माइकल एंजलो. एक ऐसा मूर्तिकार, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसकी बनाई गईंमूर्तियां ऐसी होती थीं कि जैसे अभी बात करने लगेगी. कहा जाता है, 'उन्होंने एकमूर्ति बनाई और फिर ये कहकर उसके घुटने पर हथौड़ा दे मारा कि तुम मुझसे बात क्योंनहीं करते.' इटली के थे, जो 6 मार्च 1475 में पैदा हुए और 88 साल बाद दुनिया सेगुजर गए. मगर उनकी बनाई मूर्तियों ने उन्हें जिंदा रखा. इन्हीं माइकल एंजलो को अपनाउस्ताद मानने वाला एक मूर्तिकार पाकिस्तान के सिंध में है. नाम से फ़कीर मगर,मुजस्समा (मूर्ति) ऐसा बनाते हैं कि जैसे वो उनसे बातें करेगा.माइकल एंजलो की घुटना टूटी मूर्ति.फ़कीर मेघवाड़ उर्फ़ फकीरा फकीरो भले ही पाकिस्तान में रहते हो, लेकिन हिंदुस्तान सेभी रिश्ता रहा है उनका. क्योंकि उनके दादा गुजरात में रहते थे. आज़ादी के वक्त देशका बंटवारा हुआ और उनके दादा पाकिस्तान के सिंध इलाके में अमरकोट के करीब शादीपलीमें जाकर बस गए.फकीरो के वालिद घर बनाने वाले मिस्त्री, मजदूर थे. वो उस वक्त मिट्टी से कच्चे घरबनाते, फिर मंदिरों की दीवारों पर नक्श बनाने लगे. मस्जिदों की मीनारों पर खूबसूरतडिज़ाइन बनाए. और फिर वो मंदिरों में रखी मूर्तियों पर काम करने लगे. फकीरो की नादानउम्र मिट्टी को रौंधते हुए, मसलते हुए. उससे खेलते हुए गुजरी. पढ़ाई करना शुरू किया.फ़कीरो मेघवाड़ उर्फ़ फ़कीरो फकीरा. photo- ibrahim kanbharपढ़कर आते और फिर भाई के साथ मिलकर बाप की गूंथ का रखी गई मिटटी का सत्यनाश मार देतेथे. घर के आंगन में उछल-कूद करते हुए खिलौने बनाते थे. और बाप की डांट खाते थे.क्योंकि वो मिट्टी उनके पिता ने मूर्तियों के लिए तैयार करके रखी होती थी.फकीरो और उनके भाई मान सिंह बड़े हुए. तो मिट्टी के खिलौने भी बड़े होकर मुजस्मों मेंतब्दील हो गए. यानी अब वो खिलौने नहीं बनाते, बल्कि बाप का हाथ बंटाने लगे. मानसिंह की सरकारी नौकरी लग गई. उन्होंने मिट्टी की छुट्टी कर दी, मगर फकीरो ने जारीरखा. स्कूल जाना और मिट्टी से खेलना. यानी मुजस्समों को शक्ल देना, हर बार नयातराशा हुआ आकार. जैसे उनमें बस रूह फूंकनी बाकी हो.उफ़! किस्मत कब धोखा दे जाए कुछ नहीं पता होता. वो 12वीं पास कर चुके थे. कॉलेज मेंपढ़ाई करना चाहते थे. तभी उनके भाई और पिता का रोड एक्सीडेंट हो गया. बुरी तरहजख्मी. सारी जिम्मेदारी फकीरों पर आ गई. न कॉलेज रहा, न फिर पढ़ने की ख्वाहिश. घर केखर्चे पूरे करने के लिए मूर्तियां बनाने लगे. और ये ही मूर्तियां उनकी पहचान बनतीगईं. मूर्ति बनाने की पूरी तरह से शुरुआत उन्होंने साल 1990 में की. एक बार फिर किस्मतने पलटा खाया. हिंदुस्तान की आग ने उनकी फनकारी को भी कुचलने का काम किया. अयोध्यामें बाबरी मस्जिद को ढहाया गया. जिसका असर ये हुआ हिंदुस्तान में मस्जिद को तोड़नेवालों की तरह पाकिस्तान में भी मूर्तियों को निशाना बनाया गया और फकीरो की उसमूर्ति को तोड़ दिया गया, जिसको बनाकर उन्होंने मूर्तिकार की पहचान बनाई थी. इस हादसे के बाद वो बेहद दुखी थे, उनकी फनकारी को ठेस पहुंची थी. मज़हबी एहसास जख्मीहुए. लेकिन फिर से उनपर उनकी फनकारी हावी हो गई. और उन्होंने उस मूर्ति को फिर सेज्यादा खूबसूरत बना दिया. ये मूर्ति हनुमान की थी.फकीरों ने महसूस किया कि वो अपनी फनकारी को सिर्फ मंदिरों में ही क्यों कैद रखेंउन्होंने लोगों के मुजस्में बनाने शुरू कर दिए. घर में ही एक स्टूडियो बनाया औरलोगों को सामने अलग-अलग अंदाज़ में बैठाकर उनके मुजस्समें बनाए. उनके खूबसूरतमुजस्समें मशहूर होते गए. इतना ही नहीं उन्होंने पाकिस्तान के हालात पर भीमुजस्समें बनाए. जिसमें उनका एक मुज्समा ज्यादा फेमस हुआ. वो एक बूढ़े आदमी का था जोसूखा पड़ने की वजह से खुद सूख गया था. उनके बनाए गए मुजस्समों की नुमाइश होने लगी.लोग देखने आने लगे.सिंधी टीवी चैनल से जुड़े इब्राहिम कंभर फकीरो फकीरा के बारे में लिखते हैं, ' हाथ,हथौड़ा, पत्थर, छैनी, मिट्टी, चूना, फाइबर, सीमेंट, पेंसिल और रंग इन सब चीजों कादुःख, दर्द, गम, ख़ुशी, परेशानी, उलझन, मुस्कुराहट, इत्मीनान, बैचेनी, इंतजार, सुखया अरमानों से क्या ताल्लुक है? तो सुनो, अगर कोई इनको जोड़कर ज़माने के सामने कोईरिश्ता या ताल्लुक पेश कर सकता है तो वो फकीरो जैसा है मुजस्समा (मूर्तिकार) होसकता है और कोई नहीं. वो मिट्टी में हाथ डाले तो हम कलाम (तुमसे बात करते हुए) होतेमुजस्में जन्म लेते हैं. अगर हाथ में पेंसिल उठाए तो वो तस्वीर, तस्वीर नहीं, एकसच, एक हकीकत, एक जिंदगी का गुमान देने लगती है.' फ़कीरो आगे बढ़ते गए न उन्हें मज़हबीहमले हरा सके और न गरीबी. जब सड़क हादसे के बाद गरीबी ने उनके करियर को खत्म करनाचाहा तो उनका हुनर सहारा बन गया. आज वो अपनी एक पहचान रखते है. लोग सीखने आते हैं.इतनी कामयाबी के बाद बि सरकार की नज़रों सेओझल हैं. दूसरे देशों से उन्हें ऑफर मिले.मगर वतन की मोहब्बत उनके अंदर कुलाचे मारती है. अपना देश छोड़कर नहीं जाना चाहते.इसकी वो दो वजह बताते हैं, पहली वतन की मोहब्बत, दूसरी अपने रिश्तेदार, जिनको नहींछोड़ना चाहते.इन तस्वीरों पर भी एक नज़र--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ेंबेवकूफों तुम जिसका मज़ाक उड़ा रहे हो, उस शख्स से सीखो 'हीरो' कैसे बनते हैं