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मोदी सरकार 2.0 के पहले साल में महिलाओं, बच्चों और ट्रांसजेंडर्स के लिए क्या काम हुआ

कौन-कौन से बिल पेश हुए और कौन-कौन से पास हुए?

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4 जून 2020 (अपडेटेड: 4 जून 2020, 09:47 AM IST)
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ट्रांसजेंडर बिल, MTP रेगुलेशन बिल, और POCSO में किए गए बदलाव. इनके अलावा और कौन से बिल पेश हुए, और उन पर एक्सपर्ट्स की क्या राय है, यहां पढ़ लीजिए. (सांकेतिक तस्वीरें: रायटर्स/pexels/ट्विटर)
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मोदी सरकार मई, 2019 में दोबारा केंद्र की सत्ता में आई थी. नरेंद्र मोदी ने 30 मई, 2019 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. इस बात को एक साल पूरा हो चुका है. इस एक साल में सरकार ने महिलाओं, बच्चों और सेक्शुअल माइनॉरिटीज़ से जुड़े कौन-से बड़े निर्णय लिए, कौन-से महत्वपूर्ण बिल पेश और पास कराए? यहां हम इन्हीं बातों की चर्चा कर रहे हैं.

बड़ी कामयाबी

सबसे पहले तो बड़े निर्णय और बिलों की बात. लोकसभा/राज्यसभा में सरकार की तरफ से ये बिल पेश या संसद से पास कराए गए, जो महिलाओं, बच्चों, सेक्शुअल माइनॉरिटीज़ और उनके अधिकारों से जुड़े थे.
1. सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल
कब पेश हुआ?
15 जुलाई, 2019
कब पास हुआ?
लोकसभा में पांच अगस्त, 2019. राज्यसभा में पेंडिंग.
Pregnant Woman Rep Image Pixabay 700 सरोगेसी को लेकर सुझाए गए बदलावों पर आपत्ति जताई गई. उसके बाद बिल सेलेक्ट कमिटी को भेजा गया. (सांकेतिक तस्वीर: Pixabay)

क्या है इसमें?
लोकसभा में पास हुए इस बिल में सरोगेसी को लेकर नए नियम-कानून की बात है. सिर्फ मदद करने के लिए ही सरोगेसी का ऑप्शन खुला रह गया. कई दूसरी शर्तें लगाई गईं, ताकि कमर्शियल सरोगेसी पर लगाम लगाई जा सके. लोकसभा में जब बिल पास हुआ, तो उसमें ये नियम बनाए गए कि शादीशुदा जोड़े ही सरोगेट मदर से बच्चा करवा सकते हैं. दोनों की शादी को कम से कम पांच साल हो चुकना जरूरी है, इत्यादि.
बिल जब राज्यसभा में भेजा गया, तो वहां पर मांग हुई कि इसमें बदलाव किए जाएं. बिल सेलेक्ट कमिटी के पास भेजा गया. उन्होंने बदलाव सुझाए कि शादी के पांच साल तक इंतज़ार करने की शर्त हटा दी जाए. सिंगल औरतों और भारतीय मूल के जोड़ों को सरोगेसी का फायदा उठाने दिया जाए. अब ये बिल राज्यसभा में पास होने का इंतज़ार कर रहा है.
2. POCSO (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज) अमेंडमेंट एक्ट
कब पेश हुआ?
18 जुलाई, 2019
कब पास हुआ?
राज्यसभा में 24 जुलाई, 2019. लोकसभा में 1 अगस्त, 2019.
Child Ab छोटे बच्चों को यौन शोषण और उत्पीड़न से बचाने के लिए सरकार ने POCSO एक्ट में बड़े बदलाव किए. (सांकेतिक तस्वीर)

क्या है इसमें?
बच्चों के साथ किसी भी तरह का सेक्शुअल इंटरकोर्स, यौन शोषण और पोर्नोग्राफी यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आएगा. अगर बच्चा मानसिक रूप से बीमार है या बच्चे से यौन अपराध करने वाला सैनिक, सरकारी अधिकारी या कोई ऐसा व्यक्ति है, जिस पर बच्चा भरोसा करता है, जैसे रिश्तेदार, पुलिस अफसर, टीचर या डॉक्टर, तो इसे और संगीन अपराध माना जाएगा. अब इस ऐक्ट की कुछ धाराओं में दोषी पाए जाने पर मौत की सजा तक का प्रावधान कर दिया गया है. इस ऐक्ट में कहा गया है कि अगर कोई आदमी चाइल्ड पोर्नोग्राफी को बढ़ावा देता है, तो उसके खिलाफ भी पॉक्सो ऐक्ट के तहत कड़ी सजा का प्रावधान होगा.
3. ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल
कब पेश हुआ?
19 जुलाई, 2019
कब पास हुआ?
लोकसभा में 5 अगस्त, 2019. राज्यसभा में 26 नवंबर, 2019
Trans 1 750x500 जिस दिन ये बिल पास हुआ, उस दिन को एक्टिविस्ट्स ने जेंडर जस्टिस मर्डर डे कहा, उन्होंने आरोप लगाए कि उनकी किसी भी मांग का ख्याल इसमें नहीं रखा गया. (सांकेतिक तस्वीर)

क्या है इसमें?
इस बिल में ये प्रावधान है कि ट्रांसजेंडर्स का शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या भावनात्मक शोषण नहीं किया जा सकता है. ऐसा करने पर छह महीने से दो साल तक की सज़ा और फाइन लगाने का प्रावधान है. इसके साथ ही इस बिल में सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय के केन्द्रीय मंत्री, राज्यमंत्री और सचिवों के साथ National Council for Transgender Persons बनाने का भी प्रावधान है. जिसमें नीति आयोग के सदस्य, राज्य सरकारों के प्रतिनिधि, ट्रांसजेंडर समुदाय के पांच लोग और NGO से जुड़े पांच लोग शामिल किए जायेंगे.
4. मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (अमेंडमेंट) बिल
कब पेश हुआ?
2 मार्च, 2020
कब पास हुआ?
लोकसभा में 17 मार्च, 2020. राज्यसभा में पेंडिंग है
Indian Wombs For Rent गर्भपात के नियम कानून में जो बदलाव लाने की बात कही गई, उसे एक्सपर्ट्स भी अच्छी पहल बता रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

क्या है इसमें?
1971 के गर्भपात कानून में गर्भपात की अवधि थी 12 हफ़्तों की. ख़ास केसों में बढ़ाकर इसे 20 हफ्ते तक किया जा सकता था. ये प्रावधान था कि शादीशुदा महिलाएं ही गर्भपात करवा सकती थीं. अगर गर्भ निरोध फेल हो गया हो, तो. लेकिन संशोधन में इसे बदलकर महिला और उसका पार्टनर कर दिया गया है. गर्भपात करवाने की ऊपरी लिमिट भी 20 हफ्ते से बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दी गई है इस संशोधन में. कुछ नियमों के साथ.
संशोधन में ये भी कहा गया है कि जिन मामलों में गर्भपात बिल्कुल ज़रूरी है और उसे टाला नहीं जा सकता, ऐसे मामलों में ऊपरी लिमिट हटा दी जाएगी. इनको जांचने-परखने के लिए एक मेडिकल बोर्ड बनाया जाएगा, हर राज्य में.
5. Assisted Reproductive Technology (ART) Regulation Bill, 2020
कब पेश हुआ?
अभी कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी है. सदन में ये बिल पेश होना था, लेकिन हो न सका.
Ivf Ivi Uk Petri Dish 700 गली-कूचों में खुले IVF क्लिनिक्स , वीर्य बैंक, और एग डोनेशनके नियमन के लिए ये बिल लाने की बात कही गई. (सांकेतिक तस्वीर)

क्या है इसमें?
ये बिल गर्भाधान के आर्टिफिशियल तरीकों को लेकर नियम-कानून सख्त रखने के लिए बनाया गया है. 2008 में इसे प्रपोज किया गया था. तब से लेकर अभी तक इसमें बदलाव किए जा रहे हैं. अब इसके आखिरी वर्जन को कैबिनेट ने मंजूरी दी है. 2008 से चलाए आ रहे इस बिल में प्रावधान हैं कि केंद्र सरकार National Advisory Board for Assisted Reproductive Technology नाम से एक बोर्ड बनाएगी. ये बोर्ड इस बात का ध्यान रखेगा कि ART दिलाने वाले क्लिनिक नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं. जितने भी क्लिनिक्स ART के फील्ड में काम कर रहे हैं, उन्हें अपने आप को रजिस्टर कराना होगा. वीर्य बैंक और मानव भ्रूण पर रिसर्च कर रहे क्लिनिक को भी खुद को रजिस्टर कराना ज़रूरी होगा.
बड़ी नाकामी
ट्रांसजेंडर बिल के पास होने पर इसी समुदाय के कई लोगों ने काफी ज्यादा विरोध किया. सांसदों ने इसे सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने की मांग रखी, लेकिन उनकी ये मांग पूरी नहीं हुई. ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट्स का आरोप है कि उन्होंने सरकार को एक लिस्ट दी थी अपनी मांगों की. जिस समुदाय को ध्यान में रखते हुए बिल पास किया गया, उसी समुदाय के लोग अभी तक इसका विरोध कर रहे हैं. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि यह बिल और सुधारा जा सकता था.
सरोगेसी रेगुलेशन बिल में भी लोगों ने आपत्तियां उठाईं. उसमें शादीशुदा जोड़े और करीबी रिश्तेदार के ही सरोगेट बनने के प्रावधान थे. उस पर बवाल हुआ. सेलेक्ट कमिटी ने इसमें बदलाव प्रस्तावित किए, लेकिन अभी तक ये बिल बदलावों के साथ राज्यसभा में पास नहीं हुआ है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
(1)
अनंत मिश्रा सुप्रीम कोर्ट में लॉयर हैं. इनके पास कानून में मास्टर्स की डिग्री है और छह साल से भी ज्यादा का एक्सपीरियंस है. इन्होंने 'दी लल्लनटॉप' से बातचीत में बताया कि जहां POCSO और MTP एक्ट में आए बदलाव अच्छे हैं, वहीं सरोगेसी रेगुलेशन एक्ट में बदलाव करने की ज़रूरत है. उन्होंने ये भी कहा कि सरकार को कमर्शियल सरोगेसी के बारे में भी सोचना चाहिए.
(2)
देविका गौड़ सुप्रीम कोर्ट में लॉयर हैं. ह्यूमन राइट्स और विमेन राइट्स में इन्होंने काफी काम किया है. ट्रांसजेंडर बिल को लेकर इनका कहना है कि 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि हर व्यक्ति को सेल्फ आइडेंटिफिकेशन का अधिकार है. लेकिन ये बिल उस अधिकार का हनन करता है. इसमें ट्रांसजेंडर्स के लिए जो प्रावधान बनाए गए हैं और क्राइम के लिए जो सज़ा तय की गई है, वो काफी नहीं है. यही नहीं, उन्हें भीख मांगने से रोकने के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है.


वीडियो: मोदी सरकार 2.0 के पहले साल में नरेंद्र सिंह तोमर ने किसान और खेती के लिए क्या नए फैसले लिए?

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