मार्च 1993. बंबई का माहिम इलाका. मखदूम शाह बाबा दरगाह के पास अल-हुसैनी बिल्डिंग.छठे माले के एक फ्लैट में मीटिंग चल रही थी. लोग तेज-तेज बोल रहे थे. बोलते-बोलतेसांसें भी उखड़ जा रही थीं. कुछ लोग बार-बार बाहर जाकर देख रहे थे कि कोई आ तो नहींरहा. फोन पर निगाह बनी हुई थी. साथ ही कुछ लोग बार-बार नीचे गैराज में आ-जा रहे थे.पसीना निकल रहा था. सांसें सबकी तेज थीं. पर कमरे से बाहर निकलते ही चेहरा पत्थर होजाता. वहां बंबई में बम ब्लास्ट की प्लानिंग चल रही थी. बाबरी मस्जिद के गिरने काबदला प्लान किया जा रहा था. इस फ्लैट में वो मेमन परिवार रहता था जिसने कभी बाबरीमस्जिद का मुंह भी नहीं देखा था. कुछ दिन में ये परिवार हिंदुस्तान का सबसे कुख्यातपरिवार होने वाला था. लोग नफरत करने वाले थे. जबकि किसी ने इनको देखा तक नहीं था.ये टाइगर मेमन का परिवार था. इब्राहिम मुश्ताक अब्दुल रज्जाक नदीम मेमन. 24 नवंबर1960 को पैदा हुआ. बंबई में अपना नाम बनाने की ख्वाहिश थी. रास्ता मिला दाऊदइब्राहिम के साथ. दाऊद एक पुलिसवाले का बेटा. नदीम एक क्रिकेटर का बेटा. बाप अब्दुलरज्जाक बंबई लीग खेल चुके थे. नवाब पटौदी के नाम पर अब्दुल को भी टाइगर कहा जाताथा. ख्वाहिश थी कि बेटे भी क्रिकेटर बनें. छोटा बेटा सुलेमान बाप की हसरत पूरी करनेकी कोशिश कर रहा था. बंबई स्कूल ऑफ क्रिकेट का दबदबा था. पुराने क्रिकेटर रिटायर होरहे थे. सचिन अभी चमक रहे थे. पूरा परिवार खिलंदड़ था. छह भाई थे. खेलों में तेज.नदीम भी क्रिकेट खेलता था. पर रम नहीं पाया. इसको साउथ मुंबई में कोंकण मर्कैन्टाइलबैंक में चपरासी की नौकरी मिल गई. पर गरम दिमाग के लिये ये नौकरी नहीं थी. एक दिनमैनेजर ने टाइगर को चाय लाने के लिये कहा. ये बात नदीम को अखर गई. मैनेजर को इतनामारा कि वो बेहोश हो गया. नदीम को कुछ और भा गया. समंदर की लहरों पर चलकर आयास्मगलिंग का माल ज्यादा पसंद था. पुलिस को गच्चा देकर जब माल हाथ में आता तो उसकामजा खेल में नहीं मिलता. दाऊद का साथ था. दोनों अपनी जिंदगी में बोर हो रहे थे. कुछकरना था. और स्मगलिंग से ज्यादा मजेदार कोई खेल हो नहीं रहा था बंबई में. बंबईपुलिस भी खुद को कम तेज नहीं समझती थी. एक दिन माल उतरा था. पुलिस का एक आदमी सारीजानकारी दे रहा था. जब नदीम गाड़ी लेकर निकला तो पुलिस पीछे पड़ गई. बंबई की सड़कोंपर गाड़ी चलाना ना तब आसान था, ना अब आसान है. क्राइम ब्रांच निश्चिंत था कि जायेगाकहां. उस दिन नदीम ने सारे रोड, फुटपाथ, गलियों में 100 से ऊपर की स्पीड पर गाड़ीभगाई. वन-वे रास्तों पर. पुलिस देखती रह गई. उस दिन नदीम को नया नाम मिलाअंडरवर्ल्ड की तरफ से. टाइगर. टाइगर मेमन. कास्कर परिवार दाऊद का था. मेमन परिवारटाइगर का. दाऊद के नशीले व्यापार का हैंडलर था टाइगर मेमन बंबई में. पर टाइगर गोल्डस्मगलिंग में अपने हाथ पीले करते जा रहा था. दाऊद को ये पसंद नहीं आ रहा था. दाऊदको ये भी पसंद नहीं आ रहा था कि टाइगर ISI के साथ बहुत ज्यादा नजदीकियां बढ़ा रहाथा. गरम दिमाग का टाइगर ISI को पसंद आ गया था. गरम दिमाग अपने पिता से पाया था. बापके दिमाग को क्रिकेट ने बचाये रखा था. पूरा घर ट्रॉफी से भरा था. पर टाइगर के पासक्रिकेट तो था नहीं. फिर टाइगर गोल्ड स्मगलिंग में आ गया. धुंआधार पैसा बनाने लगा.टाइगर की इज्जत अपने समाज में बढ़ गई. परिवार अल-हुसैनी बिल्डिंग के पांचवें और छठेमाले पर शिफ्ट हो गया. टाइगर और याकूब दोनों साथ काम करते. पर दोनों में अंतर था.टाइगर हिंदुओं से नफरत करता था. जिहादी मानसिकता का था. दूसरे धर्म के लोगों सेमिलता-जुलता नहीं था. याकूब वैसा नहीं था. बाबरी मस्जिद कांड के बाद बंबई में दंगेभड़के. टाइगर के बारे में लोगों को पता था. टाइगर के ऑफिस तिजारत इंटरनेशनल को आगलगा दिया गया. याकूब के ऑफिस को छोड़ दिया गया. बाबरी से टाइगर को कोई लेना-देनानहीं था. उसे देश के दूसरे मुसलमानों से भी लेना-देना नहीं था. जब उसकी प्रॉपर्टीपर हाथ डाला गया तो उसके दिमाग में आग लग गई. कोई ये हिमाकत कैसे कर सकता था? दाऊदने प्लान बनाया टाइगर के गुस्से को इस्तेमाल करने का. इसके लिये उसे जरूरत पड़ीधर्म की. और पागल लोगों की. उनकी कमी नहीं थी. सब मिल गये. यहां तो नशे में डूबेहुए लोग थे. टाइगर मेमन ने प्लान बना लिया. बंबई में ब्लास्ट करने का. वो बंबई जहांवो पैदा हुआ था. जिसे उसका दोस्त दाऊद अपनी महबूबा कहता था. इतिहास में हमेशा देखागया है कि कोई गुंडा चाहे कुछ भी करे, अपने शहर को महफूज रखता है. क्योंकि इसी सेउसे पहचान मिली होती है. चाहे वो गुंडई ही क्यों ना हो. पर यहां पर काबुल वाली बातहो गई. जैसे रूस के खिलाफ लड़ते-लड़ते गुलबुद्दीन हिकमतियार और मसूद ने काबुल पर हीबमबारी कर दी. ये कैसे हो सकता है? यही काम किया टाइगर मेमन और दाऊद इब्राहिम ने.उस वक्त देश में हालात बदल रहे थे. मंडल-कमंडल की पॉलिटिक्स हो रही थी. इसी केदौरान कुछ लोगों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी. एक पुरानी मस्जिद जिसका बाबरसे कोई वास्ता नहीं था. लोगों का भी नहीं था. कोई नमाज अता करने नहीं जाता था. परलोग भूल गये कि सहमतियां-असहमतियां अपनी जगह होती हैं. अगर आप किसी की पहचान परहमला करते हैं तो लोगों का जानवर बाहर आ जाता है. जिसके लिये समाज तैयार नहीं रहताहै. बाबरी के बाद मुसलमान बोलें या ना बोलें, कट्टरपंथी बोल पड़े. अभी इस्लामिकसमाज देश के हुक्मरान से सवाल पूछता, इससे पहले नशे का कारोबार करने वाले इस्लाम केनये मसीहा बन गये. जिंदा कौमें पांच साल इंतजार करती हैं, ताकि वोट दे के नयाहुक्मरान चुन सकें. मतवाली पागल कौमें इंतजार नहीं करतीं. दाऊद ने अरब सागर केरास्ते बारूद रायगढ़ में पहुंचाया. टाइगर ने वहां से बंबई पहुंचाया. टाइगर ने हीलोकेशन की पहचान की. कि कहां ब्लास्ट करना है. वो सारी जगहें, जहां पर टाइगर अपनेदोस्तों के साथ घूमने गया होगा. 13 मार्च को बंबई दहल गई. सीरियल ब्लास्ट हुये. 257लोग मारे गये. चहकने वाली बंबई कलपने लगी. दंगे भड़क गये. और लोग मारे गये.हिंदू-मुसलमान सबके नये नेता निकलने लगे. मकसद सबका एक ही था- बदला. पता नहींकिससे. अपने सामने रहने वाले फ्लैट वालों से. या फिर सब्जी वाले से. या फिर पतानहीं किससे. ब्लास्ट के एक दिन पहले टाइगर मेमन देश छोड़कर भाग गया था. दुबई. जहांसे वो ISI के कॉन्टैक्ट में था. इसके पहले टाइगर ने अपने परिवार को कराची शिफ्ट करदिया. पर परिवार को इसके बारे में नहीं पता था. याकूब के मुताबिक जब बाप को पता चलाकि टाइगर ISI के लिये काम करता है तो दिमाग फट गया. बूढ़े आदमी ने ISI के लोगों केसामने ही टाइगर को इतना मारा, इतना मारा कि डंडा टूट गया. बाप ने तय कर लिया किपाकिस्तान में नहीं रहना है. गजब का साहस दिखाते हुए याकूब सूटकेस लेकर इंडिया चलदिया. इसमें पाकिस्तान के खिलाफ सबूत इकट्ठे किये गये थे. भाई के खिलाफ भी सबूत थे.ISI के धता बताकर याकूब काठमांडू के रास्ते भारत आ रहा था. वहीं पकड़ा गया. उसेअंदाजा था कि ब्लास्ट के खिलाफ सबूत देने से वो तो बच जाएगा. पर वैसा हुआ नहीं.2015 में याकूब को फांसी हो गई. क्योंकि पता तो उसे था ही प्लानिंग के बारे में.बहुत बवाल हुआ. पर डिसीजन तो डिसीजन होता है. वो भी कोर्ट का. कहने वाले कहते हैंकि मेमन परिवार का सबसे पढ़ा-लिखा इंसान था याकूब. उसे फांसी देना एक सिंबल था किआतंकवाद को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. साथ देने वालों को भुगतना पड़ेगा. टाइगर नेअपनी बहादुरी दिखा दी थी. अनजान लोगों को मार दिया. पूरे परिवार की जिंदगी नरक करदी. ये परिवार देश का सबसे कुख्यात परिवार बन गया था. जो नहीं जानते थे, वो भी नफरतकरते थे. टाइगर फिर कभी नहीं लौटा. सऊदी अरब में ही बिजनेस करने लगा. कहने वालेकहते हैं कि वहां उसका बड़ा नाम है. पाकिस्तान तो आते-जाते ही रहता है. शायद टाइगरको अपने गुनाहों का अंदाजा था. उसने भाई याकूब से कहा था कि मत जाओ. गांधी मत बनो.पर भाई चला आया. याकूब को फांसी के बाद टाइगर ने कहा था कि इसका बदला मैं लूंगा. 23साल बाद टाइगर मेमन की आवाज रिकॉर्ड हुई. याकूब की मौत के बाद उसने अपनी अम्मी कोफोन किया था-अम्मी, तू रो मत. उसकी मौत जाया नहीं जाएगी. सबके आंसू जाया नहींजाएंगे. मैं इसका बदला चुकाऊंगा. पर किससे? एक बार तो बदला लिया. जो उसके परिवार नेभोगा था. दुबारा किससे? पर ये दलीलों वाला इंसान नहीं है. बंबई ब्लास्ट के एकअपराधी ने पुलिस को बताया था कि टाइगर का प्लान बंबई के सहार एयरपोर्ट को उड़ाने काभी था. पर हो नहीं पाया था. मुंबई पुलिस को इंतजार है टाइगर के पकड़े जाने का.मुंबई पुलिस अब पूरी तरह तैयार है. मुंबई की सड़कों पर भीड़ बढ़ गई है. 100 कीस्पीड पर गाड़ी चलाना मुश्किल है. और अब पुलिस टाइगरों के गले में पट्टा डालनाजानती है. (कुछ अंश असद हुसैन जैदी की किताब से साभार)--------------------------------------------------------------------------------कहानी शहाबुद्दीन की जिसने दो भाइयों को तेजाब से नहला दिया थामुख्तार अंसारी बनाम ब्रजेश सिंह: यूपी का सबसे बड़ा गैंगवार