उसकी सलवार में नहीं, हमारी सोच में दाग है
हमने एक ऐसा समाज बनाया है जो औरतों को इतना तोड़ देता है कि वो पीरियड के चलते अपनी जान ले लेती हैं.
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'Menstruate with Pride' by Sarah Maple
ओपेन मैगज़ीन के 1 जून के अंक में पढ़ा:
(हेमा देशपांडे, ओपेन मैगजीन के लिए)
बीती साइकल के साथ मेरे पीरियड को 12 साल पूरे हुए. इन 12 सालों में कुल कितनी बार मुझे दर्द के चलते अस्पताल ले जाया गया है, इसकी शायद गिनती भी नहीं की जा सकती. मेरे घर से 500 किलोमीटर दूर होने पर भी मां हर महीने घर बैठे कैलेंडर पर निशान लगाया करती है. क्योंकि मां को आज भी अपने दिन याद हैं. एक किस्सा सुनाया था उन्होंने: नानी को सचमुच पता नहीं रहा होगा. क्योंकि पीरियड को हमारे समाज में समस्या माना ही नहीं जाता. दर्द और आलस को ढोंग माना जाता है. और जो कभी लड़की अपना चिड़चिड़ापन जाहिर कर दे, उसे बर्बाद, जिद्दी, बिगड़ैल और नकचढ़ी कह दिया जाता है.
मैंने कई साल गर्ल्स हॉस्टल में गुजारे हैं. ये देखा है कि किस तरह लड़कियों के बॉयफ्रेंड उन्हें 'don't make a big deal out of it' कहकर पीरियड से जुड़ी उनकी समस्याओं को अवैध साबित कर देते थे. आज भी पीरियड का नाम ले कर नौकरीपेशा औरतों के लिए ऑफिस से छुट्टी लेना कितना बड़ा काम है, समझ सकती हूं. ऐसे में औरतों को मुंह लटकाकर आधे मन से काम करना पड़ता है. या पीरियड को बुखार बताकर छुट्टी लेनी पड़ती है.
पीरियड के समय और उससे पहले होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलाव, जिसे हम PMS यानी प्री-मेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम कहते हैं. उसपर आज भी बहस जारी है. क्योंकि समाज के एक बड़े हिस्से का मानना है कि ये असल तकलीफ नहीं, बल्कि औरतों की कल्पना का एक हिस्सा है. पीरियड के समय औरत के अंदर की ऊर्जा, जो असल में उसे बच्चे के पोषण में लगानी चाहिए थी, PMS जैसे वाहियात ख़याल बुनने में लगा दी जाती है. ये भी एक मान्यता है. कुछ औरतें पीरियड को 'बिग डील' बना देती हैं, ये सिर्फ पुरुषों की ही नहीं, खुद कई औरतों की भी सोच होती है.
कुछ साल पहले अपनी गायनेकॉलॉजिस्ट से बात करते हुए मैंने पाया कि 100 लड़कियों में एक केस ऐसा भी होता है जिन्हें पीरियड के समय लेबर पेन जैसा दर्द होता है. हॉस्टल में अपने अलावा दूसरी लड़कियों को दर्द में जमीन पर लोटते हुए पाया. लेकिन कई ऐसी लड़कियों को भी पाया जिनके पीरियड आ कर चले जाते थे, और उनकी रूममेट तक को खबर नहीं लगती थी. इन लड़कियों के लिए दूसरी लड़कियों का दर्द समझ पाना कई बार मुश्किल होता था. कहने का अर्थ ये है कि ये किन्हीं एक या दो लोगों का दोष नहीं कि पीरियड से जुड़ी तकलीफों को मेडिकल तौर पर तवज्जो नहीं मिलती. ये एक समाज के तौर पर हमारी नाकामी है.
बात डिप्रेशन और सुसाइड की. पीरियड के दिनों में, या उसके पहले उदासी, अपराधबोध, और डर का कारण डॉक्टर शरीर के हॉर्मोन में होने वाले बदलावों को मानते हैं. लेकिन सुसाइड का कारण हॉर्मोन में होने वाले बदलाव नहीं हो सकते. एक आम इंसान की तरह, जिसने दिमाग की कोई पढ़ाई नहीं की है, मैं ये समझती हूं कि आत्महत्या किसी भी व्यक्ति का आखिरी कदम होता है. मुझे नहीं मालूम कि उस 14 साल की लड़की के दिमाग में जान देने के पहले क्या चल रहा था. लेकिन कुछ आंकड़े ज़रूर हैं जो हमें उसके दिमाग में घुसने के लिए एक छोटी सी खिड़की साबित हो सकते हैं. पिछले कुछ दशकों में सरकार ने पोलियो ड्रॉप से लेकर कॉन्डम के प्रचार में खूब पैसे लगाए हैं. आज बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी स्कीमें निकाली जा रही हैं. प्रधानमंत्री लोगों से सब्सिडी छोड़ने की अपील करते हैं. ये सब अच्छे काम हैं. लेकिन देश की करोड़ों महिलाओं से कोई पैड यूज करने की अपील नहीं करता. जिस तरह शौचालय बनवाने की करते हैं. इसके दो ही कारण हो सकते हैं. या तो ये मुद्दा इतना बड़ा माना ही नहीं जाता. या फिर इससे जुड़ी शर्म के कारण इसे छोड़ दिया जाता है.
जब औरतों के सामने मुंह बाए खडीं इस शारीरिक समस्याओं के बारे में लोग बात करने से इतना कतराते हैं, तो मानसिक विषयों पर बात होना तो आने वाले कुछ सालों तक एक असंभव लगता है. यही शर्म, यही चुप्पी औरतों के कलेजे में जहर बनती है. और उन्हें लील लेती है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 2009 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक एम्स अस्पताल ने एक सर्वे किया. पोस्ट मॉर्टम के लिए आईं महिलाओं की लाशों में से ऐसे शरीर अलग किए जो 15-45 की उम्र के बीच के थे. उनके यूट्रस से टिशू निकालकर, उनके पीरियड की साइकल का पता लगाया. इस तरह 100 लाशें अलग की गईं. ये उन महिलाओं की थीं, मौत के समय जिनके पीरियड चल रहे थे. और पाया कि इनमें से आधे से ज्यादा औरतों की मौत का कारण सुसाइड था. ये महज संयोग नहीं हो सकता.
पीरियड कई औरतों के लिए एक मेडिकल समस्या है. लेकिन इस समस्या का सुसाइड में बदलना एक समाज के तौर पर हमारी नाकामी है. अपनी औरतों को समझ पाने की, उन्हें बचा पाने की नाकामी है.
बीती साइकल के साथ मेरे पीरियड को 12 साल पूरे हुए. इन 12 सालों में कुल कितनी बार मुझे दर्द के चलते अस्पताल ले जाया गया है, इसकी शायद गिनती भी नहीं की जा सकती. मेरे घर से 500 किलोमीटर दूर होने पर भी मां हर महीने घर बैठे कैलेंडर पर निशान लगाया करती है. क्योंकि मां को आज भी अपने दिन याद हैं. एक किस्सा सुनाया था उन्होंने: नानी को सचमुच पता नहीं रहा होगा. क्योंकि पीरियड को हमारे समाज में समस्या माना ही नहीं जाता. दर्द और आलस को ढोंग माना जाता है. और जो कभी लड़की अपना चिड़चिड़ापन जाहिर कर दे, उसे बर्बाद, जिद्दी, बिगड़ैल और नकचढ़ी कह दिया जाता है.
मैंने कई साल गर्ल्स हॉस्टल में गुजारे हैं. ये देखा है कि किस तरह लड़कियों के बॉयफ्रेंड उन्हें 'don't make a big deal out of it' कहकर पीरियड से जुड़ी उनकी समस्याओं को अवैध साबित कर देते थे. आज भी पीरियड का नाम ले कर नौकरीपेशा औरतों के लिए ऑफिस से छुट्टी लेना कितना बड़ा काम है, समझ सकती हूं. ऐसे में औरतों को मुंह लटकाकर आधे मन से काम करना पड़ता है. या पीरियड को बुखार बताकर छुट्टी लेनी पड़ती है.
पीरियड के समय और उससे पहले होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलाव, जिसे हम PMS यानी प्री-मेन्स्ट्रुअल सिंड्रोम कहते हैं. उसपर आज भी बहस जारी है. क्योंकि समाज के एक बड़े हिस्से का मानना है कि ये असल तकलीफ नहीं, बल्कि औरतों की कल्पना का एक हिस्सा है. पीरियड के समय औरत के अंदर की ऊर्जा, जो असल में उसे बच्चे के पोषण में लगानी चाहिए थी, PMS जैसे वाहियात ख़याल बुनने में लगा दी जाती है. ये भी एक मान्यता है. कुछ औरतें पीरियड को 'बिग डील' बना देती हैं, ये सिर्फ पुरुषों की ही नहीं, खुद कई औरतों की भी सोच होती है.
कुछ साल पहले अपनी गायनेकॉलॉजिस्ट से बात करते हुए मैंने पाया कि 100 लड़कियों में एक केस ऐसा भी होता है जिन्हें पीरियड के समय लेबर पेन जैसा दर्द होता है. हॉस्टल में अपने अलावा दूसरी लड़कियों को दर्द में जमीन पर लोटते हुए पाया. लेकिन कई ऐसी लड़कियों को भी पाया जिनके पीरियड आ कर चले जाते थे, और उनकी रूममेट तक को खबर नहीं लगती थी. इन लड़कियों के लिए दूसरी लड़कियों का दर्द समझ पाना कई बार मुश्किल होता था. कहने का अर्थ ये है कि ये किन्हीं एक या दो लोगों का दोष नहीं कि पीरियड से जुड़ी तकलीफों को मेडिकल तौर पर तवज्जो नहीं मिलती. ये एक समाज के तौर पर हमारी नाकामी है.
बात डिप्रेशन और सुसाइड की. पीरियड के दिनों में, या उसके पहले उदासी, अपराधबोध, और डर का कारण डॉक्टर शरीर के हॉर्मोन में होने वाले बदलावों को मानते हैं. लेकिन सुसाइड का कारण हॉर्मोन में होने वाले बदलाव नहीं हो सकते. एक आम इंसान की तरह, जिसने दिमाग की कोई पढ़ाई नहीं की है, मैं ये समझती हूं कि आत्महत्या किसी भी व्यक्ति का आखिरी कदम होता है. मुझे नहीं मालूम कि उस 14 साल की लड़की के दिमाग में जान देने के पहले क्या चल रहा था. लेकिन कुछ आंकड़े ज़रूर हैं जो हमें उसके दिमाग में घुसने के लिए एक छोटी सी खिड़की साबित हो सकते हैं. पिछले कुछ दशकों में सरकार ने पोलियो ड्रॉप से लेकर कॉन्डम के प्रचार में खूब पैसे लगाए हैं. आज बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी स्कीमें निकाली जा रही हैं. प्रधानमंत्री लोगों से सब्सिडी छोड़ने की अपील करते हैं. ये सब अच्छे काम हैं. लेकिन देश की करोड़ों महिलाओं से कोई पैड यूज करने की अपील नहीं करता. जिस तरह शौचालय बनवाने की करते हैं. इसके दो ही कारण हो सकते हैं. या तो ये मुद्दा इतना बड़ा माना ही नहीं जाता. या फिर इससे जुड़ी शर्म के कारण इसे छोड़ दिया जाता है.
जब औरतों के सामने मुंह बाए खडीं इस शारीरिक समस्याओं के बारे में लोग बात करने से इतना कतराते हैं, तो मानसिक विषयों पर बात होना तो आने वाले कुछ सालों तक एक असंभव लगता है. यही शर्म, यही चुप्पी औरतों के कलेजे में जहर बनती है. और उन्हें लील लेती है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 2009 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक एम्स अस्पताल ने एक सर्वे किया. पोस्ट मॉर्टम के लिए आईं महिलाओं की लाशों में से ऐसे शरीर अलग किए जो 15-45 की उम्र के बीच के थे. उनके यूट्रस से टिशू निकालकर, उनके पीरियड की साइकल का पता लगाया. इस तरह 100 लाशें अलग की गईं. ये उन महिलाओं की थीं, मौत के समय जिनके पीरियड चल रहे थे. और पाया कि इनमें से आधे से ज्यादा औरतों की मौत का कारण सुसाइड था. ये महज संयोग नहीं हो सकता.
पीरियड कई औरतों के लिए एक मेडिकल समस्या है. लेकिन इस समस्या का सुसाइड में बदलना एक समाज के तौर पर हमारी नाकामी है. अपनी औरतों को समझ पाने की, उन्हें बचा पाने की नाकामी है.

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