने पर कुमार को 5 साल तक की सजा भी हो सकती थी लेकिन मौजूदा स्थिति में कुमार के खिलाफ केस नहीं बनेगा. रिया के पति के पास कानूनी उपाय तलाक का ही रास्ता होगा. महिला पुरुष में भेदभाव करता था कानून आईपीसी की धारा 497 में व्यभिचार को बहुत ही अजीब तरीके से देखा गया था. इसमें पुरुष और महिलाओं के मामले में अलग-अलग तरह से व्यभिचार को समझा गया था. मिसाल के तौर पर अगर किसी महिला का पति किसी दूसरी महिला के साथ संबंध बनाए और इसमें दूसरी महिला की सहमति हो. तो फिर शादीशुदा महिला अपने पति या फिर दूसरी महिला के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकती. कानूनी तौर पर अडल्टरी के मामले में शिकायती सिर्फ पति हो सकता है, पत्नी नहीं. यानी महिला के पति या उससे संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ कोई क्रिमिनल केस दर्ज किए जाने का कोई प्रावधान नहीं था.
दूसरा झोल यह था कि महिला के पति की मंजूरी हो और तब महिला किसी और से संबंध बनाए, तो वह अपराध नहीं था. साथ ही पति सिर्फ दूसरे मर्द पर केस दर्ज करा सकता था, अपनी पत्नी पर नहीं.अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी और शादीशुदा महिला के साथ उसकी सहमति से संबंध बनाता है, तो ऐसे संबंध बनाने वाले पुरुष के खिलाफ उस महिला का पति अडल्टरी का केस दर्ज करा सकता था लेकिन संबंध बनाने वाली महिला के खिलाफ मामला दर्ज करने का प्रावधान नहीं था. इस तरह के दोहरे मापदंड और असमानता को ही सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को अमान्य ठहराने का आधार बनाया. सरकार ने तब भी विरोध किया था सेना के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार ने 'स्टीलिंग द अफेक्शन ऑफ ब्रदर ऑफिसर्स वाइफ' की दलील दी है. इससे पहले भी जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तो सरकार ने इस कानून को बनाए रखने की सिफारिश की थी. सरकार की दलील थी कि इस कानून की वजह से शादी जैसी संस्था सुरक्षित रहती है. केंद्र सरकार ने तब मांग की थी कि उस याचिका को खारिज कर दिया जाए, जिसमें धारा-497 के वैधता को चुनौती दी गई है.
सुप्रीम कोर्ट को केंद्र ने यह भी बताया कि इस मुद्दे को लॉ कमिशन देख रही है. जिस प्रावधान को चुनौती दी गई है, उसे विधायिका ने विवेक का इस्तेमाल कर बनाया है ताकि शादी जैसी संस्था बचाई जा सके. केंद्र का तर्क था कि कानून भारतीय समाज, संस्कृति और उसके तानेबाने को देखकर बनाया गया है. इसको जेंडर न्यूट्रल बनाते हुए अगर महिलाओं पर भी अडल्टरी का केस चलाया जाएगा, तो शादी के बंधन कमजोर होंगे. सरकार की इन दलीलों को कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया और धारा 497 को खत्म कर दिया. अब सेना से व्यभिचार के कानून को हटाने पर सुप्रीम कोर्ट सरकार की बात सुनती है या नहीं यह तो सुप्रीम कोर्ट के इस मामले पर फैसला आने के बाद ही पता चलेगा.

